RBSE Class 12th 2011 Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 Previous Year Papers
Class 12th students hunting authentic previous year papers for Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 (2011) land here for a reason: the paper below matches how RBSE assessments are remembered from that year. RBSE Solution does not mix years on one page; each combination gets its own notes.
Skim the overview sections, then work through the scanned pages. Pair this practice with RBSE books and solutions when you need to relearn a concept a question exposed.
Paper details
Quick reference for this previous year papers page — confirm board, class, and year & subject before you study.
| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2011 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
The table summarises this Previous Year Papers resource. Confirm RBSE, Class 12th, year 2011, and subject Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 before studying.
RBSE Solution organises previous year papers so each URL carries chapter-specific guidance — better for students and for search engines than one generic paragraph for the whole class.
How to practise with this question paper
Stage one: read the Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 question paper from 2011 without a timer and highlight command words — explain, prove, calculate, discuss. Stage two: attempt selected questions closed-book. Stage three: compare with solutions or teacher feedback.
Previous Year Papers work best when you log mistakes by topic, not only by question number. That log becomes your revision index before pre-boards.
RBSE Class 12th 2011 Hindi Sahitya-SS-21-2-2011
Scroll through the Previous Year Papers pages for Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 (2011).
Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-2-2011 2011 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2012
वैकल्पिक वर्ग I (OPTIONAL GROUP I – HUMANITIES)
हिन्दी साहित्य — द्वितीय पत्र
(HINDI SAHITYA — Second Paper)
समय : 3¼ घण्टे पूर्णांक : 60
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं। प्रश्न संख्या 23, 24 एवं 25 में आन्तरिक विकल्प हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंकवाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ सतत् लिखें।
- प्रश्न क्रमांक 1 के चार भाग (i, ii, iii तथा iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (अ, ब, स एवं द) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
| प्रश्न क्रमांक | सही उत्तर का क्रमाक्षर |
|---|---|
| 1. (i) | |
| 1. (ii) | |
| 1. (iii) | |
| 1. (iv) |
SS—2 -2—Hindi Sah. II [ 55-54 ] [ Turn over
प्रश्न पत्र – हिन्दी साहित्य (SS-21-2-2011)
खण्ड – अ : वस्तुनिष्ठ प्रश्न
-
"रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्" — काव्य की यह परिभाषा दी है
- (अ) पण्डितराज जगन्नाथ ने
- (ब) आचार्य विश्वनाथ ने
- (स) आचार्य वामन ने
- (द) मम्मट ने
सही उत्तर: (अ) पण्डितराज जगन्नाथ ने
व्याख्या: पण्डितराज जगन्नाथ ने 'रसगंगाधर' में काव्य की यह परिभाषा दी है, जिसमें रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द काव्य कहा गया है।
-
हिन्दी साहित्य के आदिकाल का प्रसिद्ध महाकाव्य है
- (अ) साकेत
- (ब) रामचरितमानस
- (स) पृथ्वीराज रासो
- (द) कामायनी
सही उत्तर: (स) पृथ्वीराज रासो
व्याख्या: 'पृथ्वीराज रासो' चंदबरदाई द्वारा रचित आदिकाल का प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित है।
-
"वात्सल्य" रस के प्रमुख कवि हैं
- (अ) तुलसीदास
- (ब) सूरदास
- (स) बिहारी
- (द) मीरा
सही उत्तर: (ब) सूरदास
व्याख्या: सूरदास वात्सल्य रस के प्रमुख कवि हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण के बाल रूप का वर्णन करते हुए वात्सल्य रस की सुंदर अभिव्यक्ति की है।
-
"सिर पै बैठयौ काग, आँख खात निकारत। खींचत जीभहि बाहर, अतिहि आनन्द उर धारत॥"
उपर्युक्त पंक्तियों में रस है
- (अ) अद्भुत रस
- (ब) वीर रस
- (स) शृंगार रस
- (द) वीभत्स रस
सही उत्तर: (द) वीभत्स रस
व्याख्या: इन पंक्तियों में कौए द्वारा आँख निकालने और जीभ खींचने का घृणित वर्णन है, जो वीभत्स रस का उदाहरण है। वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) है।
खण्ड – ब : अति लघु उत्तरीय प्रश्न
(उत्तर-सीमा: 5 से 20 शब्द)
-
काव्य कला के विभिन्न घटक बताइए।
काव्य कला के मुख्य घटक हैं – शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, गुण, रीति, और वृत्ति। ये सभी मिलकर काव्य को सुंदर और प्रभावशाली बनाते हैं।
-
आचार्य भामह ने काव्य-प्रयोजन किसे माना है?
आचार्य भामह ने काव्य का प्रयोजन 'यश' और 'धर्म' को माना है। उनके अनुसार काव्य से कीर्ति और धर्म की प्राप्ति होती है।
-
निर्वेद या शम भाव कौन-से रस का स्थायी भाव है और यह कैसे उत्पन्न होता है?
निर्वेद या शम भाव 'शांत रस' का स्थायी भाव है। यह संसार की अनित्यता, वैराग्य, और आध्यात्मिक चिंतन से उत्पन्न होता है।
-
भट्टनायक के मतानुसार रस का आस्वादक कौन होता है?
भट्टनायक के अनुसार रस का आस्वादक 'सामाजिक' (दर्शक या श्रोता) होता है। वे रस को भोज्य (आस्वाद्य) और सामाजिक को भोक्ता (आस्वादक) मानते हैं।
निर्देश : प्रश्न संख्या 68 से 76 तक के लिए उत्तर-सीमा 50 शब्द है।
प्रश्न 68
“वक्रोक्ति' शब्दालंकार है या अर्थालंकार, यह बताते हुए इसके लक्षण व उदाहरण दीजिए।
उत्तर: वक्रोक्ति शब्दालंकार है। इसका लक्षण है—जहाँ किसी शब्द के सामान्य अर्थ को छोड़कर वक्र (टेढ़े) अर्थ का ग्रहण किया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण: "तुम्हारी बातों का कोई जवाब नहीं" — यहाँ 'जवाब' शब्द का अर्थ उत्तर न होकर प्रशंसा है।
प्रश्न 69
रे +॑]+ तर
नेहु न नैननु कौ कछु, उपजी बड़ी बलाइ ।
नीर भरे नित प्रति रहै, तऊ न प्यास बुझाइ ॥
उपर्युक्त पंक्तियों में निहित अलंकार का नामोल्लेख करते हुए लक्षण भी लिखिए।
उत्तर: इन पंक्तियों में विरोधाभास अलंकार है। लक्षण—जहाँ एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी धर्मों का सहारा हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। यहाँ नेत्रों में नीर (जल) भरा रहने पर भी प्यास न बुझना विरोध दर्शाता है।
प्रश्न 70
“प्रतीप' अलंकार में उपमेय व उपमान की किन्हीं दो स्थितियों को बताते हुए एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: प्रतीप अलंकार में उपमेय और उपमान की दो स्थितियाँ हैं—(1) उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताना, (2) उपमान को उपमेय के समान बताना।
उदाहरण: "मुख तो चंद्रमा है, पर चंद्रमा में यह कांति कहाँ?" — यहाँ उपमेय (मुख) को उपमान (चंद्रमा) से श्रेष्ठ बताया गया है।
प्रश्न 71
हंस छोड़ आये कहाँ मुक्ताओं का देश ?
यहाँ बंदिनी के लिए लाये क्या संदेश ?
उपर्युक्त पंक्तियों में मात्राओं की गणना करके छंद का नाम व उसके लक्षण लिखिए।
उत्तर: मात्रा गणना—प्रथम पंक्ति में 16 मात्राएँ, द्वितीय पंक्ति में 16 मात्राएँ। यह दोहा छंद है। लक्षण—दोहा में दो पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ (पहली पंक्ति में 13+3=16, दूसरी में 13+3=16) और अंत में गुरु-लघु का क्रम होता है।
प्रश्न 72
धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नहीं
चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नहीं
बोध-वर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं।
उपर्युक्त पंक्तियों में मात्राओं की गणना करके प्रयुक्त छंद का नाम व उसके लक्षण लिखिए।
उत्तर: मात्रा गणना—प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ (जैसे पहली पंक्ति: ध(1)+र्(1)+म(1)+के(1)+म(1)+ग(1)+में(2)+अ(1)+ध(1)+र्(1)+मी(2)+से(1)+क(1)+भी(2)+ड(1)+र(1)+ना(2)+न(1)+हीं(2) = 16)। यह दोहा छंद है। लक्षण—दोहा में दो पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक में 16 मात्राएँ, अंत में गुरु-लघु क्रम।
प्रश्न 73
किसी भी मात्रिक छंद में मात्रा लगाने के नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: मात्रिक छंद में मात्रा लगाने के नियम—(1) ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ) की एक मात्रा होती है। (2) दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) की दो मात्राएँ होती हैं। (3) संयुक्त व्यंजन से पूर्व का स्वर गुरु (दो मात्रा) माना जाता है। (4) अनुस्वार और विसर्ग से पूर्व का स्वर भी गुरु होता है। (5) हलंत व्यंजन (जैसे 'क्') की आधी मात्रा होती है, पर गणना में पूर्ण मानी जाती है।
प्रश्न 74
अनुभाव का तात्पर्य बताते हुए अनुभाव के भेदों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: अनुभाव का तात्पर्य—रस के संचार के लिए शरीर की चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं। ये स्थायी भावों को व्यक्त करते हैं। अनुभाव के चार भेद हैं—(1) कायिक (शरीर की चेष्टाएँ जैसे हाथ-पैर हिलाना), (2) वाचिक (वाणी द्वारा भाव प्रकट करना), (3) आहार्य (वेशभूषा, आभूषण आदि), (4) सात्त्विक (रोमांच, स्वेद, कंपन आदि स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ)।
प्रश्न 75
“आज की तरह, क्या तुम भी मानती थीं
पुत्री के जन्म को अभिशाप, दहेज भय से”,
-- 'योगमाया' की इन पंक्तियों के आधार पर समझाइए कि योगमाया का परित्याग यशोदा ने किस उद्देश्य के लिए किया था। साथ ही वर्तमान समाज में पुत्री जन्म के प्रति उत्पन्न भावनाओं को भी समझाइए।
उत्तर: यशोदा ने योगमाया (पुत्री) का परित्याग इस उद्देश्य से किया था कि वह दहेज के भय और पुत्री के जन्म को अभिशाप मानने वाली सामाजिक मानसिकता से बच सके। वर्तमान समाज में पुत्री जन्म के प्रति भावनाएँ बदल रही हैं—अब शिक्षा और जागरूकता से लोग पुत्री को बोझ नहीं, बल्कि वरदान मानने लगे हैं। फिर भी कुछ क्षेत्रों में दहेज और भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ विद्यमान हैं, जिनके विरुद्ध जागरूकता आवश्यक है।
प्रश्न 20
"हार कर क्या शीश अपना मैं झुका दूँ,
मैं सफलता का अटल विश्वास हूँ।"
"अरमान जिन्दा है अभी" कविता की उपर्युक्त पंक्तियों में कवि समाज को क्या संदेश देना चाहता है? (2 अंक)
उत्तर: कवि समाज को यह संदेश देना चाहता है कि असफलता के बाद भी हार नहीं माननी चाहिए। व्यक्ति को अपने आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के बल पर हर बाधा को पार करना चाहिए। कवि स्वयं को सफलता का अटल विश्वास बताता है, जो कभी पराजित नहीं होता। यह पंक्तियाँ जीवन में निरंतर प्रयासरत रहने और आत्म-विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देती हैं।
प्रश्न 21
"मिट्टी के नीचे ही दब कर, उठ सकते मिट्टी के ऊपर।
परिचय देगी स्वयं उभर"
कविता की इन पंक्तियों को पढ़कर आपके मन में क्या भाव उत्पन्न होते हैं? स्पष्ट कीजिए। (2 अंक)
उत्तर: इन पंक्तियों को पढ़कर मेरे मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों में दबने के बाद भी व्यक्ति में पुनः उभरने की शक्ति होती है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर ही अंकुरित होकर ऊपर आता है, वैसे ही मनुष्य को संघर्षों से गुज़रकर ही अपनी पहचान बनानी होती है। यह पंक्तियाँ आत्म-विश्वास और धैर्य का संदेश देती हैं कि सच्ची पहचान स्वयं को साबित करने से मिलती है, न कि दूसरों के कहने से।
प्रश्न 22
"पवन जगावत आग कौ, दीपहिं देत बुझाय" – इस कथन का तात्पर्य किसी मौलिक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2 अंक)
उत्तर: इस कथन का तात्पर्य है कि एक ही वस्तु या व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में विपरीत प्रभाव डाल सकता है। जैसे हवा आग को भड़काती है, लेकिन दीपक को बुझा देती है।
मौलिक उदाहरण: एक शिक्षक मेहनती विद्यार्थी को प्रोत्साहित करके उसकी प्रतिभा को निखारता है (आग जगाना), जबकि आलसी विद्यार्थी को डाँट-फटकार से उसका मनोबल गिरा सकता है (दीपक बुझाना)। इसी प्रकार, धन सज्जन व्यक्ति में दानशीलता बढ़ाता है, पर दुष्ट व्यक्ति में अहंकार और लालच।
निर्देश: प्रश्न संख्या 47 से 22 तक के लिए उत्तर-सीमा 80 से 100 शब्द है।
प्रश्न 23
"जयशंकर प्रसाद का काव्य छायावादी काव्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।" इस कथन के संदर्भ में प्रसाद के काव्य में निहित छायावाद के निर्णायक तत्त्वों को समझाइए। (3 अंक)
उत्तर: जयशंकर प्रसाद के काव्य में छायावाद के निम्नलिखित निर्णायक तत्त्व मिलते हैं:
- प्रकृति का मानवीकरण: प्रसाद प्रकृति को मानवीय भावनाओं से जोड़ते हैं, जैसे 'कामायनी' में प्रकृति मानव मन की अभिव्यक्ति बनती है।
- रहस्यवाद और आध्यात्मिकता: उनके काव्य में आत्मा-परमात्मा, जीवन-मृत्यु जैसे रहस्यमय तत्त्वों की गहन व्याख्या है।
- व्यक्तिवाद और मनोविश्लेषण: मानव मन की जटिलताओं, प्रेम, वेदना और अकेलेपन का चित्रण प्रमुख है।
- कल्पना और सौंदर्यबोध: अलंकारों और मधुर संगीतात्मकता के साथ उच्च कल्पनाशीलता।
- राष्ट्रीय चेतना: 'कामायनी' में सभ्यता के संघर्ष और राष्ट्र-निर्माण का संदेश।
इन तत्त्वों के कारण प्रसाद का काव्य छायावाद का श्रेष्ठ उदाहरण है।
प्रश्न 24
"छोटे हैं बढ़ने का वर दो" — "देख के पीले पत्ते" कविता की इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। (3 अंक)
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि छोटे या कमज़ोर लोगों को भी आगे बढ़ने और विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए। कवि कहता है कि जो लोग वर्तमान में छोटे या पिछड़े हुए हैं, उन्हें भी अपनी क्षमता दिखाने और उन्नति करने का अधिकार मिलना चाहिए। यह पंक्ति सामाजिक समानता और अवसरों के समान वितरण का संदेश देती है। कवि समाज से आग्रह करता है कि वह छोटे लोगों को भी बढ़ने का वरदान (अवसर) प्रदान करे, ताकि वे अपनी प्रतिभा को विकसित कर सकें।
प्रश्न 25
"कौन जन्म के पुण्य कि ऐसे शुभ दिन आये री" — "मंगल वर्षा" कविता में कवि ने वर्षा को पुण्यों का प्रताप व शुभ दिन क्यों कहा है? कृषक परिवार व कृषक वधू के संदर्भ में समझाइए। (3 अंक)
उत्तर: कवि ने वर्षा को पुण्यों का प्रताप और शुभ दिन इसलिए कहा है क्योंकि वर्षा कृषक परिवार के लिए जीवनदायिनी है। कृषक परिवार के संदर्भ में वर्षा ही उनकी फसलों का आधार है, जो उनकी आजीविका और खुशहाली लाती है। कृषक वधू के लिए वर्षा के दिन विशेष होते हैं क्योंकि बारिश के बाद खेत हरे-भरे हो जाते हैं, जिससे उसे अपने पति और परिवार के साथ खुशी मनाने का अवसर मिलता है। वर्षा को शुभ दिन कहने का तात्पर्य है कि यह किसानों के लिए उम्मीद, समृद्धि और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है।
प्रश्न 26
"पथ भूल न जाना पथिक" कविता में पथिक को विचलित करने वाली कौन-कौन-सी स्थितियों का उल्लेख किया गया है? (3 अंक)
उत्तर: कविता में पथिक को विचलित करने वाली निम्नलिखित स्थितियों का उल्लेख किया गया है:
- मोह और आकर्षण: रास्ते में मिलने वाले सुख-सुविधाओं और भौतिक आकर्षणों से पथिक भटक सकता है।
- कठिनाइयाँ और बाधाएँ: पथ में आने वाले अंधकार, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और प्राकृतिक विपत्तियाँ उसे विचलित करती हैं।
- भ्रम और अनिश्चितता: सही मार्ग का पता न होने या भ्रामक संकेतों के कारण पथिक भ्रमित हो सकता है।
- थकान और निराशा: लंबी यात्रा से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक थकान उसे हार मानने पर मजबूर कर सकती है।
- लालच और प्रलोभन: रास्ते में मिलने वाले झूठे वादे और लालच पथिक को अपने लक्ष्य से भटका सकते हैं।
कवि पथिक को इन स्थितियों से सावधान रहने और अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहने का संदेश देता है।
प्रश्न 27
"लो उठो, गाओ, घिरो, छाओ, रचो बलि-पथ सुहाने" — राष्ट्र-निर्माण व राष्ट्र-सुरक्षा के संदर्भ में वर्तमान काल में इन पंक्तियों में निहित संदेश की प्रासंगिकता समझाइए। (3 अंक)
उत्तर: ये पंक्तियाँ राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्र-सुरक्षा के लिए सक्रिय योगदान का आह्वान करती हैं। वर्तमान काल में इनकी प्रासंगिकता निम्नलिखित है:
- राष्ट्र-निर्माण: आज देश को विकास के लिए हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी चाहिए। 'उठो' और 'गाओ' का अर्थ है जागरूक होकर देश की प्रगति में योगदान देना, चाहे वह शिक्षा, स्वच्छता, या आर्थिक विकास के क्षेत्र में हो।
- राष्ट्र-सुरक्षा: 'घिरो' और 'छाओ' का तात्पर्य है देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करना। आज साइबर हमलों, आतंकवाद और सीमा विवादों के समय में हर नागरिक को सतर्क रहना चाहिए।
- बलिदान का मार्ग: 'रचो बलि-पथ सुहाने' का अर्थ है त्याग और बलिदान को सु
22. महादेवी वर्मा की संकलित कविता 'दूर के संगीत सा वह कौन है', के भाव पक्ष व कला पक्ष का विवेचन कीजिए ।
भाव पक्ष: इस कविता में महादेवी वर्मा ने एक अज्ञात, रहस्यमयी प्रियतम की उपस्थिति को 'दूर के संगीत' जैसा बताया है। यह प्रियतम प्रकृति, ईश्वर या आत्मा का प्रतीक हो सकता है। कवयित्री उसकी अनुभूति तो करती हैं, पर उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पातीं। कविता में विरह, आकुलता और उस अलौकिक शक्ति के प्रति आकर्षण का भाव प्रमुख है।
कला पक्ष: कविता में प्रतीकात्मकता, बिम्ब विधान और संगीतात्मकता का सुंदर प्रयोग हुआ है। 'दूर के संगीत' जैसा बिम्ब अनुभूति की गहराई को व्यक्त करता है। भाषा में लाक्षणिकता और प्रवाह है। छंद योजना और शब्द चयन कविता को एक विशेष लय प्रदान करते हैं।
23. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : (उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हिंदी साहित्य के एक कवि द्वारा रचित हैं। इनमें कवि एक ओर आत्म-समर्पण और दूसरी ओर प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण करता है। पहले भाग में कवि अपने मन के अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की प्रार्थना करता है, तो दूसरे भाग में मैथिली की मुस्कान से प्रकृति के खिलने का वर्णन है।
व्याख्या: कवि कहता है कि तुम्हारे लिए कुछ भी अवध्य नहीं है, सब कुछ तुम्हारा शिकार है। बस मेरे मन के गुफा में दुबकी हुई कालिमा (अज्ञान/दुख) को तुम वैसे ही छोड़कर चले जाओगे? कवि आत्म-समर्पण करते हुए कहता है कि मैं अपने सारे द्वार खोल देता हूँ, मेरी इस खंडहर नस को अपने प्रकाश की तीक्ष्ण धार से छेद दो। मेरे व्यर्थ दिनों की कालिमा को धो दो, मेरी आँखों में सुरमा लगा दो ताकि मैं तुम्हें देख सकूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आए। मैं तुम्हारे इन सुनहरे तारों को सिरोपे (सम्मान) की तरह पहनूँगा।
दूसरे भाग में दृश्य बदल जाता है: वन के फूल हँसने लगे हैं, एक महान चित्र देखकर डालियों पर कलियाँ खिल उठी हैं - यह मैथिली की मुस्कान को देखकर हुआ है। हवा गुनगुनाकर बताने लगी है कि कौन-कौन से फूल खिले हैं, और भौंरों की भीड़ जुड़ आई है। इस नाटक के नए दृश्य के दर्शक पक्षी (द्विज) हैं, जो शाखाओं पर बैठकर मधुर रस का भोग कर रहे हैं।
विशेष: इन पंक्तियों में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का अद्भुत सामंजस्य है। पहले भाग में आध्यात्मिक उत्कंठा और दूसरे में प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण है। भाषा में चित्रात्मकता और लय है।
24. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
पद्यांश 1:
मैं नहीं चाहता चिर सुख
मैं नहीं चाहता चिर दुःख,
सुख-दुःख की आँख मिचौनी में,
खोले जीवन अपना मुख ।
सुख-दुःख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरण,
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि में ओझल हो घन ।व्याख्या:
प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि की रचना से लिया गया है। इसमें कवि जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि वह न तो केवल सुख चाहता है और न ही केवल दुःख। उसकी इच्छा है कि जीवन सुख-दुःख की आँख-मिचौनी (लुका-छिपी) के खेल में अपना वास्तविक रूप प्रकट करे। कवि के अनुसार, सुख और दुःख के मधुर मिलन से ही जीवन पूर्ण होता है, ठीक वैसे ही जैसे बादल (घन) में चाँद (शशि) छिप जाता है और चाँद में बादल। यह द्वंद्व ही जीवन की सुंदरता है।
प्रसंग: यह पद्यांश जीवन में सुख-दुःख की अनिवार्यता और उनके सह-अस्तित्व पर प्रकाश डालता है। कवि ने यहाँ जीवन को एक ऐसा खेल बताया है जिसमें सुख और दुःख दोनों का समान महत्व है।
पद्यांश 2 (अथवा):
फिर फिर सदा
संघर्ष का अणु बम यहाँ जाँचा गया
यह व्यक्ति और समाज का
उत्तप्त मंथन काल है ।
संक्रान्ति की घड़ियाँ बनी हैं श्रृंखला
बंदी हुई है देह
मन को बाँधने बढ़ते पतन के हाथ हैं
है फन विष का फैलता ही जा रहा
अब डूबता अंतिम ग्रहण की छाँह में
आलोक हत नक्षत्र मिट्टी से बना
जिसका कि पृथ्वी नाम है
बस इसलिए उजड़ी धरा
यह फूल सूखा ही खिला
केसर बिना ।व्याख्या:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने समाज और व्यक्ति के बीच चल रहे तीव्र संघर्ष को चित्रित किया है। वह कहता है कि बार-बार संघर्ष का परमाणु बम (अणु बम) यहाँ परखा जा चुका है। यह व्यक्ति और समाज के बीच उबलता हुआ मंथन का समय है। परिवर्तन (संक्रान्ति) की घड़ियाँ एक श्रृंखला बन गई हैं। शरीर बंदी है, और मन को बाँधने के लिए पतन के हाथ बढ़ रहे हैं। विषैला फन फैलता जा रहा है। अब सब कुछ अंतिम ग्रहण की छाया में डूब रहा है। वह प्रकाशहीन नक्षत्र (आलोक हत नक्षत्र) मिट्टी से बना है, जिसका नाम पृथ्वी है। इसीलिए यह धरा उजड़ गई है, यह फूल सूखा ही खिला है, केसर के बिना।
प्रसंग: यह पद्यांश समाज में व्याप्त अराजकता, संघर्ष और पतन की स्थिति का मार्मिक चित्रण करता है। कवि ने यहाँ मानवीय मूल्यों के ह्रास और विनाश की ओर संकेत किया है।
25. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : (उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
(क) पद्यांश
ओ, मनु-आदम के वंशजों!
मेरे लिए
तुमने बनाए अभयारण्य
जहाँ विचरण कर सके निर्भय
मेरी प्रिय बाघिन
हमारे शावकों के साथ
कि, जहाँ विचरण कर सकें निर्भय
हमारे हत्यारे
किया जा सके हमारा वध, बे-रोकटोक
अब, मैं सदा के लिए लुप्त हो जाऊँगा
फिर भी झाँकता रहूँगा
अपनी अदम्य दहाड़ के साथ
ट्यूरिज्म डिपार्टमेंट के सुचिक्कण
चित्ताकर्षक पोस्टरों के बीच।सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि द्वारा रचित कविता का अंश है। इसमें मानव द्वारा वन्य जीवों के प्रति किए जा रहे शोषण और उनके कृत्रिम संरक्षण की विडंबना को उजागर किया गया है।
व्याख्या : कवि बाघिन के माध्यम से मानव सभ्यता पर व्यंग्य करता है। वह कहता है कि हे मनु (मानव) के वंशजों! तुमने मेरे लिए अभयारण्य बनाए हैं, जहाँ मैं अपने शावकों के साथ निर्भय होकर विचरण कर सकूँ। लेकिन यह विडंबना है कि इन्हीं अभयारण्यों में मेरे हत्यारे भी निर्भयतापूर्वक घूमते हैं और मेरा वध बेरोकटोक किया जाता है। अब मैं सदा के लिए लुप्त हो जाऊँगा, लेकिन फिर भी पर्यटन विभाग के आकर्षक पोस्टरों पर अपनी दहाड़ के साथ झाँकता रहूँगा। कवि ने यहाँ मानव के पाखंड और वन्य जीवों के प्रति उसकी क्रूरता को उजागर किया है।
(ख) पद्यांश
आज हैं देख्यो गिरिधारी।
सुन्दर बदन मदन की सोभा चितवन अनियारी।
बजावे बंसी कुंजन में।
गावत तान तरंग रंग धुनि नाचत ग्वालन में।
माधुरी मूरति है प्यारी।
बसी रहें दिन हिरदै में नहीं टारी।
ताही पर तन धन मन बारी।
वह मूरति मोहनी निहारत लोक लाज हारी।
तुलसी बन कुंजन संचारी।
गिरिधर लाल नवल नट नागर मीराँ बलिहारी॥सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश मीराबाई द्वारा रचित एक भक्ति गीत है। इसमें मीरा ने श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम और समर्पण को व्यक्त किया है।
व्याख्या : मीरा कहती हैं कि आज मैंने गिरिधारी (श्रीकृष्ण) को देख लिया है। उनका सुंदर शरीर कामदेव की शोभा को भी मात करता है और उनकी चितवन अद्भुत है। वे कुंजों में बाँसुरी बजाते हैं और ग्वालों के बीच तान, तरंग, रंग और धुन के साथ नाचते हैं। उनकी मधुर मूर्ति अत्यंत प्यारी है। वह मूर्ति दिन-रात मेरे हृदय में बसी हुई है और मैं उसे कभी नहीं टाल सकती। मैंने उसी पर अपना तन, धन और मन न्योछावर कर दिया है। उस मोहनी मूर्ति को निहारते हुए मैंने लोक-लाज खो दी है। मीरा कहती हैं कि हे गिरिधर लाल! हे नवल नट नागर! मैं आप पर बलिहारी जाती हूँ।