RBSE Class 12th 2011 Horticulture-SS-87-2011 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2011 |
| Subject | Horticulture-SS-87-2011 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2011 Horticulture-SS-87-2011
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Rajasthan Board Class 12th Horticulture-SS-87-2011 2011 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2012
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2012
वैकल्पिक वर्ग IV — कृषि (OPTIONAL GROUP IV — AGRICULTURE)
उद्यान विज्ञान (HORTICULTURE)
समय : 3 घंटे 15 मिनट पूर्णांक : 48
नामांक / Roll No. : _________________________
No. of Questions — 20 SS—87—Horticulture
No. of Printed Pages — 7
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily. - प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं। प्रश्न क्रमांक 49 में आन्तरिक विकल्प हैं।
All the questions are compulsory. Question No. 49 has internal choice. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only.
SS—87—Horticulture SS-603 { Turn over }
प्रश्न संख्या 2 से 5 तक अति लघूत्तरात्मक हैं ।
Question Nos. 2 to 5 are very short answer questions.
प्रश्न संख्या 6 से 7 तक लघूत्तरात्मक हैं तथा 8 से 20 तक निबन्धात्मक हैं ।
Question Nos. 6 to 7 are short answer questions and 8 to 20 are essay type questions.
प्रश्न संख्या 4 के चार भाग (i, ii, iii तथा iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (अ, ब, स एवं द) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
There are four parts (i, ii, iii and iv) in Question No. 4. Each part has four alternatives A, B, C and D. Write the letter of the correct alternative in the answer-book at a place by making a table as mentioned below :
| प्रश्न क्रमांक (Question No.) | सही उत्तर का क्रमाक्षर (Correct letter of the Answer) |
|---|---|
| i | |
| ii | |
| iii | |
| iv |
SS—87—Horticulture SS-603
प्रश्न (i) खरपतवार नियंत्रण के लिये 2, 4-D की सान्द्रता होनी चाहिये
- (अ) 0%
- (ब) 0.2%
- (स) 0.3%
- (द) 0.4%
सही उत्तर: (स) 0.3%
2,4-D एक चयनात्मक खरपतवारनाशी है, जिसकी 0.3% सान्द्रता खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रभावी मानी जाती है।
प्रश्न (ii) भारत में कितने प्रतिशत फल व सब्जियों का परिरक्षण किया जाता है?
What per cent of fruits and vegetables is processed in India?
- (अ) 2
- (ब) 0
- (स) 2
- (द) 20
सही उत्तर: (द) 20
भारत में लगभग 20% फल और सब्जियों का प्रसंस्करण (परिरक्षण) किया जाता है, जो कि कुल उत्पादन का एक छोटा भाग है।
प्रश्न (iii) अनार का उत्पत्ति स्थान है
Origin place of pomegranate is
- (अ) भारत
- (ब) चीन
- (स) अफगानिस्तान
- (द) बर्मा
सही उत्तर: (स) अफगानिस्तान
अनार का मूल उत्पत्ति स्थान अफगानिस्तान और ईरान माना जाता है, जहाँ से यह अन्य क्षेत्रों में फैला।
प्रश्न 4 (iv)
विश्व में ईसबगोल का सर्वाधिक उत्पादक व निर्यातक देश कौन-सा है ?
Which country has maximum production and export of Isbagol in the world ?
- (अ) ईजरायल (A) Israel
- (ब) अमेरिका (B) America
- (स) भारत (C) India
- (द) डेनमार्क (D) Denmark
व्याख्या: भारत विश्व में ईसबगोल (Isabgol/Psyllium husk) का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है। यह मुख्यतः राजस्थान और गुजरात में उगाया जाता है।
प्रश्न 2
क्लाईमैक्ट्रिक फल के कोई दो उदाहरण लिखिये ।
Write any two examples of climacteric fruit.
उत्तर: क्लाईमैक्ट्रिक फल वे होते हैं जो तोड़ने के बाद भी पकते रहते हैं। दो उदाहरण:
- सेब (Apple)
- केला (Banana)
(अन्य उदाहरण: आम, पपीता, नाशपाती, टमाटर)
प्रश्न 3
कीनू की किस्म किन दो किस्मों के संकरण से तैयार की गयी है ?
Kinnow variety of orange is prepared by the hybridisation of which two varieties ?
उत्तर: कीनू (Kinnow) किस्म निम्नलिखित दो किस्मों के संकरण से तैयार की गई है:
- किंग (King) – Citrus nobilis
- विलो लीफ (Willow Leaf) – Citrus deliciosa
यह संकरण कैलिफोर्निया में हावर्ड स्पाइस और रॉबर्ट स्टैंडिश द्वारा किया गया था।
प्रश्न 4
जैली निर्माण के मुख्य अंशों के नाम लिखिये ।
Write the main components of jelly formation.
उत्तर: जैली निर्माण के मुख्य अंश (components) निम्नलिखित हैं:
- फलों का रस (Fruit juice) – जिसमें पेक्टिन और अम्ल होता है।
- चीनी (Sugar) – मिठास और संरक्षण के लिए।
- पेक्टिन (Pectin) – जैली को जमाने (setting) के लिए आवश्यक।
- अम्ल (Acid) – जैली के जमने और स्वाद के लिए (जैसे नींबू का रस)।
प्रश्न 5
तुलसी का वानस्पतिक नाम लिखिये ।
Write the botanical name of Tulsi.
उत्तर: तुलसी का वानस्पतिक नाम Ocimum sanctum (या Ocimum tenuiflorum) है। यह लैमिएसी (Lamiaceae) कुल का पौधा है।
प्रश्न 6
भारत में फलोत्पादन की वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिये ।
Describe the present position of pomology in India.
उत्तर: भारत में फलोत्पादन (Pomology) की वर्तमान स्थिति निम्नलिखित है:
- भारत विश्व में फल उत्पादन में दूसरे स्थान पर है (चीन के बाद)।
- यहाँ आम, केला, अंगूर, सेब, संतरा, पपीता, अनार आदि प्रमुख फल उगाए जाते हैं।
- भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, जो विश्व उत्पादन का लगभग 40% है।
- केला उत्पादन में भी भारत प्रथम स्थान पर है।
- फलोत्पादन क्षेत्रफल लगभग 6.5 मिलियन हेक्टेयर है और वार्षिक उत्पादन लगभग 100 मिलियन टन से अधिक है।
- उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु प्रमुख फल उत्पादक राज्य हैं।
- हाल के वर्षों में बागवानी तकनीक, उन्नत किस्मों और सिंचाई सुविधाओं के कारण उत्पादन में वृद्धि हुई है।
प्रश्न 7
नर्सरी से पौधे खरीदते समय ध्यान देने योग्य दो बातों का उल्लेख कीजिये ।
Write two things, which should be considered during purchasing of plants from nursery.
उत्तर: नर्सरी से पौधे खरीदते समय निम्नलिखित दो बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- पौधे की स्वस्थता: पौधा रोगमुक्त, कीटमुक्त, हरा-भरा और मजबूत तने वाला होना चाहिए। पत्तियों पर कोई धब्बे या पीलेपन न हों।
- जड़ प्रणाली: पौधे की जड़ें अच्छी तरह विकसित, सफेद और स्वस्थ होनी चाहिए। गमले या पॉलीबैग से जड़ें बाहर न निकली हों (root-bound न हो)।
फलोद्यान के लिये स्थान का चुनाव करते समय भूमि एवम् जलवायु का वर्णन कीजिये।
Describe soil and climate at the time of selection of site for an orchard.
Marks: 1+1=2
भूमि (Soil): फलोद्यान के लिए उपजाऊ, गहरी, जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। भूमि में जलभराव नहीं होना चाहिए।
जलवायु (Climate): फलोद्यान के लिए समशीतोष्ण या उपोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। तापमान 15°C से 35°C के बीच होना चाहिए। अत्यधिक गर्मी, पाला, तेज हवाएं और लू से बचाव आवश्यक है। पर्याप्त वर्षा (75-150 सेमी) और सूर्य का प्रकाश फलों के विकास के लिए आवश्यक है।
फल वृक्षों पर 'लू' के दो प्रभाव लिखिये।
Write two effects of 'loo' on fruit plants.
Marks: 1+1=2
- पत्तियों का झुलसना और गिरना: लू (गर्म हवाओं) के कारण पत्तियों से अत्यधिक पानी का वाष्पोत्सर्जन होता है, जिससे पत्तियां झुलस जाती हैं और समय से पहले गिर जाती हैं।
- फलों का झड़ना और गुणवत्ता में कमी: लू के प्रभाव से फल छोटे रह जाते हैं, उनमें दरारें पड़ जाती हैं, और वे समय से पहले पककर गिर जाते हैं, जिससे उपज और गुणवत्ता में कमी आती है।
उद्यान में अफलन के दो बाह्य कारकों का वर्णन कीजिये।
Mention any two external causes of unfruitfulness in an orchard.
Marks: 1+1=2
- परागण की कमी (Lack of Pollination): परागण करने वाले कीटों (मधुमक्खी, भौंरा आदि) की अनुपस्थिति या प्रतिकूल मौसम (अत्यधिक वर्षा, तेज हवा) के कारण परागण ठीक से नहीं हो पाता, जिससे फल नहीं लगते।
- पोषक तत्वों की कमी (Nutrient Deficiency): मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश या सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जिंक, बोरॉन) की कमी से फूल और फलों का विकास रुक जाता है, जिससे अफलन होता है।
फालसा के फल वृक्षों में प्रवर्धन एवम् कटाई-छंटाई का उल्लेख कीजिये।
Describe propagation and pruning of Phalsa fruit plant.
Marks: 1+1=2
प्रवर्धन (Propagation): फालसा का प्रवर्धन मुख्यतः बीजों द्वारा किया जाता है। बीजों को नर्सरी में बोकर पौध तैयार की जाती है। इसके अलावा, कलम विधि (हार्डवुड कटिंग) द्वारा भी प्रवर्धन किया जा सकता है।
कटाई-छंटाई (Pruning): फालसा में फल लगने के बाद (गर्मियों में) पुरानी शाखाओं को जमीन से 30-45 सेमी ऊपर तक काट दिया जाता है। इससे नई शाखाएं निकलती हैं, जिन पर अगले वर्ष अधिक फल लगते हैं। छंटाई से पौधे का आकार नियंत्रित रहता है और उपज बढ़ती है।
सोनामुखी की पत्तियों में कौन-सा अवयव पाया जाता है? इसकी मात्रा एवम् उपयोग लिखिये।
Which component is found in the leaves of Sonamukhi? Write its quantity and uses.
Marks: 1+1=2
अवयव (Component): सोनामुखी (कैसिया एंगुस्टिफोलिया) की पत्तियों में सेन्नोसाइड (Sennoside) नामक रासायनिक अवयव पाया जाता है।
मात्रा (Quantity): सोनामुखी की पत्तियों में सेन्नोसाइड की मात्रा लगभग 2-3% होती है।
उपयोग (Uses): इसका उपयोग प्राकृतिक रेचक (laxative) के रूप में कब्ज दूर करने के लिए किया जाता है। यह आयुर्वेदिक दवाओं में पेट साफ करने और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायक है।
उपरोपण की विभिन्न विधियों के नाम लिखिए। किसी एक विधि का सचित्र वर्णन कीजिये।
Write the names of different methods of grafting. Illustrate any one method by suitable diagram.
Marks: 1+1+1=3
उपरोपण की विभिन्न विधियाँ (Different methods of grafting):
- कलिकायन (Budding) - जैसे टी-बडिंग, शील्ड बडिंग
- जिह्वा उपरोपण (Tongue Grafting)
- वेज उपरोपण (Wedge Grafting)
- स्प्लिट उपरोपण (Split Grafting)
- साइड उपरोपण (Side Grafting)
- एप्रोच उपरोपण (Approach Grafting)
एक विधि का सचित्र वर्णन (Illustration of one method - टी-बडिंग / T-Budding):
टी-बडिंग में, रूटस्टॉक (नीचे का पौधा) के तने पर 'T' आकार का चीरा लगाया जाता है। स्कॉन (ऊपर का वांछित किस्म) से एक कली (bud) को छाल सहित निकालकर, इस चीरे में डाला जाता है। फिर इसे पॉलीथीन की पट्टी से बांध दिया जाता है ताकि कली सूखे न और जुड़ाव हो सके। कुछ हफ्तों में कली अंकुरित हो जाती है और नया पौधा तैयार होता है।
[T-आकार का चीरा] [कली डाली गई]
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----+---- ----+----
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----+---- ----+----
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(रूटस्टॉक) (बंधा हुआ)
नीम्बू वर्गीय फल वृक्षों में लगने वाले प्रमुख तीन रोगों के लक्षण व रोकथाम के उपाय लिखिये।
Describe the symptoms of three major diseases in citrus fruit plants and their remedial measures.
Marks: 1+1+1=3
-
सिट्रस कैंकर (Citrus Canker):
- लक्षण: पत्तियों, तनों और फलों पर पीले घेरे वाले भूरे रंग के उभरे हुए धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में फट जाते हैं।
- रोकथाम: प्रभावित भागों को काटकर नष्ट करें। बोर्डो मिश्रण (1%) या स्ट्रेप्टोमाइसिन (100 ppm) का छिड़काव करें।
-
ग्रीनिंग रोग (Greening Disease / Huanglongbing):
- लक्षण: पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और नसें हरी रहती हैं। फल छोटे, विकृत और कड़वे हो जाते हैं। पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगता है।
- रोकथाम: रोगग्रस्त पेड़ों को हटा दें। साइलिड कीट (वाहक) को नियंत्रित करने के लिए इमिडाक्लोप्रिड या डाइमेथोएट का छिड़काव करें। स्वस्थ पौधों का ही उपयोग करें।
-
फल सड़न रोग (Fruit Rot / Brown Rot):
- लक्षण: फलों पर भूरे या काले रंग के पानी जैसे धब्बे बनते हैं, जो बाद में सड़न में बदल जाते हैं। फल गिरने लगते हैं।
- रोकथाम: प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट करें। फफूंदनाशक (जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3%) का छिड़काव करें। जल निकासी का उचित प्रबंध करें।
प्रश्न 6: केला के लिए जलवायु, भूमि एवम् पकाने की विधि
Write the climate, soil and procedure of ripening of Banana.
जलवायु (Climate): केला उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु का फल है। इसके लिए 20°C से 35°C तापमान उपयुक्त रहता है। पाले से केले की फसल को बहुत नुकसान होता है। अधिक वर्षा (200-250 सेमी) वाला क्षेत्र केले के लिए अच्छा होता है।
भूमि (Soil): केले के लिए जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। जल भराव वाली मिट्टी में केले की खेती नहीं की जा सकती।
पकाने की विधि (Procedure of Ripening): केले को पकाने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती हैं:
- प्राकृतिक पकाना: केले के गुच्छों को काटकर छायादार स्थान पर रख दिया जाता है। 5-7 दिनों में ये स्वतः पक जाते हैं।
- एथिलीन गैस द्वारा: पके केले से निकलने वाली एथिलीन गैस का उपयोग करके कच्चे केलों को पकाया जाता है। इसके लिए केलों को एक कमरे में बंद करके पके केले या कार्बाइड का उपयोग किया जाता है।
- तापमान नियंत्रण: 20-25°C तापमान पर केले जल्दी पकते हैं। इसके लिए विशेष पकाने वाले कक्षों का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 7: विवर्णकरण (Blanching)
What do you mean by blanching? Write any four advantages of this process in vegetables and fruits.
विवर्णकरण (Blanching): यह एक ऊष्मा उपचार प्रक्रिया है जिसमें फलों या सब्जियों को कुछ समय के लिए गर्म पानी या भाप में रखा जाता है और फिर तुरंत ठंडे पानी में डाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एंजाइमों को निष्क्रिय करना होता है।
सब्जियों व फलों में इस क्रिया के चार लाभ:
- एंजाइम निष्क्रियता: यह प्रक्रिया फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले एंजाइमों को नष्ट कर देती है जो रंग, स्वाद और पोषक तत्वों को खराब कर सकते हैं।
- रंग संरक्षण: विवर्णकरण से हरी सब्जियों का हरा रंग बरकरार रहता है और फलों का प्राकृतिक रंग सुरक्षित रहता है।
- सूक्ष्मजीव नियंत्रण: यह प्रक्रिया फलों और सब्जियों की सतह पर मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को कम करती है।
- भंडारण अवधि बढ़ाना: विवर्णकरण के बाद फलों और सब्जियों को फ्रीज करने या डिब्बाबंद करने पर उनकी भंडारण अवधि बढ़ जाती है।
प्रश्न 8: अचार को सुरक्षित रखने की तीन विधियाँ
Describe any three methods to preserve the pickles.
- नमक का उपयोग: अचार में नमक मिलाकर रखा जाता है। नमक पानी को सोख लेता है और सूक्ष्मजीवों के विकास को रोकता है। नमक की मात्रा 10-15% होनी चाहिए।
- तेल का उपयोग: अचार को तेल में डुबोकर रखा जाता है। तेल की परत हवा को अचार तक पहुँचने से रोकती है, जिससे बैक्टीरिया और फफूंद नहीं पनप पाते। सरसों का तेल सबसे अधिक उपयोग किया जाता है।
- सिरके का उपयोग: सिरका (एसिटिक एसिड) अचार को खट्टा स्वाद देता है और सूक्ष्मजीवों के विकास को रोकता है। सिरके में 5-10% एसिटिक एसिड होना चाहिए।
प्रश्न 9: संतरे का पानक बनाने की विधि
Describe in detail the method of preparation of orange squash and enlist the essential ingredients for making orange squash from orange juice of two kilograms of orange in tabular form.
संतरे का पानक बनाने की विधि (Method of Preparation of Orange Squash):
- संतरे का रस निकालना: ताजे, पके हुए संतरों को धोकर आधा काट लें और जूसर से रस निकाल लें। रस को छान लें ताकि बीज और गूदा अलग हो जाए।
- चीनी की चाशनी बनाना: एक बर्तन में चीनी और पानी डालकर गर्म करें जब तक चीनी पूरी तरह घुल न जाए। चाशनी को उबाल लें और फिर ठंडा करें।
- मिश्रण तैयार करना: ठंडी चाशनी में संतरे का रस, साइट्रिक एसिड और संरक्षक (पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट) मिलाएं। अच्छी तरह मिलाएं।
- भंडारण: तैयार पानक को साफ, सूखी बोतलों में भरें और कसकर बंद करें। ठंडी, सूखी जगह पर रखें।
2 किग्रा संतरे के रस से पानक बनाने के लिए आवश्यक सामग्री:
| सामग्री (Ingredient) | मात्रा (Quantity) |
|---|---|
| संतरे का रस | 2 किग्रा |
| चीनी | 2 किग्रा |
| पानी | 1 लीटर |
| साइट्रिक एसिड | 20 ग्राम |
| पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट (संरक्षक) | 2 ग्राम |
प्रश्न 10: आम अथवा खजूर की खेती का वर्णन
Describe in detail the cultivation of mango or date palm under the following headings:
(i) जलवायु (Climate) (ii) चार उन्नत किस्में (Four improved varieties) (iii) प्रवर्धन (Propagation) (iv) रोपण (Planting) (v) खाद एवम् उर्वरक (Manure and Fertilizers)
आम की खेती (Cultivation of Mango):
(i) जलवायु (Climate): आम उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु का फल है। इसके लिए 24°C से 30°C तापमान उपयुक्त रहता है। पाले से आम के पौधों को बहुत नुकसान होता है। 75-250 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र आम के लिए अच्छे होते हैं। फूल आने के समय शुष्क मौसम आवश्यक है।
(ii) चार उन्नत किस्में (Four improved varieties):
- दशहरी (Dasheri)
- लंगड़ा (Langra)
- चौसा (Chausa)
- आल्फांसो (Alphonso)
(iii) प्रवर्धन (Propagation): आम का प्रवर्धन प्रायः कलम विधि (grafting) द्वारा किया जाता है। वेज ग्राफ्टिंग (wedge grafting) और साइड ग्राफ्टिंग (side grafting) सामान्य विधियाँ हैं। बीज से उगाए गए पौधों को रूटस्टॉक के रूप में उपयोग किया जाता है।
(iv) रोपण (Planting): आम के पौधों को वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) में रोपा जाता है। पौधों के बीच की दूरी 8-10 मीटर रखी जाती है। गड्ढे 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर आकार के खोदे जाते हैं और उनमें गोबर की खाद मिलाई जाती है।
(v) खाद एवम् उर्वरक (Manure and Fertilizers): आम के पौधों को प्रति वर्ष 10-15 किग्रा गोबर की खाद, 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 500 ग्राम पोटाश देना चाहिए। खाद की मात्रा पौधे की आयु के अनुसार बढ़ाई जाती है। खाद को दो भागों में बांटकर देना चाहिए - एक भाग फूल आने से पहले और दूसरा भाग फल लगने के बाद।
प्रश्न: आम या खजूर की खेती का निम्न शीर्षकों के आधार पर वर्णन कीजिए :
(i) जलवायु (ii) चार उन्नत किस्में (iii) प्रवर्धन (iv) रोपण (v) खाद एवं उर्वरक
आम की खेती
(i) जलवायु: आम की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। इसके लिए 24°C से 30°C तापमान तथा 75-250 सेमी वार्षिक वर्षा आवश्यक है। पुष्पन एवं फलन के समय शुष्क मौसम लाभदायक होता है।
(ii) चार उन्नत किस्में: दशहरी, लंगड़ा, चौसा, और आम्रपाली।
(iii) प्रवर्धन: आम का प्रवर्धन प्रायः कलम (ग्राफ्टिंग) विधि द्वारा किया जाता है, जैसे वेनेर ग्राफ्टिंग या सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग। बीज से उगाए गए पौधे असमान गुणवत्ता के होते हैं, इसलिए कलम विधि से ही उन्नत किस्मों का संरक्षण होता है।
(iv) रोपण: पौधों को 10×10 मीटर की दूरी पर गड्ढों में रोपा जाता है। गड्ढे 1×1×1 मीटर आकार के होते हैं, जिनमें खाद एवं मिट्टी भरी जाती है। रोपण का उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त या फरवरी-मार्च है।
(v) खाद एवं उर्वरक: प्रति पेड़ 10-20 किग्रा गोबर की खाद, 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस, और 500 ग्राम पोटाश प्रतिवर्ष देना चाहिए। खाद को दो भागों में बांटकर बरसात के आरंभ और फल तुड़ाई के बाद दिया जाता है।
खजूर की खेती
(i) जलवायु: खजूर के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है। इसके लिए 25°C से 40°C तापमान तथा कम वर्षा (20-50 सेमी) आवश्यक है। अधिक आर्द्रता फलों को नुकसान पहुंचाती है।
(ii) चार उन्नत किस्में: मेडजूल, खद्रावी, बरही, और हलावी।
(iii) प्रवर्धन: खजूर का प्रवर्धन प्रायः ऑफशूट (शाखा-कलम) द्वारा किया जाता है। ऑफशूट को मातृ पौधे से अलग करके नर्सरी में लगाया जाता है। बीज से उगाए गए पौधे नर-मादा भेद के कारण अविश्वसनीय होते हैं।
(iv) रोपण: पौधों को 8×8 मीटर की दूरी पर गड्ढों में रोपा जाता है। गड्ढे 1×1×1 मीटर आकार के होते हैं। रोपण का उपयुक्त समय फरवरी-मार्च या अक्टूबर-नवंबर है।
(v) खाद एवं उर्वरक: प्रति पेड़ 10-15 किग्रा गोबर की खाद, 400 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम फास्फोरस, और 400 ग्राम पोटाश प्रतिवर्ष देना चाहिए। खाद को दो किश्तों में बांटकर सर्दी और गर्मी के मौसम में दिया जाता है।
प्रश्न: 'नीम' की खेती का निम्न शीर्षकों के आधार पर वर्णन कीजिए :
(i) महत्व (ii) जलवायु (iii) प्रवर्धन (iv) रोपण (v) उपज
नीम की खेती
(i) महत्व: नीम का वृक्ष बहुउपयोगी है। इसकी पत्तियाँ, छाल, बीज एवं तेल का उपयोग औषधि, कीटनाशक, उर्वरक एवं सौंदर्य प्रसाधनों में होता है। यह पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है।
(ii) जलवायु: नीम के लिए उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। यह 25°C से 40°C तापमान तथा 40-120 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह उगता है। यह सूखा सहनशील है।
(iii) प्रवर्धन: नीम का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जाता है। बीजों को नर्सरी में बोकर पौध तैयार की जाती है। बीजों की अंकुरण क्षमता शीघ्र कम हो जाती है, इसलिए ताजे बीजों का उपयोग करना चाहिए।
(iv) रोपण: पौधों को 5×5 मीटर या 6×6 मीटर की दूरी पर गड्ढों में रोपा जाता है। गड्ढे 60×60×60 सेमी आकार के होते हैं। रोपण का उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त या फरवरी-मार्च है।
(v) उपज: नीम का वृक्ष 5-7 वर्षों में फल देना शुरू करता है। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष 30-50 किग्रा फल (गुठली) देता है। पत्तियों की उपज भी प्रतिवर्ष 20-30 किग्रा प्रति वृक्ष होती है।