RBSE Class 12th 2013 -SS-21-2013 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2013 |
| Subject | -SS-21-2013 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2013 -SS-21-2013
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Rajasthan Board Class 12th -SS-21-2013 2013 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक पूरक परीक्षा, 2013
SENIOR SECONDARY SUPPLEMENTARY EXAMINATION, 2013
हिन्दी साहित्य
समय : 3 घण्टे  
पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(उत्तर सीमा 20 से 40 शब्द)
जो खो न सकेगा अपने को
वह बीज बनेगा क्या तरुवर
अपनी आँखों से देखूँ
किसलय सुमन मनोहर फल,
यह बात सोचता बीज अगर
यह गलत चीज यह छाया छल,
विश्वास न जिसको fret
वह छू सकता है कब अम्बर ?
जब तक कि अहम् के गुदमैले
छिलके से चिपटा अन्तर मन
तब तक विकास केवल सपना
तुम देखो चाहे मूँद नयन,
मिट्टी के नीचे ही दबकर
उठ सकते मिट्टी के ऊपर !
-
(क) कौनसा बीज वृक्ष बनता है ?
वही बीज वृक्ष बनता है जो अपने अस्तित्व को मिट्टी में खोने का साहस रखता है। जो बीज अपने स्वरूप को बनाए रखने की जिद करता है, वह कभी अंकुरित होकर वृक्ष नहीं बन सकता।
-
(ख) बीज को क्या सोचना गलत है ?
बीज का यह सोचना गलत है कि वह अपनी आँखों से पत्ते, फूल और फल देखेगा। यह सोच भ्रम और छलावा है, क्योंकि बीज को मिट्टी में दबकर अपना अस्तित्व खोना पड़ता है, तभी वह वृक्ष बन सकता है।
-
(ग) “अहम के गुदमैले छिलके” के भाव को स्पष्ट कीजिए।
“अहम के गुदमैले छिलके” से तात्पर्य मनुष्य के अहंकार और स्वार्थ से है। यह अहंकार मनुष्य के मन को मैला कर देता है, जैसे गंदा छिलका। जब तक मन इस अहंकार से चिपका रहता है, तब तक विकास संभव नहीं है।
-
(घ) विकास का सपना कैसे पूरा किया जाता है ?
विकास का सपना तभी पूरा होता है जब मनुष्य अपने अहंकार और स्वार्थ को त्याग देता है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर ही ऊपर उठता है, वैसे ही मनुष्य को अपने अहम् को मिटाकर ही सच्चा विकास प्राप्त होता है।
-
(ड) उक्त पद्यांश में मनुष्य को क्या संदेश दिया गया है ?
इस पद्यांश में मनुष्य को यह संदेश दिया गया है कि सच्ची उन्नति के लिए अहंकार और स्वार्थ का त्याग आवश्यक है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर वृक्ष बनता है, वैसे ही मनुष्य को अपने अहम् को मिटाकर ही ऊँचाई प्राप्त कर सकता है।
2. निम्न गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(उत्तर सीमा 20 से 40 शब्द)
हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों में तिलक ने “स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा इसी तथ्य को ध्यान में रखकर दिया था कि स्वतंत्रता एक नैसर्गिक मूल्य है । नैसर्गिक मूल्य की रक्षा भी की जाती है और उसका अनुभव भी किया जाता है । मानव द्वारा व्यवस्था हेतु निर्मित प्रतिबंधों के बीच ही मानव के विकास की समस्त संभावनाएँ छिपी हुई हैं | यदि सामाजिक व्यवस्था का अभाव हो जाए और एक जंगली जीवन पद्धति मात्र रह जाए तो व्यक्तित्व विकास के वे सब सोपान ढह जाएँगे, जिससे मानवीय गरिमा की प्रतिष्ठा संभव होती है और जिन्हें पाने के लिए मनुष्य करोड़ों वर्षों से अनेक स्तर पर सक्रिय रहा है । इसलिए नैसर्गिक मूल्य के रूप में स्वतंत्रता को स्वयमेव कुछ प्रतिबंधों में बँधना पड़ेगा । ये प्रतिबंध मनुष्य के चतुर्दिक् विकास में रुकावट उत्पन्न नहीं करेंगे, क्योंकि इनका सृजन ही मानवीय विकास के लिए किया गया है । इसी आधार पर ग्रीन ने कहा था, “जिस प्रकार सौन्दर्य कुरूपता के अभाव का नाम नहीं होता उसी प्रकार स्वतंत्रता भी प्रतिबंधों के अभाव का नाम नहीं है ।”
-
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए ।
उत्तर: स्वतंत्रता और प्रतिबंधों का सहसंबंध
-
(ख) “नैसर्गिक मूल्य” का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: नैसर्गिक मूल्य का अर्थ है वह मूल्य जो मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त होता है, जैसे स्वतंत्रता। यह किसी बाहरी शक्ति द्वारा प्रदत्त नहीं होता, बल्कि मानव के स्वभाव में अंतर्निहित होता है। इसकी रक्षा और अनुभव दोनों आवश्यक हैं।
-
(ग) मानव-निर्मित प्रतिबंधों से स्वतंत्रता बाधित नहीं होती । क्यों ?
उत्तर: मानव-निर्मित प्रतिबंध स्वतंत्रता को बाधित नहीं करते, क्योंकि इनका सृजन मानवीय विकास के लिए किया गया है। ये प्रतिबंध सामाजिक व्यवस्था बनाए रखते हैं, जिसके अभाव में व्यक्तित्व विकास के सोपान ढह जाएंगे। अतः ये प्रतिबंध विकास में सहायक हैं, बाधक नहीं।
-
(घ) “सौन्दर्य कुरूपता के अभाव का नाम नहीं होता ।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि सौन्दर्य केवल कुरूपता के न होने का नाम नहीं है, बल्कि वह एक सकारात्मक गुण है। इसी प्रकार स्वतंत्रता भी केवल प्रतिबंधों के अभाव का नाम नहीं, बल्कि वह एक सकारात्मक मूल्य है जो प्रतिबंधों के बीच ही विकसित होती है।
-
(ङ) “चतुर्दिक्” का समानार्थी शब्द लिखते हुए उसका वाक्य में प्रयोग कीजिए ।
उत्तर: “चतुर्दिक्” का समानार्थी शब्द है – “चारों ओर”।
वाक्य प्रयोग: बारिश के बाद चतुर्दिक् हरियाली छा गई।
खण्ड-ब
3. किसी एक विषय पर लगभग 450 शब्दों में निबंध लिखिए : 8
- विज्ञापनों की मृग-मरीचिका
- दूरदर्शन के कार्यक्रमों की उपादेयता
- चाँदनी रात में नौका-विहार
- भारतीय लोकतंत्र की दशा एवं दिशा
4. जिला शिक्षा अधिकारी, उज्जैन की ओर से सचिव, माध्यमिक शिक्षा परिषद्, भोपाल को एक कार्यालयी पत्र लिखिए जिसमें शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, रामगढ़ में परीक्षा केन्द्र खोलने को अनुशंसा की गई हो। 4
अथवा
जिला कलैक्टर, विजयगढ़ की ओर से जिले के सभी राजकीय विद्यालयों में जनसंख्या एवं पर्यावरण जागरूकता के लिए कार्यक्रम आयोजित करने संबंधी पत्र का प्रारूप लिखिए।
5. निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 20-25 शब्दों में लिखिए :
-
प्रश्न: जनसंचार के कोई दो माध्यम लिखिए।
उत्तर: जनसंचार के दो माध्यम हैं – (1) समाचार पत्र (प्रिंट मीडिया) और (2) दूरदर्शन (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया)।
-
प्रश्न: समाचार पत्र के संबंध में 'डेडलाइन' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'डेडलाइन' का अर्थ है वह निर्धारित समय सीमा, जिसके भीतर समाचार को संपादित कर प्रकाशन के लिए भेजना अनिवार्य होता है।
-
प्रश्न: इंटरनेट पत्रकारिता से क्या आशय है?
उत्तर: इंटरनेट पत्रकारिता से आशय इंटरनेट के माध्यम से समाचारों के प्रकाशन और प्रसारण से है, जिसमें वेबसाइटों, ब्लॉगों और सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है।
-
प्रश्न: दूरदर्शन की खबरों के दो चरण लिखिए।
उत्तर: दूरदर्शन की खबरों के दो चरण हैं – (1) समाचार संकलन और संपादन, (2) समाचार प्रसारण (एंकरिंग और विजुअल प्रस्तुति)।
6. कविता रचना के उपकरणों को स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द) 4
उत्तर: कविता रचना के उपकरण हैं – छंद, अलंकार, रस, भाषा-शैली, बिम्ब और प्रतीक। ये कविता को सौंदर्य और प्रभाव प्रदान करते हैं।
7. निम्न पद्यावतरणों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 7
(उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द)
पद्यांश 1:
और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी
दफ्तर में छुट्टी थी -- यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहर-दहर कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आवेंगे
रंग-रस-गंध से लदे फँदे दूर के विदेश के
वे नन्दन वन होवेंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व
अभ्यास करके दिखावेंगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि बसन्त आया |
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत पद्यांश 'बसन्त आया' कविता से लिया गया है। कवि कहता है कि कैलेंडर और कविताओं से बसन्त के आगमन का पूर्वानुमान था, परन्तु वास्तविक अनुभव तो आज ही हुआ जब प्रकृति में बदलाव देखा। यह बसन्त के आगमन की सहज और मार्मिक अभिव्यक्ति है।
अथवा
पद्यांश 2:
बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ ऐसी मति उदित उदार कौन की भई ।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध रिषिराज तपवृद्ध कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई ।
भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है, 'केसोदास' क्यों हू न बखानी काहू पै गई ।
पति at चारमुख Ya बनैं पाँचमुख नाती बनैं घटमुख तदपि नई-नई ॥
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत पद्यांश केशवदास द्वारा रचित है। कवि सरस्वती (बानी जगरानी) की उदारता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि देवता, ऋषि-मुनि भी उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर पाए। चार मुख वाला ब्रह्मा, पाँच मुख वाला शिव और घटमुख भी नई-नई बातें कहते रहते हैं, पर सरस्वती की महिमा अनंत है।
8. निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए :
(क) यह तन जारौं on कै, vel कि पवन उड़ाउ ।
मकु तेहि मारग होइ परौ, कंत at जहँ पाठ ॥
पंक्तियों में निहित भाव-सौन्दर्य लिखिए | 2
भाव-सौन्दर्य: इन पंक्तियों में नायिका अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल है। वह कहती है कि वह अपने शरीर को जला दे या हवा में उड़ा दे, ताकि उसकी राख उस मार्ग पर पड़े जहाँ से उसका प्रियतम गुज़रता हो। इसमें प्रेम की तीव्रता, त्याग और समर्पण का अद्भुत भाव-सौन्दर्य निहित है।
(ख) हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे ।
मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा ।
पंक्तियों का शिल्प-सौन्दर्य लिखिए | 2
शिल्प-सौन्दर्य: इन पंक्तियों में 'हेम कुंभ' (स्वर्ण कलश) रूपक है, जो उषा के प्रकाश को दर्शाता है। 'ढुलकाती सुख मेरे' में मानवीकरण है। 'मदिर ऊँघते रहते' में अनुप्रास अलंकार है। रात भर जागने और तारों के जगने का चित्रण मुक्त छंद में किया गया है, जो शिल्प की सुंदरता को बढ़ाता है।
9.
निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए :
(क) “A तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वन्द्दी या हिस्सेदार नहीं ।” यह कथन किसका और किसके प्रति है ?
यह कथन कुटज का है, जो राजा जनक के प्रति कहा गया है। कुटज जनक को संबोधित करते हुए कहता है कि वह उनका विरोधी, प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र और वशी (आत्मनियंत्रित) व्यक्ति है।
(ख) एक बूँद सहसा उछली सागर के झाग से;
रंग गई क्षणभर ढलते सूरज की आग से |
उक्त पंक्तियों में कवि ने जीवन में किसके महत्त्व को प्रतिष्ठापित किया है ?
इन पंक्तियों में कवि ने जीवन में क्षणभंगुरता और सौंदर्य के महत्त्व को प्रतिष्ठापित किया है। एक छोटी सी बूँद, जो सागर के झाग से उछलती है और ढलते सूरज की आग से रंग जाती है, यह दर्शाती है कि जीवन के छोटे-छोटे क्षण भी अत्यंत मूल्यवान और सुंदर हो सकते हैं।
खण्ड- द
निम्न गद्यांशों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : (उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द)
पहला गद्यांश:
कवि अपनी रुचि के अनुसार जब विश्व को परिवर्तित करता है तो यह भी बताता है कि विश्व से उसे असंतोष क्यों है, वह यह भी बताता है कि विश्व में उसे क्या रुचता है जिसे वह 'फलता-फूलता देखना चाहता है | उसके चित्र के चमकीले रंग और पार्श्वभूमि की गहरी काली रेखाएँ दोनों ही यथार्थ जीवन से उत्पन्न होते हैं । इसलिए प्रजापति -- कवि गंभीर यथार्थवादी होता है, ऐसा यथार्थवादी जिसके पाँव वर्तमान की धरती पर है और आँखें भविष्य के क्षितिज पर लगी हुई हैं । इसलिए मनुष्य साहित्य में अपने सुख-दुख की बात ही नहीं सुनता, वह उसमें आशा का स्वर भी सुनता है । साहित्य थके हुए मनुष्य के लिए विश्रांति ही नहीं है, वह उसे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी करता है ।
संदर्भ: यह गद्यांश हिंदी साहित्य के एक निबंध से लिया गया है, जिसमें कवि और साहित्य के यथार्थवादी स्वरूप पर चर्चा की गई है।
प्रसंग: लेखक कवि की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहता है कि कवि अपनी रुचि के अनुसार विश्व को परिवर्तित करता है और यह बताता है कि उसे विश्व से क्या असंतोष है और क्या रुचता है।
व्याख्या: कवि एक गंभीर यथार्थवादी होता है, जिसके पैर वर्तमान की धरती पर होते हैं और आँखें भविष्य के क्षितिज पर। उसके चित्र के चमकीले रंग और पार्श्वभूमि की काली रेखाएँ दोनों यथार्थ जीवन से उत्पन्न होते हैं। साहित्य मनुष्य को केवल सुख-दुख ही नहीं सुनाता, बल्कि उसमें आशा का स्वर भी होता है, जो थके हुए मनुष्य को विश्रांति और आगे बढ़ने का उत्साह प्रदान करता है।
दूसरा गद्यांश:
दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं । सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है । परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी । जिसका मन अपने वश में नहीं है वही दूसरे मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है । कुटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त है । वह वशी है । वह बैरागी है । राजा जनक की तरह संसार में रहकर, संपूर्ण भोगों को भोग कर भी उनसे मुक्त है । जनक की ही भाँति वह घोषणा करता है -- “मैं स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ, उसे वश में कर सका हूँ ।'
संदर्भ: यह गद्यांश हिंदी साहित्य के एक निबंध से लिया गया है, जिसमें मन की वशीभूतता और स्वतंत्रता पर चर्चा की गई है।
प्रसंग: लेखक सुख और दुख को मन के विकल्प बताते हुए कहता है कि सुखी वह है जिसका मन वश में है, और दुखी वह है जिसका मन परवश है।
व्याख्या: परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, चाटुकारिता करना। जिसका मन अपने वश में नहीं, वह दूसरों के मन का अनुसरण करता है और मिथ्या आडंबर रचता है। कुटज इन सबसे मुक्त है, वह वशी और बैरागी है। वह राजा जनक की तरह संसार में रहकर भी भोगों से मुक्त है और घोषणा करता है कि उसने अपने मन को जीत लिया है, वह स्वार्थ के लिए दूसरे के मन में नहीं घुसता।
खण्ड-ग
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निम्न में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लिखिए : (उत्तर सीमा लगभग 50 शब्द) 2×2=4
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“बालक बच गया” लघु निबंध में किस मनोवैज्ञानिक तथ्य को उजागर किया गया है?
इस लघु निबंध में बालक के मन में अपने पिता के प्रति गहरे लगाव और उनके खोने के भय को उजागर किया गया है। यह बाल मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जहाँ बच्चा अपने माता-पिता को सुरक्षा का प्रतीक मानता है और उनसे बिछड़ने की कल्पना मात्र से भयभीत हो जाता है।
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“दूसरे की मुद्रा की झनझनाहट गरीब आदमी के हृदय में उत्तेजना उत्पन्न करती है।” इस कथन का सन्दर्भ लिखते हुए इसका आशय स्पष्ट कीजिए।
सन्दर्भ: यह पंक्ति “बालक बच गया” नामक लघु निबंध से ली गई है। आशय: लेखक कहना चाहता है कि गरीब व्यक्ति के लिए दूसरे के पास धन का होना और उसकी आवाज सुनना, उसके मन में ईर्ष्या और पीड़ा उत्पन्न करता है। यह उसकी आर्थिक विषमता की ओर संकेत करता है।
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सच्चे साहित्यकार को किस प्रकार के साहित्य की रचना करना चाहिए?
सच्चे साहित्यकार को ऐसे साहित्य की रचना करनी चाहिए जो समाज में जागरूकता लाए, मानवीय मूल्यों की स्थापना करे और सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा करुणा जैसे आदर्शों को प्रोत्साहित करे। उसका साहित्य समाज के दर्पण के समान होना चाहिए, जो यथार्थ को उजागर करे और मानवता के कल्याण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करे।
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सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” या पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का साहित्यिक परिचय दीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) 4
सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”: ये हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ हैं। इनका जन्म 1899 ई. में बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ। इनकी प्रमुख रचनाओं में “परिमल”, “गीतिका”, “अनामिका” (काव्य), “बिल्लेसुर बकरिहा” (उपन्यास) आदि शामिल हैं। निराला जी ने कविता में नए प्रयोग किए और प्रकृति, प्रेम, दर्शन तथा सामाजिक चेतना को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनकी भाषा में ओज और संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय है।
पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: ये हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार और कहानीकार हैं। इनका जन्म 1883 ई. में ग्वालियर में हुआ। इनकी प्रसिद्ध कहानी “उसने कहा था” हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती है। गुलेरी जी ने “पुरुष परीक्षा”, “सुखमय जीवन” जैसे निबंध भी लिखे। उनकी शैली में गंभीरता, हास्य और व्यंग्य का सुंदर मिश्रण मिलता है।
खण्ड-य
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निम्न प्रश्नों में से किन्हीं चार के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए : 4×2=8
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“लेकिन अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं है, जितना धन।” इस कथन के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिए।
इस कथन का निहितार्थ यह है कि अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता स्वाभाविक है, क्योंकि वह काम नहीं कर सकता। लेकिन यदि उसके पास धन होगा तो लोग उस पर संदेह करेंगे कि उसने यह धन कैसे पाया। इस प्रकार, धन उसके लिए लज्जा का कारण बन सकता है, जबकि दरिद्रता नहीं।
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चिड़िया और गीध की कहानी के माध्यम से भूपसिंह क्या बताना चाहता था?
भूपसिंह चिड़िया और गीध की कहानी के माध्यम से यह बताना चाहता था कि छोटे और कमजोर प्राणी भी अपनी बुद्धि और साहस से बड़े और शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। यह कहानी सिखाती है कि एकता और समझदारी से किसी भी बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।
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“बिस्कोहर की माटी” अध्याय में वात्सल्य भाव की मनोरम झाँकी देखने को मिलती है। स्पष्ट करें।
“बिस्कोहर की माटी” अध्याय में माँ का अपने बच्चे के प्रति असीम प्रेम और वात्सल्य भाव दर्शाया गया है। माँ अपने बच्चे को भूख से बचाने के लिए स्वयं भूखी रहती है और उसकी हर जरूरत को पूरा करने का प्रयास करती है। यह मातृत्व के त्याग और समर्पण की एक मार्मिक झाँकी प्रस्तुत करता है।
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“मन से तो किशोर हो सकते हो। शरीर फिर वैसा फुर्तीला, लचीला और गर्वीला नहीं हो सकता।” “अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ सभ्यता में” लेखक ने यह वाक्य किस सन्दर्भ में कहा है?
लेखक ने यह वाक्य उस सन्दर्भ में कहा है जब वह अपने बचपन के दिनों को याद करता है और वर्तमान में अपने शरीर की स्थिति से तुलना करता है। वह कहना चाहता है कि मन से तो हम युवा रह सकते हैं, लेकिन शरीर उम्र के साथ वैसा चुस्त और ताकतवर नहीं रहता जैसा बचपन में था।
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“उसके गुरु तो तुम्हीं हो, तुम्हीं ने मंत्र दिया होगा।” “सूरदास की झोपड़ी” अध्याय के इस कथन में किसने किस पर क्या व्यंग्य किया है?
इस कथन में सूरदास ने अपने पुत्र पर व्यंग्य किया है। सूरदास का पुत्र उन्हें अंधा होने के कारण बेकार समझता है और उनकी उपेक्षा करता है। सूरदास व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि तुम ही मेरे गुरु हो, तुमने ही मुझे यह मंत्र दिया होगा कि बुढ़ापे में बेटा पिता की सेवा नहीं करता।
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“अपना मालवा : खाऊ-उजाड़ सभ्यता में” आलेख पर्यावरण विनाश की गंभीर समस्या से प्रेरित है। स्पष्ट कीजिए। 6
“अपना मालवा : खाऊ-उजाड़ सभ्यता में” आलेख में लेखक ने मालवा क्षेत्र में हो रहे पर्यावरण विनाश को चिंताजनक रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक बताता है कि आधुनिक सभ्यता के विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का प्रदूषण और जमीन की उर्वरता का नाश हो रहा है। यह सब मानव की लालच और अविवेकपूर्ण गतिविधियों का परिणाम है। लेखक ने इस आलेख के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है और चेतावनी दी है कि यदि इसी प्रकार प्रकृति का दोहन होता रहा तो मानव जीवन संकट में पड़ जाएगा।