RBSE Class 12th 2011 Philosophy-SS-28-1-2011 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2011
Subject Philosophy-SS-28-1-2011
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-28-1-2011 2011 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2011
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2011

वैकल्पिक वर्ग I – कला (OPTIONAL GROUP I – Humanities)

दर्शनशास्त्र – प्रथम पत्र
(PHILOSOPHY – First Paper)

समय : 3 घण्टे     पूर्णांक : 60


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
    Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily.
  2. प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि/अन्तर/विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
    If there is any error/difference/contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
  3. प्रश्न पत्र के दोनों खण्ड करने अनिवार्य हैं। खण्ड 'ब' के सभी प्रश्नों में आंतरिक विकल्प हैं।
    Both the Sections of the question paper are compulsory. There are internal choices in all the questions of Section B.
  4. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
    Write the answer to each question in the given answer-book only.

Page 1 of 3

खण्ड ‘3’ (Section - A)

निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये :

Write short notes on any five of the following : 5 × 4 = 20

  1. आस्तिक व नास्तिक
    Astika and Nastika (orthodox and heterodox)

    आस्तिक वे दर्शन हैं जो वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करते हैं, जैसे सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। नास्तिक वे दर्शन हैं जो वेदों को प्रमाण नहीं मानते, जैसे चार्वाक, बौद्ध और जैन दर्शन। आस्तिक ईश्वर और आत्मा में विश्वास करते हैं, जबकि नास्तिक इन्हें अस्वीकार करते हैं।

  2. प्रकृति
    Prakriti

    सांख्य दर्शन में प्रकृति मूल प्रकृति है, जो तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से बनी है। यह जड़ होते हुए भी सृष्टि का मूल कारण है। प्रकृति से ही महत्, अहंकार, पंचतन्मात्राएँ और इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं। पुरुष के सान्निध्य में प्रकृति विकास को प्राप्त होती है।

  3. ब्रह्म
    Brahma

    वेदांत दर्शन में ब्रह्म सर्वोच्च सत्य है, जो निराकार, निर्गुण, सच्चिदानंद स्वरूप है। यह एकमेव अद्वितीय तत्व है, जिससे समस्त जगत उत्पन्न होता है। ब्रह्म ही सृष्टि का कारण, आधार और लय है। उपनिषदों में ब्रह्म को 'सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म' कहा गया है।

  4. बौद्ध दर्शन में आर्य सत्य
    Noble Truth in Buddhist Philosophy

    बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्य हैं: (1) दुःख सत्य – संसार दुःखमय है, (2) दुःख समुदय सत्य – दुःख का कारण तृष्णा है, (3) दुःख निरोध सत्य – तृष्णा के निरोध से दुःख निवृत्ति संभव है, (4) दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा सत्य – आर्य अष्टांगिक मार्ग दुःख निवृत्ति का मार्ग है। ये सत्य बुद्ध के प्रथम उपदेश का आधार हैं।

  5. त्रिरत्न
    Triratna

    जैन दर्शन में त्रिरत्न तीन रत्न हैं: सम्यक् दर्शन (सत्य का सही ज्ञान), सम्यक् ज्ञान (सत्य का सही ज्ञान), और सम्यक् चारित्र (सत्य के अनुसार आचरण)। ये तीनों मिलकर मोक्ष के मार्ग का निर्माण करते हैं। बौद्ध दर्शन में त्रिरत्न बुद्ध, धम्म और संघ हैं।

  6. अष्टांग योग
    Astanga Yoga

    पतंजलि योग दर्शन में अष्टांग योग के आठ अंग हैं: यम (नियम), नियम (व्यक्तिगत नियम), आसन (शारीरिक मुद्राएँ), प्राणायाम (श्वास नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रिय निग्रह), धारणा (एकाग्रता), ध्यान (चिंतन), और समाधि (पूर्ण एकाग्रता)। ये आठ अंग क्रमशः शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि के लिए हैं।

  7. न्याय में अनुमान
    Anumana in Nyaya

    न्याय दर्शन में अनुमान प्रमाण का दूसरा रूप है। यह व्याप्ति (कारण-कार्य संबंध) पर आधारित होता है। अनुमान के पाँच अवयव हैं: प्रतिज्ञा (पर्वत पर अग्नि है), हेतु (धूम के कारण), उदाहरण (जहाँ धूम वहाँ अग्नि, जैसे रसोईघर), उपनय (इस पर्वत पर धूम है), और निगमन (अतः पर्वत पर अग्नि है)।

  8. सांख्य में विकासवाद
    Evolution in Samkhya

    सांख्य दर्शन में सृष्टि का विकास प्रकृति से होता है। प्रकृति से महत् (बुद्धि), महत् से अहंकार, अहंकार से पंचतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और पंचमहाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) उत्पन्न होते हैं। यह विकास पुरुष के सान्निध्य में होता है, जो जड़ प्रकृति को सक्रिय करता है।

  9. जीवात्मा की विभिन्न अवस्थाएँ
    Various stages of Jivatma

    वेदांत दर्शन में जीवात्मा की चार अवस्थाएँ मानी गई हैं: जाग्रत (जागने की अवस्था, जहाँ बाह्य ज्ञान होता है), स्वप्न (स्वप्न अवस्था, जहाँ मानसिक अनुभव होते हैं), सुषुप्ति (गहरी नींद, जहाँ कोई ज्ञान नहीं होता), और तुरीय (चौथी अवस्था, जो साक्षी चेतना है)। तुरीय अवस्था में ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।

  10. न्याय में उपमान
    Upamana in Nyaya

    न्याय दर्शन में उपमान चौथा प्रमाण है। यह सादृश्य (समानता) के आधार पर ज्ञान प्राप्त करने की विधि है। उदाहरण: किसी व्यक्ति ने गाय देखी है, और उसे बताया जाता है कि गवय (जंगली गाय) गाय के समान होता है। जब वह जंगल में गवय देखता है, तो उपमान से उसे ज्ञान होता है कि यह गवय है।

SS—28-I— Philos. I [ss-554]

खण्ड 'ब' (Section - B)

निर्देश : सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।

Instruction : All questions are compulsory.


  1. गीता में वर्णित 'स्थितप्रज्ञ' के संप्रत्यप को समझाइये।
    Explain the concept of ‘Sthita-prajna’, according to Gita.

    अथवा (OR)

    भारतीय दार्शनिक संप्रदायों के वगीकरण पर एक निबन्ध लिखिए।
    Write an essay on the classification of Indian Philosophical schools.

    उत्तर (स्थितप्रज्ञ): गीता के अनुसार 'स्थितप्रज्ञ' वह व्यक्ति है जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है और जो सभी इच्छाओं, राग-द्वेष, भय और क्रोध से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में स्थित है। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है और सभी प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव रखता है। गीता के दूसरे अध्याय (श्लोक 54-72) में इसका विस्तार से वर्णन है।

  2. बौद्ध-दर्शन के 'प्रतीत्य-समुत्पाद' का वर्णन कीजिए।
    Describe ‘Pratitya-Samutpad’ in Buddhism.

    अथवा (OR)

    जैन-दर्शन में ‘कैवल्य’ विचार को स्पष्ट कीजिए।
    Explain the notion of ‘Kaivalya’ in Jainism.

    उत्तर (प्रतीत्य-समुत्पाद): बौद्ध दर्शन में 'प्रतीत्य-समुत्पाद' (आश्रित समुत्पाद) का अर्थ है कि सभी घटनाएँ और पदार्थ कारणों और परिस्थितियों के संयोग से उत्पन्न होते हैं। यह बारह अंगों (निदानों) की श्रृंखला है – अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा-मरण। यह दुःख के कारण और निरोध को समझाने का मूल सिद्धांत है।

  3. सांख्य की तत्त्व-मीमांसा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
    Give a brief description of Metaphysics of Samkhya.

    अथवा (OR)

    योग में समाधि की अवस्थाओं का विवेचन कीजिए।
    Explain the stages of Samadhi in Yoga.

    उत्तर (सांख्य तत्त्व-मीमांसा): सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि के मूल तत्त्व दो हैं – पुरुष (चेतन तत्त्व) और प्रकृति (जड़ तत्त्व)। प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रजस, तमस) के असंतुलन से महत्, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, ग्यारह इंद्रियाँ और पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं। कुल मिलाकर 25 तत्त्व हैं। पुरुष नित्य, शुद्ध और साक्षी है, जबकि प्रकृति सृष्टि का मूल कारण है।

  4. न्याय में प्रत्यक्ष के स्वरूप व प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
    Throw light on nature and types of ‘Pratyaksha’ in Nyaya.

    अथवा (OR)

    न्याय की ज्ञान-मीमांसा के महत्व पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।
    Write a short essay on the importance of Epistemology of Nyaya.

    उत्तर (प्रत्यक्ष का स्वरूप व प्रकार): न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष को इंद्रियों और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान माना गया है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं – (1) लौकिक प्रत्यक्ष (सामान्य इंद्रिय-ज्ञान) और (2) अलौकिक प्रत्यक्ष (योगज, सामान्यलक्षण, ज्ञानलक्षण)। लौकिक प्रत्यक्ष को आगे निर्विकल्पक (निराकार) और सविकल्पक (साकार) में बाँटा गया है। न्याय के अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण का सबसे प्रमुख साधन है।