RBSE Class 12th 2013 -SS-85-2013 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2013 |
| Subject | -SS-85-2013 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2013 -SS-85-2013
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Rajasthan Board Class 12th -SS-85-2013 2013 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक पूरक परीक्षा, 2013
SENIOR SECONDARY SUPPLEMENTARY EXAMINATION, 2013
दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें ।
Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं ।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें ।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें ।
For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity. - प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें ।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
SS—85—Philosophy (Supp.) [SS - 485]
Section – A
निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये :
Define each of the following :
-
कर्मवाद (Karmavada)
कर्मवाद के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। यह सिद्धांत बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुख का भोग करता है।
-
स्वधर्म (Swadharma)
स्वधर्म का अर्थ है अपने स्वभाव, जाति, वर्ण और आश्रम के अनुसार निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना। गीता में स्वधर्म का पालन करने पर बल दिया गया है।
-
क्षणिकवाद (Kshanikvada)
क्षणिकवाद बौद्ध दर्शन का एक सिद्धांत है जिसके अनुसार प्रत्येक वस्तु क्षणिक है और प्रत्येक क्षण नष्ट होती है। कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है।
-
प्रमा (Prama)
प्रमा का अर्थ है यथार्थ ज्ञान। यह वह ज्ञान है जो वस्तु के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करता है और भ्रम रहित होता है।
-
निर्गुण ब्रह्म (Nirgun Brahma)
निर्गुण ब्रह्म वह ब्रह्म है जो सभी गुणों से रहित है। यह अद्वैत वेदांत के अनुसार सच्चिदानंद स्वरूप है और इसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता।
-
अनुभववाद (Empiricism)
अनुभववाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो ज्ञान का स्रोत इंद्रिय अनुभव को मानता है। इसके अनुसार सभी ज्ञान अनुभव से उत्पन्न होता है।
प्रश्न संरचना (Question Structure)
| खण्ड (Section) | प्रश्न संख्या (Question Nos.) | प्रति प्रश्न अंक (Marks per question) | उत्तर की शब्द सीमा (Word limit of answer) |
|---|---|---|---|
| अ (A) | 1-10 | 1 | 20 शब्द (words) |
| ब (B) | 11-20 | 2 | 50 शब्द (words) |
| स (C) | 21-30 | 5 | 100-150 शब्द (words) |
नोट: प्रश्न संख्या 21 से 30 तक आंतरिक विकल्प हैं। (There are internal choices for Q. Nos. 21 to 30.)
SS—85—Philosophy (Supp.) [SS - 485]
खण्ड-ब / SECTION - B
-
‘ऋत’ संक्षेप में प्रकाश डालिए।
Explain 'Rita' in brief.उत्तर: 'ऋत' का अर्थ है ब्रह्मांडीय नियम या सत्य। यह वैदिक काल में प्रकृति और नैतिक व्यवस्था को संचालित करने वाला सार्वभौमिक सिद्धांत है। ऋत ही सत्य, धर्म और ऋतुचक्र का आधार है।
-
क्या गीता के अनुसार कर्म-संन्यास संभव है?
Is Karma-sanyas possible, according to Gita?उत्तर: गीता के अनुसार कर्म-संन्यास (कर्मों का त्याग) संभव नहीं है, क्योंकि मनुष्य कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता। गीता कर्म-योग पर बल देती है, जिसमें फल की आसक्ति छोड़कर निष्काम भाव से कर्म करना सिखाया गया है।
-
स्याद्वाद क्या है?
What is Syatvada?उत्तर: स्याद्वाद जैन दर्शन का एक सिद्धांत है जो कहता है कि किसी भी वस्तु के बारे में सापेक्ष दृष्टिकोण से ही कथन किया जा सकता है। 'स्यात्' का अर्थ है 'शायद' या 'किसी दृष्टि से'। यह अनेकांतवाद का व्यावहारिक रूप है।
-
सांख्य में 'प्रकृति' और 'विकृति' का क्या तात्पर्य है?
What are the meaning of 'Prakriti' and 'Vikriti' in Samkhya?उत्तर: सांख्य दर्शन में 'प्रकृति' मूल प्रकृति है, जो तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से युक्त अव्यक्त मूल कारण है। 'विकृति' प्रकृति से उत्पन्न विकार या परिणाम हैं, जैसे महत्, अहंकार, पंचतन्मात्राएँ आदि। प्रकृति स्वयं कारण है, जबकि विकृतियाँ कार्य हैं।
-
अद्वैत वेदान्त में 'तत्त्वमसि' का क्या अर्थ है?
What is the meaning of 'Tatvamasi' in Advaita Vedanta?उत्तर: 'तत्त्वमसि' का अर्थ है 'तू वह है'। अद्वैत वेदान्त में इस महावाक्य का तात्पर्य है कि जीवात्मा और परमात्मा (ब्रह्म) में अभेद है। यह बताता है कि व्यक्तिगत आत्मा वास्तव में परम ब्रह्म के समान है, और द्वैत का भ्रम मिटाने का उपदेश देता है।
-
लॉक के अनुसार प्राथमिक व गौण गुणों में क्या अन्तर है?
What is the distinction between primary and secondary qualities according to Locke?उत्तर: लॉक के अनुसार प्राथमिक गुण (जैसे आकार, गति, संख्या, घनत्व) वस्तु में स्वयं विद्यमान होते हैं और इंद्रियों से स्वतंत्र होते हैं। गौण गुण (जैसे रंग, स्वाद, गंध) वस्तु में नहीं होते, बल्कि प्राथमिक गुणों के कारण हमारी इंद्रियों में उत्पन्न संवेदनाएँ मात्र हैं।
-
अरस्तू के उपादान कारण को संक्षेप में समझाइये।
Explain Aristotle's material cause in brief.उत्तर: अरस्तू के अनुसार उपादान कारण (Material Cause) वह पदार्थ या द्रव्य है जिससे कोई वस्तु बनी होती है। उदाहरण के लिए, मूर्ति का उपादान कारण कांस्य या पत्थर है, और घर का उपादान कारण ईंट-पत्थर हैं। यह चार कारणों (उपादान, निमित्त, रूप, प्रयोजन) में से एक है।
8. ईश्वर के अस्तित्व के डेकार्ट द्वारा प्रस्तुत सत्तामूलक प्रमाण को समझाइये।
Explain the ontological argument given by Descartes for the existence of God.
डेकार्ट का सत्तामूलक प्रमाण (Ontological Argument): डेकार्ट के अनुसार, ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण उसके सार (essence) से ही प्राप्त होता है। उन्होंने तर्क दिया कि ईश्वर का विचार एक पूर्ण सत्ता (perfect being) का विचार है। एक पूर्ण सत्ता में अस्तित्व (existence) भी एक गुण है, क्योंकि अस्तित्व के बिना कोई सत्ता पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिए, ईश्वर के विचार से ही उसका अस्तित्व सिद्ध होता है। यह प्रमाण इस प्रकार है:
- ईश्वर का विचार एक पूर्ण सत्ता का विचार है।
- पूर्ण सत्ता में सभी गुण होते हैं, जिनमें अस्तित्व भी शामिल है।
- अतः ईश्वर का अस्तित्व है।
डेकार्ट ने इसे त्रिभुज के उदाहरण से समझाया: जैसे त्रिभुज के विचार से उसके तीन कोणों का योग 180° होना आवश्यक है, वैसे ही ईश्वर के विचार से उसका अस्तित्व आवश्यक है।
9. स्पिनोजा के 'समानान्तरवाद' को समझाइए।
Explain Spinoza's 'Parallelism'.
स्पिनोजा का समानान्तरवाद (Parallelism): स्पिनोजा के अनुसार, ईश्वर या प्रकृति के अनंत गुण (attributes) हैं, जिनमें से मनुष्य केवल दो गुणों को जानता है – चिंतन (thought) और विस्तार (extension)। समानान्तरवाद का सिद्धांत बताता है कि चिंतन और विस्तार के क्रम (order) और संबंध (connection) समान हैं। अर्थात्, विचारों का क्रम और वस्तुओं का क्रम एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते।
उदाहरण के लिए, जब मन में कोई विचार उठता है, तो शरीर में उसके अनुरूप एक गति होती है, लेकिन विचार शरीर को प्रभावित नहीं करता और न ही शरीर विचार को। दोनों एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। यह द्वैतवाद (dualism) का समाधान प्रस्तुत करता है।
20. क्या व्यवसाय में नैतिकता का स्थान होता है? समझाइये।
Does morality has any place in business? Explain.
व्यवसाय में नैतिकता का स्थान: हाँ, व्यवसाय में नैतिकता का महत्वपूर्ण स्थान है। नैतिकता व्यवसाय को दीर्घकालिक सफलता, विश्वास और सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करती है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:
- ग्राहक विश्वास: नैतिक व्यवहार से ग्राहकों का विश्वास बढ़ता है, जिससे व्यवसाय को स्थायी लाभ मिलता है।
- कर्मचारी संतोष: नैतिक नीतियाँ कर्मचारियों को प्रेरित करती हैं और कार्यस्थल पर सकारात्मक वातावरण बनाती हैं।
- सामाजिक उत्तरदायित्व: व्यवसाय का समाज के प्रति कर्तव्य है कि वह धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और शोषण से बचे।
- कानूनी अनुपालन: नैतिकता कानूनी समस्याओं से बचाती है और व्यवसाय की प्रतिष्ठा बनाए रखती है।
अतः नैतिकता के बिना व्यवसाय अल्पकालिक लाभ तो कमा सकता है, लेकिन दीर्घकाल में असफल हो जाता है।
SECTION - B
21. पुरुषार्थ के रूप में 'मोक्ष' के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
Explain the nature of 'Moksha', as a Purusartha.
मोक्ष का स्वरूप (पुरुषार्थ के रूप में): भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थ माने गए हैं – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष सर्वोच्च पुरुषार्थ है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार को दर्शाता है। इसके स्वरूप की मुख्य विशेषताएँ:
- दुःखों का अंत: मोक्ष में सभी प्रकार के दुःखों और बंधनों से मुक्ति मिलती है।
- आनंद की प्राप्ति: यह परम आनंद (bliss) की अवस्था है, जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है।
- कर्मों का क्षय: मोक्ष में सभी कर्मों का फल समाप्त हो जाता है और पुनर्जन्म नहीं होता।
- ब्रह्म के साथ एकता: अद्वैत वेदांत के अनुसार, मोक्ष का अर्थ ब्रह्म (परम सत्ता) के साथ आत्मा का एकीकरण है।
मोक्ष को प्राप्त करने के लिए ज्ञान, भक्ति और कर्म के मार्ग बताए गए हैं।
अथवा
भारतीय दर्शन में पुनर्जन्म और कर्मवाद के सिद्धान्त को समझाइये।
Explain the doctrines of Rebirth and Karmavada in Indian philosophy.
पुनर्जन्म और कर्मवाद: भारतीय दर्शन में पुनर्जन्म (Rebirth) और कर्मवाद (Karmavada) परस्पर संबंधित सिद्धांत हैं।
- कर्मवाद: इस सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक कर्म का एक फल होता है। अच्छे कर्मों का फल सुख और बुरे कर्मों का फल दुःख के रूप में मिलता है। कर्मों का संचय (Sanchita), प्रारब्ध (Prarabdha) और क्रियमाण (Kriyamana) में विभाजन किया जाता है।
- पुनर्जन्म: यह सिद्धांत बताता है कि आत्मा अमर है और शरीर के नष्ट होने पर नया शरीर धारण करती है। यह जन्म-मृत्यु का चक्र (Samsara) तब तक चलता रहता है जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।
दोनों सिद्धांत मिलकर यह समझाते हैं कि वर्तमान जीवन की परिस्थितियाँ पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम हैं, और वर्तमान कर्म भविष्य के जन्मों को निर्धारित करते हैं।
22. गीता के अनुसार स्थितप्रज्ञ के स्वरूप को समझाइये।
Explain the nature of 'Sthita prajna', according to Gita.
स्थितप्रज्ञ का स्वरूप (गीता के अनुसार): गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति के लक्षण बताए हैं। स्थितप्रज्ञ वह है जिसने सभी इच्छाओं और विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है। इसके मुख्य लक्षण:
- इच्छाओं का त्याग: वह सभी भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है और मन को वश में रखता है।
- द्वंद्वों से परे: सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है।
- निर्मल मन: उसका मन सभी विकारों (क्रोध, लोभ, मोह) से मुक्त होता है।
- ब्रह्म में स्थित: वह निरंतर ब्रह्म (परमात्मा) का ध्यान करता है और उसमें लीन रहता है।
गीता के अनुसार, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा योगी है और मोक्ष का अधिकारी है।
अथवा
गीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म के संबंध को समझाइये।
Explain the relation of Jnana, Bhakti and Karma in Gita.
गीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म का संबंध: गीता तीन मार्गों – ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग – का समन्वय प्रस्तुत करती है। इनका संबंध इस प्रकार है:
- कर्म योग: निष्काम कर्म (फल की इच्छा के बिना कर्तव्यपालन) का मार्ग है। यह मन को शुद्ध करता है और ज्ञान के लिए तैयार करता है।
- ज्ञान योग: आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार कराता है। यह कर्म योग के बाद आता है, क्योंकि शुद्ध मन ही ज्ञान को ग्रहण कर सकता है।
- भक्ति योग: ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का मार्ग है। गीता के अनुसार, भक्ति सबसे सरल मार्ग है और यह ज्ञान और कर्म दोनों को पूर्ण करती है।
गीता में इन तीनों को एक-दूसरे का पूरक बताया गया है। कर्म के बिना ज्ञान अधूरा है, और भक्ति के बिना कर्म यांत्रिक हो जाता है। अतः साधक को तीनों का समन्वय करना चाहिए।
23. बुद्ध के “अष्टांगिक मार्ग” का विवेचन कीजिए।
बुद्ध के अनुसार, दुःख से मुक्ति का मार्ग 'अष्टांगिक मार्ग' है, जिसे 'मध्यम मार्ग' भी कहा जाता है। यह आठ अंगों में विभाजित है:
- सम्यक् दृष्टि – सही दृष्टिकोण, चार आर्य सत्यों को समझना।
- सम्यक् संकल्प – सही विचार, अहिंसा और त्याग की भावना।
- सम्यक् वाक् – सही वाणी, झूठ और कठोर शब्दों से बचना।
- सम्यक् कर्मांत – सही आचरण, हिंसा, चोरी और कामुकता से दूर रहना।
- सम्यक् आजीव – सही जीविका, ईमानदारी से जीवनयापन।
- सम्यक् व्यायाम – सही प्रयास, अकुशल विचारों को रोकना और कुशल विचारों को बढ़ाना।
- सम्यक् स्मृति – सही स्मृति, शरीर और मन के प्रति जागरूकता।
- सम्यक् समाधि – सही एकाग्रता, ध्यान के माध्यम से मन को शांत करना।
यह मार्ग नैतिकता, ध्यान और प्रज्ञा के तीन भागों में बँटा है, जो निर्वाण की प्राप्ति में सहायक है।
क्या जैन दर्शन सापेक्षवादी है? समझाइये।
जैन दर्शन को सापेक्षवादी (Relativist) माना जा सकता है, क्योंकि यह 'अनेकांतवाद' और 'स्याद्वाद' पर आधारित है। अनेकांतवाद के अनुसार, वास्तविकता के अनेक पहलू हैं, और कोई एक दृष्टिकोण पूर्ण सत्य नहीं है। स्याद्वाद में प्रत्येक कथन को 'स्यात्' (शायद) शब्द से जोड़ा जाता है, जो सापेक्षता को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, "स्यात् घटः अस्ति" (शायद घड़ा है) और "स्यात् घटः नास्ति" (शायद घड़ा नहीं है) दोनों सत्य हो सकते हैं, यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। इस प्रकार, जैन दर्शन सापेक्षवादी है, क्योंकि यह सत्य को बहुआयामी और सापेक्ष मानता है।
24. सांख्य के अनुसार विकासवाद की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
सांख्य दर्शन में विकासवाद (Evolution) की प्रक्रिया प्रकृति और पुरुष के संयोग से शुरू होती है। प्रकृति तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से बनी है, और पुरुष चेतन तत्व है। विकास की प्रक्रिया निम्नलिखित है:
- प्रकृति – मूल प्रकृति, अव्यक्त और अविभाजित।
- महत् (बुद्धि) – प्रकृति से सबसे पहले महत् या बुद्धि उत्पन्न होती है, जो निर्णय और विवेक का कार्य करती है।
- अहंकार – बुद्धि से अहंकार उत्पन्न होता है, जो 'मैं' की भावना देता है।
- मन – अहंकार से मन उत्पन्न होता है, जो इंद्रियों को नियंत्रित करता है।
- पाँच ज्ञानेंद्रियाँ – आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा।
- पाँच कर्मेंद्रियाँ – हाथ, पैर, वाणी, गुदा, जननेंद्रिय।
- पाँच तन्मात्राएँ – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध (सूक्ष्म तत्व)।
- पाँच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी (स्थूल तत्व)।
यह क्रम 24 तत्वों का निर्माण करता है, जो प्रकृति के विकास को दर्शाता है। पुरुष केवल साक्षी है, इसमें भाग नहीं लेता।
योग-दर्शन में 'यम' और 'नियम' की व्याख्या कीजिए।
योग-दर्शन में पतंजलि ने अष्टांग योग के पहले दो अंगों 'यम' और 'नियम' का वर्णन किया है। ये नैतिक नियम हैं:
यम (पाँच सामाजिक नियम)
- अहिंसा – किसी भी प्राणी को मानसिक या शारीरिक कष्ट न देना।
- सत्य – सच बोलना और सत्य का पालन करना।
- अस्तेय – चोरी न करना और दूसरों की वस्तु न लेना।
- ब्रह्मचर्य – संयमित जीवन, विशेषकर यौन संयम।
- अपरिग्रह – संग्रह न करना, आवश्यकता से अधिक न रखना।
नियम (पाँच व्यक्तिगत नियम)
- शौच – शरीर और मन की शुद्धता।
- संतोष – जो मिले उसमें संतुष्ट रहना।
- तप – कठोरता और अनुशासन, जैसे उपवास।
- स्वाध्याय – आत्म-अध्ययन और शास्त्रों का पाठ।
- ईश्वर प्रणिधान – ईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति।
यम और नियम योग के आधार हैं, जो मन को शुद्ध कर ध्यान और समाधि के लिए तैयार करते हैं।
25. अद्वैत वेदांत में 'अहं ब्रह्मास्मि' के तात्पर्य को स्पष्ट कीजिए।
अद्वैत वेदांत में 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) का अर्थ है कि व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मा) और परमात्मा (ब्रह्म) में कोई भेद नहीं है। यह महावाक्य उपनिषदों (विशेषकर बृहदारण्यक उपनिषद) से लिया गया है। शंकराचार्य के अनुसार, जीव और ब्रह्म का भेद अज्ञान (माया) के कारण प्रतीत होता है। जब यह अज्ञान दूर होता है, तो जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है कि वह स्वयं ब्रह्म है। इसका तात्पर्य है कि आत्मा शुद्ध चेतना, सत्य और आनंद स्वरूप है, और संसार का कोई भी पदार्थ उससे भिन्न नहीं है। यह अद्वैत (अद्वितीय) सिद्धांत को स्थापित करता है।
अद्वैत वेदांत के अनुसार जगत के स्वरूप को समझाइये।
अद्वैत वेदांत के अनुसार, जगत (संसार) का स्वरूप मिथ्या (अवास्तविक) है। शंकराचार्य ने जगत को 'माया' का परिणाम बताया है। माया एक शक्ति है जो ब्रह्म में रहती है और जगत को प्रकट करती है। जगत तीन स्तरों पर देखा जाता है:
- पारमार्थिक स्तर – केवल ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है।
- व्यावहारिक स्तर – व्यवहार में जगत सत्य प्रतीत होता है, जैसे स्वप्न में वस्तुएँ सत्य लगती हैं।
- प्रातिभासिक स्तर – भ्रम के कारण जगत का आभास होता है, जैसे रस्सी में साँप का भ्रम।
इस प्रकार, जगत ब्रह्म पर आरोपित (अध्यास) है, और वास्तव में केवल ब्रह्म ही सत्य है। जगत अनित्य, दुःखमय और मिथ्या है, जबकि ब्रह्म नित्य, आनंदमय और सत्य है।
26. लॉक के प्रतिनिधानात्मक वस्तुवाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
लॉक का प्रतिनिधानात्मक वस्तुवाद (Representative Realism): जॉन लॉक के अनुसार, हम वस्तुओं को सीधे नहीं जानते, बल्कि उनके प्रतिनिधि (ideas) के माध्यम से जानते हैं। बाहरी वस्तुएँ हमारे मन में संवेदनाएँ उत्पन्न करती हैं, जो उन वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। लॉक ने गुणों को दो भागों में बाँटा: प्राथमिक गुण (जैसे आकार, गति) जो वस्तु में वास्तव में होते हैं, और द्वितीयक गुण (जैसे रंग, स्वाद) जो केवल हमारी इंद्रियों में होते हैं। इस प्रकार, हमारा ज्ञान वस्तुओं के प्रतिनिधित्व पर आधारित है, न कि वस्तुओं पर सीधे।
अथवा
कांट के समीक्षावाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
कांट का समीक्षावाद (Critical Philosophy): इमैनुअल कांट ने ज्ञान की सीमाओं और संभावनाओं की जाँच की। उनके अनुसार, ज्ञान दो स्रोतों से आता है: इंद्रिय अनुभव और मन की श्रेणियाँ (जैसे कारणता, समय, स्थान)। हम वस्तुओं को जैसा वे अपने आप में हैं (noumena) नहीं जान सकते, बल्कि जैसा वे हमें दिखाई देती हैं (phenomena) जान सकते हैं। कांट ने तर्क दिया कि मन निष्क्रिय नहीं है, बल्कि अनुभव को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। यह समीक्षावाद अनुभववाद और तर्कवाद के बीच समन्वय स्थापित करता है।
27. अरस्तू के कारण सिद्धान्त को संक्षेप में समझाइये।
अरस्तू का कारण सिद्धान्त (Theory of Causation): अरस्तू ने चार प्रकार के कारण बताए:
- उपादान कारण (Material Cause): वह पदार्थ जिससे वस्तु बनी है (जैसे मूर्ति के लिए मिट्टी)।
- निमित्त कारण (Efficient Cause): वह शक्ति या एजेंट जो वस्तु को बनाता है (जैसे मूर्तिकार)।
- रूप कारण (Formal Cause): वस्तु का आकार या सार (जैसे मूर्ति का डिज़ाइन)।
- अंतिम कारण (Final Cause): वस्तु का उद्देश्य या लक्ष्य (जैसे मूर्ति का सौंदर्य या पूजा)।
अरस्तू के अनुसार, किसी भी वस्तु को पूरी तरह समझने के लिए इन चारों कारणों का ज्ञान आवश्यक है।
अथवा
कारणता के अनुलाग सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
कारणता का अनुलाग सिद्धान्त (Entailment Theory of Causation): यह सिद्धान्त कहता है कि कारण और कार्य के बीच तार्किक अनिवार्यता (logical necessity) का संबंध होता है। अर्थात, यदि कारण घटित होता है, तो कार्य का घटित होना अनिवार्य है। यह दृष्टिकोण डेविड ह्यूम के अनुभववादी दृष्टिकोण के विपरीत है, जो कारणता को केवल नियमित संयोग मानता है। अनुलाग सिद्धान्त के अनुसार, कारण और कार्य के बीच एक आंतरिक, तार्किक संबंध होता है, जो उन्हें अविभाज्य बनाता है।
28. लाइबनित्ज मन-देह समस्या का क्या समाधान सुझाते हैं? समझाइये।
लाइबनित्ज का समाधान: पूर्व-स्थापित सामंजस्य (Pre-established Harmony): लाइबनित्ज के अनुसार, मन और शरीर दो अलग-अलग पदार्थ हैं जो एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते। उन्होंने सुझाव दिया कि ईश्वर ने सृष्टि की शुरुआत में ही मन और शरीर की गतिविधियों को इस प्रकार समन्वित किया कि वे एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में कार्य करें। जैसे दो घड़ियाँ जो एक ही समय दिखाती हैं, बिना एक-दूसरे को प्रभावित किए। इस प्रकार, मन में विचार और शरीर में गति एक साथ घटित होते हैं, लेकिन उनके बीच कोई कारणात्मक संबंध नहीं है; यह ईश्वर द्वारा पूर्व-स्थापित सामंजस्य का परिणाम है।
अथवा
क्या जगत की व्यवस्था, ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है? तर्क दीजिए।
हाँ, जगत की व्यवस्था ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है (टेलिओलॉजिकल आर्गुमेंट): यह तर्क कहता है कि ब्रह्मांड में इतनी सुव्यवस्था, उद्देश्य और जटिलता है कि यह किसी बुद्धिमान रचयिता के बिना संभव नहीं है। जैसे एक घड़ी को बनाने के लिए एक घड़ीसाज़ की आवश्यकता होती है, वैसे ही ब्रह्मांड की व्यवस्था के लिए एक ईश्वर की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी का सूर्य से उचित दूरी पर होना, जल चक्र, और जीवों की जटिल संरचना सभी एक योजना और उद्देश्य को दर्शाते हैं। इसलिए, जगत की व्यवस्था ईश्वर के अस्तित्व का एक मजबूत प्रमाण है।
नहीं, यह प्रमाण पर्याप्त नहीं है (आलोचना): डेविड ह्यूम और अन्य दार्शनिकों ने तर्क दिया कि ब्रह्मांड की व्यवस्था को प्राकृतिक नियमों या संयोग से भी समझाया जा सकता है। सादृश्य (analogy) पूरी तरह से सही नहीं है, क्योंकि ब्रह्मांड एक घड़ी से कहीं अधिक जटिल है। इसके अलावा, यदि ब्रह्मांड में बुराई और अव्यवस्था भी है, तो यह एक सर्वशक्तिमान और सर्वकल्याणकारी ईश्वर के विचार के विपरीत है। अतः, यह तर्क ईश्वर के अस्तित्व को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं करता।
29. क्या ईश्वर का अस्तित्व किसी युक्ति द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है ? विवेचन कीजिए ।
अथवा
मन-देह के संबंध की समस्या क्या है ? समझाइये ।
Can the existence of God be proved by any argument ? Discuss.
OR
What is the problem of mind-body relation ? Explain.
Solution (for first option): The existence of God has been debated through various arguments such as the cosmological, teleological, and ontological arguments. The cosmological argument posits that everything has a cause, leading to a first cause (God). The teleological argument points to design and order in the universe, implying a designer. The ontological argument argues that the concept of a perfect being necessitates existence. However, critics like David Hume and Immanuel Kant have challenged these arguments, suggesting that they rely on assumptions not empirically verifiable. Thus, while arguments exist, they are not universally accepted as conclusive proof.
Solution (for second option): The mind-body problem concerns the relationship between mental phenomena (thoughts, consciousness) and physical states (brain processes). Key theories include dualism (mind and body are separate substances), materialism (mind is a product of brain activity), and idealism (reality is fundamentally mental). The problem arises from explaining how non-physical mind can interact with physical body, leading to debates about causality and the nature of consciousness.
30. क्या भौतिक व आध्यात्मिक पर्यावरण के मध्य कोई संबंध है ? विवेचन कीजिए ।
अथवा
शिक्षा-दर्शन से आप क्या समझते हैं ? व्याख्या कीजिए ।
Is there any relation between physical and spiritual environment ? Discuss.
OR
What do you understand by philosophy of Education ? Explain.
Solution (for first option): Yes, there is a significant relation between physical and spiritual environment. The physical environment (nature, surroundings) can influence spiritual well-being by providing peace, inspiration, and a sense of connection. Conversely, spiritual practices (meditation, mindfulness) can shape how individuals perceive and interact with their physical surroundings. Many philosophies, such as those in Eastern traditions, emphasize harmony between the two, suggesting that a balanced environment supports holistic development.
Solution (for second option): Philosophy of Education is the study of the purpose, nature, and ideals of education. It examines questions like: What should be taught? How should learning occur? What is the role of the teacher? It draws from branches of philosophy (metaphysics, epistemology, ethics) to guide educational practices. For example, idealism emphasizes moral and spiritual development, while pragmatism focuses on experiential learning. It helps in shaping curricula, teaching methods, and educational policies.
SS—85—Philosophy (Supp.) [SS - 485]