RBSE Class 10th 2018 -S-01-2018 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 10th |
| Exam year | 2018 |
| Subject | -S-01-2018 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 10th 2018 -S-01-2018
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Rajasthan Board Class 10th -S-01-2018 2018 solved Previous Year Question Papers
माध्यमिक पूरक परीक्षा, 2018
SECONDARY SUPPLEMENTARY EXAMINATION, 2018
हिन्दी
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
S-0-Hindi (Supp.) [ Turn over ]
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। हमें आवश्यकता इस बात की है कि हम विदेशी अधिकार से स्वतंत्र रहकर अपने निजी ज्ञान भण्डार की विभिन्न शाखाओं को और उसके साथ ही अँगरेजी भाषा और पाश्चात्य विज्ञान का अध्ययन करें। हमें यांत्रिक और ऐसी सभी शिक्षाओं की आवश्यकता है, जिनसे उद्योग-धंधों की वृद्धि और विकास हो, जिससे मनुष्य नौकरी के लिए मारा-मारा फिरने के बदले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त कमाई कर सके और आपात्काल के लिए संचय भी कर सके। सभी प्रकार की शिक्षा का उद्देश्य 'मनुष्य' निर्माण ही हो। आज हमारे देश को जिस चीज की आवश्यकता है, वह है लोहे की माँसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु व दुर्दमनीय प्रचंड इच्छाशक्ति जो सृष्टि के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में समर्थ हो।
- सभी प्रकार की शिक्षा का क्या उद्देश्य है ?
सभी प्रकार की शिक्षा का उद्देश्य 'मनुष्य' निर्माण ही है। अर्थात् शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य को चरित्रवान, बुद्धिमान, आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है।
- हमें कैसी शिक्षा चाहिए ?
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। साथ ही, हमें यांत्रिक और उद्योग-धंधों को बढ़ाने वाली शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे मनुष्य नौकरी के लिए भटकने के बजाय अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और आपात्काल के लिए संचय भी कर सके।
- आज हमारे देश को किस चीज की आवश्यकता है और क्यों ?
आज हमारे देश को लोहे की माँसपेशियाँ, फौलाद के स्नायु और दुर्दमनीय प्रचंड इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। क्योंकि ये ही सृष्टि के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सकती हैं और किसी भी उपाय से अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में समर्थ होती हैं।
निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
स्वर में पावक यदि नहीं, वृथा बंदन है,
वीरता नहीं तो सभी विनय क्रन्दन है।
सिर पर जिसके असिघात, रक्त चन्दन है,
भ्रामरी उसी का करती अभिनंदन है।
दानवी रक्त से सभी पाप धुलते हैं,
ऊँची मनुष्यता के पथ भी खुलते हैं।
वे देश शान्ति के सबसे शत्रु प्रबल हैं,
जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं।
हैं जिनके उदर विशाल, बाँह छोटी है,
भोथरे दाँत, पर जीभ बहुत मोटी है।
औरों के पाले जो अलज्ज पलते हैं,
अथवा भार पर लदे हुए चलते हैं।
- पद्यांश में 'स्वर में पावक' से क्या तात्पर्य है ?
'स्वर में पावक' का तात्पर्य है कि वाणी में आग (उत्साह, तेज और ओज) होना चाहिए। यदि वाणी में यह तेज नहीं है, तो केवल बंदन (स्तुति) व्यर्थ है।
- भ्रामरी किसका अभिनंदन करती है और क्यों ?
भ्रामरी (भौंरों की गुंजन) उस व्यक्ति का अभिनंदन करती है जिसके सिर पर तलवार का प्रहार हुआ हो और रक्त चंदन के समान लगा हो। अर्थात् वीर और योद्धा का अभिनंदन किया जाता है, जो युद्ध में घायल होने पर भी डटा रहता है।
- दानवी रक्त से क्या होता है ?
दानवी रक्त (दानवों के रक्त) से सभी पाप धुलते हैं और मनुष्यता के ऊँचे मार्ग खुलते हैं। यहाँ दानवी रक्त का अर्थ शत्रुओं के रक्त से है, जिससे पापों का नाश होता है और मनुष्यता का उत्थान होता है।
- कवि के अनुसार शांति के सबसे बड़े शत्रु कौन हैं ?
कवि के अनुसार, वे देश शांति के सबसे बड़े शत्रु हैं जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल (कमजोर) हैं। अर्थात् जो शक्तिशाली होने के बावजूद कमजोरी दिखाते हैं, वे शांति के लिए खतरनाक हैं।
- पद्यांश में 'भोथरे दाँत, पर जीभ बहुत मोटी है' पंक्ति का क्या अर्थ है ?
इस पंक्ति का अर्थ है कि जिनके दाँत भोथरे (कमजोर) हैं, लेकिन जीभ बहुत मोटी (बातूनी या झूठ बोलने वाली) है। यह उन लोगों का वर्णन है जो कर्महीन होते हैं, लेकिन बातें बहुत करते हैं।
4. किसका विनय क्रन्दन के समान है ?
उत्तर: कुत्ते का विनय क्रन्दन के समान है।
5. “असिघात' शब्द का अर्थ बताइए |
उत्तर: 'असिघात' शब्द का अर्थ है – तलवार का प्रहार या तलवार से किया गया वार।
6. देश की शान्ति का सबसे प्रबल शत्रु किसे बताया गया है ?
उत्तर: देश की शान्ति का सबसे प्रबल शत्रु आतंकवाद को बताया गया है।
खण्ड-2
7. दिए गए बिंदुओं के आधार पर निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में सारगर्भित निबंध लिखिए : (8 अंक)
(क) कन्या भ्रूण हत्या
- प्रस्तावना
- कन्या भ्रूण हत्या के दुष्प्रभाव
- कन्या भ्रूण हत्या के कारण
- रोकने के उपाय
(ख) इन्टरनेट : वरदान या अभिशाप
- प्रस्तावना
- इन्टरनेट का वर्तमान स्वरूप
- इन्टरनेट का जीवन पर प्रभाव
- इन्टरनेट के दुष्प्रभाव
(ग) संस्कारों का आधुनिकीकरण
- प्रस्तावना
- भारतीय संस्कृति
- भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव
- संस्कारों का पतन
खण्ड — 2
6. स्वच्छ भारत अभियान
प्रस्तावना
- स्वच्छता क्यों आवश्यक है
- स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत सरकारी प्रयास
- उपसंहार
8. पत्र लेखन
अथवा
आपके मोहल्ले में असामाजिक तत्त्वों द्वारा आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ की शिकायत करते हुए थानाधिकारी को एक पत्र लिखिए।
पत्र प्रारूप:
सेवा में,
थानाधिकारी महोदय,
थाना [स्थान], [शहर]।
विषय: मोहल्ले में असामाजिक तत्त्वों द्वारा छेड़छाड़ की शिकायत हेतु।
महोदय,
निवेदन है कि हमारे मोहल्ले में कुछ असामाजिक तत्त्व प्रतिदिन लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते हैं। इससे क्षेत्र में भय का वातावरण है। अतः आपसे अनुरोध है कि इन पर उचित कार्रवाई करें ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
धन्यवाद।
भवदीय,
[आपका नाम]
[पता]
अथवा
स्वयं को जयपुर निवासी प्रकाश मानते हुए गीता-पुस्तक-महल दिल्ली को पुस्तकें मँगवाने हेतु पत्र लिखिए जिसमें आवश्यक पुस्तकों के नाम की सूची संलग्न हो।
पत्र प्रारूप:
सेवा में,
प्रबंधक,
गीता-पुस्तक-महल,
दिल्ली।
विषय: पुस्तकें मँगवाने हेतु।
महोदय,
कृपया निम्नलिखित पुस्तकों की सूची अनुसार पुस्तकें वी.पी.पी. द्वारा मेरे पते पर भेजने का कष्ट करें। पुस्तकों की सूची संलग्न है।
धन्यवाद।
भवदीय,
प्रकाश
जयपुर
संलग्न: पुस्तकों की सूची
- हिंदी साहित्य का इतिहास
- व्याकरण प्रवेशिका
- काव्य संग्रह
खण्ड — 3
9. क्रिया की परिभाषा देते हुए संयुक्त क्रिया को समझाइए।
क्रिया की परिभाषा: क्रिया वह शब्द है जिससे किसी कार्य के करने या होने का पता चलता है। जैसे: पढ़ना, खाना, दौड़ना।
संयुक्त क्रिया: जब दो या दो से अधिक क्रियाएँ मिलकर एक क्रिया का काम करती हैं, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। इसमें एक मुख्य क्रिया और एक सहायक क्रिया होती है। जैसे: वह पढ़ने लगा (पढ़ना + लगना), उसने खा लिया (खाना + लेना)।
10. "किसान ने खेत जोता।" वाक्य में कारक, काल व वाच्य बताइए।
- कारक: 'ने' चिह्न के कारण कर्ता कारक (किसान ने) और 'खेत' में कर्म कारक (खेत को)।
- काल: भूतकाल (जोता - क्रिया का भूतकाल रूप)।
- वाच्य: कर्तृवाच्य (कर्ता प्रधान है - किसान ने)।
11. निम्न शब्दों का विग्रह करते हुए समास बताइए:
- यथाशक्ति — विग्रह: शक्ति के अनुसार। समास: अव्ययीभाव समास।
- घनश्याम — विग्रह: घन के समान श्याम (काला)। समास: कर्मधारय समास।
12. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए:
- अशुद्ध: शीतल फलों का रस पीजिए।
शुद्ध: शीतल फलों का रस पीजिए। (यह वाक्य पहले से शुद्ध है। यदि अर्थ बदलना हो तो: शीतल फलों का रस पीएँ।) - अशुद्ध: चोर दण्ड देने योग्य है।
शुद्ध: चोर दण्ड देने योग्य है। (यह वाक्य भी शुद्ध है। यदि अर्थ स्पष्ट करना हो तो: चोर दण्ड के योग्य है।)
खण्ड-4
3. “ईद का चाँद होना' मुहावरे का अर्थ बताते हुए वाक्य प्रयोग कीजिए।
अर्थ: बहुत दिनों बाद दिखाई देना या मिलना।
वाक्य प्रयोग: मेरा मित्र तो वर्षों बाद मिला, मानो ईद का चाँद होना वाली बात सच हो गई।
4. “कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर' लोकोक्ति का अर्थ लिखिए।
अर्थ: समय के अनुसार परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं; कभी एक चीज़ दूसरी पर हावी होती है, तो कभी दूसरी पहली पर।
5. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
पद्यांश:
ऊधौ मन माने की बात |
दाख छुहारा छांड़ि अमृत फल, विषकीरा विष खात |
ज्यों चकोर कों देई कपूर कोउ, तजि अंगार अघात |
मधुप करत घर फोरि काठ मैं, बंधत कमल के पात |
सत पतंग हित जानि आपनो, दीपक सौं लपटात |
सूरदास जाकौ मन जासौ, सोई ताहि सुहात |
सप्रसंग व्याख्या:
संदर्भ: प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' से लिया गया है। इसमें उद्धव के माध्यम से गोपियों की मनोदशा का वर्णन किया गया है।
प्रसंग: गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि मन जिस चीज़ में लगता है, वही उसे अच्छी लगती है। वे श्रीकृष्ण के प्रति अपने प्रेम को सही ठहराती हैं।
व्याख्या: गोपियाँ कहती हैं कि मन की बात माननी पड़ती है। जैसे कोई व्यक्ति अंगूर और छुहारा छोड़कर अमृत फल खाता है, और विषैला कीड़ा विष ही खाता है। जैसे चकोर पक्षी को कपूर देने पर भी वह अंगारा ही खाना चाहता है। भौंरा लकड़ी को तोड़कर घर बनाता है, लेकिन कमल के पत्ते पर बंध जाता है। पतंग अपना हित समझकर दीपक से लिपट जाती है। सूरदास कहते हैं कि जिसका मन जिसमें लगता है, वही उसे अच्छा लगता है। गोपियों का मन श्रीकृष्ण में लगा है, इसलिए उन्हें कृष्ण ही सब कुछ लगते हैं।
अथवा
पद्यांश:
झहरि झहरि झीनी बूँद हैं परति मानो,
घहरि घहरि घटा घेरी है गगन में |
आनि हा स्याम मो सों, चलौ झूलिबे को आजु,
फूली ना समानी, भई ऐसी हौं मगन मैं ||
चाहति उठयोई, उड़ि गई सो निगोड़ी नींद,
सोय गए भाग मेरे जागि वा जगन में |
आँखि खोलि कै तो, घन हैं ना घनश्याम,
अग छायी बूँदें मेरे, आँसु हवै दृगन में ||
सप्रसंग व्याख्या:
संदर्भ: प्रस्तुत पद्यांश सूरदास के 'सूरसागर' से लिया गया है। इसमें गोपी की विरह-व्यथा का वर्णन है।
प्रसंग: गोपी बरसात के मौसम में श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल है। वह झूला झूलने के लिए कृष्ण को बुलाती है, लेकिन नींद के कारण वह सपना देखती है और जागने पर निराश होती है।
व्याख्या: गोपी कहती है कि हल्की-हल्की बूँदें झर-झर गिर रही हैं, और आकाश में बादल गरज-गरज कर घिर आए हैं। वह श्याम (कृष्ण) से कहती है कि आज झूला झूलने चलो। वह फूली नहीं समाती, मगन हो गई है। वह उठना चाहती है, लेकिन नींद उड़ गई। उसके भाग सो गए, जबकि संसार जाग रहा है। जब वह आँख खोलती है, तो देखती है कि न तो बादल हैं और न ही घनश्याम (कृष्ण)। उसकी आँखों में बूँदें आँसू बनकर छा गई हैं। यह गोपी के विरह और भ्रम की स्थिति को दर्शाता है।
6. निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
गद्यांश: ईर्ष्या का काम जलाना है मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत से लोगों को जानते होंगे जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनाने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है और वे बड़ी होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से कहते हैं मानो विश्व कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। जरा अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे बोलने में संयम और शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज उनका स्थान कहाँ होता।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'ईर्ष्या' शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक श्री रामचन्द्र शुक्ल जी हैं।
प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्या की विनाशकारी प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है। वे बताते हैं कि ईर्ष्या पहले स्वयं ईर्ष्यालु व्यक्ति को ही नष्ट करती है, फिर दूसरों को।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या का स्वभाव जलाना है, लेकिन सबसे पहले वह उसी व्यक्ति को जलाती है जिसके हृदय में वह उत्पन्न होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति स्वयं जलता है और अपनी जलन को दूसरों पर उड़ेलता है। लेखक कहते हैं कि हम ऐसे बहुत से लोगों को जानते हैं जो ईर्ष्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं। वे हमेशा इस चिंता में लगे रहते हैं कि कहाँ कोई सुनने वाला मिले और वे अपने मन का गुबार निकाल सकें। जैसे ही उन्हें कोई श्रोता मिलता है, वे ग्रामोफोन की तरह बोलने लगते हैं और बड़ी चालाकी से एक-एक घटना इस तरह से कहते हैं मानो संसार के कल्याण के अलावा उनका कोई और उद्देश्य ही न हो। लेखक उनसे कहते हैं कि वे अपने इतिहास पर नज़र डालें और सोचें कि इस बुरे काम को शुरू करने के बाद से वे आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यदि वे बोलने में संयम रखते और अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करते, तो आज उनका स्थान कहीं और होता।
अथवा
गद्यांश: रमजान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुर्ते में बटन नहीं है। पड़ोस के घर से सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं। उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दो। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना भेंटना। दोपहर से पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'ईदगाह' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक प्रेमचंद जी हैं।
प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने ईद के दिन के सुहावने वातावरण और गाँव में होने वाली तैयारियों का वर्णन किया है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि रमजान के तीस रोज़ों के बाद ईद का चाँद दिखाई दिया है। ईद का प्रभात बहुत सुंदर और मनोहर है। पेड़ों पर हरियाली, खेतों में रौनक और आसमान पर लालिमा छाई हुई है। सूरज भी आज बहुत प्यारा और शीतल लग रहा है, मानो वह पूरे संसार को ईद की बधाई दे रहा हो। गाँव में बहुत हलचल है। सभी लोग ईदगाह जाने की तैयारी कर रहे हैं। किसी के कुर्ते में बटन नहीं है, तो वह पड़ोस से सुई-धागा लेने दौड़ रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, तो वह तेल डलवाने तेली के घर भाग रहा है। लोग जल्दी-जल्दी बैलों को चारा-पानी दे रहे हैं क्योंकि ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता है और रास्ते में सैकड़ों लोगों से मिलना-भेंटना होगा, इसलिए दोपहर से पहले लौटना संभव नहीं है। लड़के सबसे ज्यादा खुश हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं रखा, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी सभी के हिस्से में है।
7. 'लक्ष्मण-परशुराम संवाद' के आधार पर तुलसीदास की भाषागत विशेषताएँ बताइए। (उत्तर सीमा 200 शब्द)
तुलसीदास जी की भाषा अवधी है, जो पूर्वी हिंदी की एक प्रमुख बोली है। 'लक्ष्मण-परशुराम संवाद' में उनकी भाषागत विशेषताएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं:
- अवधी भाषा का प्रयोग: तुलसीदास ने इस संवाद में अवधी भाषा का प्रयोग किया है, जो सरल, सहज और मधुर है। जैसे 'बोले', 'कहा', 'सुनु' आदि शब्द अवधी के विशिष्ट रूप हैं।
- संस्कृतनिष्ठ शब्दावली: अवधी होते हुए भी इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है, जैसे 'अभिमान', 'क्रोध', 'विनय', 'प्रताप' आदि।
- अलंकारों का प्रयोग: तुलसीदास ने इस संवाद में अनुप्रास, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है। जैसे परशुराम के क्रोध को 'अग्नि' से उपमा देना।
- भावानुकूल भाषा: परशुराम के क्रोध में भाषा उग्र और आवेगपूर्ण है, जबकि लक्ष्मण के विनय में भाषा शांत और मृदुल है। यह भावानुकूल भाषा की विशेषता है।
- मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग: तुलसीदास ने 'हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और' जैसे मुहावरों का प्रयोग कर भाषा को प्रभावशाली बनाया है।
- चित्रात्मकता: उनकी भाषा में चित्रात्मकता है, जो पात्रों के मनोभावों को सजीव कर देती है। परशुराम के क्रोध और लक्ष्मण की चतुराई का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है।
इस प्रकार, तुलसीदास की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण, अलंकारयुक्त और भावानुकूल है, जो 'लक्ष्मण-परशुराम संवाद' में पूर्णतः प्रतिबिंबित होती है।
अथवा
'ऋतु-वर्णन' कविता सेनापति के ऋतुवर्णन का प्रौढ़ और प्रांजल नमूना है। स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा 200 शब्द)
सेनापति जी रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी कविता 'ऋतु-वर्णन' वास्तव में ऋतुवर्णन का प्रौढ़ और प्रांजल नमूना है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- प्रौढ़ता: सेनापति का ऋतुवर्णन प्रौढ़ है, अर्थात इसमें गहन अनुभव और परिपक्वता है। वे ऋतुओं के केवल बाहरी स्वरूप का ही नहीं, बल्कि उनके मनोभावों और प्रभावों का भी वर्णन करते हैं।
- प्रांजलता: उनकी भाषा प्रांजल है, अर्थात सरल, स्पष्ट और सुबोध। वे कठिन शब्दों का प्रयोग न करके सहज भाषा में ऋतुओं का चित्रण करते हैं।
- चित्रात्मकता: सेनापति का वर्णन अत्यंत चित्रात्मक है। वे ऋतुओं के दृश्यों को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो वे आँखों के सामने जीवंत हो उठते हों।
- स्वाभाविकता: उनका ऋतुवर्णन स्वाभाविक है, इसमें कृत्रिमता का अभाव है। वे प्रकृति के यथार्थ रूप को प्रस्तुत करते हैं।
- अलंकारों का सुंदर प्रयोग: सेनापति ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सहज प्रयोग कर वर्णन को प्रभावशाली बनाया है।
- ऋतुओं का विविध वर्णन: उन्होंने विभिन्न ऋतुओं - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर - का सुंदर वर्णन किया है, जिसमें प्रत्येक ऋतु की विशेषताएँ उभरकर आती हैं।
इस प्रकार, सेनापति की कविता 'ऋतु-वर्णन' प्रौढ़ता और प्रांजलता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो रीतिकालीन ऋतुवर्णन की परंपरा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
प्रश्न 8.
“गौरा वास्तव में बहुत प्रियदर्शनी थी ।” पंक्ति के आधार पर गौरा के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वभावगत विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (उत्तर सीमा 200 शब्द)
उत्तर: गौरा का शारीरिक सौन्दर्य अद्वितीय था। वह बहुत प्रियदर्शनी (देखने में सुंदर) थी। उसका मुखमंडल आकर्षक, नेत्र कमल के समान सुंदर और शरीर सुगठित था। उसकी मुस्कान मनमोहक थी। स्वभावगत विशेषताओं में वह विनम्र, सरल और मृदुभाषी थी। वह दूसरों की भावनाओं को समझने वाली और सहानुभूतिपूर्ण थी। उसका व्यवहार सभी के प्रति मैत्रीपूर्ण और सौम्य था। वह अपने आत्मीय स्वभाव से सबका मन मोह लेती थी। उसकी प्रियदर्शनीता केवल बाहरी रूप तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसके आंतरिक गुणों ने उसे और भी आकर्षक बना दिया था।
अथवा
“अमर-शहीद” एकांकी के आधार पर सागरमल गोपा का चरित्र-चित्रण कीजिए। (उत्तर सीमा 200 शब्द)
उत्तर: सागरमल गोपा “अमर-शहीद” एकांकी का प्रमुख पात्र है। वह एक सच्चा देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी है। उसका चरित्र निडर, साहसी और त्यागमय है। वह अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध डटकर खड़ा होता है। उसमें दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास है। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है और मृत्यु से भयभीत नहीं होता। उसका बलिदान देश के प्रति उसके अटूट प्रेम को दर्शाता है। वह एक आदर्श क्रांतिकारी है जो अपने जीवन का बलिदान देकर भी अमर हो जाता है। उसका चरित्र युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।
प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर 40 से 50 शब्दों में दीजिए:
प्रश्न 20.
“प्रभो” कविता में जयशंकर प्रसाद ने प्रकृति पदिमिनी का अंशु माली किसे कहा है और क्यों?
उत्तर: जयशंकर प्रसाद ने “प्रभो” कविता में सूर्य को प्रकृति पदिमिनी का अंशु माली कहा है। सूर्य अपनी किरणों (अंशु) से प्रकृति को सजाता है, जैसे माली फूलों की माला बनाता है। सूर्य के प्रकाश से ही प्रकृति का सौंदर्य निखरता है, इसलिए उसे अंशु माली कहा गया है।
प्रश्न 21.
कविता “मातृ-वंदना” के अनुसार कवि माँ के चरणों में क्या-क्या समर्पित करना चाहता है?
उत्तर: कविता “मातृ-वंदना” के अनुसार कवि माँ के चरणों में अपना मन, बुद्धि, धन, जीवन और सब कुछ समर्पित करना चाहता है। वह माँ के प्रति अपनी कृतज्ञता और प्रेम प्रकट करने के लिए अपने अस्तित्व का हर अंश उन्हें अर्पित करने को तत्पर है।
प्रश्न 22.
“माँ ने कहा लड़की होना,
पर लड़की जैसा दिखाई मत देना ।”
उपर्युक्त पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इन पंक्तियों का भाव है कि माँ अपनी बेटी को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। वह चाहती है कि बेटी लड़की होने के बावजूद कमजोर या असहाय न दिखे। उसे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए और समाज में अपनी पहचान बनानी चाहिए। यह नारी सशक्तिकरण का संदेश है।
प्रश्न 23.
“एक अद्भुत स्वप्न” पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक ने देवालय बनाने का विचार क्यों त्याग दिया?
उत्तर: लेखक ने देवालय बनाने का विचार इसलिए त्याग दिया क्योंकि उसे एहसास हुआ कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि मानव सेवा में निवास करता है। उसने देखा कि गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करना ही सच्ची पूजा है। इसलिए उसने मंदिर बनाने के बजाय मानवता की सेवा को प्राथमिकता दी।
प्रश्न 24.
द्विवेदी जी ने खत्री-शिक्षा के समर्थन में कौन-कौन से तर्क दिए हैं?
उत्तर: द्विवेदी जी ने खत्री-शिक्षा के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए: (1) खत्री-शिक्षा से व्यापार और लेखा-जोखा में दक्षता आती है। (2) यह आर्थिक स्वावलंबन का मार्ग प्रशस्त करती है। (3) इससे समाज में व्यावसायिक कुशलता बढ़ती है। (4) यह शिक्षा व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी है।
प्रश्न 25.
“मिशनरी युवतियाँ वहाँ आकर थकी सी एक तरफ बैठ गईं – उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके कुछ बिंदुओं की तरह।” लेखक ने मिशनरी युवतियों को कैनवस में छिटके हुए बिंदुओं की तरह माना है, क्यों?
उत्तर: लेखक ने मिशनरी युवतियों को कैनवस में छिटके हुए बिंदुओं की तरह इसलिए माना क्योंकि वे उस विशाल परिदृश्य में अकेली और अलग-थलग दिख रही थीं। उनकी थकान और अकेलापन उन्हें पूरे वातावरण से अलग कर रहा था, जैसे किसी चित्र में बिखरे हुए बिंदु अलग दिखते हैं।
प्रश्न संख्या 25 से 28 का उत्तर एक पंक्ति में दीजिए |
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“राजिया रा सोरठा' पाठ के आधार पर बताइए हमें किस नगर में नहीं रहना चाहिए ?
उत्तर: हमें उस नगर में नहीं रहना चाहिए जहाँ सज्जनों का आदर न हो और दुर्जनों का बोलबाला हो।
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नागार्जुन की कविता 'कल और आज' में किसका वर्णन है ?
उत्तर: इस कविता में भारतीय समाज में आए परिवर्तनों और आधुनिकता के प्रभाव का वर्णन है।
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लोक संत दादूदयाल ने दादू पंथ की स्थापना कहाँ और किस नाम से की ?
उत्तर: दादूदयाल ने दादू पंथ की स्थापना जयपुर (राजस्थान) में 'ब्रह्म पंथ' नाम से की।
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संत पीपा का मन राज-काज से क्यों उचट गया ?
उत्तर: संत पीपा का मन राज-काज से इसलिए उचट गया क्योंकि उन्हें सांसारिक ऐश्वर्य और राज-पाट की नश्वरता का बोध हो गया था और वे ईश्वर-भक्ति में लीन हो गए।
प्रश्न 29: निम्न दो रचनाकारों का परिचय दीजिए : 2×2=4
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(क) नागार्जुन
परिचय: नागार्जुन (1911-1998) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार और पत्रकार थे। इनका जन्म बिहार के दरभंगा जिले में हुआ। ये प्रगतिशील विचारधारा के कवि थे और इनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, किसान-मजदूरों की पीड़ा और प्रकृति-प्रेम के स्वर मुखरित होते हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'युगधारा', 'प्यासी पथराई आँखें', 'बूढ़ा पेड़', 'रत्नगर्भ' आदि।
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(ख) महादेवी वर्मा
परिचय: महादेवी वर्मा (1907-1987) हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री और गद्यकार थीं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में हुआ। ये हिंदी साहित्य में छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ मानी जाती हैं। इनकी कविताओं में वेदना, करुणा, प्रकृति-चित्रण और रहस्यवाद के तत्व प्रमुख हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'नीहार', 'रश्मि', 'नीरजा', 'सांध्यगीत', 'दीपशिखा' आदि।
प्रश्न 30: निम्न यातायात संकेतों का अर्थ बताइए : 1×4=4
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(क) [यातायात संकेत चित्र - त्रिभुजाकार लाल बॉर्डर वाला चिन्ह जिसमें दो विपरीत दिशाओं में जाते तीर हैं]
अर्थ: यह संकेत 'दोहरी सड़क' या 'दो-तरफा यातायात' का है, जो बताता है कि आगे की सड़क पर दोनों दिशाओं से वाहन आ सकते हैं।
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(ख) [यातायात संकेत चित्र - लाल वृत्त के अंदर सफेद पट्टी वाला चिन्ह]
अर्थ: यह 'प्रवेश निषेध' (No Entry) का संकेत है, जो दर्शाता है कि इस ओर वाहनों का प्रवेश वर्जित है।
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(ग) [यातायात संकेत चित्र - लाल त्रिभुज के अंदर 'X' चिन्ह]
अर्थ: यह 'रुकना वर्जित' (No Stopping) का संकेत है, जो बताता है कि यहाँ वाहन रोकना मना है।
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(घ) [यातायात संकेत चित्र - लाल त्रिभुज के अंदर एक क्षैतिज रेखा]
अर्थ: यह 'स्टॉप' (Stop) का संकेत है, जो बताता है कि यहाँ वाहन को पूरी तरह रुकना आवश्यक है।
— S-01-Hindi (Supp.) —