RBSE Class 12th 2013 Hindi Sahitya-SS-21-2013 Previous Year Papers
Hindi Sahitya-SS-21-2013 from the 2013 exam year is part of the Class 12th previous year papers archive on RBSE Solution. Many learners start here after finishing the textbook to see how questions were actually framed on the Rajasthan Board of Secondary Education (RBSE) paper.
Treat this question paper as a mock under gentle timing first, then as a marking exercise the second time. The introduction on this page is written only for this subject-and-year pair, not copied from other pages.
Bookmark the link if you coach juniors — the layout stays stable for search engines and classroom sharing.
Paper details
Quick reference for this previous year papers page — confirm board, class, and year & subject before you study.
| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2013 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-2013 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
The table summarises this Previous Year Papers resource. Confirm RBSE, Class 12th, year 2013, and subject Hindi Sahitya-SS-21-2013 before studying.
RBSE Solution organises previous year papers so each URL carries chapter-specific guidance — better for students and for search engines than one generic paragraph for the whole class.
How to practise with this question paper
Stage one: read the Hindi Sahitya-SS-21-2013 question paper from 2013 without a timer and highlight command words — explain, prove, calculate, discuss. Stage two: attempt selected questions closed-book. Stage three: compare with solutions or teacher feedback.
Previous Year Papers work best when you log mistakes by topic, not only by question number. That log becomes your revision index before pre-boards.
RBSE Class 12th 2013 Hindi Sahitya-SS-21-2013
Scroll through the Previous Year Papers pages for Hindi Sahitya-SS-21-2013 (2013).
Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-2013 2013 solved Previous Year Question Papers
हिन्दी साहित्य
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आंतरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
- उत्तर यथासम्भव निर्धारित शब्द-सीमा में ही सुपाठ्य लिखें।
नोट : प्रश्नों की संख्या — 4 | मुद्रित पृष्ठ — 7
विषय : हिन्दी साहित्य (SS-540)
परीक्षा : वरिष्ठ माध्यमिक परीक्षा, 2013
खण्ड-अ
1. निम्न पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(उत्तर सीमा 20 से 40 शब्द तक)
मैं तो पंथी बाधाओं का
संघर्षों की राह का,
घने तिमिर में नई किरण का
एक मधुर विश्वास हूँ ।
जब मानव ने सोची
बात नये निर्माण की,
बढ़ा, बढ़ी ज्यों-ज्यों सुख-लिप्सा
वैभव की उत्थान की,
मैं रहता हूँ स्वेद से
मनमोहक श्रृंगार कर,
चलता हूँ मैं तूफानों में,
नित दहके अंगार पर,
मझधारा के मतवाले
यौवन से मेरी प्रीत है --
लहर-लहर के उर में तट से
मिलने का उल्लास हूँ ।
घने तिमिर में नई किरण का
एक मधुर विश्वास हूँ ।
(क) संघर्षों की राह का पथिक किन वस्तुओं से अपना श्रृंगार करता है ?
संघर्षों की राह का पथिक अपने पसीने (स्वेद) से अपना श्रृंगार करता है। वह कठिन परिश्रम और संघर्ष को ही अपनी सुंदरता और सजावट मानता है।
(ख) “लिप्सा एवं तिमिर” शब्दों के अर्थ लिखिए ।
- लिप्सा – तीव्र इच्छा, लालच, या अत्यधिक आकांक्षा।
- तिमिर – अंधकार, अज्ञान, या अंधेरा।
(ग) “घने तिमिर में नई किरण का एक मधुर विश्वास हूँ ।” पंक्ति के भाव-सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए ।
इस पंक्ति में कवि कहता है कि वह घने अंधकार (तिमिर) में एक नई किरण के रूप में मधुर विश्वास है। भाव-सौन्दर्य यह है कि जहाँ चारों ओर निराशा और अज्ञान का अंधकार छाया हो, वहाँ कवि आशा और ज्ञान की एक नई रोशनी का प्रतीक है। यह आशावादी दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो कठिनाइयों में भी उम्मीद जगाता है।
(घ) काव्यांश में किससे प्रीत का वर्णन किया गया है ?
काव्यांश में कवि की प्रीत (प्रेम) मझधारा के मतवाले यौवन से वर्णित की गई है। यह यौवन जीवन की चुनौतियों और उत्साह का प्रतीक है।
(ड) “तूफानों एवं दहके अंगार पर चलने” से क्या तात्पर्य है ?
“तूफानों में चलने” का तात्पर्य जीवन की कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने से है। “दहके अंगार पर चलने” का अर्थ है खतरनाक और जलती हुई स्थितियों में भी निर्भय होकर आगे बढ़ना। यह साहस और दृढ़ता का प्रतीक है।
2. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(उत्तर सीमा 20 से 40 शब्द तक)
जिस विद्यार्थी ने समय की कीमत समझ ली, वह सफलता को अवश्य प्राप्त करता है। प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी दिनचर्या का समय-सारिणी अथवा तालिका बनाकर उसका पूरी दृढ़ता से पालन करना चाहिए।
जिस विद्यार्थी ने समय का सही उपयोग करना सीख लिया, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो किसी कार्य के पूरा न होने पर समय की दुहाई दिया करते हैं। वास्तव में सच्चाई इसके विपरीत होती है। अपनी अकर्मण्यता और आलस्य को वे समय की कमी के बहाने छिपाते हैं। कुछ लोगों को अकर्मण्य रहकर समय की कमी का बहाना बताना अच्छा लगता है। ऐसे लोग केवल बातूनी होते हैं। दुनिया के सफलतम व्यक्तियों ने सदैव व्यस्तता में जीवन बिताया है। उनकी सफलता का रहस्य समय का सदुपयोग रहा है।
दुनिया में अथवा प्रकृति में हर वस्तु का समय निश्चित है। समय बीत जाने पर कार्य फलदायक नहीं रहता। सूरज यदि समय पर उदय होना व अस्त होना बंद कर दे, वर्षा यदि समय पर न हो, किसान समय पर अनाज न बोए तो कैसी स्थिति हो जाएगी? ठीक इसी प्रकार यदि विद्यार्थी समय की कीमत नहीं समझेगा तो वह सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। केवल परीक्षा के समय ही विद्यार्थी परिश्रम करेगा और शेष दिन आराम करेगा तो उसे वांछित सफलता नहीं मिल सकती।
(क) गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
उत्तर: समय का सदुपयोग / समय की कीमत
(ख) “अकर्मण्य” शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए।
उत्तर: “अकर्मण्य” का अर्थ है – काम न करने वाला, आलसी, निष्क्रिय।
वाक्य प्रयोग: अकर्मण्य व्यक्ति कभी भी जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
(ग) दुनिया के सफलतम व्यक्तियों की जीवन-शैली की विशेषता लिखिए।
उत्तर: दुनिया के सफलतम व्यक्तियों ने सदैव व्यस्तता में जीवन बिताया है। उनकी सफलता का रहस्य समय का सदुपयोग रहा है। वे हर पल का सदुपयोग करते हैं और आलस्य से दूर रहते हैं।
(घ) “दिनचर्या” बनाकर उसके अनुसार कार्य करने के क्या-क्या लाभ हो सकते हैं? लिखिए।
उत्तर: दिनचर्या बनाकर कार्य करने से समय का सदुपयोग होता है, कार्यों में अनुशासन आता है, आलस्य दूर होता है, और सभी कार्य समय पर पूरे होते हैं। इससे विद्यार्थी को सफलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
(ङ) “समय बीत जाने पर कार्य फलदायक नहीं होता” इस अर्थ को व्यक्त करने वाली एक कहावत लिखिए।
उत्तर: “समय बीत जाने पर कार्य फलदायक नहीं होता” इस अर्थ को व्यक्त करने वाली कहावत है – “समय पर बोया अनाज ही फलता है।” या “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।”
खण्ड-ब
3. किसी एक विषय पर लगभग 450 शब्दों में निबंध लिखिए : 8
- शिक्षा का उद्देश्य : व्यक्ति निर्माण एवं चरित्र निर्माण
- हिन्दी भाषा राष्ट्र की अस्मिता की अभिव्यक्ति है
- सूचना का अधिकार : लाभ व सीमाएँ
- राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका
4. प्रधानाचार्य, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, शिवनगर की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी, मुरैना को विद्यालय में रिक्त चल रहे विज्ञान एवं अंग्रेजी विषय के शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था करने हेतु कार्यालयी पत्र लिखिए । 4
अथवा
आयुक्त, नगर परिषद्, रामनगर की ओर से “प्रशासन शहरों के संग” अभियान के अन्तर्गत आयोज्य शिविर एवं किए जाने वाले कार्यों की पूर्ण जानकारी आमजन तक पहुँचाने हेतु एक प्रेस विज्ञप्ति का प्रारूप लिखिए ।
5. निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 20 - 25 शब्दों में लिखिए :
-
(क) समाचार लेखन में 'इण्ट्रो' से क्या आशय है ?
समाचार लेखन में 'इण्ट्रो' से आशय समाचार के प्रारंभिक भाग से है, जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और पाठक का ध्यान आकर्षित करता है।
-
(ख) संपादकीय लेख एवं फीचर के अन्तर को स्पष्ट कीजिए ।
संपादकीय लेख किसी समस्या पर अखबार का आधिकारिक मत प्रस्तुत करता है, जबकि फीचर मानवीय रुचि के विषयों पर विस्तृत, रोचक और विश्लेषणात्मक लेख होता है।
-
(ग) “स्तंभ लेखन' किसे कहते हैं ?
स्तंभ लेखन वह नियमित लेखन है जिसमें लेखक किसी विशेष विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो समाचार पत्र के एक निश्चित स्तंभ में प्रकाशित होता है।
-
(घ) हिन्दी नेट संसार का संक्षिप्त परिचय दीजिए ।
हिन्दी नेट संसार इंटरनेट पर हिन्दी भाषा की उपस्थिति को दर्शाता है, जिसमें हिन्दी वेबसाइटें, ब्लॉग, सोशल मीडिया, ई-पुस्तकें और डिजिटल मीडिया शामिल हैं, जो हिन्दी के वैश्विक प्रसार में सहायक हैं।
6. कहानी के बुनियादी तत्त्वों को लिखते हुए क्लाइमेक्स को स्पष्ट कीजिए । ( उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द ) 4
कहानी के बुनियादी तत्त्व हैं: कथानक, पात्र, संवाद, देशकाल, वातावरण, दृष्टिकोण और शैली। क्लाइमेक्स कहानी का वह उच्चतम बिंदु है जहाँ संघर्ष अपने चरम पर पहुँचता है और निर्णायक मोड़ आता है।
प्रश्न 7. निम्न में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द)
यदि हम किसी तरह युधिष्ठिर जैसा संकल्प पा जाते हैं
तो एक दिन पता नहीं क्या सोचकर रुक ही जाता है सत्य
लेकिन पलटकर सिर्फ खड़ा ही रहता है वह दृढ़ निश्चयी
अपनी कहीं और देखती दृष्टि से हमारी आँखों में देखता हुआ
अंतिम बार देखता-सा लगता है वह हमें
और उसमें से उसी का हलका सा प्रकाश जैसा आकार
समा जाता है हममें |
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियाँ 'युधिष्ठिर का संकल्प' कविता से ली गई हैं। कवि कहता है कि यदि हम युधिष्ठिर जैसा दृढ़ संकल्प कर लें, तो सत्य स्वयं हमारे सामने आकर रुक जाता है, पर वह हमें अंतिम बार देखकर अपने प्रकाश को हममें समाहित कर देता है।
अथवा
एक बार फिरि आवौ |
उर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ ॥
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज वार वार चुचुकारे ।
क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले ! ते अब निपट बिसारे ॥
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे ।
तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे हग कमल हिममारे ॥
सुनहु पथिक ! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेशो ।
तुलसी मोहिं और सबहिन ते इन्हको बड़ो अंदेसो ॥
सप्रसंग व्याख्या: ये पंक्तियाँ तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' से ली गई हैं। इसमें माता कैकेयी राम के वन जाने पर शोकाकुल होकर कहती हैं कि हे पथिक! यदि राम से वन में मिलना हो, तो उनसे कहना कि मुझे सबसे अधिक चिंता भरत की है, जो दिन-प्रतिदिन मुरझा रहे हैं।
प्रश्न 8. निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए :
(क) वह लता वहीं की, जहाँ कली
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूँदे वर महामरण
भाव-सौन्दर्य: इन पंक्तियों में जीवन और मृत्यु के सहज संबंध को दर्शाया गया है। लता जहाँ पली-बढ़ी, उसी भूमि पर अंत में समा जाती है। यह जीवन की नश्वरता और प्रकृति के साथ एकात्मता का भाव व्यक्त करता है। मृत्यु को 'महामरण' कहकर उसे महान और स्वाभाविक बताया गया है।
(@) अघ ओधघ की बेरी कटी विकटी निकटी प्रकटी गुरु ज्ञान-गटी ।
अघ ओधघ की बेरी कटी विकटी निकटी प्रकटी गुरु ज्ञान-गटी ।
चहूँ ओरनि नाचति मुक्तिनटी गुन धूरजटी वन पंचबटी ॥
शिल्प-सौन्दर्य: इन पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। 'कटी विकटी निकटी प्रकटी' में 'टी' की आवृत्ति से ध्वनि-सौंदर्य बढ़ा है। 'गुरु ज्ञान-गटी' और 'मुक्तिनटी' में रूपक अलंकार है। लयात्मकता और शब्द-चयन अत्यंत प्रभावशाली है, जो भक्ति रस को उजागर करता है।
खण्ड-स
निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए:
(क) “यह दीप अकेला' कविता में व्यष्टि एवं समष्टि के संतुलन को आवश्यक माना गया है। क्यों? स्पष्ट करें। (2 अंक)
कविता में व्यष्टि (व्यक्ति) और समष्टि (समाज) के संतुलन को इसलिए आवश्यक माना गया है क्योंकि अकेला दीप अंधकार को दूर नहीं कर सकता। व्यक्ति का अस्तित्व समाज के सहयोग से ही सार्थक होता है। अतः दोनों का संतुलन जीवन को प्रकाशित करने के लिए अनिवार्य है।
(ख) “तोड़ो तोड़ो तोड़ो / ये ऊसर बंजर तोड़ो / ये चरती परती तोड़ो” पंक्तियों के प्रतीकार्थ लिखिए। (2 अंक)
इन पंक्तियों में 'ऊसर बंजर' और 'चरती परती' पुरानी, रूढ़ एवं अनुपयोगी परंपराओं, विचारों और सामाजिक बुराइयों के प्रतीक हैं। 'तोड़ो' का आवाहन इन बंधनों को नष्ट कर नवनिर्माण की प्रेरणा देता है। यह क्रांति और परिवर्तन का संदेश है।
खण्ड-द
निम्न गद्यांशों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए: (उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द) (7 अंक)
गद्यांश 1:
संध्या समय मुख्य बाजार घूमने गया। बड़ी भीड़-भाड़ थी। विशेषता यह थी कि भीड़ में नंगे बदन लोग बहुत बड़ी संख्या में थे। काला बदन, उस पर यज्ञोपवीत, मोटी तोंद, तहमद बाँधे, सिर से टोपी और पैर से जूता नदारद। साधारण स्निग्ध बातचीत करने में इतनी ज़ोर से बोलते थे जैसे लड़ रहे हों। यह दृश्य मेरे लिए बिलकुल नया था।
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने संध्या के समय बाजार में देखे गए एक विचित्र दृश्य का वर्णन किया है। भीड़ में अधिकतर लोग नंगे बदन थे, काले शरीर पर यज्ञोपवीत, मोटी तोंद और तहमद बाँधे हुए थे। वे बहुत ज़ोर से बात कर रहे थे। यह दृश्य लेखक के लिए नया और अद्भुत था।
अथवा
गद्यांश 2:
दुरंत जीवन-शक्ति है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो ज़िंदगी में, मन ढाल दो जीवन रस के उपकरणों में। ठीक है। लेकिन क्यों? क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है? सारा संसार मतलब के लिए ही तो जी रहा है। याज्ञवल्क्य बहुत बड़े ब्रह्मवादी ऋषि थे। उन्होंने अपनी पत्नी को विचित्र भाव से समझाने की कोशिश की कि सब कुछ स्वार्थ के लिए है। पुत्र के लिए पुत्र प्रिय नहीं होता, पत्नी के लिए पत्नी प्रिया नहीं होती -- सब अपने मतलब के लिए होते हैं -- 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति'। विचित्र नहीं है यह तर्क? संसार में जहाँ कहीं प्रेम है, सब मतलब के लिए। पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है। सुनके हैरानी होती है। दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है -- है केवल प्रचंड स्वार्थ।
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में लेखक जीवन की जटिलता और स्वार्थ के प्रश्न पर विचार करता है। वह याज्ञवल्क्य के इस कथन का उल्लेख करता है कि सब कुछ आत्मा के लिए प्रिय है, अर्थात् सारा प्रेम स्वार्थ पर आधारित है। लेखक इस तर्क को विचित्र मानता है और पश्चिमी विचारकों हॉब्स और हेल्वेशियस के समान दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए आश्चर्य व्यक्त करता है कि संसार में केवल प्रचंड स्वार्थ ही शेष है।
खण्ड-अ
11. निम्न में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लिखिए : (उत्तर सीमा लगभग 50 शब्द) 2×2=4
(क) संवदिया के बारे में गाँव के लोगों की क्या धारणा थी?
गाँव के लोग संवदिया को एक अशुभ और अपशकुन व्यक्ति मानते थे। उनकी धारणा थी कि संवदिया जहाँ भी जाता है, वहाँ दुख और मृत्यु का संदेश लेकर जाता है। लोग उससे दूर रहते थे और उसे अकेला छोड़ देते थे, क्योंकि वह हमेशा बुरी खबरें लाता था।
(ख) “चार हाथ' लघु कहानी शोषण पर आधारित व्यवस्था का परदाफ़ाश करती है। स्पष्ट कीजिए।
“चार हाथ' कहानी समाज में व्याप्त शोषणकारी व्यवस्था को उजागर करती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे गरीब और कमजोर लोगों का शोषण किया जाता है। कहानी में पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि शोषण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक भी होता है, जो व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
(ग) विकास का यह 'उजला' पहलू अपने पीछे कितने व्यापक पैमाने पर विनाश का अंधेरा लेकर आया था। “जहाँ कोई वापसी नहीं' पाठ के आधार पर इस कथन में निहित पीड़ा को स्पष्ट कीजिए।
इस कथन में विकास के नाम पर होने वाले विनाश की गहरी पीड़ा व्यक्त की गई है। “जहाँ कोई वापसी नहीं' पाठ में दिखाया गया है कि विकास की चकाचौंध में प्रकृति और मानवीय संबंधों का कितना बड़ा विनाश हुआ। यह विकास अपने साथ पर्यावरणीय असंतुलन, सामाजिक विस्थापन और सांस्कृतिक क्षति लेकर आया, जिससे लोगों को अपनी जड़ों से कटना पड़ा।
2. विद्यापति या भीष्म साहनी का साहित्यिक परिचय लगभग 100 शब्दों में लिखिए। 4
विद्यापति का साहित्यिक परिचय: विद्यापति (1352-1448) मैथिली और संस्कृत के महान कवि थे। उन्हें 'मैथिली कोकिल' कहा जाता है। उनकी रचनाओं में 'कीर्तिलता', 'कीर्तिपताका', और 'पदावली' प्रमुख हैं। उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम को अत्यंत मार्मिकता से चित्रित किया। उनकी भाषा में मिठास और भावनाओं की गहराई है। वे भक्ति काल के प्रमुख कवि माने जाते हैं।
भीष्म साहनी का साहित्यिक परिचय: भीष्म साहनी (1915-2003) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'तमस', 'बसंती', 'मध्यांतर' और 'कड़ियाँ' शामिल हैं। 'तमस' उपन्यास पर फिल्म भी बनी। उन्होंने विभाजन की त्रासदी, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में उकेरा। उनकी भाषा सरल और प्रभावशाली है।
खण्ड-य
3. निम्न प्रश्नों में से किन्हीं चार के उत्तर लगभग 50 शब्दों में लिखिए : 2×4=8
(क) “सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाज़ी-पर-बाज़ी जीतते हैं, चोट-पर-चोट खाते हैं, धक्के-पर-धक्के सहते हैं पर मैदान में डटे रहते हैं।'' इस कथन के आधार पर सूरदास की मनःस्थिति में आए बदलाव को स्पष्ट कीजिए।
इस कथन से सूरदास की मनःस्थिति में आए बदलाव का पता चलता है। पहले सूरदास निराश और दुखी थे, लेकिन बाद में उन्होंने जीवन को एक खेल की तरह स्वीकार किया। वे चोटें खाकर भी डटे रहे और हार नहीं मानी। उन्होंने सीखा कि सच्चा खिलाड़ी विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करता रहता है और अंततः सफल होता है।
(ख) “अजीब होते हैं ये पहाड़ी लोग।” यह कथन किसके द्वारा किस प्रसंग में कहा गया है?
यह कथन 'आरोहण' कहानी में लेखक द्वारा कहा गया है। प्रसंग यह है कि जब लेखक पहाड़ी लोगों के व्यवहार को देखता है तो उन्हें अजीब लगता है। पहाड़ी लोग अपनी सादगी, साहस और अलग जीवनशैली के कारण मैदानी लोगों से भिन्न होते हैं। लेखक उनकी इस विशेषता पर आश्चर्य व्यक्त करता है।
(ग) “बिस्कोहर की माटी' आत्मकथांश में विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रकृति की सतरंगी छटा का मनोरम चित्रण किया है।” स्पष्ट करें।
“बिस्कोहर की माटी' में विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रकृति के विविध रंगों का सुंदर वर्णन किया है। उन्होंने बिस्कोहर गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य को शब्दों में पिरोया है। वहाँ के हरे-भरे खेत, नदियाँ, पहाड़ और जंगल सभी का चित्रण इतना जीवंत है कि पाठक मानो उस वातावरण में खो जाता है। प्रकृति की सतरंगी छटा उनके लेखन में स्पष्ट झलकती है।
(घ) “अपना मालवा खाऊ-उजाडू सभ्यता” अध्याय में लेखक ने पर्यावरणीय सरोकारों को आम जनता से जोड़ दिया है। कैसे? स्पष्ट करें।
इस अध्याय में लेखक ने पर्यावरणीय मुद्दों को आम लोगों की दैनिक जिंदगी से जोड़ा है। उन्होंने दिखाया कि कैसे लोग अपने खान-पान और जीवनशैली से पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। लेखक ने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया है, जिससे आम जनता इसे आसानी से समझ सके और अपने जीवन में लागू कर सके।
(ड) “आशा से ज्यादा दीर्घजीवी कोई वस्तु नहीं होती।” ऐसा क्यों कहा गया है? स्पष्ट करें।
यह कथन इसलिए कहा गया है क्योंकि आशा मनुष्य को जीवन भर साथ देती है। चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों, आशा कभी खत्म नहीं होती। यह मनुष्य को संघर्ष करने की शक्ति देती है और उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। आशा ही है जो मनुष्य को निराशा के अंधकार में भी उजाला दिखाती है और उसे जीवित रखती है।
4. “आरोहण' कहानी के आधार पर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन का वर्णन कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द) 6
पर्वतीय लोग सादा जीवन जीते हैं, कठोर परिश्रम करते हैं, प्रकृति के करीब रहते हैं और आपसी सहयोग से अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं।