RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers

You opened the RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers page — a focused place to read the real previous year question paper for that subject and year. RBSE Solution keeps exam-year sets together so you can practise the same cycle your seniors faced.

Previous year papers reward patience: read instructions, note mark distribution, then attempt questions before peeking at solutions elsewhere on the site. This URL always loads the same free previous year papers content for Hindi-S-01-2018-With Solution (2018).

Use the details table to confirm class and year, then scroll to the paper images or PDF below. More subjects from 2018 are linked later on this page.

Paper details

Quick reference for this previous year papers page — confirm board, class, and year & subject before you study.

Board RBSE
Class Class 10th
Exam year 2018
Subject Hindi-S-01-2018-With Solution
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

The table summarises this Previous Year Papers resource. Confirm RBSE, Class 10th, year 2018, and subject Hindi-S-01-2018-With Solution before studying.

RBSE Solution organises previous year papers so each URL carries chapter-specific guidance — better for students and for search engines than one generic paragraph for the whole class.

How to practise with this question paper

Stage one: read the Hindi-S-01-2018-With Solution question paper from 2018 without a timer and highlight command words — explain, prove, calculate, discuss. Stage two: attempt selected questions closed-book. Stage three: compare with solutions or teacher feedback.

Previous Year Papers work best when you log mistakes by topic, not only by question number. That log becomes your revision index before pre-boards.

RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution

Scroll through the Previous Year Papers pages for Hindi-S-01-2018-With Solution (2018).

RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 0
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 1
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 2
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 3
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 4
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 5
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 6
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 7
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 8
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 9
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 10
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 11
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 12
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 13
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 14
https://rbsesolution.com
RBSE Class 10th 2018 Hindi-S-01-2018-With Solution Previous Year Papers 15
https://rbsesolution.com

Rajasthan Board Class 10th Hindi-S-01-2018-With Solution 2018 solved Previous Year Question Papers

माध्यमिक परीक्षा, 2018

SECONDARY EXAMINATION, 2018

हिन्दी

समय : 3 घण्टे 15 मिनट       पूर्णांक : 80


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
  2. सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।

प्रश्न-पत्र कोड : S-0-Hindi       कक्षा : X Hindi

नामांक : ____________________       रोल नं. : ____________________

प्रश्नों की संख्या : 30       मुद्रित पृष्ठ : 8


RBSE 2018 Solved Paper (Solution Attached)

यह प्रश्न-पत्र माध्यमिक परीक्षा, 2018 के हिन्दी विषय का है। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

खण्ड - I

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

कबीर ने समाज में रहकर समाज का बड़े समीप से निरीक्षण किया। समाज में फैले बाह्याडंबर, भेदभाव, सांप्रदायिकता आदि का उन्होंने पुष्ट-प्रमाण लेकर ऐसा दृढ़ विरोध किया कि किसी की हिम्मत नहीं हुई जो उनके अकाट्य तर्कों को काट सके। कबीर का व्यक्तित्व इतना ऊँचा था कि उनके सामने टिक सकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। इस प्रकार उन्होंने समाज तथा धर्म की बुराइयों को निकाल-निकालकर सबके सामने रखा। ऊँचा नाम रखकर संसार को ठगने वालों के नकली चेहरों को सबको दिखाया, और दीन-दलितों को ऊपर उठाने का उपदेश देकर अपने व्यक्तित्व को सुधार कर सबके सामने एक महान आदर्श प्रस्तुत कर सिद्धांतों का निरूपण किया। कर्म, सेवा, अहिंसा तथा निर्गुण मार्ग का प्रसार किया। कर्म-कांड तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया। अपनी साखियों, रमैनियों तथा शब्दों को बोलचाल की भाषा में रचकर सबके सामने एक विशाल ज्ञानमार्ग खोला। इस प्रकार कबीर ने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया और कथनी-करनी की एकता पर बल दिया। वे महान आत्मा, समाज-सुधारक तथा महान कवि थे। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम के बीच समन्वय की धारा प्रवाहित कर दोनों को ही शीतलता प्रदान की।

  1. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

    उत्तर: कबीर का समाज-सुधार और समन्वयवादी दृष्टिकोण

  2. कबीर के व्यक्तित्व की क्या विशेषता थी?

    उत्तर: कबीर का व्यक्तित्व इतना ऊँचा और प्रभावशाली था कि उनके सामने कोई टिक नहीं सकता था। वे समाज और धर्म की बुराइयों का पुष्ट प्रमाणों के साथ दृढ़ विरोध करते थे और उनके अकाट्य तर्कों को कोई काट नहीं सकता था। वे महान आत्मा, समाज-सुधारक और कवि थे।

  3. धर्म के विषय में कबीर का क्या दृष्टिकोण था?

    उत्तर: कबीर ने धर्म के क्षेत्र में कर्म-कांड और मूर्तिपूजा का विरोध किया। उन्होंने कर्म, सेवा, अहिंसा और निर्गुण मार्ग का प्रसार किया। वे समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाकर हिंदू-मुस्लिम के बीच समन्वय की धारा प्रवाहित करना चाहते थे और कथनी-करनी की एकता पर बल देते थे।

निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

ओ बदनसीब अंधो! कमजोर अभागो,
अब तो खोलो नयन नींद से जागो।
वह अधी? बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गई, वही पापी है।
जब तक प्रसन्न यह अनल सगुण हँसते हैं,
है जहाँ खड़ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्म पालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पावक प्रचंडतम वहाँ प्रकट होता है।

4. भारतवासियों के प्रति कवि क्यों आक्रोशित है ?

कवि भारतवासियों के प्रति इसलिए आक्रोशित है क्योंकि वे अपने प्राचीन गौरव, संस्कृति और आदर्शों को भूलकर पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में लग गए हैं। वे स्वार्थी, आलसी और परतंत्र हो गए हैं, जिससे उनका पतन हुआ है।

5. पुण्य का क्षय एवं स्वार्थ का उदय कब होता है ?

पुण्य का क्षय और स्वार्थ का उदय तब होता है जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, धर्म का पतन होता है, और समाज में अनैतिकता, लोभ तथा अहंकार बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में सत्य, दया और परोपकार जैसे गुण नष्ट हो जाते हैं।

6. धर्म का पालन किस प्रकार से किया जा सकता है ?

धर्म का पालन सत्य, अहिंसा, दया, परोपकार, ईमानदारी और कर्तव्यपालन के माध्यम से किया जा सकता है। व्यक्ति को अपने कर्मों में नैतिकता का पालन करना चाहिए, दूसरों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।


खण्ड - 2

दिए गए बिंदुओं के आधार पर निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबंध लिखिए:

(क) समाचार-पत्रों का महत्त्व

  1. प्रस्तावना
  2. समाचार-पत्रों का वर्तमान स्वरूप
  3. समाचार-पत्रों का दायित्व
  4. उपसंहार

(ख) राजस्थान में गहराता जल संकट

  1. प्रस्तावना
  2. जल संकट के कारण
  3. जल संकट निराकरण के उपाय
  4. उपसंहार

खण्ड - 2

(ग) उपभोक्तावाद और भारतीय संस्कृति

  1. प्रस्तावना
  2. पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव
  3. उपभोक्तावाद, उदारवाद और आर्थिक सुधार
  4. उपसंहार

(घ) राष्ट्रीय विकास में महिलाओं की भागीदारी

  1. प्रस्तावना व स्वरूप
  2. राष्ट्र विकास में महिला भागीदारी की आवश्यकता
  3. कामकाजी महिलाओं की समस्या व उनका समाधान
  4. उपसंहार

8. पत्र लेखन

प्रश्न: आपका नाम ईशान्त है। आप लक्ष्मीनगर, जयपुर के हैं। आपके क्षेत्र में अक्सर अनियमित बिजली कटौती की समस्या रहती है। नियमित विद्युत सप्लाई दिलाने हेतु मुख्य अभियंता 'विद्युत', जयपुर को एक शिकायती पत्र लिखिए।

पत्र का प्रारूप:

सेवा में,
मुख्य अभियंता,
विद्युत विभाग,
जयपुर।

दिनांक: 15 फरवरी, 2018

विषय: अनियमित बिजली कटौती की समस्या के संबंध में शिकायत।

महोदय,

मैं ईशान्त, लक्ष्मीनगर, जयपुर का निवासी हूँ। हमारे क्षेत्र में पिछले कई दिनों से अनियमित बिजली कटौती की समस्या बनी हुई है। बिना किसी सूचना के बार-बार बिजली गुल हो जाती है, जिससे निवासियों को अत्यधिक कठिनाई होती है। विशेषकर गर्मी के मौसम में यह समस्या और विकट हो जाती है।

अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि हमारे क्षेत्र में नियमित विद्युत सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ।

धन्यवाद।

भवदीय,
ईशान्त
लक्ष्मीनगर, जयपुर

अथवा

प्रश्न: स्वयं को रतलाम का पुस्तक विक्रेता दीपक मानते हुए पुस्तक महल, नई दिल्ली को नवीनतम पुस्तक सूची भेजने हेतु एक पत्र लिखिए।

पत्र का प्रारूप:

सेवा में,
प्रबंधक,
पुस्तक महल,
नई दिल्ली।

दिनांक: 15 फरवरी, 2018

विषय: नवीनतम पुस्तक सूची भेजने हेतु अनुरोध।

महोदय,

मैं दीपक, रतलाम का पुस्तक विक्रेता हूँ। मैं आपके प्रकाशन की पुस्तकें अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराना चाहता हूँ। कृपया मुझे अपने प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक सूची (कैटलॉग) शीघ्र भेजने का कष्ट करें, ताकि मैं अपने ग्राहकों को नई पुस्तकों के बारे में जानकारी दे सकूँ।

धन्यवाद।

भवदीय,
दीपक
पुस्तक विक्रेता, रतलाम


खण्ड - 3

9. कर्म के आधार पर क्रिया के भेद बताते हुए उनकी परिभाषा लिखिए।

कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद होते हैं:

  1. सकर्मक क्रिया: जिस क्रिया का फल कर्ता पर न पड़कर कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे: राम ने पुस्तक पढ़ी। (यहाँ 'पुस्तक' कर्म है।)
  2. अकर्मक क्रिया: जिस क्रिया का फल कर्ता पर ही पड़ता है और उसे किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे: बच्चा रोता है। (यहाँ कोई कर्म नहीं है।)

10. “राधा ने मिठाई खाई।” वाक्य में निहित कारक, काल और वाच्य लिखिए।

  • कारक: 'राधा ने' – कर्ता कारक (ने चिह्न), 'मिठाई' – कर्म कारक (को चिह्न गृहीत)
  • काल: भूतकाल (सामान्य भूत)
  • वाच्य: कर्तृवाच्य (कर्ता की प्रधानता)

11. बहुब्रीहि समास की सोदाहरण परिभाषा लिखिए।

परिभाषा: बहुब्रीहि समास में समस्त पद का अर्थ किसी तीसरे व्यक्ति या वस्तु से होता है, न कि समास के किसी भी पद से। इसमें दोनों पद प्रधान नहीं होते, बल्कि कोई अन्य अर्थ प्रधान होता है।

उदाहरण: 'नीलकंठ' – नील है कंठ जिसका (अर्थात शिव)। यहाँ 'नील' और 'कंठ' दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (शिव) का बोध कराते हैं।

खण्ड - 3

2. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए :

(क) धोबी ने अच्छे कपड़े धोए।

शुद्ध रूप: धोबी ने कपड़े अच्छे धोए।

(ख) सुदामा पक्के कृष्ण के मित्र थे।

शुद्ध रूप: सुदामा पक्के मित्र थे कृष्ण के।

3. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए :

(क) बालू से तेल निकालना

अर्थ: असंभव कार्य करना या बहुत कठिन काम करना।

(ख) अंधे की लाठी होना

अर्थ: एकमात्र सहारा होना।

4. “चट मंगनी पट ब्याह” लोकोक्ति का अर्थ लिखिए :

अर्थ: बिना देर किए काम को जल्दी-जल्दी करना या बिना तैयारी के काम शुरू कर देना।

खण्ड - 4

5. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :

पद्यांश:

सीत को प्रबल सेनापति कोपि चढ़यो दल,
निबल अनल त्रास सियराइ कै।
फिर के समीर, तेई बरसें विषम तीर,
रही है गरम भौन कोनन मैं जाइ कै।
धूमनैन फैल, लोग आगि पर गिरे रहैं,
हिय सौं लगाई रहैं नैंक सुलगाई कै।
मानो भीत जानि महा सीत तैं पसारि पानि,
छतियाँ की छाँह राख्यौ पाउक छिपाइ कै।

सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के रीतिकालीन कवि द्वारा रचित है, जिसमें शीत ऋतु की विकटता का वर्णन किया गया है।

प्रसंग: कवि ने शीत ऋतु में पड़ने वाली अत्यधिक ठंड का चित्रण किया है। ठंड को एक प्रबल सेनापति के रूप में दर्शाया गया है जो अपनी सेना (बर्फ, हवा) के साथ आक्रमण करता है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि शीत ऋतु का प्रबल सेनापति क्रोधित होकर अपनी सेना लेकर चढ़ आया है। निर्बल अग्नि (आग) भी ठंड के भय से काँप रही है। हवा के झोंके विषम बाणों की तरह बरस रहे हैं। लोग गरम घरों में जाकर छिपे हुए हैं। धुआँ फैल रहा है और लोग आग के पास गिरे रहते हैं, अपने हृदय से लगाकर आग को सुलगाए रखते हैं। ऐसा लगता है मानो भयंकर शीत से डरकर लोगों ने अपने हाथ फैलाकर अपनी छातियों की छाया में पैरों को छिपा लिया है।

विशेष: इस पद्यांश में शीत ऋतु की भीषणता का मार्मिक चित्रण है। कवि ने अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है। भाषा सरल एवं प्रभावशाली है।

6. निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :

गद्यांश: मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ | वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता | उसकी मर्यादा का विचार तो रखना ही होगा | दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गईं | उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया | पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया | वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर बिराजे । नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया | अदालतों में बिजली के पंखे रहते हैं | क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो ! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं | बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे | मालूम नहीं, पंखे की हवा से, या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया | फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई |

सप्रसंग व्याख्या:

संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'मियाँ नूरूद्दीन' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक 'कृष्णा सोबती' हैं।

प्रसंग: इस अंश में लेखिका ने मियाँ नूरे के वकील की मृत्यु का वर्णन किया है। वकील साहब को गाँव में सम्मान देने के लिए एक अस्थायी सिंहासन बनाया गया, लेकिन अंत में उनका अंत बहुत ही दयनीय हुआ।

व्याख्या: लेखिका कहती हैं कि मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठा के अनुसार बहुत ही गौरवपूर्ण हुआ। वकील जमीन पर या ताख पर नहीं बैठ सकता था, इसलिए उसकी मर्यादा का ध्यान रखते हुए दीवार में दो खूंटियाँ गाड़कर उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया और उस पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की तरह उस सिंहासन पर बैठे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। लेखिका व्यंग्य करती हैं कि अदालतों में बिजली के पंखे होते हैं, लेकिन यहाँ तो मामूली पंखा भी नहीं था। उन्हें डर था कि कहीं कानून की गरमी वकील के दिमाग पर न चढ़ जाए। तब बाँस का पंखा लाया गया और नूरे हवा करने लगे। पता नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ गए और उनका शरीर मिट्टी में मिल गया। फिर बड़े जोर-शोर से मातम मनाया गया और वकील साहब की अस्थियाँ कूड़े के ढेर पर डाल दी गईं।

विशेष: इस गद्यांश में लेखिका ने गाँव के लोगों की अज्ञानता और अंधविश्वास पर करारा व्यंग्य किया है। वकील को सम्मान देने के लिए बनाया गया अस्थायी सिंहासन ही उनकी मृत्यु का कारण बनता है। भाषा सरल और व्यंग्यात्मक है।

खंड – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 7. पहली कियां sara, दव दुसमण आमय दटै | पचंड हुआं विस वाव, रोभा घालै राजिया ||

उपर्युक्त सोरठे का भावार्थ लिखिए। (उत्तर सीमा 200 शब्द)

भावार्थ: प्रस्तुत सोरठा राजस्थानी भाषा में रचित है, जिसमें ईर्ष्यालु व्यक्ति के स्वभाव का चित्रण किया गया है। कवि कहते हैं कि ईर्ष्यालु व्यक्ति पहले तो अपने से बड़े या समृद्ध व्यक्ति को देखकर जलता है। वह दूसरे के सुख-समृद्धि को सहन नहीं कर पाता। फिर वह दूसरों की बुराई करने में लग जाता है। जब उसके मन में ईर्ष्या का विष बढ़ जाता है, तो वह प्रचंड रूप धारण कर लेता है। अंत में वह राजा (या शक्तिशाली व्यक्ति) के प्रति भी द्वेष भाव रखने लगता है और उसे हानि पहुँचाने का प्रयास करता है। इस प्रकार ईर्ष्या मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है और वह अपने कर्तव्यों से विमुख होकर दूसरों को नुकसान पहुँचाने में ही अपनी सफलता समझने लगता है।

अथवा

“लक्ष्मण-परशुराम संवाद” पाठानुसार परशुराम की क्रोधाग्नि कैसे शांत हुई? लिखिए।

“लक्ष्मण-परशुराम संवाद” में परशुराम का क्रोध तब भड़का जब उन्होंने सुना कि शिव धनुष टूट गया है। वे क्रोधित होकर राम-लक्ष्मण को धमकाने लगे। लक्ष्मण ने विनोदपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण शैली में परशुराम को उत्तर दिया। उन्होंने परशुराम की वीरता और तपस्या की प्रशंसा करते हुए उन्हें शांत रहने की सलाह दी। लक्ष्मण ने यह भी कहा कि धनुष तो टूटा ही था, उसे जोड़ा नहीं जा सकता। अंत में राम ने स्वयं आगे बढ़कर परशुराम को प्रणाम किया और उनकी बातों का सम्मान किया। राम के विनम्र व्यवहार और लक्ष्मण की चतुराई भरी बातों से परशुराम का क्रोध शांत हुआ और वे वापस चले गए।

प्रश्न 8. “वह तो बस आहुति देना ही अपना धर्म समझता है।” सागर के इस कथन का क्या अभिप्राय है? (उत्तर सीमा 200 शब्द)

सागर का यह कथन उस व्यक्ति के स्वभाव को दर्शाता है जो निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए अपना सब कुछ त्याग देता है। यहाँ 'आहुति' का अर्थ है बलिदान या त्याग। सागर कहते हैं कि वह व्यक्ति केवल दूसरों के लिए अपने सुख-सुविधाओं का त्याग करना ही अपना कर्तव्य समझता है। वह बदले में कुछ नहीं चाहता, न ही प्रशंसा की अपेक्षा रखता है। उसके लिए त्याग ही जीवन का सार है। यह भाव मानवता के उच्चतम आदर्श को प्रस्तुत करता है, जहाँ व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता है।

अथवा

लोक संत पीपा ने निर्गुण भक्ति काव्यधारा में किस प्रकार योगदान दिया है? लिखिए।

लोक संत पीपा ने निर्गुण भक्ति काव्यधारा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे राजस्थान के एक राजा थे जिन्होंने संत रामानंद से दीक्षा ली। उन्होंने ईश्वर को निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापी माना। उनकी रचनाओं में जाति-पाति, ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध किया गया है। उन्होंने सरल भाषा में भक्ति का मार्ग दिखाया और कहा कि ईश्वर प्राप्ति के लिए बाहरी आडंबरों की नहीं, बल्कि सच्चे मन से प्रेम करने की आवश्यकता है। उनके पद आज भी लोकप्रिय हैं और निर्गुण भक्ति परंपरा को समृद्ध करते हैं।

खंड – लघु उत्तरीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर 40 से 50 शब्दों में दीजिए:

प्रश्न 9. गोपियाँ किस लालच से कृष्ण की दासी बन गईं?

गोपियाँ कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण के कारण उनकी दासी बन गईं। उन्हें किसी भौतिक लालच नहीं था, बल्कि वे कृष्ण के सान्निध्य और उनके प्रेम को पाने के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार थीं। उनका लालच था कृष्ण के चरणों में समर्पित होकर उनकी भक्ति में लीन रहना।

प्रश्न 20. 'कल और आज' कविता में नागार्जुन ने ऋतु चक्र का सजीव वर्णन किस प्रकार किया है?

नागार्जुन ने 'कल और आज' कविता में ऋतु चक्र का सजीव वर्णन प्रकृति के विभिन्न रूपों के माध्यम से किया है। उन्होंने गर्मी, बरसात, सर्दी और बसंत ऋतुओं के आने-जाने को चित्रित किया है। कवि ने ऋतुओं के परिवर्तन को मानव जीवन से जोड़कर यह दिखाया है कि समय के साथ सब कुछ बदलता है, लेकिन प्रकृति का चक्र सदा चलता रहता है।

प्रश्न 21. 'कन्यादान' कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए।

'कन्यादान' कविता का मूल भाव बेटी के विवाह के समय माँ की भावनाओं और चिंताओं को दर्शाता है। माँ अपनी बेटी को जीवन की कठोर वास्तविकताओं के लिए तैयार करती है। वह उसे सिखाती है कि संसार में सुख-दुख दोनों आते हैं, और उसे धैर्यपूर्वक सब कुछ सहन करना चाहिए। कविता में माँ का वात्सल्य और बेटी के प्रति उसकी चिंता स्पष्ट झलकती है।

प्रश्न 22. “एक अद्भुत अपूर्व सत्य” निबंध की भाषा-शैली पर अपने विचार लिखिए।

“एक अद्भुत अपूर्व सत्य” निबंध की भाषा सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है। लेखक ने संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया है, लेकिन भाषा बोझिल नहीं है। शैली में वर्णनात्मकता और विचारात्मकता का सुंदर समन्वय है। लेखक ने तथ्यों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक सहजता से जुड़ जाता है। निबंध में उदाहरणों और दृष्टांतों का प्रयोग भाषा को प्रभावशाली बनाता है।

प्रश्न संख्या 23 से 24 का उत्तर दीजिए :

23. 'गगौरा' की मृत्यु का क्या कारण था ?

उत्तर : 'गगौरा' की मृत्यु का कारण यह था कि वह बहुत बूढ़ी हो गई थी और उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई। (कहानी 'गगौरा' में यह दर्शाया गया है कि वह वृद्धावस्था के कारण मर गई।)

24. हामिद ने चिमटा खरीदने का ही निर्णय क्यों किया ?

उत्तर : हामिद ने चिमटा खरीदने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि वह अपनी दादी अमीना के लिए एक ऐसी वस्तु खरीदना चाहता था जो उनके काम आए और लंबे समय तक चले। चिमटा रोटी सेंकने और चूल्हे से अंगारे निकालने में उपयोगी था, इसलिए उसने यही खरीदा।

प्रश्न संख्या 25 से 28 का उत्तर एक पंक्ति में दीजिए :

25. “दामिनी दमक, सुर चाप की चमक, स्याम' सेनापति की sie पंक्तियों में किस ऋतु का वर्णन है ?

उत्तर : इन पंक्तियों में वर्षा ऋतु का वर्णन है। (दामिनी = बिजली, सुर चाप = इंद्रधनुष, स्याम = काले बादल)

26. “मातृ-वन्दना' कविता में कवि ने अपने श्रम का श्रेय किसे दिया है ?

उत्तर : कवि ने अपने श्रम का श्रेय माता को दिया है।

27. आध्यात्मिक दृष्टि से कन्याकुमारी का क्या महत्त्व है ?

उत्तर : आध्यात्मिक दृष्टि से कन्याकुमारी का महत्त्व यह है कि यहाँ देवी कन्याकुमारी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ साधक और भक्त आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आते हैं।

28. परनिन्दा के विषय में दादू ने क्या कहा है ?

उत्तर : दादू ने कहा है कि परनिन्दा (दूसरों की बुराई) नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे मन अशुद्ध होता है और ईश्वर की प्राप्ति में बाधा आती है।

प्रश्न 29 : निम्न रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए :

29. (क) तुलसीदास

उत्तर : तुलसीदास (1532-1623) हिंदी साहित्य के महान कवि थे। इनका जन्म राजापुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। ये रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'रामचरितमानस', 'विनय पत्रिका', 'कवितावली' आदि हैं। इन्होंने अवधी और ब्रजभाषा में रचनाएँ कीं।

29. (ख) मुंशी प्रेमचंद

उत्तर : मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) हिंदी और उर्दू के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार थे। इनका जन्म वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। ये यथार्थवादी लेखक थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'गोदान', 'गबन', 'सेवासदन', 'पंच परमेश्वर' आदि हैं। इन्होंने ग्रामीण जीवन और सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में चित्रित किया।

प्रश्न 30 : निम्नलिखित यातायात संकेतों का क्या अर्थ है ?

30. (क) P (ख) (ग) X

उत्तर :

  • (क) P – यह संकेत पार्किंग (Parking) का है, अर्थात यहाँ वाहन खड़ा करने की अनुमति है।
  • (ख) → – यह संकेत दाएँ मुड़ना (Right Turn) का है, अर्थात यहाँ से वाहन दाएँ मुड़ सकते हैं।
  • (ग) X – यह संकेत नो एंट्री (No Entry) का है, अर्थात इस मार्ग पर वाहनों का प्रवेश वर्जित है।

राजस्थान बोर्ड परीक्षा प्रश्न-पत्र (हल सहित)

माध्यमिक परीक्षा, 2018

हिन्दी

(समय: 3:15 घण्टे)

परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश:

  • परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
  • सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
  • प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
  • जिन प्रश्नों में आंतरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।

(पूर्णांक: 80)


भाग-अ

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

कबीर ने समाज में रहकर समाज का बड़े समीप से निरीक्षण किया। समाज में फैले बाह्याडंबर, भेदभाव, साम्प्रदायिकता आदि का उन्होंने पुष्ट-प्रमाण लेकर ऐसा दृढ़ विरोध किया कि किसी की हिम्मत नहीं हुई जो उनके अकाट्य तर्कों को काट सके। कबीर का व्यक्तित्व इतना ऊँचा था कि उनके सामने टिक सकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। इस प्रकार उन्होंने समाज तथा धर्म की बुराइयों को निकाल-निकालकर सबके सामने रखा। ऊँचा नाम रखकर संसार को ठगने वालों के नकली चेहरों को सबको दिखाया और दीन-दलितों को ऊपर उठाने का उपदेश देकर अपने व्यक्तित्व को सुधार कर सब के सामने एक महान आदर्श प्रस्तुत कर सिद्धांतों का निरूपण किया। कर्म, सेवा, अहिंसा तथा निर्गुण मार्ग का प्रसार किया। कर्म-काण्ड तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया। अपनी साखियों, स्मैनियों तथा शब्दों को बोलचाल की भाषा में रचकर सबके सामने एक विशाल ज्ञानमार्ग खोला। इस प्रकार कबीर ने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया और कथनी-करनी की एकता पर बल दिया। वे महान युगदृष्टा, समाज-सुधारक तथा महान कवि थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम के बीच समन्वय की धारा प्रवाहित कर दोनों को ही शीतलता प्रदान की।

प्रश्न 1. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। (4)

उत्तर : गद्यांश का उचित शीर्षक – कबीर – समाज सुधारक।

प्रश्न 2. कबीर के व्यक्तित्व की क्या विशेषता थी? (4)

उत्तर : कबीर के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी कि उनका व्यक्तित्व इतना उच्च था कि उनके सामने टिक सकने की किसी में हिम्मत नहीं थी। वे अपने अकाट्य तर्कों और दृढ़ विरोध के लिए जाने जाते थे।

प्रश्न 3. धर्म के विषय में कबीर का क्या दृष्टिकोण था? (2)

उत्तर : धर्म के बारे में कबीर का दृष्टिकोण विकासशील और समन्वयवादी था। उन्होंने अलग-अलग धर्मों में फैले पाखंड, ऊँच-नीच, जाति-पाति तथा सांप्रदायिकता का विरोध किया। उन्होंने अहिंसा, कर्म, सेवा तथा निर्गुण मार्ग का प्रसार किया।


निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

ओ बदनसीब अन्धो! कमजोर अभागो,
अब तो खोलो नयन नींद से जागो।

वह अघी? बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गई, वही पापी है।
जब तक प्रसन्न यह अनल सगुण हँसते हैं,
है जहाँ वह, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्म पालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पावक प्रचंडतम वहाँ प्रकट होता है।

प्रश्न 4. भारतवासियों के प्रति कवि क्यों आक्रोशित हैं? (4)

उत्तर : कवि भारतवासियों में व्याप्त लोभ की भावना और कायरता के प्रति आक्रोशित हैं। वे उन्हें अंधा, कमजोर और अभागा कहते हुए जागने का आह्वान कर रहे हैं।

प्रश्न 5. पुण्य का क्षय एवं स्वार्थ का उदय कब होता है? (3)

उत्तर : जहाँ पर वीरता और निडरता का भाव नहीं होता और कायरता का जन्म हो जाता है, वहाँ पुण्यों का क्षय होने लगता है। लोभ-लालच प्रकट हो जाता है, और वहाँ स्वार्थ की भावना उदय हो जाती है।

प्रश्न 6. धर्म का पालन किस प्रकार से किया जा सकता है? (2)

उत्तर : धर्म का पालन वीरता, शूरता और साहस जैसे गुणों के द्वारा होता है। कमजोर और डरपोक मनुष्य धर्म का पालन नहीं कर सकता। लोभ, स्वार्थ, कायरता और कमजोरी का त्याग करके ही धर्म का पालन किया जा सकता है।

भाग-ब

7. दिए गए बिंदुओं के आधार पर निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबंध लिखिए : (8)

  1. समाचार-पत्रों का महत्व
    • (क) प्रस्तावना
    • (ख) समाचार-पत्रों का वर्तमान स्वरूप
    • (ग) समाचार-पत्रों का दायित्व
    • (घ) उपसंहार
  2. राजस्थान में गहराता जल संकट
    • (क) प्रस्तावना
    • (ख) जल संकट के कारण
    • (ग) जल संकट निराकरण के उपाय
    • (घ) उपसंहार
  3. उपभोक्तावाद और भारतीय संस्कृति
    • (क) प्रस्तावना
    • (ख) पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव
    • (ग) उपभोक्तावाद, उदारवाद और आर्थिक सुधार
    • (घ) उपसंहार
  4. राष्ट्रीय विकास में महिलाओं की भागीदारी
    • (क) प्रस्तावना व स्वरूप
    • (ख) राष्ट्र विकास में महिला भागीदारी की आवश्यकता
    • (ग) कामकाजी महिलाओं की समस्या व उनका समाधान
    • (घ) उपसंहार

निबंध (उदाहरण)

समाचार-पत्रों का महत्व

प्रस्तावना – आज समाचार-पत्र जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है। समाचार-पत्र की शक्ति असीम है। प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में तो इसका और भी अधिक महत्व है। देशोन्नति एवं अवनति समाचार-पत्रों पर ही निर्भर करती है। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में समाचार-पत्रों एवं उनके संपादकों का विशेष योगदान रहा है। इसको किसी ने जनता की सदा चलती रहने वाली पार्लियामेंट कहा है।

समाचार-पत्रों का वर्तमान स्वरूप – अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में समाचार-पत्र आज एक अतिमहत्वपूर्ण अंग बन चुका है। विश्व की राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले समाचार-पत्र ही हैं। निष्पक्ष समाचार एवं टिप्पणी से समाचार-पत्रों का महत्व बढ़ता है। लोग उन पर विश्वास करते हैं। प्रजातंत्र शासन में तो समाचार-पत्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती है, ये प्रजातंत्र के प्रहरी होते हैं। शासनारूढ़ राजनीतिक दल को सचेत करना, उसकी गलत नीतियों की आलोचना करना, जनता को जागरूक बनाना आदि इनके कार्य हैं। समाचार-पत्र जनता के मत और आकांक्षा को प्रकट करते हैं, देश की प्रगति की सच्ची तस्वीर जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि समाचार-पत्रों को विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अतिरिक्त प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। समाचार-पत्र पर शब्द आज पूरी तरह लाक्षणिक हो गया है, अब समाचार-पत्र केवल समाचारों से पूर्ण पत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह साहित्य, राजनीति, धर्म, विज्ञान आदि विविध विधाओं को भी अपनी कलेवर सीमा में सँभाले चल रहा है। किन्तु वर्तमान स्वरूप में आते-आते समाचार-पत्र ने एक लम्बी यात्रा तय की है। आज ज्योतिष, अंध विश्वास, भविष्यवाणी, भाग्यकल सभी कुछ समाचार-पत्रों का अंग बनाए गए हैं।

समाचार पत्रों का दायित्व – आजकल समाचार-पत्र जनता के विचारों के प्रसार का सबसे बड़ा साधन है। ये धनिकों की वस्तु न होकर जनता की वाणी है। ये शोषितों और दलितों की पुकार है। आज ये जनता के माता-पिता, स्कूल-कॉलेज, शिक्षक, थियेटर, आदर्श और उत्प्रेरक हैं। परामर्शदाता और साथी सब कुछ है। ये सच्चे अर्थों में जनता के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः समाचार-पत्र निराश्रितों का सबसे बड़ा आश्रय है। दो अढ़ाई रुपए के समाचार-पत्र में क्या नहीं होता? कार्टून, देश भर के महत्वपूर्ण और मनोरंजक समाचार, संपादकीय लेख, विद्वानों के लेख, नेताओं के भाषणों की रिपोर्ट, व्यापार एवं मेलों की सूचनाएँ और विशेषज्ञ संस्करणों में स्त्रियों और बच्चों के उपयोग की सामग्री, पुस्तकों की आलोचना, नाटक, कहानी, धारावाहिक, उपन्यास, हास्य व्यंग्यात्मक लेख आदि विशेष सामग्री रहती हैं। समाचार-पत्र सामाजिक कुरीतियाँ दूर करने में बड़े सहायक हैं। समाचार-पत्रों की खबरें बड़ों-बड़ों के मिजाज ठीक कर देती है। सरकारी नीति के प्रकाश और उसके खंडन का समाचार-पत्र सुंदर साधन है। इनके द्वारा शासन में सुधार भी किया जा सकता है। समाचार-पत्र व्यापार का सर्वसुलभ साधन है। विक्रय करने वाले और क्रय करने वाले दोनों ही समाचार-पत्रों को अपनी सूचना का माध्यम बनाते हैं। इससे जितना ही लाभ साधारण जनता को होता है, उतना ही व्यापारियों को। बाजार का उतार-चढ़ाव इन्हीं समाचार-पत्रों की सूचनाओं पर चलता है। व्यापारी बड़ी उत्कंठा से समाचार-पत्रों को पढ़ते हैं।

उपसंहार – अंत में यह कहना आवश्यक है कि समाचार-पत्र का बड़ा महत्व है, पर उसका उत्तरदायित्व भी है कि उसके समाचार निष्पक्ष हों, किसी विशेष पार्टी या पूँजीपति के स्वार्थ का साधन न बनें। आजकल के भारतीय समाचार-पत्रों में यह बड़ी कमी है। जनता की वाणी का ऐसा दुरुपयोग नहीं होना चाहिए, फिर भी यह निर्विवाद है कि भारत में पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है और विशेषकर हिंदी समाचार-पत्रों का। पत्र संपादक को अपना दायित्व भली प्रकार समझना चाहिए।


राजस्थान में गहराता जल संकट

प्रस्तावना – जल ही जीवन है। पानी के बिना हम जीवित नहीं रह सकते। वर्तमान समय में सभी महानगर जलसंकट से जूझ रहे हैं। पानी के परंपरागत स्रोत हैं – नदियाँ, तालाब, झरने, वर्षा। नदियों में जल का प्रवाह तभी होता है जब पहाड़ों पर बर्फ पर्याप्त मात्रा में पड़ती है और वह सूर्य की गर्मी से पिघलकर हिमखंडों (ग्लेशियरों) के रूप में नदी में जल का संचार करती है।

जल संकट के कारण – यह देखा जा रहा है कि नदियों में जल का स्तर निरंतर घटता जा रहा है अतः पेयजल की उपलब्धता कम होती जा रही है। तालाबों की संख्या भी निरंतर घटती जा रही है। पुराने तालाब खराब अवस्था में हैं तथा नए तालाब नहीं बनाए जा रहे हैं। वर्षा का होना भी कुछ-कुछ अनिश्चित-सा होता जा रहा है। यही कारण है कि जल की मात्रा निरंतर कम होती जा रही है।

जल संकट निराकरण के उपाय – वर्षा का काफी जल बर्बाद हो जाता है। इस जल को संचित करने के लिए वर्षा जल संचयन (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) की तकनीक अपनानी चाहिए। तालाबों की सफाई और गहरीकरण करना चाहिए। नदियों के जलस्तर को बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण और जल संरक्षण के उपाय करने चाहिए। जल का दुरुपयोग रोकना होगा और कृषि में ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाना होगा।

उपसंहार – जल संकट एक गंभीर समस्या है, जिसके समाधान के लिए सरकार और जनता दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे। जल के प्रति जागरूकता फैलाना और संरक्षण के उपाय अपनाना ही इस संकट से निपटने का एकमात्र रास्ता है।

RBSE Solved Paper 2018 Science 10th

जाता है। उसका संरक्षण किया जाना चाहिए। अब लोग वॉल पर तथा जमीन पर कुछ क्षेत्र घेरकर उसमें वर्षा जल का संचय करते हैं। यही जल बाद में शुद्ध करके पेयजल के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इससे जल की उपलब्धता बढ़ेगी। इस उपाय के अलावा हमें जल को बचाकर रखने की आदत डालनी होगी। हम पेयजल की काफी बर्बादी करते हैं। शौचालयों में पेयजल को प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। पेड़-पौधों को सींचने, मोटरगाड़ियों को धोने, कपड़ों की धुलाई आदि कामों में भी काफी पेयजल की बर्बादी करते हैं। इन कामों में धरती के कच्चे जल का प्रयोग किया जा सकता है।

उपसंहार

पानी के स्रोतों पर भी हमारी दृष्टि बनी रहनी चाहिए। उनको ठीक-ठाक अवस्था में रखना जरूरी है। इनकी साफ-सफाई करते रहना चाहिए। नदियों के जल को प्रदूषण से बचाना चाहिए। शहरों में गंदे नालों और कारखानों के अवशेषों को नदियों में डाला जा रहा है। इससे जल प्रदूषित हो जाता है। आज गंगा नदी तक पवित्र नहीं रह गई है। इस स्थिति से जल प्रदूषण उत्पन्न होता है और पेयजल का संकट उत्पन्न हो जाता है।

अब समय आ गया है कि हम जल संरक्षण के उपायों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें और इन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँ।


उपभोक्तावाद और भारतीय संस्कृति

प्रस्तावना

उपभोक्तावाद एक ऐसी आर्थिक प्रक्रिया है जिसका सीधा अर्थ है समाज के भीतर व्याप्त प्रत्येक तत्व उपभोग करने योग्य है। बस उसे उचित तरीके से एक जरूरी वस्तु के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है। उसको खरीदने और बेचने वाले लोग स्वतः ही मिल जाएंगे, क्योंकि मानव मस्तिष्क चीजों को बहुत जल्दी ग्रहण कर लेता है।

पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव

पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय जनमानस को विशेष रूप से युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बाजारवाद की बाढ़ में नैतिक मूल्य बह गए हैं। इंसानियत लुप्त-सी होने लगी है। अमीर बनने की लालसा में खाद्य व पेय पदार्थों में मिलावट, कालाबाजारी, घूसखोरी, अपहरण जैसे अपराधों में बढ़ोत्तरी हो रही है। भारतीय संस्कृति के लोग, पाश्चात्य संस्कृति को अपना रहे हैं वहाँ के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा आदि की नकल करके उसी रंग-रूप में ढलते जा रहे हैं जो कि भारतीय संस्कृति के लिए विनाशक तत्व है।

उपभोक्तावाद, उदारवाद और आर्थिक सुधार

1991 में भारतीय सरकार ने महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार प्रस्तुत किए जो इस दृष्टि से वृहद् प्रयास थे कि इनमें विदेशी व्यापार, उदारीकरण, कर सुधार और विदेशी निवेश के प्रति आग्रह शामिल था। इन उपायों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद की। इससे भारतीय उपभोक्तावाद, उदारवाद तथा आर्थिक नीति में विभिन्न सुधार हुए।

उपसंहार

भारतीय संस्कृति में इतने महान् तत्व होते हुए भी आज स्थिति विपरीत है। आज अध्यात्म की जगह प्रखर भोगवाद का बोलबाला है। अध्यात्म के केन्द्र सुविधा के अड्डे बन गए हैं। समन्वय का स्थान अब अलगाववाद लेता जा रहा है। आरक्षण और चुनाव के आधार पर जातिवाद को बढ़ावा मिल रहा है। सब धर्म, मत, संप्रदाय अपनी अलग पहचान बनाने को आतुर हो रहे हैं। वर्ण-व्यवस्था ने घृणित रूप धारण कर लिया है। चतुर्वर्गों में से धर्म की कोई परवाह नहीं करता। सभी अर्थ और काम की नंगी यात्रा कर रहे हैं। यह सब पाश्चात्य संस्कृति का कुप्रभाव है। आज संस्कृति के मापदंड केवल शब्दों तक ही रह गए हैं, व्यवहार में कहीं नहीं दीखते। यदि भारत को पुनः उन्नति के शिखर पर आसीन होना है तो उसे अपने असली स्वरूप को पहचानना होगा। वरना उसकी हस्ती भी जल्दी ही धूलधूसरित हो जाएगी।


राष्ट्रीय विकास में महिलाओं की भागीदारी

प्रस्तावना व स्वरूप

"नर से भारी नारी, एक नहीं दो-दो मात्राएँ", यह कह कर कविवर दिनकर ने नारी के महत्व को स्पष्ट किया है। सचमुच नारी पुरुष से अधिक महत्वपूर्ण है। हमारी संस्कृति में जो कुछ भी सुंदर है, शुभ है, कल्याणकारी है, मंगलकारी है, उसकी कल्पना नारी रूप में ही की गई है। सौंदर्य कामदेव और रति के मिलन में ही पूर्णतया प्राप्त करता है। धन-धान्य और समृद्धि की देवी लक्ष्मी है। विद्या एवं कलाओं की देवी वीणावादिनी, हंसवाहिनी सरस्वती जी हैं। स्वयं भगवान शिव की शक्ति का आधार शक्तिरूपिणी दुर्गा या पार्वती हैं। राम से पहले सीता को याद करना और कृष्ण से पहले राधा का नाम लिया जाना इस बात का सूचक है कि हमारे यहाँ नारी के महत्व को बहुत प्राचीनकाल से ही पहचान लिया गया था। भारतीय समाज में नारी सदा से पूज्य नहीं है। कोई भी धार्मिक कृत्य नारी के बिना अधूरा माना जाता था।

राष्ट्र विकास में महिला भागीदारी की आवश्यकता

वर्तमान काल की नारी जीवन के सभी क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रही है। अब वह अबला नहीं रही। आज स्कूल, कॉलेज, सेना, पुलिस, चिकित्सा, वकालत, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में उसने नाम कमाया है। वह पुरुषों की तुलना में अधिक योग्य और कार्यकुशल कर्मचारी सिद्ध हुई है। सबसे सुखद बात तो यह है कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में आने से नारी का रूप और अधिक संतुलित और गरिमाशाली बना है। उसमें दया, ममता, करुणा, वात्सल्य आदि कोमल गुण पहले की भाँति विद्यमान हैं और नई रोशनी के कारण विवेक, स्वाभिमान, आत्मसम्मान आदि गुणों का और समावेश हो गया है। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की भागीदारी, पुरुषों के समान ही आवश्यक तत्व है।

कामकाजी महिलाओं की समस्या व उनका समाधान

नौकरी पेशा नारी के जीवन में समस्याओं का अंबार है। उसे पहले की तरह ही चूल्हा-चौका भी सँभालना है और नौकरी की जिम्मेदारी भी ढोनी है। उस पर कार्य का बहुत दबाव है। बालकों और पति के प्रति भी जवाबदेह और ऑफिस में कार्य के प्रति भी जवाबदेह। दूसरे घर से बाहर निकलने पर असुरक्षा बोध भी उसे सताता है। यदा-कदा उसे शारीरिक शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। उसका परिवार अपने को उपेक्षित अनुभव करने लगता है। वह बच्चों और पति को वांछित समय नहीं दे पाती। अतः परिवार में तनाव बढ़ता है। अतः पुरुष व नारी मिलकर कार्य करेंगे तब ही इस समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

उपसंहार

मध्ययुग में भारतीय नारी की प्रतिष्ठा घटी थी परन्तु स्वाधीनता संग्राम में नारियों के महत्वपूर्ण योगदान के कारण उनकी प्रतिष्ठा पुनः बढ़ी है। आज भारतीय समाज में नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में वे पुरुषों के समान योगदान दे रही हैं।

भाग-स

प्रश्न 8 (पत्र लेखन)

आपका नाम ईशान्त है। आप लक्ष्मीनगर, जयपुर के हैं। आपके क्षेत्र में अकसर अनियमित बिजली कटौती की समस्या रहती है। नियमित विद्युत सप्लाई दिलाने हेतु मुख्य अभियंता विद्युत जयपुर को एक शिकायती पत्र लिखिए। (4)

प्रेषक
ईशान्त
लक्ष्मीनगर, जयपुर
दिनांक 5 जुलाई, 2048

सेवा में,
मुख्य अभियंता
विद्युत वितरण निगम
जयपुर (राज.)

विषय: विद्युत सप्लाई की अनियमितता के विषय में।

महोदय,

मैं इस पत्र के द्वारा लक्ष्मीनगर की विद्युत सप्लाई की अनियमितता की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। विद्युत वितरण बोर्ड की तरफ से अनियमित बिजली की कटौती की जा रही है। कटौती का कोई समय निश्चित नहीं है। जब चाहे बिजली गुल हो जाती है। बिजली न होने पर आम लोगों का जीवन थम-सा गया है। बिजली न होने पर पानी की आपूर्ति बंद हो जाती है। आवश्यक कार्य भी नहीं होते हैं।

अतः आपसे निवेदन है कि आप जनता के दुःखों और परेशानियों को देखते हुए नियमित विद्युत सप्लाई दिलाने के संबंध में तुरन्त कार्यवाही करें।

धन्यवाद

भवदीय
ईशान्त
लक्ष्मीनगर, जयपुर

अथवा

स्वयं को रतलाम का पुस्तक विक्रेता दीपक मानते हुए पुस्तक महल, नई दिल्ली को नवीनतम पुस्तक सूची भेजने हेतु एक पत्र लिखिए।

प्रेषक
दीपक बुक डिपो
कृष्णा नगर, रतलाम
दिनांक 7 अप्रैल, 20__

सेवा में,
प्रबंधक महोदय
पुस्तक महल, नई सड़क,
नई दिल्ली

विषय: पुस्तक महल, नई दिल्ली को नवीनतम पुस्तक सूची भेजने हेतु।

महोदय,

मैंने कुछ समय पहले ही दुकान प्रारम्भ की है। मैंने आपके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के श्रेष्ठ स्तर और प्रसिद्धि के बारे में सुना है। मैं अपनी दुकान के द्वारा अपने शहरवासियों को आपकी पुस्तकों से लाभान्वित करना चाहता हूँ। कृपया आपके द्वारा जो पुस्तकें प्रकाशित हैं, उनका सूची-पत्र और दुकानदार को दिए जाने वाले कमीशन का विवरण जल्दी भेजने की कृपा करें।

धन्यवाद

भवदीय
दीपक

प्रश्न 9

कर्म के आधार पर क्रिया के भेद बताते हुए उनकी परिभाषा लिखिए। (2)

कर्म के आधार पर क्रिया के दो प्रकार होते हैं:

  1. अकर्मक क्रिया - जिस क्रिया का फल कर्म पर नहीं, कर्ता पर पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में अकर्मक क्रिया में किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती। जैसे- मोर नाचता है, मोहन हँसता है।
  2. सकर्मक क्रिया - जिस क्रिया का फल कर्म पर पड़ता है तथा जिसके प्रयोग में कर्म की अनिवार्यता बनी रहती है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे- राम ने बैर खाये, अनुराग ने फल खरीदे।

प्रश्न 10

राधा ने मिठाई खाई। वाक्य में निहित कारक, काल और वाच्य लिखिए। (3)

राधा ने मिठाई खाई वाक्य में:

  • कारक: कर्ता कारक
  • काल: भूतकाल
  • वाच्य: कर्मवाच्य

प्रश्न 11

बहुव्रीहि समास की सोदाहरण परिभाषा लिखिए। (2)

जहाँ समस्त पद में आये हुए दोनों पद गौण होते हैं तथा ये दोनों मिलकर किसी तीसरे पद के विषय में संकेत करते हैं तथा यही तीसरा पद प्रधान होता है। जैसे- चक्रधर = चक्र धारण करने वाला (विष्णु)।

प्रश्न 12

निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए: (1×2=2)

  1. धोबी ने अच्छे कपड़े धोए।
  2. सुदामा पक्के कृष्ण के मित्र थे।

शुद्ध वाक्य:

  1. धोबी ने कपड़े अच्छे धोए।
  2. सुदामा कृष्ण के पक्के मित्र थे।

प्रश्न 13

निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखिए: (1×2=2)

  1. बालू से तेल निकालना

अर्थ: असंभव कार्य करना या बहुत कठिन कार्य करना।

RBSE Solved Paper 2018 Science 10th

प्रश्न 14:

2. अंधे की लाठी होना।

अथवा:

  1. बालू से तेल निकालना - नामुमकिन या व्यर्थ कोशिश करना।
  2. अंधे की लाठी होना - एकमात्र सहारा होना।

प्रश्न 15:

चट मंगनी पट ब्याह लोकोक्ति का अर्थ लिखिए।

अर्थ: चट मंगनी पट ब्याह - अच्छे काम को तुरंत करना।


भाग-द

प्रश्न 4:

निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:

सीत कौ प्रबल सेनापति कोपि अगल दल,
फिरत अग्नि सियराइ कै।
सूरज के समीर, अग बरसें विषम तीर,
रही है गरम भौन कोनन मैं जाई कै।
धूम नैन बहैं, लोग आगि पर गिरे रहैं,
हिय सौं लगाइ रहैं नैंक सुलगाइ कै।
मानौ भीत जानि महा सीत तैं पसारि पानि,
छतियाँ की छाँह राख्यौ पाउक छिपाइ कै।

अथवा:

विशाल मंदिर की यामिनी में,
जिसे देखना हो दीपमाला।
तो तारकागण की ज्योति उसका,
पता अनूठा बता रही है।

प्रभो! प्रेममय प्रकाश तुम हो,
प्रकृति-पद्मिनी के अंशुमाली।
असीम उपवन के तुम हो माली
धरा बराबर बता रही है।

जो तेरी होवे दया दयानिधि,
तो पूर्ण होता ही है मनोरथ
सभी ये कहते पुकार करके,
यही तो आशा दिला रही है।

पहला पद्यांश (सेनापति):

संदर्भ तथा प्रसंग: प्रस्तुत छंद कवि सेनापति के कवित्तों से पाठ्यपुस्तक में ऋतुवर्णन शीर्षक के अंतर्गत लिया गया है। इस छंद के माध्यम से कवि ने शीत को एक आक्रमणकारी के रूप में बताया है।

व्याख्या: कवि सेनापति कहते हैं कि शीत ऋतु की ताकतवर सेना ने सांसारिक जीवन पर क्रोधित होकर चढ़ाई कर दी है। इसकी वजह से अग्नि शक्तिरहित हो गई है और सूरज ठंडा पड़ गया है। इन दोनों का प्रभाव लोगों की शीत से सुरक्षा नहीं कर पा रहा है। बर्फ के जैसी ठंडी हवा ही शीत की सेना द्वारा बरसाए जा रहे खतरनाक तीरों के समान है। शीत के डर से बेचारी गर्मी घरों के कोनों में जा छुपी है। आग तापने वाले लोगों की आँखों से धुएँ के कारण पानी बह रहा है। लोग ठंड से बचने के लिए अग्नि पर झुके जा रहे हैं। आग के जरा-सा जलते ही लोग उसे तापने लगते हैं। इन दृश्यों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो अग्नि को शीत से डरा हुआ जानकर लोगों ने उसे भयंकर ठंड से बचाने के लिए हाथ फैलाकर अपने छातियों की छाया में छुपा लिया है।

विशेष:

  • साहित्यिक और समर्थ ब्रज भाषा का उपयोग हुआ है।
  • शैली शब्द चित्रात्मक है। कवि ने सटीक शब्दों का चुनाव करके शीतकालीन दृश्यों को साकार कर दिया है।
  • भयानक रस की झलक है।
  • "अग्नि सियराइ", "बरसें विषम", "पसारि पानि" आदि में अनुप्रास अलंकार है। पूरे छंद में सांगरूपक का निर्वाह किया गया है। "मानो भीत जानि.......... छिपाई कै" में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

दूसरा पद्यांश (जयशंकर प्रसाद):

संदर्भ तथा प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि जयशंकर प्रसाद की रचना "प्रभो" से लिया गया है। पद्यांश में कवि परमप्रभु के अनौखे व्यक्तित्व की झलक नूतन कल्पनाओं के द्वारा प्रस्तुत कर रहा है।

व्याख्या: कवि कहता है- क्या तुम अज्ञात परमप्रभु के रात्रि में दीपमालाओं से चमकते-दमकते विशाल मंदिर की झलक पाना चाहते हो? तो फिर उस विशाल नीले आकाश में झिलमिलाते, अनगिनत तारों को निहारो। वह ईश्वर कैसा अद्भुत और प्रकाशमय है, इसे ऐसी विशाल कल्पना से ही कुछ-कुछ समझा जा सकता है। हे मेरे प्रभु! आप ऐसे प्रकाश हैं जो सारे संसार पर लगातार सहज प्रेम की वर्षा करते हैं। यह सारी प्रकृतिरूपी कमलिनी को खिलाने वाले परम प्रसन्नतामय बनाने वाले हैं! ईश्वर आप ही हैं। इस सृष्टिरूप अनंत बगीचे के रक्षक आप ही हैं। इस सच को यह सारी पृथ्वी लगातार बताती आ रही है। पृथ्वी का प्रकृतिरूपी सौंदर्य, खुशियाँ देने वाला स्वरूप और इसके प्राणियों में स्थित परस्पर प्रेम का भाव आपकी मेहरबानी का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कवि कहते हैं- हे दया करने वाले परमप्रभु! सारा जगत हमेशा से पुकार-पुकार कर कहता आ रहा है कि यदि आपकी प्राणी पर दया दृष्टि हो जाए तो उसके मन की सारी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं। हे स्वामी! इसी को देखकर तो मुझ जैसे निराशों को भी उम्मीद हो रही है कि आप मेरी इच्छाओं को भी पूरा करेंगे।

विशेष:

  • कवि ने बड़ी सहज-सरल भाषा में अपनी इच्छाओं को व्यक्त किया है।
  • कवि का ईश्वर की दयाभावना पर पूरा विश्वास है। यह काव्यांश से पढ़कर पता चल रहा है।
  • "दया दयानिधि" में अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 5:

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:

मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो रखना ही होगा। दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गईं। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर बिराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की टाट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं। क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं। बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने...

संदर्भ तथा प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी से लिया गया है, जिसमें मियाँ नूरे और उनके वकील के बीच के हास्यास्पद दृश्य का वर्णन है। यहाँ वकील की प्रतिष्ठा और मर्यादा को बनाए रखने का प्रयास दर्शाया गया है।

व्याख्या: लेखक कहता है कि मियाँ नूरे के वकील का अंत उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल बहुत ही गौरवमय तरीके से हुआ। वकील जमीन पर या ताख पर नहीं बैठ सकता था, इसलिए उसकी मर्यादा का ध्यान रखना जरूरी था। दीवार में दो खूटियाँ गाड़कर उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। उस पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की तरह उस सिंहासन पर बैठ गए। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। लेखक व्यंग्य करता है कि अदालतों में खस की टाट्टियाँ और बिजली के पंखे होते हैं, लेकिन यहाँ तो मामूली पंखा भी नहीं है। उसे डर है कि कहीं कानून की गरमी वकील के दिमाग पर न चढ़ जाए। अंत में बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगा।

प्रश्न 16

गद्यांश पर आधारित प्रश्न

प्रथम गद्यांश: "लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से, या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला मार्टी में मिल गया। फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की afer घूरे पर डाल दी गई।"

संदर्भ एवं प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश पाठ्य पुस्तक में वर्णित 'ईदगाह' शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक लोकप्रिय कहानीकार मुंशी प्रेमचंद हैं। मेले से सारे बच्चे खिलौने लेकर लौट आते हैं। बालक नूरेमियाँ के खिलौने का अपने घर पर जो हुआ, प्रस्तुत गद्यांश में वर्णन किया गया है।

व्याख्या: मेले से बालक नूरेमियाँ को वकील वाला खिलौना पसंद आया। उसे लेकर खुश होता हुआ वह घर आया। नूरे ने वकील के सम्मान का ध्यान रखते हुए उसके बैठने के लिए ऊँचे आसन का इंतजाम किया, क्योंकि वकील को किसी ताक में तो नहीं रखा जा सकता था। इसलिए दीवार में दो खूँटियाँ गाड़ी गई और खूँटियों के ऊपर एक लकड़ी का पट्टा रख दिया। पट्टे के ऊपर कालीन के जैसे कागज बिछाया गया। इस तरह वकील साहब के बैठने के लिए नूरे ने इंतजाम किया। वकील को उस आसन पर बैठाया गया। ऐसा लग रहा था कि जैसे राजा भोज अपने सिंहासन पर बैठे हैं। नूरे ने सोचा कि अदालतों में तो बिजली के पंखे लगे होते हैं। घास की टाट्टियाँ भी रहती हैं। यहाँ भी इनके लिए हवा का इंतजाम किया जाए नहीं तो कानून की गरमी दिमाग में चढ़ जाएगी। तुरंत ही बाँस के एक पंखे को लाया गया। उस पंखे से नूरे मियाँ वकील साहब को हवा करने लगा। पंखा करते समय पंखे की चोट लगी या हवा से वकील साहब अपने सिंहासन से गिर पड़े। जमीन पर गिरते ही वकील साहब का नश्वर चोला बिखरकर गिर गया। मिट्टी से बने वकील का चोला मिट्टी में ही मिल गया। नूरेमियाँ और घर के बच्चों ने बहुत दुःख मनाया। बिखरे हुए चोले को लेकर घूरे पर फेंक दिया गया। इस तरह नूरेमियाँ के खिलौने वकील साहब का अंत हो गया।

नोट : विशेष

  1. गद्यांश में बच्चों का खिलौनों के लिए अपनापन और आत्मीयता को दर्शाया गया है।
  2. प्रेमचंद ने बच्चे के मासूम मन की भावनाओं को कुशलता से बताया है।
  3. वर्णनात्मक व व्यंगात्मक शैली का उपयोग हुआ है।

द्वितीय गद्यांश

"एक उपवन को प्राप्त करके ईश्वर को धन्यवाद देते हुए उसका सुख नहीं लेना और इस चिंता में डूबे रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला। यह एक ऐसी कमी है, जिससे ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन-रात सोचते हुए वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपने विकास के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को कष्ट पहुँचाने को ही अपना सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है।"

संदर्भ एवं प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश पाठ्य-पुस्तक में वर्णित निबंध 'ईर्ष्या, तू न गई मेरे मन से' पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री रामधारी सिंह दिनकर हैं। ईर्ष्या का बीज इस भावना से उत्पन्न होता है कि मेरे पास इसकी कमी है, मेरे पास यह सामग्री नहीं है। ईर्ष्यालु इस बात से संतुष्ट नहीं होता है कि उसके पास जो है, वही सब कुछ है।

व्याख्या: ईर्ष्या एक ऐसी भावना है। वह जिसके हृदय में आसन जमा लेती है, उसका संतोष कूच कर जाता है। अंजाम यह होता है कि उसे भगवान द्वारा प्रदत्त कोई भी उपहार, सुख प्रदान नहीं कर सकता और वह समस्त उपलब्धियों को छोटा मान लेता है, क्योंकि उसके मन में बसी ईर्ष्या उस वस्तु के महत्व को ही कम कर देती है। उसकी स्थिति बड़ी अजीब हो उठती है। उसे जो उपवनरूपी सुख मिला है, उसके लिए भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका आनंद नहीं उठाता बल्कि रात-दिन इसी चिंता में डूबा रहता है कि उसे उससे अधिक सुख-सुविधाएँ क्यों नहीं मिली, जिन्हें दूसरे लोग भोग रहे हैं। यह एक ऐसा दोष है, जिसके परिणामस्वरूप उसका चरित्र दिन-प्रतिदिन अधिक से अधिकतर कठिन होता चला जाता है, साथ ही भयंकर हो उठता है। वह अपने मन से संकुचित और सीमित क्षेत्र में सिमटकर अनुभव करता है। वह अपने उस कल्पित अभाव से मुक्ति पाने के लिए रात-दिन चिंता में डूबा रहता है। वह यह भूल जाता है कि केवल सोचने से कमी दूर नहीं हो सकती, उसके लिए कर्म चेतना जरूरी है। वह कर्म चेतना का वरण न करके बर्बादी की ओर बढ़ता चला जाता है। वह ईर्ष्यावश अपनी अकर्मण्यता का भार दूसरों पर डाल देता है और उनके बुराई की कामना में लग जाता है। अकारण उन्हें नुकसान पहुँचाने को ही वह अपना श्रेष्ठ कर्तव्य मान लेता है।

नोट : विशेष

  1. यहाँ ईर्ष्यालु व्यक्ति के मनोविकार का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया गया है।
  2. लेखक कर्म को मानता है, सृष्टि का प्रधान रहस्य। प्रसाद ने कामायनी में कहा है- "कर्म का भोग, भोग का कर्म यही जड़ चेतन का आनंद।" तुलसीदास की भी यही मान्यता है- "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस कीन्ह सो तस फल चाखा।"
  3. चिंता में डूबे रहने से और केवल इच्छा करने से संसार में कुछ भी नहीं मिलता।
  4. ईर्ष्या व्यक्ति को आलसी बनाकर उसके चरित्र को अपूर्ण बना देती है।

सोरठा का भावार्थ

सोरठा: "पहली कियां उपाव, दव दुसमण आमय दटै। पचंड हुआं विस वाव, रोभा घालै राजिया।।"

भावार्थ: संसार में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं, जिनका आरंभ में तिरस्कार किए जाने पर घातक परिणाम होते हैं। दव अर्थात् आग, शत्रु और रोग पर ये तीनों आरंभ में ही हमारा ध्यान चाहते हैं। यदि कहीं थोड़ी सी भी आग लगे तो जल्दी उसे बुझा देने का प्रयास करना चाहिए। अवज्ञा करने पर वह भीषण रूप धारण कर सकती है और तब उस पर नियंत्रण पाने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ेगा और जन-धन की बहुत हानि होगी। इसी प्रकार शत्रु और रोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उनका जल्दी ही उपाय करना चाहिए नहीं तो ये गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। उक्त सोरठे का यही आशय है कि आग, शत्रु और रोग को आरंभ में ही नियंत्रित कर लेना चाहिए।

RBSE Solved Paper 2018 Science 10th

प्रश्न 7 (अथवा)

लक्ष्मण-परशुराम संवाद पाठानुसार परशुराम की क्रोधाग्नि कैसे शांत हुई? लिखिए।

महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर में भगवान शिव के प्राचीन धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले वीर के साथ सीता का विवाह किए जाने की माँग रखी। राम ने धनुष पर डोरी चढ़ाकर उसे खींचा तो धनुष बीच से टूट गया।

इसी समय सूचना प्राप्त कर मुनि परशुराम उस सभा मंडप में पहुँचे। धनुष टूटने का ज्ञात होने पर वह बहुत क्रोधित हो गए। राम ने उनका क्रोध शांत करने के लिए कहा कि धनुष को तोड़ने वाला उनका कोई सेवक ही होगा। यह सुनकर परशुराम भड़क गए। वह कहने लगे कि यह काम सेवक का नहीं शत्रु का है। धनुष तोड़ने वाला राजाओं के बीच से निकलकर अलग खड़ा हो जाए नहीं तो सभी राजा मारे जाएंगे। यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा कि उन्होंने बचपन में बहुत धनुषियाँ तोड़ी थीं तब तो मुनि ने क्रोध नहीं किया था। इस धनुष से इतना प्रेम क्यों है? गुरु के धनुष की तुलना साधारण धनुषियों से किए जाने पर परशुराम क्रोधित हो गए। लक्ष्मण ने कहा कि धनुष तो राम के स्पर्श करते ही टूट गया। इसमें उनका कोई दोष नहीं है। मुनि अनावश्यक ही इतना क्रोध कर रहे हैं।

यह सुनकर परशुराम अत्यधिक क्रोध से भर गए। उन्होंने विश्वामित्र से कहा कि वह इस मूर्ख लड़के को हमारा प्रताप और बल बताकर समझा दें। इस पर लक्ष्मण ने कहा कि शूरवीर शत्रु के सामने वीरता दिखाते हैं। कायर लोग ही व्यर्थ का प्रलाप किया करते हैं।

यह सुनते ही परशुराम ने अपना फरसा हाथ में ले लिया और बोले कि यह कड़वा बोलने वाला बालक मारने योग्य है। परशुराम की इस क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए राम ने नेत्रों के संकेत से लक्ष्मण को चुप कराया और परशुराम की क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए शीतल वचनों में कुछ प्रार्थना करने लगे, जिससे उनकी क्रोधाग्नि शांत हुई।

प्रश्न 8 (अथवा)

"वह तो बस आहुति देना ही अपना धर्म समझता है।" सागर के इस कथन का क्या अभिप्राय है? (उत्तर सीमा 200 शब्द) (6)

सागरमल गोपा जैसलमेर राज्य को अँग्रेजों के प्रभाव से मुक्त कराकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन कर रहा है। जैसलमेर का शासक महारावल जवाहर सिंह अँग्रेजों के प्रभाव में है। वह प्रजा का उत्पीड़क तथा शोषक है। उसके सेवक भी उसके आदेश पर प्रजा को परेशान करते हैं। सागरमल इन बातों से भारत की स्वाधीनता के नेता जवाहरलाल नेहरू, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री तथा रेजीडेंट एलिंगटन आदि को अवगत कराने के लिए पत्र लिखता है। वह प्रजा को अत्याचार तथा शोषण का विरोध करने के लिए प्रेरित करता है। राजा की निरंकुश, अत्याचारी, स्वेच्छाचारी, सामंतशाही के विरुद्ध उसका आंदोलन देखकर क्रोधित सत्ताधारी उसको arch बनाकर तरह-तरह की यातनायें देते हैं। जेल के अंदर यातनाएँ सहते हुए सागरमल गोपा को अपने धर्म का पालन करने के लिए कहा तो उसके उत्तर में सागरमल ने कहा-स्वतंत्रता प्राप्ति के इस संघर्षरूपी यज्ञ में अपने जीवन की आहुति देना ही उसका धर्म है। इस कार्य को ही वह अपना वास्तविक धर्म समझता है। अंत में जेल में ही सागरमल को 3 अप्रैल 1946 को जिंदा जला दिया जाता है। इस प्रकार स्वतंत्रता संग्रामरूपी यज्ञ में वह अपने जीवन की आहुति दे देता है।

प्रश्न 8 (अथवा - दूसरा विकल्प)

लोकसंत पीपा ने निर्गुण भक्ति काव्यधारा में किस प्रकार योगदान दिया है? लिखिए।

लोकसंत पीपा राजस्थान के एक राजवंश में पैदा हुए थे। वह युवावस्था में ही गागरौन के राजा बन गये थे और एक बुद्धिमान तथा प्रजाप्रिय शासक थे। वह मूर्तिपूजक तथा देवी दुर्गा के भक्त थे। स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण करने के पश्चात् पीपा निर्गुण, निराकार परम ब्रह्म की पूजा करने लगे। उन्होंने राज्य-वैभव त्याग दिया और वैराग्य धारण कर लिया।

संत पीपा मानते थे कि सभी प्राणी परमात्मा की संतान हैं। परमात्मा अपनी संतान में पक्षपात नहीं करता। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान थे। उनकी दृष्टि में ब्राह्मण तथा शूद्र में कोई ऊँचा अथवा नीचा नहीं था। संत पीपा के मन में भक्ति की भावना थी। वह भक्त के साथ एक समाज सुधारक भी थे। वह भक्ति के माध्यम से समाज के उपेक्षित वर्ग में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय तथा साहस की भावना उत्पन्न करते थे। वह समाज में फैली रूढ़ियों को तोड़ने की चेतना जगाते थे। अपनी कर्मनिष्ठा और भक्ति के कारण वह आज भी जनवाणी तथा लोकगीतों का विषय बने हुए हैं।

इस प्रकार लोकसंत पीपा ने निर्गुण भक्ति को अपनी काव्य धारा में स्थान देकर प्रसारित किया।

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर 40 से 50 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 9

गोपियाँ किस लालच से कृष्ण की दासी बन गईं? (2)

कृष्ण ने अपने चंचल नयन रूपी मन से देखकर गोपियों के मन को वश में कर लिया। वे श्रीकृष्ण के मनमोहक हृदय को देखते रहने के लालच में उनके चरणों की दासियाँ बन गईं।

प्रश्न 10

कल और आज कविता में नागार्जुन ने ऋतु चक्र का सजीव वर्णन किस प्रकार किया है? (2)

कल और आज कविता में कवि द्वारा ग्रीष्म के तीव्र ताप से तपती हुई धरती, आकाश और जीव जगत का सजीव और स्वाभाविक वर्णन किया गया है। इसके पश्चात वर्षा ऋतु के आगमन से सारे परिदृश्य के बदल जाने का चित्रण किया गया है।

प्रश्न संख्या 25 से 28 का उत्तर एक पंक्ति में दीजिए :

25. जाने का भी शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है। इस प्रकार ऋतु चक्र का बहुत सजीव प्रस्तुतीकरण है।

उक्त पंक्तियों में वर्षा ऋतु का वर्णन किया गया है।

26. कन्यादान कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए। (2)

कविता भारतीय नारी के जीवन पर केन्द्रित है। कवि परंपराओं में बंधी हुई भारतीय नारी को जाग्रत करना चाहता है। कविता का संदेश है कि स्त्री को स्त्री होने पर गर्व होना चाहिए। उसे सभी प्रकार की दीन-हीन भावना से स्वतंत्र रहना चाहिए।

27. एक अदभुत अपूर्व स्वप्न निबंध की भाषा-शैली पर अपने विचार लिखिए। (2)

एक अदभुत अपूर्व स्वप्न निबंध की भाषा सरल और सुबोध है। इस निबंध में भारतेन्दु ने तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है। मुहावरों और लोकोक्तियों ने भाषा को प्रभावशाली बना दिया है। भारतेन्दु जी ने तत्कालीन समस्त को इस निबंध में हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है। पाखण्ड, स्वार्थपरता, शिक्षा क्षेत्र तथा अंग्रेजी शासन पद्धति पर कटाक्ष किया है।

28. परनिन्दा के विषय में दादू ने क्या कहा है? (4)

दादू ने अपने शिष्यों को परनिंदा से दूर रहने को कहा है। उनके अनुसार जिस व्यक्ति के हृदय में राम नहीं बसते वहीं दूसरों की निंदा करता है।

प्रश्न संख्या 29 से 30

29. निम्न रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए : (4)

1. तुलसीदास

महाकवि तुलसीदास का जन्म संवत् 1589 (सन् 1532) में बाँदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ। इनके पिताजी का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। यह सरयूपारीण ब्राह्मण थे। अशुभ नक्षत्र में जन्म होने और इनके स्वरूप की विचित्रता के कारण इनके माता-पिता ने इनको त्याग दिया। इनका पालन-पोषण मुनिया नाम की सेविका ने किया। इनके गुरु महात्मा नरहरिदास माने जाते हैं। इनका विवाह रत्नावली नामक गुणवती स्त्री से हुआ, लेकिन वैवाहिक जीवन अधिक नहीं चल पाया। तुलसीदास जी ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ रामचरितमानस की रचना अयोध्या में प्रारंभ की किन्तु बाद में यह काशी के निवासी हो गए। श्रावन मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी संवत् 1680 (सन् 1623) को इनका स्वर्गवास हो गया।

2. मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही नामक गाँव में सन् 1880 ई. में हुआ था। इनके पिता मुंशी अजायब लाल तथा माता आनन्दी देवी थीं। ये उर्दू में नवाबराय के नाम से रचना करते थे। इनका विवाह विधवा शिवरानी से हुआ था। इनकी रचना पर अंग्रेजों द्वारा सोजे वतन पर प्रतिबंध लगा देने के बाद इन्होंने प्रेमचंद नाम से रचनाएँ कीं। माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण आदि पत्रिकाओं का संपादन किया। निर्मला, सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान, गबन इनके प्रमुख उपन्यास हैं। प्रेमचंद अध्यापक तथा डिप्टी इंस्पेक्टर रहे। महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर प्रेमचंद ने नौकरी छोड़ दी। प्रेमचंद साहित्य-रचना और सम्पादन का कार्य करने लगे। सन् 1936 में इनका निधन हो गया।

30. निम्नांकित यातायात संकेतों का क्या अर्थ है? (4)

  1. ओवर टेकिंग पर प्रतिबंध है।
  2. प्रतिबंध समाप्त होता है।
  3. दाहिने मोड़ पर प्रतिबंध।
  4. एक ही रास्ता है।

अतिरिक्त प्रश्न :

गौरा की मृत्यु का क्या कारण था? (2)

(पाठ्यक्रम में नहीं है)

हामिद ने चिमटा खरीदने का ही निर्णय क्यों किया? (2)

ईद के मेले में हामिद ने तीन पैसों में लोहे का चिमटा खरीदा, क्योंकि उसे पता था उसकी दादी के पास चिमटा नहीं था। जब वह तवे पर रोटियाँ बनाती थी तो उसके हाथ की उँगलियाँ जल जाती थीं, यही वजह है कि हामिद ने दादी के लिए चिमटा खरीदा।

दामिनी दमक, सुर चाप की चमक, स्याम सेनापति की उक्ति पंक्तियों में किस ऋतु का वर्णन है? (4)

उक्त पंक्तियों में वर्षा ऋतु का वर्णन किया गया है।

मातृ-वन्दना कविता में कवि ने अपने श्रम का श्रेय किसे दिया है? (4)

कविता में कवि ने अपने श्रम का पूरा श्रेय भारत माँ के चरणों में समर्पित किया है।

आध्यात्मिक दृष्टि से कन्याकुमारी का क्या महत्व है? (4)

सर्वप्रथम कन्याकुमारी सूर्योदय और सूर्यास्त के दर्शन कराने वाली भूमि है। वहाँ वह चट्टान भी है जहाँ विवेकानंद ने समाधि लगाई थी।