RBSE Class 12th 2011 Hindi Sahitya-SS-21-1-2011 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2011 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-1-2011 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2011 Hindi Sahitya-SS-21-1-2011
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Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-1-2011 2011 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2012
वैकल्पिक समूह I (OPTIONAL GROUP I — HUMANITIES)
हिन्दी साहित्य — प्रथम पत्र
(HINDI SAHITYA — First Paper)
समय : 3 घण्टे | पूर्णांक : 60
प्रश्नों की संख्या : 25 | मुद्रित पृष्ठ : 7
पेपर कोड : SS—2—Hindi Sah. I
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं। प्रश्न संख्या 23, 24 एवं 25 में आन्तरिक विकल्प हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंकवाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ सतत् लिखें।
- प्रश्न क्रमांक 4 के चार भाग (i, ii, iii तथा iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (अ, ब, स एवं द) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
| प्रश्न क्रमांक | सही उत्तर का क्रमाक्षर |
|---|---|
| (i) | |
| (ii) | |
| (iii) | |
| (iv) |
[ 55-540 ] [ Turn over ]
प्रश्न 1 (बहुविकल्पीय प्रश्न)
-
“आशीर्वाद' नामक निबंध के रचनाकार हैं
- (अ) विद्यानिवास मिश्र
- (ब) बालमुकुन्द गुप्त
- (स) महावीर प्रसाद द्विवेदी
- (द) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
सही उत्तर: (द) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
स्पष्टीकरण: 'आशीर्वाद' निबंध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित है, जो हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक एवं निबंधकार हैं।
-
‘सीता’ को यातना किसने दी?
- (अ) निष्ठुर स्वामी
- (ब) अत्याचारी पति
- (स) कठोर विमाता
- (द) क्रूर पिता
सही उत्तर: (स) कठोर विमाता
स्पष्टीकरण: प्रस्तुत पाठ के अनुसार, सीता को उसकी कठोर विमाता द्वारा यातना दी गई थी।
-
तुलसीदास के मन में आत्महत्या का विचार आने का कारण था
- (अ) काशी के पंडितों द्वारा अपमान
- (ब) मोहिनी मोह
- (स) पुलिस द्वारा अपमान
- (द) रत्नावली के कटु वचन
सही उत्तर: (द) रत्नावली के कटु वचन
स्पष्टीकरण: तुलसीदास की पत्नी रत्नावली के कटु वचनों से आहत होकर उनके मन में आत्महत्या का विचार आया था।
-
“रानी केतकी की कहानी” के रचनाकार हैं
- (अ) इंशा अल्ला खाँ
- (ब) सदल मिश्र
- (स) लल्लू लाल
- (द) सदल मिश्र
सही उत्तर: (अ) इंशा अल्ला खाँ
स्पष्टीकरण: 'रानी केतकी की कहानी' इंशा अल्ला खाँ द्वारा रचित है, जो हिंदी गद्य की प्रारंभिक रचनाओं में से एक है।
प्रश्न 2 (लघु उत्तरीय)
गांधीजी ने विलायत में कुटुम्ब के साथ रहना छोड़कर अलग रहना क्यों शुरू किया?
गांधीजी ने विलायत में कुटुम्ब के साथ रहना इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वहाँ उन्हें अपने धर्म और रीति-रिवाजों का पालन करने में कठिनाई होती थी। वे शाकाहारी भोजन और अपनी आदतों के अनुसार रहना चाहते थे, जो उस परिवार में संभव नहीं था।
प्रश्न 3 (लघु उत्तरीय)
“आखिरी चट्टान” यात्रावृत्त में लड़कियों द्वारा आत्महत्या का क्या कारण बताया है?
“आखिरी चट्टान” यात्रावृत्त में लड़कियों द्वारा आत्महत्या का कारण सामाजिक दबाव और पारिवारिक प्रताड़ना को बताया गया है। लड़कियाँ अपने जीवन की विवशताओं और अत्याचारों से तंग आकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती थीं।
प्रश्न 4 (लघु उत्तरीय)
तुलसीदास के जन्म के समय राजनीतिक स्थिति कैसी थी?
तुलसीदास के जन्म के समय (1532 ई.) भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार हो रहा था। हुमायूँ का शासनकाल था, जिसमें राजनीतिक अस्थिरता थी। हिंदू राजाओं के छोटे-छोटे राज्य थे, और मुगलों से संघर्ष चल रहा था। समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक उथल-पुथल का माहौल था।
प्रश्न 5 से 12 (लघु उत्तरीय प्रश्न)
5. गद्य के विकास में आर्य समाज ने किस प्रकार योगदान किया ?
(उत्तर सीमा लगभग 40 शब्द)
आर्य समाज ने गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसने सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली भाषा में धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक विषयों पर लेखन को प्रोत्साहित किया। स्वामी दयानंद सरस्वती के 'सत्यार्थ प्रकाश' जैसे ग्रंथों ने हिंदी गद्य को नई दिशा दी।
6. “कवि और कविता” निबंध में बताये गये प्रभावोत्पादकता नामक प्रधान धर्म को स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
प्रभावोत्पादकता का अर्थ है पाठक या श्रोता पर गहरा प्रभाव डालने की क्षमता। निबंध के अनुसार, कविता का प्रधान धर्म प्रभावोत्पादकता है। कविता में भावों, विचारों और कल्पना के माध्यम से ऐसा प्रभाव उत्पन्न होना चाहिए जो पाठक के मन को झकझोर दे और उसे सोचने पर मजबूर कर दे।
7. प्रेमचंद ने साहित्य को देशकाल का प्रतिबिंब क्यों बताया है ?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
प्रेमचंद के अनुसार, साहित्य समाज का दर्पण होता है। यह अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को अपने में समेटे होता है। साहित्यकार अपने युग की समस्याओं, संघर्षों और आकांक्षाओं को अपनी रचनाओं में चित्रित करता है, इसलिए साहित्य देशकाल का प्रतिबिंब है।
8. “ममता का फल” एकांकी में किसकी ममता कैसे विषकारी बन रही थी ?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
“ममता का फल” एकांकी में माता की ममता विषकारी बन रही थी। माता अपने पुत्र पर अत्यधिक स्नेह करती थी और उसकी हर इच्छा पूरी करती थी। यह अंधी ममता पुत्र को स्वार्थी और अनुशासनहीन बना रही थी, जिससे उसका चरित्र पतन की ओर जा रहा था।
9. “आत्म-विश्लेषण” निबंध में लेखक ने बड़े आदमियों के किन-किन रोगों का उल्लेख किया है?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
लेखक ने बड़े आदमियों के निम्नलिखित रोगों का उल्लेख किया है: (1) अहंकार और घमंड, (2) दूसरों की उपेक्षा करना, (3) आलोचना सहन न करना, (4) स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना, (5) दूसरों की भावनाओं की कद्र न करना। ये रोग उनके व्यक्तित्व को दूषित करते हैं।
10. तुलसीदास के बाल्यकाल के बारे में बताइये।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
तुलसीदास का जन्म राजापुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। बाल्यकाल में वे अत्यंत कुरूप थे और उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था। उनका पालन-पोषण एक निर्धन ब्राह्मण दंपत्ति ने किया। बाल्यकाल में वे राम-कथा सुनने में रुचि लेते थे और उनमें भक्ति भावना प्रबल थी।
11. तुलसीदास चोरी से बगीचे में क्या देखने गये थे ?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
तुलसीदास चोरी से बगीचे में रामलीला देखने गये थे। उनके पिता ने उन्हें रामलीला देखने से मना किया था, लेकिन तुलसीदास की राम-भक्ति इतनी प्रबल थी कि वे छिपकर बगीचे में जाकर रामलीला का आनंद लेते थे। यह उनकी बाल्यकाल की भक्ति भावना को दर्शाता है।
12. प्रगतिवाद की कोई चार प्रवृत्तियों का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द)
प्रगतिवाद की चार प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं:
- यथार्थवाद: जीवन की वास्तविक समस्याओं का चित्रण।
- वर्ग-संघर्ष: शोषक और शोषित के बीच संघर्ष का प्रतिपादन।
- समाजवादी दृष्टिकोण: सामाजिक समानता और न्याय पर बल।
- वैज्ञानिक चेतना: अंधविश्वासों के विरुद्ध तर्क और विज्ञान को महत्व।
3. “गर्मियों में पहाड़ पर” में पहाड़ी लोगों में किस प्रकार के बदलाव की बात की गयी है?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2
“गर्मियों में पहाड़ पर” में पहाड़ी लोगों में मौसम के अनुसार जीवनशैली में बदलाव की बात की गई है। गर्मियों में पहाड़ी लोग ऊँचाई वाले स्थानों पर चले जाते हैं, जहाँ ठंडक होती है। वे अपने पशुओं को भी साथ ले जाते हैं और अस्थायी आवास बनाकर रहते हैं। यह बदलाव प्रकृति के अनुकूल ढलने का प्रतीक है।
4. तुलसीदास ने स्थान-स्थान पर अखाड़े स्थापित करने की प्रेरणा क्यों दी?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2
तुलसीदास ने स्थान-स्थान पर अखाड़े स्थापित करने की प्रेरणा इसलिए दी ताकि लोग शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें। अखाड़ों में कुश्ती, व्यायाम और युद्ध कला का अभ्यास होता था, जिससे समाज में शक्ति और अनुशासन का विकास होता था। इसके अलावा, यह धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को भी बढ़ावा देता था।
5. तुलसीदास ने मठ के महंत का पद क्यों छोड़ा?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2
तुलसीदास ने मठ के महंत का पद इसलिए छोड़ा क्योंकि वे सांसारिक बंधनों और ऐश्वर्य से दूर रहना चाहते थे। उनका मानना था कि महंत पद से जुड़ी जिम्मेदारियाँ और भौतिक सुख-सुविधाएँ आध्यात्मिक मार्ग में बाधक होती हैं। वे सादा जीवन और उच्च विचारों के पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने यह पद त्याग दिया।
6. तुलसीदास के स्थान पर आप होते तो, रत्नावली को काशी से वापस भेजकर कैसा अनुभव करते?
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 2
यदि मैं तुलसीदास के स्थान पर होता, तो रत्नावली को काशी से वापस भेजकर मुझे गहरा दुख और पश्चाताप होता। मैं यह सोचकर व्यथित होता कि मैंने अपनी पत्नी के प्रति अन्याय किया है। साथ ही, मुझे यह अनुभव होता कि सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर ही सच्चा आध्यात्मिक सुख प्राप्त किया जा सकता है।
7. नई कविता की कोई चार प्रवृत्तियों का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 3
नई कविता की चार प्रमुख प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:
- यथार्थवाद: इसमें जीवन की वास्तविकताओं और समस्याओं का चित्रण किया जाता है।
- व्यक्तिवाद: कवि अपने व्यक्तिगत अनुभवों और भावनाओं को अभिव्यक्त करता है।
- प्रयोगधर्मिता: भाषा, शैली और बिम्बों में नए प्रयोग किए जाते हैं।
- सामाजिक चेतना: समाज के शोषित और वंचित वर्गों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाती है।
8. साक्षात्कार एवं डायरी विधा का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 3
साक्षात्कार: यह एक संवादात्मक विधा है जिसमें एक व्यक्ति (साक्षात्कारकर्ता) दूसरे व्यक्ति (साक्षात्कारी) से प्रश्न पूछकर उसके विचारों, अनुभवों और जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। यह पत्रकारिता और शोध का महत्वपूर्ण माध्यम है।
डायरी: यह एक व्यक्तिगत लेखन विधा है जिसमें लेखक अपने दैनिक जीवन की घटनाओं, भावनाओं और विचारों को क्रमबद्ध रूप में लिखता है। यह आत्मकथात्मक शैली में होती है और इसमें गोपनीयता का भाव होता है।
9. हिन्दी के विकास में इंशा अल्ला खाँ एवं मुंशी सदासुख लाल के योगदान का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 3
इंशा अल्ला खाँ: वे उर्दू और हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक थे। उन्होंने 'रानी केतकी की कहानी' लिखी, जो हिन्दी गद्य की प्रारंभिक रचनाओं में से एक है। उनकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण थी, जिसने हिन्दी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुंशी सदासुख लाल: वे हिन्दी के प्रारंभिक गद्य लेखकों में से एक थे। उन्होंने 'सुखसागर' नामक ग्रंथ की रचना की, जो हिन्दी गद्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उनकी रचनाओं ने हिन्दी भाषा को साहित्यिक रूप देने में योगदान दिया।
20. हिन्दी शब्दावली का वर्गीकरण सहित समुचित परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 60 शब्द) 3
हिन्दी शब्दावली का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है:
- उत्पत्ति के आधार पर: तत्सम (संस्कृत से सीधे लिए गए), तद्भव (संस्कृत से विकसित), देशज (देशी भाषाओं से), विदेशज (अन्य भाषाओं से आए)।
- प्रयोग के आधार पर: साहित्यिक, बोलचाल, पारिभाषिक (तकनीकी), क्षेत्रीय।
- रचना के आधार पर: सरल (एक शब्द), यौगिक (दो या अधिक शब्दों से मिलकर), योगरूढ़ (यौगिक होते हुए भी विशेष अर्थ देने वाले)।
हिन्दी शब्दावली में विविधता है, जो इसे समृद्ध और अभिव्यंजक बनाती है।
प्रश्न 22
हिन्दी आलोचना के उद्भव एवं विकास का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 50 शब्द) 4
हिन्दी आलोचना का उद्भव 19वीं शताब्दी के मध्य में भारतेन्दु युग से माना जाता है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने साहित्यिक मानदंडों की नींव रखी। द्विवेदी युग में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वैज्ञानिक आधार दिया। छायावाद के बाद आलोचना में मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण विकसित हुए। वर्तमान में सिद्धांतों और व्यावहारिकता का समन्वय देखने को मिलता है।
प्रश्न 23
'क्षात्रधर्म का सौन्दर्य' निबंध के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा लगभग 50 शब्द) 4
इस निबंध का उद्देश्य क्षत्रिय धर्म के वीरतापूर्ण और त्यागमयी पक्ष को उजागर करना है। लेखक ने परशुराम और भीष्म जैसे पात्रों के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्चा क्षात्रधर्म केवल युद्ध कौशल में नहीं, बल्कि न्याय, सत्य और लोककल्याण के लिए समर्पित होने में है।
प्रश्न 24
निम्नलिखित अवतरण की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए : 4
“परशुराम चाहे ज्ञान-विज्ञान की जानकारी का बोझ ढोने में भीष्म के समकक्ष न रहे हों, पर सीधी बात को सीधे समझने में निश्चय ही वह उनसे बहुत आगे थे। वह भी ब्रह्मचारी थे -- बाल ब्रह्मचारी ! पर भीष्म जब अपने निर्वार्य भाइयों के लिए कन्याहरण कर लाये और एक कन्या को अविवाहित रहने के लिए बाध्य किया तब उन्होंने भीष्म के इस अशोभन कार्य को क्षमा नहीं किया। समझाने-बुझाने तक ही नहीं रुके, लड़ाई भी की। पर भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के शब्दों से चिपटे ही रहे। वह भविष्य नहीं देख सके, वह लोक-कल्याण को नहीं समझ सके।”
अथवा
“जब यह कुतूहल उत्कंठा बन जाता है और उत्कंठा व्यष्टि के लिए न होकर समष्टि के लिए हो जाती है, तो जीवन का रंग उतरने नहीं पाता, जीवन का स्वाद बिगड़ने नहीं पाता और शरीर चाहे कैसा भी हो, किसी भी अवस्था में ढोलक की थाप के साथ जिन्दगी का तराना फूटने को आकुल हो उठता है। बूढ़े होते जाते पेड़ में भी जैसे वसंत आने पर एक-दो फुनगी आए बिना नहीं रहती, एक-दो फूल खिले बिना नहीं रहते।”
प्रसंग: प्रस्तुत अवतरण 'क्षात्रधर्म का सौन्दर्य' निबंध से लिया गया है, जिसमें लेखक ने परशुराम और भीष्म के चरित्र के माध्यम से क्षात्रधर्म के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट किया है।
व्याख्या: लेखक कहता है कि परशुराम भले ही ज्ञान-विज्ञान में भीष्म के बराबर न रहे हों, लेकिन सीधी बात को सीधे समझने में वे भीष्म से कहीं आगे थे। दोनों ब्रह्मचारी थे, परंतु जब भीष्म ने अपने भाइयों के लिए कन्याहरण किया और एक कन्या को अविवाहित रहने पर बाध्य किया, तो परशुराम ने इस अन्याय को क्षमा नहीं किया। वे केवल समझाने-बुझाने तक नहीं रुके, बल्कि युद्ध भी किया। इसके विपरीत भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के शब्दों से चिपके रहे और वे भविष्य नहीं देख सके, लोक-कल्याण को नहीं समझ सके। इस प्रकार लेखक ने स्पष्ट किया है कि सच्चा क्षात्रधर्म शब्दों की प्रतिज्ञा में नहीं, बल्कि न्याय और लोक-कल्याण के लिए संघर्ष करने में है।
वैकल्पिक व्याख्या: दूसरे अवतरण में लेखक ने जीवन में उत्साह और जिजीविषा के महत्व को रेखांकित किया है। जब कुतूहल उत्कंठा में बदल जाता है और वह उत्कंठा व्यक्तिगत न होकर समाज के लिए होती है, तो जीवन का रंग और स्वाद बना रहता है। चाहे शरीर कैसा भी हो, जीवन का संगीत फूट पड़ता है। इसी प्रकार बूढ़े पेड़ में भी वसंत आने पर नई फुनगियाँ और फूल आते हैं, अर्थात् जीवन के अंतिम पड़ाव में भी उत्साह और सृजनशीलता बनी रहती है।
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए :
प्रथम गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक विचारों पर आधारित है। इसमें साहित्य के दो पक्षों—सिद्धांत पक्ष और अनुभूति पक्ष—पर प्रकाश डाला गया है।
प्रसंग : लेखक ने साहित्य के आदिकाल से चले आ रहे दो विभागों का उल्लेख किया है। सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर साहित्य जीवन में उतरता है और इसी आधार पर आदर्श और यथार्थ के दो रूप बनते हैं। लेखक अपनी दृष्टि को यथार्थोन्मुख आदर्श बताता है और अनुभूति प्रधान साहित्य को अधिक महत्व देता है।
व्याख्या : गद्यांश में कहा गया है कि साहित्य के दो मुख्य विभाग हैं—सिद्धांत पक्ष और अनुभूति पक्ष। सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर साहित्य जीवन में अवतरित होता है। इसी आधार पर साहित्य के आदर्श और यथार्थ दो रूप बनते हैं। जहाँ ये दोनों मिल जाते हैं, वहाँ आदर्शोन्मुख यथार्थ बन जाता है। लेखक की दृष्टि यथार्थोन्मुख आदर्श रही है। सिद्धांतवादी साहित्य की अपेक्षा अनुभूति के क्षणों में बंधा हुआ साहित्य ही वास्तव में साहित्य की संज्ञा से विभूषित होता है। उसी में जीवन दर्शन है और भविष्य जीवन की प्रेरणा है। इस प्रकार लेखक अनुभूति प्रधान साहित्य को अधिक महत्व देता है।
द्वितीय गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या (अथवा)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश भारतीय समाज की मानसिकता और उद्योग-उपक्रमी स्वभाव पर केंद्रित है।
प्रसंग : लेखक भारतीयों में नई चीजें सीखने की क्षमता और प्रतिस्पर्धा में उतरने की प्रवृत्ति पर चर्चा करता है। साथ ही, उनकी उत्पादकता और रचनात्मकता को सही दिशा देने के लिए उचित प्रणालियों की आवश्यकता पर बल देता है।
व्याख्या : गद्यांश में कहा गया है कि भारतीयों में कुछ नया सीखने की मानसिक सामर्थ्य तो है ही, उनमें से अधिकतर में होड़ में उतरने का मिजाज भी है, जो उनके उद्योग-उपक्रमी स्वभाव को दर्शाता है। आज इनके इस जोश को उचित मार्ग प्रदान करने वाली पर्याप्त प्रणालियाँ नहीं हैं, जहाँ से उनकी उत्पादकता और रचनात्मकता प्रवाहित हो सके। लेखक का मानना है कि हमें इस दिशा में प्रयास करने होंगे। हमारी तकनीकी परिकल्पना की प्रयोजनाओं में ऐसे अनेक तत्त्व मौजूद हैं, जो भारत में इस कीमती साधन से लाभान्वित हो सकेंगे। इस प्रकार लेखक भारतीयों की क्षमता को पहचानने और उसे सही दिशा देने की आवश्यकता पर बल देता है।
प्रश्न 25
निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 200 शब्दों में कीजिए :
प्रथम गद्यांश
प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित 'तुलसीदास' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। इस गद्यांश में तुलसीदास की पत्नी रत्नावली के स्वभाव की विवशताओं और तुलसीदास पर उसके प्रभाव का चित्रण किया गया है।
व्याख्या: तुलसीदास ने अपनी पत्नी रत्नावली को अनेक बार हीन भावना से ग्रस्त होते देखा है। जब यह हीनता उसे सताती है, तो वह कभी-कभी मन ही मन में उग्र भी हो उठती है। तुलसीदास अपनी पत्नी के रूप और गुणों पर पूरी तरह मुग्ध हैं, फिर भी रत्ना के स्वभाव की इस कटुता में वे कहीं न कहीं बहुत दुखी हैं। जब यह हीन भावना जागृत होती है, तो रत्नावली कभी-कभी ईर्ष्यालु भी हो जाती है। तुलसीदास के आंतरिक सौंदर्य बोध को इससे आघात पहुँचता है। इस आघात से बचने के लिए उनकी चेतना भीतर ही भीतर व्याकुल हो उठती है। इस प्रकार लेखक ने रत्नावली के मानसिक द्वंद्व और तुलसीदास की मनोदशा का मार्मिक चित्रण किया है।
द्वितीय गद्यांश (अथवा)
प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित 'कबीर' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। इस गद्यांश में लेखक ने कबीरदास और अपने दृष्टिकोण की तुलना करते हुए समाज सुधार के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि वे महात्मा कबीरदास जी को उच्चतम आत्माओं में से एक मानते हैं। कबीरदास ने दूसरों की बुराइयों की कठोर आलोचना करके स्वयं को सुधारा। परंतु लेखक अपनी और समाज की सच्ची आलोचना करके दोनों को एक निष्ठा से बाँधकर आगे बढ़ना चाहते हैं। वे कहते हैं कि टूटी-फूटी झोंपड़ियों के बीच में अकेले महल की कोई शोभा नहीं होती। वह महल अपनी सारी भव्यता और कलात्मकता के बावजूद क्रूर और गँवार लगता है। इस प्रकार लेखक ने सामूहिक विकास और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को रेखांकित किया है।