RBSE Class 12th 2010 Hindi Sahitya-SS-21-1-2010 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2010 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-1-2010 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2010 Hindi Sahitya-SS-21-1-2010
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Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-1-2010 2010 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2010
वैकल्पिक समूह I (मानविकी) — हिन्दी साहित्य — प्रथम पत्र
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 60
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं। प्रश्न संख्या 23, 24 एवं 25 में आन्तरिक विकल्प हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंकवाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ लिखें।
- प्रश्न क्रमांक 1 के चार भाग (i, ii, iii, iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (आ, ब, स एवं द) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
| प्रश्न क्रमांक | सही उत्तर का क्रमाक्षर |
|---|---|
| 1. (i) | |
| 1. (ii) | |
| 1. (iii) | |
| 1. (iv) |
प्रश्नों की संख्या : 25 मुद्रित पृष्ठों की संख्या : 7
SS—2-1—Hindi Sah. I SS-540 [Turn over
प्रश्नपत्र – हिंदी साहित्य (SS-21-1-2010) – पृष्ठ 2
-
डॉ रामकुमार वर्मा की प्रथम कविता का शीर्षक है
- (अ) देश-सेवा
- (ब) जन-सेवा
- (स) राष्ट्र-सेवा
- (द) मानव-सेवा
सही उत्तर: (स) राष्ट्र-सेवा
डॉ रामकुमार वर्मा की प्रथम कविता 'राष्ट्र-सेवा' है, जो उनके देशभक्तिपूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाती है।
-
शिव शम्भु शर्मा ने निर्दोष के हाथों में बंधी हथकड़ियों को कहा है
- (अ) पवित्र आभूषण
- (ब) हीरक आभूषण
- (स) हेममय आभूषण
- (द) मणिमय आभूषण
सही उत्तर: (अ) पवित्र आभूषण
शिव शम्भु शर्मा ने निर्दोष व्यक्ति के हाथों की हथकड़ियों को 'पवित्र आभूषण' कहा है, जो उनकी निर्दोषता और त्याग का प्रतीक है।
-
तुलसीदास की जन्मभूमि का नया नाम पड़ा
- (अ) मथुरा
- (ब) काशी
- (स) तिवारीपुर
- (द) राजापुर
सही उत्तर: (द) राजापुर
तुलसीदास की जन्मभूमि का नया नाम 'राजापुर' है, जो उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित है।
-
अध्यापक की रचना है
- (अ) रानी केतकी की कहानी
- (ब) प्रेम सागर
- (स) नासिकेतोपाख्यान
- (द) सत्य चरित
सही उत्तर: (अ) रानी केतकी की कहानी
'अध्यापक' (इंशा अल्ला खाँ) की प्रसिद्ध रचना 'रानी केतकी की कहानी' है, जो हिंदी गद्य की प्रारंभिक रचनाओं में से एक है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
-
“आखिरी चट्टान तक” यात्रावृत्त देश के किस क्षेत्र से सम्बन्धित है ? (उत्तर सीमा लगभग 30 शब्द)
“आखिरी चट्टान तक” यात्रावृत्त देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से सम्बन्धित है।
-
“ममता का विष” के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि सुशील को कौन स्वस्थ नहीं होने दे रहा था और क्यों ? (उत्तर सीमा लगभग 30 शब्द)
सुशील को उसकी माँ स्वस्थ नहीं होने दे रही थी, क्योंकि वह अत्यधिक ममता के कारण उसे अधिक खिला-पिला देती थी, जिससे उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता था।
-
तुलसीदास को किस षड्यंत्र में जेल जाना पड़ा ? (उत्तर सीमा लगभग 40 शब्द)
तुलसीदास को अकबर के दरबार के कुछ ईर्ष्यालु कवियों और दरबारियों के षड्यंत्र में जेल जाना पड़ा। उन्होंने तुलसीदास पर झूठा आरोप लगाया कि उन्होंने बादशाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की है, जिसके कारण उन्हें कारावास हुआ।
19वीं शताब्दी में हिन्दी के विकास में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों का योगदान
19वीं शताब्दी में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों ने हिन्दी भाषा को प्रोत्साहित किया। इन आन्दोलनों ने जनजागरण, शिक्षा प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए हिन्दी को माध्यम बनाया, जिससे हिन्दी साहित्य का विकास हुआ।
'भीष्म को क्षमा नहीं किया गया' निबंध का संदेश
इस निबंध का संदेश है कि क्षमा का सिद्धांत सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। भीष्म ने अपने जीवन में अनेक अन्याय किए, जैसे द्रौपदी का अपमान और अभिमन्यु वध में सहयोग। ऐसे घोर पापों के लिए क्षमा नहीं दी जा सकती। निबंध न्याय और अन्याय के बीच संतुलन पर बल देता है।
"गर्मियों में पहाड़ पर" लेख में उचित पहाड़
लेख में गर्मियों में मध्यम ऊँचाई वाले पहाड़ों पर जाना उचित बताया गया है, जैसे मसूरी, नैनीताल, शिमला आदि। ये स्थान अत्यधिक ऊँचे नहीं होते, जिससे वहाँ का मौसम सुहावना रहता है और यात्रा सुविधाजनक होती है। अधिक ऊँचाई वाले पहाड़ों पर ठंड अधिक होती है और यात्रा कठिन हो जाती है।
"सभ्य वेश में" आत्मकथा अंश से प्रेरणा
इस आत्मकथा अंश से हमें प्रेरणा मिलती है कि बाहरी वेशभूषा से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक सभ्यता और संस्कार हैं। लेखक ने दिखाया है कि सभ्य वेश धारण करने से व्यक्ति का व्यवहार और दृष्टिकोण बदल सकता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने आचरण और विचारों को सभ्य बनाने का प्रयास करना चाहिए।
"मेले" निबंध के आधार पर मानव जीवन में मेलों का महत्व
मेले मानव जीवन में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और मनोरंजन के महत्वपूर्ण साधन हैं। ये विभिन्न वर्गों के लोगों को एक साथ लाते हैं, जिससे आपसी भाईचारा बढ़ता है। मेलों में मिलने वाली वस्तुएँ और कलाएँ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी प्रोत्साहित करती हैं। निबंध के अनुसार, मेले जीवन में उल्लास और ऊर्जा का संचार करते हैं।
रत्नावली के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ
रत्नावली के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ हैं: वह अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और धैर्यवान है। वह अपने पति के प्रति समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ है। कठिन परिस्थितियों में भी वह अपनी सूझबूझ और साहस से काम लेती है। उसका स्वभाव मृदु और विनम्र है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वह दृढ़ निर्णय लेने में सक्षम है।
तुलसीदास के पालन-पोषण एवं शिक्षा में योगदान
तुलसीदास के पालन-पोषण में उनकी माता हुलसी और पिता आत्माराम दुबे का योगदान रहा। बचपन में उनकी देखभाल उनकी नानी ने की। शिक्षा के क्षेत्र में उनके गुरु शेषनाथ और बाद में नरहरिदास का महत्वपूर्ण योगदान रहा। नरहरिदास ने ही उन्हें रामभक्ति का मार्ग दिखाया और साहित्यिक रचना के लिए प्रेरित किया।
भारतेन्दुयुगीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
भारतेन्दुयुगीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं: राष्ट्रीय चेतना और स्वदेश प्रेम, सामाजिक सुधार और कुरीतियों पर व्यंग्य, हिन्दी भाषा के विकास पर बल, नवीन विधाओं (निबंध, नाटक, कविता) का प्रयोग, और पाश्चात्य प्रभाव के साथ भारतीय परंपरा का समन्वय। इस युग में साहित्य समाज जागरण का माध्यम बना और हिन्दी गद्य का विकास हुआ।
प्रश्न 20
"तुम कभी तारा न बनना" – महादेवी वर्मा ने अपनी माता को यह क्यों कहा?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2 अंक
महादेवी वर्मा ने अपनी माता को 'तुम कभी तारा न बनना' इसलिए कहा क्योंकि तारे का जीवन अकेला और नीरस होता है। वह सदा अकेला चमकता है, उसका कोई साथी नहीं होता। माँ का जीवन परिवार और समाज से जुड़ा होता है, इसलिए वह चाहती थीं कि माँ तारे की तरह अकेली न हों, बल्कि सबके बीच खुश रहें।
रामचरितमानस को उस समय की जनभाषा में प्रस्तुत करने के पीछे तुलसीदास का क्या विचार था?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2 अंक
तुलसीदास का मानना था कि धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान केवल संस्कृतज्ञों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने रामचरितमानस को अवधी (जनभाषा) में रचकर आम जनता तक रामकथा को सरलता से पहुँचाने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य था कि हर वर्ग का व्यक्ति, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या नहीं, राम के आदर्शों से परिचित हो सके।
तुलसीदास ने जनता को जगाने हेतु क्या प्रयास किए?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2 अंक
तुलसीदास ने जनता को जगाने के लिए रामचरितमानस जैसी सरल और प्रभावशाली रचना की, जिसमें उन्होंने लोककल्याण, नैतिकता और भक्ति के संदेश दिए। उन्होंने रामलीला का आयोजन किया, जिससे लोग सामूहिक रूप से रामकथा सुन और देख सकें। इसके अलावा, उन्होंने अपने प्रवचनों और भजनों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाई।
तुलसीदास ने रत्नावली को काशी से वापस भेज दिया। इसके औचित्य पर अपने विचार लिखिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2 अंक
तुलसीदास का रत्नावली को काशी से वापस भेजना उनके त्याग और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। वे संसारिक बंधनों से मुक्त होकर भगवान की भक्ति में लीन रहना चाहते थे। रत्नावली को वापस भेजकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चा सुख भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि ईश्वर की शरण में है। यह उनके वैराग्य और उच्च आदर्शों को दर्शाता है।
प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) 3 अंक
प्रयोगवाद हिंदी साहित्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति है, जिसमें कवि नए-नए प्रयोगों के लिए प्रेरित होते हैं। इसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं:
- भाषा और शैली में नवीनता: कवि पारंपरिक भाषा से हटकर नई शब्दावली और मुहावरों का प्रयोग करते हैं।
- विषय-वस्तु में विविधता: प्रेम, प्रकृति, समाज, और व्यक्तिगत अनुभवों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है।
- बिंब और प्रतीकों का प्रयोग: कविता में गहरे अर्थों को व्यक्त करने के लिए बिंब और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है।
- व्यक्तिगत अनुभवों पर बल: कवि अपने निजी अनुभवों और भावनाओं को केंद्र में रखते हैं।
रेखाचित्र, संस्मरण एवं रिपोर्ताज विधाओं का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) 3 अंक
ये तीनों गद्य विधाएँ हैं:
- रेखाचित्र: किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का संक्षिप्त, सजीव और कलात्मक वर्णन। इसमें लेखक अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर चित्र प्रस्तुत करता है।
- संस्मरण: लेखक के अपने जीवन के किसी घटना या अनुभव का स्मरण। यह व्यक्तिगत और भावनात्मक होता है।
- रिपोर्ताज: किसी घटना या स्थिति का सजीव और तथ्यात्मक वर्णन, जिसमें पत्रकारिता और साहित्य का मिश्रण होता है। यह घटना को पाठक के सामने जीवंत कर देता है।
हिन्दी भाषा के विकास में लल्लूलाल एवं सदल मिश्र के योगदान का उल्लेख कीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) 3 अंक
लल्लूलाल और सदल मिश्र ने हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया:
- लल्लूलाल: उन्होंने 'प्रेमसागर' नामक ग्रंथ की रचना की, जो खड़ी बोली हिंदी में लिखा गया पहला महत्वपूर्ण गद्य ग्रंथ माना जाता है। इसने हिंदी गद्य को एक नई दिशा दी।
- सदल मिश्र: उन्होंने 'नासिकेतोपाख्यान' जैसी रचनाओं के माध्यम से हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उन्होंने सरल और प्रभावशाली भाषा में धार्मिक और नैतिक विषयों को प्रस्तुत किया, जिससे हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ।
हिन्दी शब्द भण्डार की व्यापकता पर प्रकाश डालिए।
(उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) 3 अंक
हिंदी का शब्द भंडार अत्यंत व्यापक और समृद्ध है। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित स्रोतों से शब्द आए हैं:
- तत्सम शब्द: संस्कृत से सीधे लिए गए शब्द, जैसे 'पुस्तक', 'विद्यालय'।
- तद्भव शब्द: संस्कृत से विकसित होकर बने शब्द, जैसे 'हाथ', 'आँख'।
- देशज शब्द: देशी भाषाओं से आए शब्द, जैसे 'लोटा', 'थैला'।
- विदेशी शब्द: अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि से आए शब्द, जैसे 'किताब', 'स्कूल'।
इस प्रकार हिंदी ने विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनाकर अपने शब्द भंडार को विस्तृत और लचीला बनाया है।
प्रश्न 21
हिन्दी कहानी के विकास के विभिन्न सोपानों का परिचय दीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 150 शब्द)
उत्तर: हिन्दी कहानी का विकास मुख्यतः तीन सोपानों में विभाजित किया जा सकता है:
- प्रारंभिक काल (1900-1920): इस काल में कहानियाँ अधिकतर नैतिक और उपदेशात्मक होती थीं। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, और चंद्रधर शर्मा गुलेरी इस काल के प्रमुख कहानीकार हैं। गुलेरी की 'उसने कहा था' इस काल की महत्वपूर्ण कहानी है।
- प्रगतिशील काल (1930-1950): इस काल में कहानियाँ सामाजिक यथार्थ और आर्थिक विषमता पर केंद्रित हुईं। प्रेमचंद, यशपाल, और भगवतीचरण वर्मा इस काल के प्रमुख कहानीकार हैं। कहानियों में गाँव, किसान, और मजदूरों की समस्याओं का चित्रण मिलता है।
- आधुनिक काल (1950 के बाद): इस काल में कहानियाँ मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत अनुभवों पर केंद्रित हुईं। निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, और कमलेश्वर इस काल के प्रमुख कहानीकार हैं। कहानियों में अकेलापन, अस्तित्ववाद, और शहरी जीवन की जटिलताओं का चित्रण मिलता है।
प्रश्न 22
"आत्म-विश्लेषण" निबंध के आधार पर बाबू गुलाबराय के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 150 शब्द)
उत्तर: "आत्म-विश्लेषण" निबंध के आधार पर बाबू गुलाबराय के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- आत्म-चिंतन की प्रवृत्ति: वे अपने जीवन और कार्यों का निरंतर विश्लेषण करते थे। वे अपनी कमियों और गुणों को पहचानने में सक्षम थे।
- सादगी और विनम्रता: उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल और विनम्र था। वे दिखावे से दूर रहते थे और सादा जीवन जीते थे।
- साहित्यिक प्रेम: उन्हें साहित्य से गहरा लगाव था। वे साहित्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते थे।
- स्वतंत्र विचार: वे किसी भी विषय पर अपने स्वतंत्र विचार रखते थे और किसी के प्रभाव में नहीं आते थे।
- सामाजिक चेतना: उनमें समाज के प्रति गहरी जिम्मेदारी की भावना थी। वे समाज की समस्याओं को समझते थे और उनके समाधान के लिए प्रयासरत रहते थे।
प्रश्न 23
निम्नलिखित अवतरण की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए:
"संसार से तटस्थ रहकर शान्ति सुख पूर्वक लोक-व्यवहार संबंधी उपदेश देने वालों का उतना अधिक महत्व हमारे धर्म में नहीं है जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौन्दर्य की ज्योति जगानेवालों का है। हमारे यहाँ उपदेशक ईश्वर के अवतार नहीं माने गये हैं। अपने जीवन द्वारा कर्म-सौन्दर्य संघटित करने वाले ही अवतार कहे गये हैं। कर्म-सौन्दर्य के योग से उनके व्यक्तित्व में इतना माधुर्य आ गया है कि हमारा हृदय आप से आप उनकी ओर खिंचा पड़ता है।"
सन्दर्भ: प्रस्तुत अवतरण हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार बाबू गुलाबराय के निबंध "आत्म-विश्लेषण" से लिया गया है।
प्रसंग: लेखक यहाँ कर्म-सौन्दर्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि केवल उपदेश देने वालों की अपेक्षा कर्म द्वारा सौन्दर्य स्थापित करने वाले व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि जो लोग संसार से दूर रहकर शांति और सुखपूर्वक लोक-व्यवहार के उपदेश देते हैं, उनका हमारे धर्म में उतना महत्व नहीं है जितना उन लोगों का है जो संसार के भीतर प्रवेश करके उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौन्दर्य की ज्योति जगाते हैं। हमारे यहाँ उपदेशकों को ईश्वर का अवतार नहीं माना गया है। केवल वे ही अवतार कहे गए हैं जो अपने जीवन द्वारा कर्म-सौन्दर्य का निर्माण करते हैं। कर्म-सौन्दर्य के योग से उनके व्यक्तित्व में इतना माधुर्य आ जाता है कि हमारा हृदय स्वतः ही उनकी ओर खिंच जाता है। इस प्रकार लेखक कर्म-सौन्दर्य को जीवन में सर्वोपरि स्थान देते हैं और बताते हैं कि केवल उपदेश देने से नहीं, बल्कि कर्म द्वारा सौन्दर्य स्थापित करने से ही व्यक्ति महान बनता है।
अथवा
"कविता से दुनिया में आज तक बहुत बड़े-बड़े काम हुए हैं। अच्छी कविता सुनकर कवितागत रस के अनुसार दुःख, शोक, क्रोध, करुणा, जोश आदि के भाव पैदा हुए बिना नहीं रहते और जैसा भाव मन में पैदा होता है, कार्यरूप में फल वैसा ही होता है। हम लोगों में पुराने जमाने के भाट चारण आदि अपनी कविता ही की बदौलत वीरों में वीरता का संचार कर देते थे। पुराणादिक में कारुणिक प्रसंगों का वर्णन सुनने और उत्तर रामचरित आदि दृश्य का अभिनय देखने में जो अश्रुपात होने लगता है वह क्या है? वह अच्छी कविता का प्रभाव है।"
सन्दर्भ: प्रस्तुत अवतरण हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार बाबू गुलाबराय के निबंध "आत्म-विश्लेषण" से लिया गया है।
प्रसंग: लेखक यहाँ कविता की शक्ति और उसके प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि कविता मनुष्य के मन और कर्म को किस प्रकार प्रभावित करती है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि कविता ने दुनिया में आज तक बहुत बड़े-बड़े काम किए हैं। अच्छी कविता सुनने से उसके रस के अनुसार दुःख, शोक, क्रोध, करुणा, जोश आदि भाव उत्पन्न होते हैं और जैसा भाव मन में पैदा होता है, वैसा ही कार्यरूप में फल मिलता है। पुराने समय में भाट और चारण अपनी कविता के माध्यम से वीरों में वीरता का संचार कर देते थे। पुराणों में करुण प्रसंगों का वर्णन सुनने और उत्तर रामचरित जैसे नाटकों का अभिनय देखने में जो आँसू निकलते हैं, वह अच्छी कविता का ही प्रभाव है। इस प्रकार लेखक कविता की शक्ति को स्वीकार करते हुए बताते हैं कि कविता मनुष्य के भावों और कर्मों को गहराई से प्रभावित करती है।
प्रश्न 24. निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए :
प्रथम गद्यांश
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध निबंध से लिया गया है। इसमें साहित्यकार और समाज के संबंध पर प्रकाश डाला गया है।
प्रसंग : लेखक कहता है कि जब देश में कोई बड़ा आंदोलन या परिवर्तन होता है, तो साहित्यकार उससे अप्रभावित नहीं रह सकता। वह अपने देशवासियों के दुख-दर्द को महसूस करता है और अपनी रचना में उसे अभिव्यक्त करता है।
व्याख्या : लेखक के अनुसार, जब देश में कोई लहर (जैसे स्वतंत्रता आंदोलन) उठती है, तो साहित्यकार के लिए उससे अलग रहना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा देशवासियों के कष्टों से व्याकुल हो उठती है और वह रो उठता है, लेकिन उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होते हुए भी सार्वभौमिक रहता है। उदाहरण के तौर पर 'गुलामी' की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना 'काका' की पुस्तक है। आज जब गुलामी की प्रथा समाप्त हो गई है, फिर भी उस रचना में इतनी व्यापकता है कि हम उसे पढ़कर मुग्ध हो जाते हैं। इस प्रकार साहित्यकार की रचना समय और स्थान की सीमाओं को पार कर जाती है।
द्वितीय गद्यांश (अथवा)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश भारत की मानवीय शक्ति और उसके विकास की संभावनाओं पर केंद्रित है।
प्रसंग : लेखक भारत के मनुष्य बल को देश की सबसे बड़ी शक्ति मानता है और बताता है कि उसे प्रशिक्षित करके कैसे देश के विकास में योगदान दिया जा सकता है।
व्याख्या : लेखक कहता है कि भारत का मनुष्य बल उसकी समग्र सामर्थ्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। वह भारत की एक प्रमुख शक्ति है। यदि हम किसी अकुशल भारतीय को प्रशिक्षित करके कुशल बना सकते हैं, किसी कुशल भारतीय की कुशलता में वृद्धि कर सकते हैं, और किसी पढ़े-लिखे भारतीय के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बना सकते हैं, तथा कृषि, उद्योग और सेवा के क्षेत्रों में आर्थिक क्रियाशीलता के नए रास्ते बना सकते हैं, तो ये सब भारतीय न केवल लक्ष्यों तक पहुँचने में कामयाब होंगे, बल्कि उनसे आगे भी जा सकेंगे। इस प्रकार मानव संसाधन का सही उपयोग देश की प्रगति की कुंजी है।
25. निम्नलिखित अवतरण की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए :
प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित निबंध 'कबीर' से लिया गया है, जिसके लेखक हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। इसमें कबीरदास के धर्म-बोध और उनके समय की सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है।
व्याख्या : लेखक कहते हैं कि धर्म की समझ और उसका स्वरूप देश और काल के अनुसार बदलता रहता है। कबीर साहब ने जिस समय निर्गुण राम (बिना आकार-गुण वाले ईश्वर) का प्रचार किया, उस समय भारत में घोर अत्याचार और धार्मिक पाखंड का बोलबाला था। लोग आस्था खो चुके थे और चारों ओर शून्यता तथा निराशा का वातावरण था। भारत रूपी महल खंडहर में बदल चुका था। ऐसे में यदि कबीरदास ने निर्गुण राम का दिया (ज्ञान और भक्ति का प्रकाश) नहीं जलाया होता, तो आज उस खंडहर में अंधविश्वास और अज्ञान रूपी भूत ही भूत समा चुके होते। अर्थात् कबीर ने अपने निर्गुण भक्ति मार्ग से समाज को पाखंड और आडंबर से मुक्ति दिलाई।
प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी 'पूस की रात' से लिया गया है, जिसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु हैं। यह कहानी हल्कू और उसकी पत्नी मुन्नी के संघर्ष को दर्शाती है।
व्याख्या : लेखक कहते हैं कि हल्कू के मन में सौंदर्य बोध (सुंदरता की अनुभूति) की प्रक्रिया जब अपनी गहराई में उतरकर पूर्णता पाने का प्रयास करने लगी, तो उसका रोष से भरा स्वाभिमान बाधा बनकर सामने आया। हल्कू को अपनी पत्नी मुन्नी का अन्याय पक्ष (जमींदार के पक्ष) में जाना अच्छा नहीं लगा, भले ही उनके बीच सारा सद्भाव था। उनका न्याय-बोध (न्याय की समझ) उनकी सौंदर्य-रीझ (पत्नी के प्रति आकर्षण) के बावजूद सहमत नहीं हो पाता था। वे अपनी रीझ के कारण कुछ हद तक शांत तो हुए, लेकिन न्याय के प्रति सजग और उत्साहित भी बने रहे।