RBSE Class 10th 2023 Hindi-S-01-2023 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 10th |
| Exam year | 2023 |
| Subject | Hindi-S-01-2023 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 10th 2023 Hindi-S-01-2023
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Rajasthan Board Class 10th Hindi-S-01-2023 2023 solved Previous Year Question Papers
Sl. No. _______________ नामांक _______________
No. of Questions - 23 No. of Printed Pages - 1
माध्यमिक परीक्षा, 2023
SECONDARY EXAMINATION, 2023
हिंदी
समय : 3 घण्टे 15 मिनट पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करना अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
- प्रश्न का उत्तर लिखने से पूर्व प्रश्न का क्रमांक अवश्य लिखें।
Sl Hindi
s-01-Hindi
खण्ड - अ
3. निम्नलिखित अपठित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए -
सभ्यता की वर्तमान स्थिति में एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से वैसा भय तो नहीं रहा जैसा पहले करता था, पर एक जाति को दूसरी जाति से, एक देश को दूसरे देश से, देशों के स्थायी कारण प्रतिष्ठित हो गए हैं। सबल और सबल देशों के बीच अर्थ-संघर्ष की, सबल और निर्बल देशों के बीच अर्थ शोषण की प्रक्रिया अनवरत चल रही है, एक क्षण का विराम नहीं है। इस सार्वभौम वणग्वृत्ति से उसका अनर्थ कभी न होता, क्षात्रवृत्ति उसके लक्ष्य से अपना लक्ष्य अलग रखती। पर इस युग में दोनों का बिलक्षण सहयोग हो गया है। वर्तमान अर्थोन्माद को शासन के भीतर रखने के लिए क्षात्रधर्म के उच्च और पवित्र आदर्श को प्रतिष्ठा आवश्यक है।
-
(1) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक है -
- अ) भय
- ब) प्रसन्नता
- स) आश्चर्य
- द) भय और अर्थ-संघर्ष
व्याख्या: गद्यांश में भय और अर्थ-संघर्ष दोनों का उल्लेख है, अतः 'भय और अर्थ-संघर्ष' उचित शीर्षक है।
-
(2) एक देश को दूसरे देश से भय के कारण हो गए हैं -
- अ) स्थायी
- ब) क्षणिक
- स) स्थायी
- द) अस्थायी
व्याख्या: गद्यांश में कहा गया है कि "देशों के स्थायी कारण प्रतिष्ठित हो गए हैं", अतः भय के कारण स्थायी हैं।
-
(3) सबल और निर्बल देशों के बीच अनवरत चल रही है -
- अ) शोषण की प्रक्रिया
- ब) शंका की प्रक्रिया
- स) भय जनित प्रक्रिया
- द) वैर की प्रक्रिया
व्याख्या: गद्यांश में स्पष्ट है कि "सबल और निर्बल देशों के बीच अर्थ शोषण की प्रक्रिया अनवरत चल रही है।"
-
(4) क्षात्रवृत्ति किस वृत्ति से भिन्न है -
- अ) वणग्वृत्ति से
- ब) क्षात्रधर्म से
- स) वैश्य वृत्ति से
- द) क्षात्रकर्म से
व्याख्या: गद्यांश में कहा गया है कि "क्षात्रवृत्ति उसके लक्ष्य से अपना लक्ष्य अलग रखती", जहाँ 'उसके' का अर्थ वणग्वृत्ति से है।
5) उच्च और पवित्र आदर्श के लिए किसकी प्रतिष्ठा आवश्यक है -
- a) वणिक संघ की
- b) भय निवृत्ति संघ की
- c) विप्र संघ की
- d) क्षात्रसंघ की
सही उत्तर: d) क्षात्रसंघ की
व्याख्या: प्रश्न में उच्च और पवित्र आदर्शों के लिए क्षात्रसंघ (क्षत्रियों के संघ) की प्रतिष्ठा को आवश्यक बताया गया है, क्योंकि क्षत्रिय वर्ग रक्षा और नैतिक मूल्यों के संरक्षण से जुड़ा होता है।
निम्नलिखित अपठित पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए -
किंतु यह झंझट है भारी, चुद्ध क्षेत्र संसार बना |
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना |
आजा बचपन एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शान्ति |
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली यह अपनी प्राकृत विश्रांति ||
अग भोली सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप |
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप ||
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी |
नंदन चन-सी फूल उठी वह छोटी सी fern मेरी ||
6) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक है -
- a) वृद्धावस्था
- b) बचपन
- c) यौवन
- d) जरावस्था
सही उत्तर: b) बचपन
व्याख्या: पद्यांश में कवयित्री बचपन की निर्मल शांति, सरलता और निष्पाप जीवन को याद करती है, इसलिए इसका उचित शीर्षक 'बचपन' है।
7) कवयित्री के अनुसार चिंता के चक्कर में जीवन कैसा बन गया -
- a) भार
- b) हल्का
- c) सुखी
- d) व्याकुल
सही उत्तर: a) भार
व्याख्या: पद्यांश की पंक्ति "चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना" से स्पष्ट है कि चिंता के कारण जीवन बोझिल (भार) हो गया है।
8) निर्मल शब्द का अर्थ है –
- अ) पवित्र ✓
- ब) सबल
- स) निघ्सहाय
- द) fitz a स
9) उपर्युक्त काव्यांश में संताप मिटाने वाला है –
- अ) परिवार
- ब) सहयोगी
- स) बचपन ✓
- द) यौवन
10) नंदनवन-सी क्या फूल उठी?
- अ) उपबन
- ब) बगिया ✓
- स) उद्यान
- द) कुटिया
11) "मैं क्यों लिखता हूँ" पाठ में लेखक ने किस विभीषिका का वर्णन किया है?
- अ) हिरोशिमा के परमाणु विस्फोट का ✓
- ब) भोपाल की गैस दुर्घटना का
- स) दिल्ली के दंगों का
- द) एक सुखद अनुभूति जो दुःख में बदल गई
12) "जब बाबू जी रामायण का पाठ करते तब हम उनकी बगल में बैठे-बैठे आइने में अपना मुँह निहारा करते" – उपर्युक्त पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
- अ) जार्ज पंचम की नाक
- ब) भाता का अँचल
- स) साना-साना हाथ जोड़ि ✓
- द) ठैयां झुलनी हे रानी हो राघा
0.2) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए : [6 × 1 = 6]
- प्राय: गुण-दोष, अवस्था, व्यापार अमूर्तभाव तथा क्रिया भाववाचक संज्ञा के अन्तर्गत आते हैं।
- ऐसे सर्वनाम जिसका प्रयोग वक्ता या लेखक (स्वयं) अपने लिए करते हैं वे उत्तम पुरुष सर्वनाम कहलाते हैं।
- जिस वाक्य में क्रिया का प्रभाव या फल केवल कर्ता पर ही पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।
- परिमाण बाचक विशेषण के दो उपभेद हैं।
- हिन्दी भाषा में मुख्यत: दो प्रकार के उपसर्ग प्रचलित हैं।
- वे सह जो धातु अथवा क्रिया के अन्त में लगकर नए शब्दों की रचना करते हैं उन्हें कृत प्रत्यय कहते हैं।
9.3) निम्नलिखित अति लघुत्तरात्मक प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा लगभग 20 शब्द) [2 × 5 = 10]
-
यण संधि को उदाहरण सहित समझाइए।
यण संधि में 'इ', 'उ', 'ऋ' के बाद कोई स्वर आए तो वे क्रमशः 'य', 'व', 'र' में बदल जाते हैं। उदाहरण: 'इ' + 'आ' = 'य' → प्रति + आगत = प्रत्यागत।
-
‘एवं’ एवं ‘गमन’ में अन्तर लिखिए।
‘एवं’ एक अव्यय है जिसका अर्थ ‘और’ या ‘इस प्रकार’ होता है, जबकि ‘गमन’ एक संज्ञा है जिसका अर्थ ‘जाना’ या ‘यात्रा’ है।
-
“कीचड़ उछालना” मुहावरे का अर्थ लिखिए।
इस मुहावरे का अर्थ है: किसी की बुराई करना या उसे बदनाम करना।
प्रश्न 4:
“वह सब 84, सब साधें सब जाय” लोकोक्ति का अर्थ लिखिए।
अर्थ: इस लोकोक्ति का अर्थ है कि मनुष्य जीवन में अनेक प्रकार के साधन (धन, संपत्ति, योग, तप आदि) करता है, लेकिन अंत में सब कुछ यहीं छूट जाता है। केवल सत्कर्म और ईश्वर की भक्ति ही साथ जाती है। यह संसार की नश्वरता और मोह-माया के त्याग की ओर संकेत करती है।
प्रश्न 5:
“बालगोबिन भगत” पाठ के माध्यम से लेखक ने क्या दर्शाया है?
लेखक ने इस पाठ के माध्यम से एक सच्चे भक्त, सरल हृदय, कर्तव्यनिष्ठ और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण व्यक्ति के जीवन को दर्शाया है। बालगोबिन भगत ने ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ सामाजिक समानता, परिश्रम, सत्यनिष्ठा और मानवता की सेवा को अपने जीवन का आधार बनाया। लेखक ने यह दिखाया कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार में होती है।
प्रश्न 6:
नवाब साहब ने खीरे की सब फाँको को खिड़की से बाहर फेंककर तौलिए से हाथ और होंठ पोंछकर किस भाव को दर्शाया?
नवाब साहब ने ऐसा करके अपने दिखावटी ठाठ-बाट और मिजाजी स्वभाव को दर्शाया। वे खीरा खाने का नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में उसे फेंक देते हैं। इससे उनका दिखावा, अहंकार और सादगी से दूर रहने का भाव प्रकट होता है। वे अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए झूठा दिखावा करते हैं।
प्रश्न 7:
“मानवीय करुणा की दिव्य चमक” संस्मरण किसके संबंध में है?
यह संस्मरण महान कवि एवं समाज सुधारक रवींद्रनाथ टैगोर के संबंध में है। इसमें टैगोर की मानवीय करुणा, दया और संवेदनशीलता को दर्शाया गया है, जो उनके व्यक्तित्व की दिव्य चमक को उजागर करती है।
प्रश्न 8:
“एक कहानी यह भी” पाठ में मन्नू भण्डारी पर किस-किस का प्रभाव अधिक उभर कर आया है?
मन्नू भण्डारी पर उनके पिता और माँ का प्रभाव अधिक उभर कर आया है। पिता ने उन्हें स्वतंत्र सोच और लेखन की प्रेरणा दी, जबकि माँ ने उन्हें संघर्षशील और साहसी बनाया। दोनों के व्यक्तित्व ने मिलकर उनके लेखन और जीवन दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
प्रश्न 9:
गोपियों ने हारिल की लकरी किसे कहा है?
गोपियों ने श्रीकृष्ण को हारिल की लकरी कहा है। हारिल एक पक्षी है जो अपने बच्चों को बहुत स्नेह करता है और उन्हें कभी छोड़ता नहीं। गोपियों का कहना है कि जिस प्रकार हारिल अपने बच्चों से अलग नहीं होता, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी उनसे अलग नहीं हो सकते। यह उनके प्रति गोपियों के अटूट प्रेम और आसक्ति को दर्शाता है।
प्रश्न 10:
“सूरदास की जोति मिल्यो मल्लिका को तात” का भाव स्पष्ट कीजिए।
इस पंक्ति का भाव है कि सूरदास जी की कविता की ज्योति (प्रकाश) मल्लिका (एक प्रकार का फूल या सुगंध) को प्राप्त हुई है। यहाँ सूरदास की रचनाओं की महिमा और उनके भक्ति भाव की सुगंध को दर्शाया गया है। सूरदास ने अपने पदों में कृष्ण भक्ति का ऐसा अमृत भरा है जो मल्लिका के समान सुगंधित और मनमोहक है। यह भक्ति काव्य की उत्कृष्टता को व्यक्त करता है।
प्रश्न 11:
“खैरियत चाहते हो तो अपना यह कफ़न लेकर यहाँ से सीधे चले जाओ!” उपर्युक्त वाक्य किसने किससे कही?
यह वाक्य बालगोबिन भगत ने अपने बेटे से कहा था। जब बेटा बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु निकट आई, तो बालगोबिन भगत ने उसे कफ़न देकर कहा कि यदि तुम्हें भलाई चाहिए तो इस कफ़न को लेकर यहाँ से चले जाओ। इसका अर्थ था कि वे अपने बेटे को मृत्यु के भय से मुक्त करना चाहते थे और उसे ईश्वर की इच्छा में समर्पित होने की सीख दे रहे थे।
प्रश्न 12:
“दरअसल मंत्रमुग्ध - सी मैं तंद्रिल अवस्था में ही थोड़ी दूर तक निकल आई थी कि अचानक मानो ब्रेक सी लगी ...... जैसे समाधिस्थ भाव में नृत्य करती किसी आत्मलीन नृत्यांगना के नुपूर अचानक बंद हो गए हों।” लेखिका ने ऐसा क्यों कहा?
लेखिका ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वे एक गहन आध्यात्मिक और मंत्रमुग्ध कर देने वाली अवस्था में थीं। वे किसी सुंदर दृश्य या अनुभूति में इतनी खो गई थीं कि उन्हें अपने आस-पास की दुनिया का ध्यान नहीं रहा। अचानक किसी कारण (जैसे कोई आवाज या घटना) से उनकी यह तंद्रा भंग हो गई, जैसे किसी नृत्यांगना के नुपूर अचानक बंद हो जाएं। यह उनके मन की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ वे पूरी तरह से लीन थीं और फिर अचानक वास्तविकता में लौट आईं।
खण्ड - ब
निर्देश : प्रश्न संख्या 4 से 6 तक के लिए प्रत्येक प्रश्न के लिए अधिकतम उत्तर सीमा 40 शब्द हैं।
-
प्र.4) कैप्टन ने नेताजी की मूर्ति पर चश्मा क्यों लगाया? [2]
कैप्टन ने नेताजी की मूर्ति पर चश्मा इसलिए लगाया क्योंकि उन्हें लगता था कि नेताजी की आँखों में वह चमक और तेज नहीं है जो उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। चश्मा लगाकर वे मूर्ति को अधिक जीवंत और यथार्थवादी बनाना चाहते थे।
-
प्र.5) “भगत का निर्णय अटल था। तू जा, नहीं तो मैं ही इस घर को छोड़कर चलूँगा।” बालगोबिन भगत ने ऐसा क्यों कहा? [2]
बालगोबिन भगत ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उनका पुत्र मर चुका था और वे अपनी बहू को विधवा जीवन जीने के लिए बाध्य नहीं करना चाहते थे। वे चाहते थे कि बहू पुनर्विवाह करके अपना जीवन सुखपूर्वक बिताए। यदि बहू नहीं मानती तो वे स्वयं घर छोड़ने को तैयार थे।
-
प्र.6) लेखक के गाड़ी में बैठने पर टैक्सी साहब ने क्या प्रतिक्रिया की? 'लखनवी अंदाज' पाठ के आधार पर लिखिए। [2]
लेखक के गाड़ी में बैठने पर टैक्सी साहब ने बड़ी शालीनता और लखनवी अंदाज में उनका स्वागत किया। उन्होंने लेखक से बड़े विनम्र भाव से पूछा कि वे कहाँ जाना चाहते हैं और फिर गाड़ी चलाने से पहले उन्होंने लेखक को सीट बेल्ट बाँधने का संकेत दिया।
-
प्र.7) फादर कामिल बुल्के के व्यक्तित्व की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। [2]
- वे अत्यंत सरल, मिलनसार और विनम्र व्यक्ति थे।
- उन्हें हिंदी भाषा और साहित्य से गहरा प्रेम था और उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी कोश जैसा महत्वपूर्ण कार्य किया।
-
प्र.8) गोपियों को उद्धव का संदेश पसंद क्यों नहीं आया? [2]
गोपियों को उद्धव का संदेश इसलिए पसंद नहीं आया क्योंकि उद्धव ने उन्हें योग और साधना का उपदेश दिया था, जबकि गोपियाँ तो कृष्ण के प्रति अपने प्रेम में डूबी हुई थीं। वे कृष्ण के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकती थीं, इसलिए उन्हें यह संदेश नीरस और बेमानी लगा।
-
प्र.9) लक्ष्मण के वचनों से बढ़े हुए परशुराम जी के क्रोध को किसने और कैसे शांत किया? [2]
लक्ष्मण के वचनों से बढ़े हुए परशुराम जी के क्रोध को श्रीराम ने शांत किया। श्रीराम ने बड़ी विनम्रता और शालीनता से परशुराम जी को संबोधित करते हुए उनके क्रोध का कारण पूछा और फिर अपने मीठे वचनों से उन्हें शांत किया।
-
प्र.10) 'संगतकार' कविता किसके महत्त्वपूर्ण योगदान को दर्शाती है? [2]
'संगतकार' कविता मुख्य गायक के साथ सहयोग करने वाले संगतकार के महत्त्वपूर्ण योगदान को दर्शाती है। यह कविता उन पृष्ठभूमि के कलाकारों की भूमिका को उजागर करती है जो बिना किसी प्रसिद्धि की आकांक्षा के मुख्य कलाकार की सफलता में अपना योगदान देते हैं।
प्र.3) मूर्तिकार ने अन्त में जार्ज पंचम की नाक का क्या हल निकाला?
मूर्तिकार ने अंत में जार्ज पंचम की नाक को तोड़कर उसके स्थान पर एक नई नाक लगाने का हल निकाला। उसने पुरानी नाक को हटाकर एक नई नाक बनाई और उसे जोड़ दिया, जिससे मूर्ति का स्वरूप बदल गया।
प्र.4) 'माता का अँचल' पाठ के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
'माता का अँचल' पाठ का शीर्षक अत्यंत सार्थक है। यह शीर्षक माता के स्नेह, सुरक्षा और वात्सल्य का प्रतीक है। अँचल माँ की गोद का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ बच्चा सुरक्षित और प्यार महसूस करता है। पाठ में बालक भोलानाथ अपनी माँ के अँचल में शरण लेता है और वहाँ उसे सुख-शांति मिलती है। इस प्रकार शीर्षक पाठ के मूल भाव को स्पष्ट करता है।
प्र.5) कवि ऋतुराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संक्षेप में लिखिए।
व्यक्तित्व: ऋतुराज का जन्म 1943 में हुआ। वे एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और लेखक थे। उनका व्यक्तित्व संवेदनशील और चिंतनशील था। वे प्रकृति और मानवीय भावनाओं के गहरे जानकार थे।
कृतित्व: ऋतुराज ने कविता, कहानी और निबंध विधाओं में लेखन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'अनामिका', 'पंखुरी', 'सपनों के से' आदि शामिल हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति चित्रण और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर मिश्रण मिलता है।
अथवा
प्र.5) कवि सूरदास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संक्षेप में लिखिए।
व्यक्तित्व: सूरदास हिंदी साहित्य के महान कवि थे। वे वल्लभाचार्य के शिष्य थे और पुष्टिमार्गीय भक्ति परंपरा से जुड़े थे। उनका जन्म 1478 ई. में हुआ था। वे जन्म से अंधे थे, लेकिन उनकी भक्ति और काव्य प्रतिभा अद्वितीय थी।
कृतित्व: सूरदास की प्रमुख रचना 'सूरसागर' है, जिसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और भक्ति का सुंदर वर्णन है। उन्होंने 'सूरसारावली' और 'साहित्य लहरी' जैसी रचनाएँ भी लिखीं। उनकी कविताओं में वात्सल्य और श्रृंगार रस की प्रधानता है।
प्र.6) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संक्षेप में लिखिए।
व्यक्तित्व: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 1927 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, कहानीकार और निबंधकार थे। उनका व्यक्तित्व सरल, संवेदनशील और समाज सुधारक था। वे नई कविता आंदोलन के प्रमुख कवियों में से एक थे।
कृतित्व: उनकी प्रमुख कविता संग्रह 'बाँस का पुल', 'कुछ और कविताएँ', 'गर्म हवा' आदि हैं। उन्होंने कहानी संग्रह 'तीसरी कसम' भी लिखा। उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है।
अथवा
प्र.6) मन्नू भण्डारी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संक्षेप में लिखिए।
व्यक्तित्व: मन्नू भण्डारी का जन्म 1931 में हुआ। वे हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार थीं। उनका व्यक्तित्व संवेदनशील और स्त्री-मन की गहरी समझ रखने वाला था। वे नई कहानी आंदोलन की प्रमुख लेखिकाओं में से एक थीं।
कृतित्व: उनकी प्रमुख कहानियाँ 'महाभोज', 'एक प्लेट सैलाब', 'आपका बंटी' आदि हैं। उन्होंने उपन्यास 'महाभोज' और 'एक इंच मुस्कान' भी लिखे। उनकी रचनाओं में स्त्री-जीवन, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक मुद्दों का सजीव चित्रण मिलता है।
खण्ड - 4
प्र.7) निम्नलिखित पठित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
फ़ादर बुल्के संकल्प से संन्यासी थे। कभी-कभी लगता है वे मन से संन्यासी नहीं थे। रिश्ता बनाते थे। तोड़ते नहीं थे। दर्सियों साल बाद मिलने के बाद भी उसकी गंध महसूस होती थी। वह जब भी दिल्ली आते तो मिलते - खोजकर, निकालकर, गर्मी सर्दी बरसात झेलकर मिलते, चाहे दो मिनट के लिए ही क्यों न हो। कौन संन्यासी करता है? उनकी चिंता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। हर मंच से इसकी तकली बयान करते, इसके लिए आकाट्य तर्क देते। बस इसी एक सवाल पर उन्हें झुँझलाते देखा है और हिन्दी वालों की ही हिन्दी की उपेक्षा पर दुःख करते उन्हें पाया है।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'फ़ादर बुल्के' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री विष्णु प्रभाकर हैं।
प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने फ़ादर बुल्के के व्यक्तित्व की विशेषताओं का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि फ़ादर बुल्के बाहरी रूप से संन्यासी थे, लेकिन उनके मन में लोगों के प्रति गहरा प्रेम और लगाव था।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि फ़ादर बुल्के ने संकल्प लिया था कि वे संन्यासी की तरह रहेंगे, लेकिन उनके मन में संन्यासी जैसी वैराग्य भावना नहीं थी। वे लोगों से रिश्ते बनाते थे और उन्हें कभी नहीं तोड़ते थे। कई वर्षों बाद मिलने पर भी वे उस रिश्ते की गंध महसूस करते थे। जब भी वे दिल्ली आते, वे अपने परिचितों को खोजकर मिलते, चाहे गर्मी, सर्दी या बरसात ही क्यों न हो। वे दो मिनट के लिए ही सही, मिलने जरूर जाते थे। लेखक कहते हैं कि कोई संन्यासी ऐसा नहीं करता। फ़ादर बुल्के को हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की चिंता थी। वे हर मंच से इसकी पीड़ा बयान करते और इसके लिए अकाट्य तर्क देते थे। केवल इसी एक सवाल पर उन्हें झुँझलाते देखा गया और वे हिन्दी वालों द्वारा ही हिन्दी की उपेक्षा पर दुखी होते थे।
अथवा
संस्कृति के नाम से जिस कूड़े-करकट के ढेर का बोध होता है, वह न संस्कृति है न रक्षणीय वरन् क्षण-क्षण परिवर्तन होने वाले संसार में किसी भी चीज को पकड़कर बैठा नहीं जा सकता। मानव ने जब-जब प्रज्ञा और मैत्री भाव से किसी नए तथ्य का दर्शन किया है तो उसने कोई वस्तु नहीं देखी है, जिसकी रक्षा के लिए दलबंदियों की जरूरत है। मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है वह अकल्याण की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं स्थायी भी है।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के 'संस्कृति' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक श्री भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।
प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने संस्कृति की सही परिभाषा और उसके स्वरूप को स्पष्ट किया है। वे बताते हैं कि संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि वह निरंतर परिवर्तनशील है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि संस्कृति के नाम पर जो कूड़ा-करकट का ढेर दिखाया जाता है, वह वास्तव में संस्कृति नहीं है और न ही उसकी रक्षा की जानी चाहिए। इस संसार में हर पल परिवर्तन हो रहा है, इसलिए किसी भी चीज को पकड़कर बैठना उचित नहीं है। मानव ने जब भी बुद्धि और मैत्री भाव से किसी नए सत्य को देखा है, तो उसे ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली जिसकी रक्षा के लिए गुटबंदी की आवश्यकता हो। मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना भी कल्याणकारी अंश है, वह अकल्याणकारी अंशों की तुलना में न केवल श्रेष्ठ है, बल्कि स्थायी भी है।
प्र.8) निम्नलिखित पठित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
सर द्रुम पलना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहे तन भारी दै।
पवन चले, केकी-कीर बतरावैं,
कोकिल गर्द हलसावै कर तारी दै।
पूरित पराग-सी उतारो करे राई नोन,
'कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक बसंत ताहि,
हे प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै।
सप्रसंग व्याख्या:
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश 'बसंत' नामक कविता से लिया गया है, जिसमें कवि ने बसंत ऋतु के सौंदर्य और उसके प्रभाव का वर्णन किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि बसंत ऋतु में वृक्षों पर नए-नए पत्ते आ जाते हैं, फूलों के गुच्छे इतने भारी हो जाते हैं कि शाखाएँ झुक जाती हैं। हवा चलती है, मोर और तोते आपस में बातें करते हैं, कोयल अपनी मधुर आवाज से सबको मोहित करती है। फूलों के पराग से वातावरण सुगंधित हो जाता है। नायिका अपने केशों में लता-पुष्प सजाती है। कवि बसंत को कामदेव का बालक कहते हैं, जिसे सुबह गुलाब की कलियाँ चटकारी देकर जगाती हैं। इस प्रकार बसंत ऋतु का सर्वत्र सौंदर्य छा जाता है।
अथवा
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला,
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई, उत्साह अस्त होता हुआ,
आवाज से राख जैसा कुछ गिरता हुआ,
तभी मुख्य गायक को ढाँडस बँधाता,
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर।
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ,
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है,
और वह फिर से गाया जा सकता है।
सप्रसंग व्याख्या:
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश 'संगतकार' कविता से लिया गया है, जिसमें कवि ने संगतकार के महत्व को रेखांकित किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि जब मुख्य गायक का गला बैठने लगता है, उसकी प्रेरणा और उत्साह क्षीण होने लगता है, और उसकी आवाज बेसुरी होकर राख की तरह बिखरने लगती है, तब संगतकार अपने स्वर से उसे सहारा देता है। वह मुख्य गायक को ढाँडस बँधाता है और यह एहसास दिलाता है कि वह अकेला नहीं है। संगतकार का यह साथ मुख्य गायक को फिर से गाने का साहस देता है। इस प्रकार संगतकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
प्र.9) लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शिक्षा के महत्व को किस प्रकार सिद्ध किया? (उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शिक्षा के महत्व को सिद्ध करते हुए कहा कि शिक्षा मनुष्य को सभ्य, सुसंस्कृत और आत्मनिर्भर बनाती है। शिक्षा से व्यक्ति में विवेक, नैतिकता और देशभक्ति का विकास होता है। वे मानते थे कि शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है। शिक्षा ही व्यक्ति को उन्नति के पथ पर ले जाती है और समाज तथा राष्ट्र की प्रगति में सहायक होती है।
अथवा
"संगीत एक आराधना है।" कैसे? 'नौबतखाने में इबादत' पठित पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
लेखक के अनुसार, संगीत एक आराधना है क्योंकि यह मन को शांति और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। 'नौबतखाने में इबादत' पाठ में बताया गया है कि संगीत सुनने और सीखने के लिए समर्पण, धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, जो ईश्वर की आराधना के समान है। संगीत में लय, ताल और स्वर के माध्यम से भक्ति भाव उत्पन्न होता है, जो साधक को ईश्वर के निकट ले जाता है।
9.20) “आत्मकथ्य” कविता का मूल भाव स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
उत्तर: 'आत्मकथ्य' कविता में कवि ने अपने जीवन के संघर्षों और अनुभवों को साझा किया है। कवि कहता है कि उसने जीवन में बहुत कुछ सहा है, लेकिन फिर भी वह अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ा रहा। इस कविता का मूल भाव आत्मचिंतन और जीवन की सच्चाइयों को स्वीकार करना है।
अथवा
“बादल” कविता में कवि ने बादल के माध्यम से क्या संदेश दिया है? (उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
उत्तर: 'बादल' कविता में कवि ने बादल को क्रांति और परिवर्तन का प्रतीक बनाया है। बादल के माध्यम से कवि ने समाज में व्याप्त अन्याय और असमानता को दूर करने का संदेश दिया है। बादल की तरह ही मनुष्य को भी दुखियों की सहायता करनी चाहिए और बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए।
खण्ड - 4
3.2) निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में एक निबंध लिखिए।
अ) जीवन में शिक्षा का महत्व
- प्रस्तावना
- शिक्षा का अर्थ
- शिक्षा से जीवन का विकास
- शिक्षा के विविध महत्व
- उपसंहार
ब) वैश्विक महंगाई
- महंगाई का अर्थ
- महंगाई के कारण
- महंगाई से जनता पर प्रभाव
- महंगाई से निपटने के उपाय
- उपसंहार
स) स्वस्थ जीवन सुख का आधार
- स्वास्थ्य का अर्थ
- स्वास्थ्य पर आधारित भोजन
- स्वास्थ्य कमजोर होने के कारण
- स्वास्थ्य सुधार के उपाय
- उपसंहार
S44 - Hindi
प्र.22) स्वयं को राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय मँगवाने हेतु एक प्रार्थना-पत्र लिखिए।
सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
[स्थान का नाम]
विषय: स्वयं को विद्यालय में प्रवेश हेतु प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं [अपना नाम], पुत्र/पुत्री [पिता का नाम], [पूरा पता] का निवासी हूँ। मैंने इस वर्ष कक्षा 10वीं की परीक्षा [पिछले विद्यालय का नाम] से उत्तीर्ण की है। अब मैं आपके विद्यालय में कक्षा 11वीं (संकाय का नाम) में प्रवेश लेना चाहता/चाहती हूँ।
मेरे पिताजी का स्थानांतरण इस नगर में हो गया है, जिसके कारण मुझे यहाँ आना पड़ा है। आपके विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता एवं अनुशासन के कारण मैं यहाँ प्रवेश लेना चाहता/चाहती हूँ।
अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे अपने विद्यालय में प्रवेश प्रदान करने की कृपा करें। मैं आपके विद्यालय के नियमों का पालन करूँगा/करूँगी और पढ़ाई में पूरी लगन दिखाऊँगा/दिखाऊँगी।
धन्यवाद।
आपका आज्ञाकारी शिष्य/शिष्या,
[आपका नाम]
[दिनांक]
अथवा
स्वयं को ससालगढ़ का निवासी सुरेश मानकर अपने छोटे भाई मोहन को शिक्षा का महत्व बताते हुए एक पत्र लिखिए।
पत्र का प्रारूप:
ससालगढ़
[दिनांक]
प्रिय भाई मोहन,
स्नेहपूर्ण पत्र प्राप्त हुआ। तुम्हारी पढ़ाई के बारे में जानकर मुझे बहुत खुशी हुई। आज मैं तुम्हें शिक्षा के महत्व के बारे में कुछ बातें बताना चाहता हूँ।
शिक्षा मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। यह हमें अज्ञानता के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है। शिक्षा ही हमें सही-गलत का ज्ञान कराती है और हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है।
शिक्षा से हमें अच्छी नौकरी मिलती है और हम आत्मनिर्भर बनते हैं। यह हमारे समाज और देश की उन्नति में भी सहायक होती है। शिक्षित व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है और दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।
इसलिए तुम मन लगाकर पढ़ाई करो और अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाओ। यदि किसी विषय में कोई समस्या हो तो मुझे पत्र लिखकर बताओ।
तुम्हारा बड़ा भाई,
सुरेश
प्र.23) दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाई मिट्टी की मूर्तियों के बिक्री हेतु एक विज्ञापन लिखिए! (उत्तर सीमा 25-50 शब्द)
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दिव्यांग बच्चों द्वारा निर्मित सुंदर मिट्टी की मूर्तियाँ बिक्री हेतु उपलब्ध। हर मूर्ति अनूठी और कलात्मक। खरीदकर इन बच्चों का हौसला बढ़ाएँ। संपर्क: [पता/फोन नंबर]।
अथवा
ऋतु में विद्यालय के उद्यान में पुष्प प्रदर्शनी देखने के लिए आने हेतु एक विज्ञापन लिखिए। (उत्तर सीमा 25-50 शब्द)
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आप सभी को सादर आमंत्रण! विद्यालय उद्यान में पुष्प प्रदर्शनी का आयोजन। विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों का अद्भुत संग्रह। दिनांक: [तारीख], समय: सुबह 9 से शाम 5 बजे तक। आइए और प्रकृति की सुंदरता का आनंद लें।