RBSE Class 12th 2013 Philosophy-SS-85-2013 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2013
Subject Philosophy-SS-85-2013
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2013 2013 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2013
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2013

दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY

समय : 3 घण्टे

पूर्णांक : 80


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें ।
    Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily.
  2. सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं ।
    All the questions are compulsory.
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें ।
    Write the answer to each question in the given answer-book only.
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें ।
    For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity.
  5. प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें ।
    If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.

SS—85—Philosophy [SS - 60] | [ Turn over

खण्ड प्रश्न संख्या अंक प्रत्येक प्रश्न उत्तर की शब्द सीमा

खण्ड प्रश्न संख्या अंक प्रत्येक प्रश्न उत्तर की शब्द सीमा
1-10 1 20 शब्द
11-20 2 50 शब्द
21-30 5 100-150 शब्द

Section Question Nos. Marks per question Word limit of answer

Section Question Nos. Marks per question Word limit of answer
A 1-10 1 20 words
B 11-20 2 50 words
C 21-30 5 100-150 words

प्रश्न संख्या 21 से 30 तक में आंतरिक विकल्प हैं।

There are internal choices for Q. Nos. 21 to 30.


SECTION - A

निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये :

Define each of the following :

  1. धर्म (Dharm)

    धर्म का अर्थ है वह मार्ग या सिद्धांत जो व्यक्ति को सत्य, न्याय और कर्तव्य की ओर ले जाता है। यह व्यक्ति के आचरण और नैतिकता का आधार है।

  2. स्थित प्रज्ञ (Sthita Pragya)

    स्थित प्रज्ञ का अर्थ है वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर और अविचलित हो। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि में समान रहता है और आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में होता है।

  3. दुःख निरोध (Dukh Nirodh)

    दुःख निरोध का अर्थ है दुःख का पूर्ण रूप से समाप्त हो जाना। यह बौद्ध दर्शन में आर्य सत्यों में से चौथा सत्य है, जो निर्वाण की स्थिति को दर्शाता है।

  4. पुरुष (सांख्य) (Purusha - Samkhya)

    सांख्य दर्शन में पुरुष चेतन तत्व है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव का होता है। यह प्रकृति से भिन्न है और साक्षी मात्र है।

  5. सगुण ब्रह्म (Saguna Brahman)

    सगुण ब्रह्म वह ब्रह्म है जिसमें गुण, रूप और आकार होते हैं। यह ईश्वर के रूप में पूजा जाता है और भक्ति मार्ग का आधार है।

  6. बुद्धिवाद (Rationalism)

    बुद्धिवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो ज्ञान प्राप्ति में तर्क और बुद्धि को प्रमुख मानता है। यह अनुभववाद के विपरीत है और मानता है कि सत्य तर्क से जाना जा सकता है।

SS—85—Philosophy [SS - 60]

खण्ड-ब / SECTION - B

  1. पुरुषार्थ के विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में समझाइये।
    Explain the different kinds of Purusarthas in brief.

    पुरुषार्थ चार प्रकार के होते हैं: धर्म (righteousness), अर्थ (wealth), काम (desire/pleasure), और मोक्ष (liberation)। धर्म से तात्पर्य नैतिक और सामाजिक कर्तव्यों का पालन करना है। अर्थ का अर्थ है जीवन निर्वाह के लिए धन और संसाधनों का उपार्जन। काम का अर्थ है वैध इच्छाओं और भोगों की पूर्ति। मोक्ष सबसे उच्च पुरुषार्थ है, जो आत्मा की मुक्ति और परम सत्य की प्राप्ति है। ये चारों मिलकर मानव जीवन के लक्ष्यों को पूर्ण करते हैं।

  2. गीता में स्वधर्म से क्या आशय है?
    What is the meaning of 'Svadharma' in Gita?

    गीता में स्वधर्म का अर्थ है व्यक्ति का अपना स्वाभाविक कर्तव्य, जो उसकी जाति, वर्ण, और व्यक्तिगत प्रकृति (गुण-कर्म) के अनुसार निर्धारित होता है। यह कर्तव्य निष्काम भाव से, फल की इच्छा के बिना, ईश्वर को समर्पित करके किया जाना चाहिए। स्वधर्म का पालन करना परधर्म (दूसरे के कर्तव्य) से श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह आत्मिक विकास और समाज के कल्याण में सहायक होता है।

  3. बुद्ध के 'अनात्मवाद' के सिद्धान्त को समझाइये।
    Explain Buddha's theory of 'Anatmavada'.

    बुद्ध का अनात्मवाद (अनत्ता) सिद्धांत कहता है कि कोई स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा (आत्मन्) नहीं है। व्यक्ति पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का एक अस्थायी संयोजन मात्र है। ये स्कंध निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं, इसलिए कोई शाश्वत 'स्व' नहीं है। यह सिद्धांत हिंदू और जैन आत्मवाद का विरोध करता है और निर्वाण प्राप्ति के लिए 'अहंकार' के त्याग पर बल देता है।

  4. न्याय के अनुसार व्याप्ति क्या है?
    What is 'Vyapti' according to Nyaya?

    न्याय दर्शन में व्याप्ति का अर्थ है दो पदार्थों के बीच अविनाभाव संबंध (नियत सहचार)। इसका तात्पर्य है कि जहाँ जहाँ हेतु (कारण) होता है, वहाँ वहाँ साध्य (कार्य) अवश्य होता है। उदाहरण के लिए, 'धूम' और 'अग्नि' के बीच व्याप्ति है—जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है। यह अनुमान प्रमाण का आधार है। व्याप्ति के बिना अनुमान अमान्य होता है।

  5. अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म को 'नेति-नेति' क्यों कहा गया है?
    Why is Brahman called 'Neti-Neti' in Advaita Vedanta?

    अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म को 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह नहीं) इसलिए कहा गया है क्योंकि ब्रह्म सभी सीमित, सापेक्ष और नाम-रूप से परे है। ब्रह्म को किसी भी सकारात्मक विशेषण (जैसे सगुण, साकार) द्वारा पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता। 'नेति-नेति' विधि से सभी उपाधियों और मिथ्या आरोपों का निषेध करके निर्गुण, निराकार ब्रह्म की ओर संकेत किया जाता है। यह उपनिषदों की एक प्रमुख व्याख्या पद्धति है।

  6. लॉक के कथन “मन कोरा कागज है” से क्या तात्पर्य है? समझाइये।
    What is the meaning of Locke's statement 'mind is a tabula rasa'? Explain.

    लॉक के अनुसार, मन जन्म के समय एक कोरे कागज (टैबुला रासा) के समान होता है, जिस पर कोई जन्मजात विचार या सिद्धांत नहीं होते। सारा ज्ञान अनुभव से आता है—या तो संवेदना (बाहरी वस्तुओं से) या चिंतन (मन की आंतरिक क्रियाओं से) के माध्यम से। यह सिद्धांत तर्कवाद (जन्मजात विचारों) का विरोध करता है और अनुभववाद की नींव रखता है। मन धीरे-धीरे अनुभवों से विचारों और ज्ञान का निर्माण करता है।


पिछले प्रश्न (संक्षिप्त उत्तर हेतु)

  1. कारण-कार्य संबन्ध
    Cause-effect relationship

    कारण-कार्य संबंध वह नियमित संबंध है जिसमें एक घटना (कारण) दूसरी घटना (कार्य) को उत्पन्न करती है। न्याय दर्शन में इसे 'असत्कार्यवाद' कहा गया है, जहाँ कार्य कारण में पहले से विद्यमान नहीं होता, बल्कि नवीन उत्पन्न होता है। यह संबंध व्याप्ति पर आधारित है।

  2. ईश्वर के अस्तित्व के लिये सत्तामूलक प्रमाण
    Ontological argument for the existence of God

    सत्तामूलक प्रमाण (Ontological Argument) ईश्वर के अस्तित्व को उसकी परिभाषा से सिद्ध करता है। सेंट एंसल्म के अनुसार, ईश्वर 'सबसे महान सत्ता' है, जिससे बड़ी कोई कल्पना नहीं की जा सकती। यदि वह केवल मन में होता, तो वास्तविकता में भी होने पर वह और महान होता। अतः ईश्वर का वास्तविक अस्तित्व आवश्यक है।

  3. अंतःक्रियावाद
    Interactionism

    अंतःक्रियावाद (Interactionism) मन-शरीर समस्या का एक दृष्टिकोण है, जो मानता है कि मन और शरीर दो अलग-अलग पदार्थ हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। डेकार्टे ने इसे प्रस्तुत किया। उदाहरण: मानसिक इच्छा (मन) शारीरिक क्रिया (शरीर) उत्पन्न करती है, और शारीरिक संवेदना मानसिक अनुभव को जन्म देती है।

  4. वायु प्रदूषण
    Air Pollution

    वायु प्रदूषण का अर्थ है वायुमंडल में हानिकारक पदार्थों (जैसे धुआँ, रसायन, धूल) की उपस्थिति जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती है। यह औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों के धुएँ, और जीवाश्म ईंधन के जलने से होता है। इसके प्रभावों में श्वसन रोग, ग्लोबल वार्मिंग, और अम्ल वर्षा शामिल हैं।

17. कारणता के अनुवर्तिता सिद्धान्त को समझाइये।
Explain the succession theory of Causation.

उत्तर: कारणता का अनुवर्तिता सिद्धान्त (Succession Theory of Causation) डेविड ह्यूम द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार, कारण और कार्य के बीच कोई आवश्यक या आंतरिक संबंध नहीं है, बल्कि केवल नियमित अनुक्रम (regular succession) पाया जाता है। ह्यूम के अनुसार, जब हम दो घटनाओं को बार-बार एक के बाद एक होते देखते हैं, तो हमारे मन में यह आदत बन जाती है कि पहली घटना (कारण) के बाद दूसरी घटना (कार्य) अवश्य होगी। यह संबंध मानसिक आदत पर आधारित है, न कि वस्तुगत आवश्यकता पर।

Explanation: The succession theory of causation was propounded by David Hume. According to this theory, there is no necessary or internal connection between cause and effect, but only a regular succession. Hume argued that when we repeatedly observe two events occurring one after the other, our mind forms a habit that the second event (effect) will always follow the first (cause). This connection is based on mental habit, not on objective necessity.

8. ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिये प्रयोजनमूलक प्रमाण को समझाइये।
Explain the teleological argument to prove the existence of God.

उत्तर: प्रयोजनमूलक प्रमाण (Teleological Argument) को 'डिज़ाइन आर्गुमेंट' भी कहा जाता है। यह प्रमाण बताता है कि संसार में व्याप्त सुव्यवस्था, उद्देश्यपूर्णता और जटिल रचना एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ रचनाकार (ईश्वर) के अस्तित्व को सिद्ध करती है। जिस प्रकार एक घड़ी की जटिल रचना को देखकर हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसे किसी बुद्धिमान घड़ीसाज़ ने बनाया है, उसी प्रकार ब्रह्मांड की अद्भुत व्यवस्था और प्रकृति में पाई जाने वाली उद्देश्यपूर्णता यह सिद्ध करती है कि इसका एक रचनाकार (ईश्वर) है। इस प्रमाण के प्रमुख समर्थक विलियम पैली और थॉमस एक्विनास हैं।

Explanation: The teleological argument, also known as the design argument, states that the order, purpose, and complex design in the universe prove the existence of an omnipotent, omniscient creator (God). Just as the complex design of a watch implies a watchmaker, the wonderful order and purposefulness in nature and the universe imply a divine creator. Major supporters include William Paley and Thomas Aquinas.

9. बर्कले के 'आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद' को समझाइये।
Explain Berkeley's 'Subjective Idealism'.

उत्तर: जॉर्ज बर्कले का आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद (Subjective Idealism) यह सिद्ध करता है कि भौतिक वस्तुओं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। बर्कले के अनुसार, "अस्तित्व का अर्थ ग्रहण किया जाना है" (Esse est percipi)। अर्थात्, किसी वस्तु का अस्तित्व केवल तभी तक है जब तक उसे किसी चेतन मन द्वारा अनुभव किया जा रहा है। भौतिक पदार्थ (matter) का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है; जिसे हम भौतिक वस्तु कहते हैं, वह वास्तव में संवेदनाओं (sensations) का एक समूह मात्र है। बर्कले के अनुसार, वस्तुएँ तब भी अस्तित्व में रहती हैं जब कोई मानव मन उन्हें नहीं देख रहा होता, क्योंकि वे ईश्वर के मन में सदैव विद्यमान रहती हैं।

Explanation: George Berkeley's subjective idealism holds that physical objects have no independent existence. According to Berkeley, "To be is to be perceived" (Esse est percipi). An object exists only as long as it is being perceived by a conscious mind. Matter has no independent existence; what we call a physical object is merely a collection of sensations. Objects continue to exist even when no human mind perceives them because they always exist in the mind of God.

20. वर्तमान में भौतिक पर्यावरण के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? समझाइये।
What are the major challenges in front of physical environment today? Explain.

उत्तर: वर्तमान में भौतिक पर्यावरण के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. जलवायु परिवर्तन (Climate Change): ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और मौसम चक्र बदल रहा है।
  2. प्रदूषण (Pollution): वायु, जल और भूमि प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
  3. जैव विविधता का ह्रास (Loss of Biodiversity): वनों की कटाई और आवास विनाश के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।
  4. प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन (Overexploitation of Natural Resources): जीवाश्म ईंधन, खनिज और जल का अत्यधिक उपयोग संसाधनों को समाप्त कर रहा है।
  5. अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management): प्लास्टिक और अन्य गैर-निम्नीकरणीय कचरे का बढ़ता संकट पर्यावरण के लिए चुनौती है।

Explanation: The major challenges before the physical environment today include: climate change due to greenhouse gas emissions, pollution of air, water and land, loss of biodiversity from deforestation and habitat destruction, overexploitation of natural resources like fossil fuels and water, and the growing crisis of waste management, especially non-biodegradable plastic waste.

SECTION - C

21. भारतीय दर्शन में 'आस्तिक' और 'नास्तिक' पदों के अर्थ को स्पष्ट कीजिये।
Explain the meaning of the terms 'Astika' and 'Nastika' in Indian Philosophy.

उत्तर: भारतीय दर्शन में 'आस्तिक' और 'नास्तिक' शब्दों का प्रयोग वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार या अस्वीकार करने के आधार पर किया जाता है, न कि ईश्वर में विश्वास के आधार पर।

  • आस्तिक (Astika): वे दर्शन जो वेदों को प्रमाण मानते हैं और उनकी सत्ता को स्वीकार करते हैं, आस्तिक कहलाते हैं। इनमें छह प्रमुख दर्शन शामिल हैं: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत।
  • नास्तिक (Nastika): वे दर्शन जो वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करते हैं, नास्तिक कहलाते हैं। इनमें तीन प्रमुख दर्शन शामिल हैं: चार्वाक, बौद्ध और जैन।

Explanation: In Indian philosophy, the terms 'Astika' and 'Nastika' are used based on acceptance or rejection of the authority of the Vedas, not on belief in God. Astika schools (Nyaya, Vaisheshika, Samkhya, Yoga, Mimamsa, Vedanta) accept the Vedas as authoritative. Nastika schools (Charvaka, Buddhism, Jainism) reject the authority of the Vedas.

अथवा / OR

क्या भारतीय दर्शन निराशावादी है? समझाइये।
Is Indian Philosophy pessimistic? Explain.

उत्तर: भारतीय दर्शन को निराशावादी कहना उचित नहीं है। यद्यपि भारतीय दर्शन संसार को दुःखमय मानता है (जैसे बौद्ध दर्शन में 'सब कुछ दुःख है'), लेकिन यह दुःख से मुक्ति (मोक्ष/निर्वाण) का मार्ग भी बताता है। भारतीय दर्शन का अंतिम लक्ष्य आनंद और मुक्ति की प्राप्ति है। वेदांत दर्शन में ब्रह्म को 'सच्चिदानंद' (सत्य, चेतना और आनंद) कहा गया है। इस प्रकार, भारतीय दर्शन दुःख की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए भी अंततः आशावादी है क्योंकि यह दुःख से मुक्ति का निश्चित मार्ग प्रस्तुत करता है।

Explanation: It is not correct to call Indian philosophy pessimistic. Although Indian philosophy considers the world as full of suffering (as in Buddhism's 'everything is suffering'), it also provides a path to liberation (Moksha/Nirvana) from this suffering. The ultimate goal of Indian philosophy is the attainment of bliss and liberation. In Vedanta, Brahman is described as 'Satchidananda' (Truth, Consciousness, and Bliss). Thus, while accepting the reality of suffering, Indian philosophy is ultimately optimistic as it offers a definite path to liberation from suffering.

प्रश्न 22

गीता में लोक-संग्रह का अर्थ बताइये । यह कर्मयोग से किस प्रकार संबंधित है ?

अथवा

क्या गीता युद्ध के लिये प्रेरित करती है ? अपने उत्तर के लिये तर्क दीजिये ।


State the meaning of Lok-Samgraha in Gita. How is it related to ‘Karma Yoga’?

OR

Does Gita motivate for war? Give arguments for your answer.

लोक-संग्रह का अर्थ: गीता में लोक-संग्रह का अर्थ है समाज के कल्याण और व्यवस्था के लिए किए जाने वाले कार्य। यह निःस्वार्थ भाव से, बिना फल की इच्छा के, समाज की भलाई के लिए कर्म करने की प्रेरणा देता है।

कर्मयोग से संबंध: लोक-संग्रह कर्मयोग का ही एक व्यावहारिक रूप है। कर्मयोग में फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्यपालन पर बल दिया जाता है, और लोक-संग्रह इसी कर्तव्यपालन का सामाजिक आयाम है। श्रीकृष्ण स्वयं लोक-संग्रह के लिए कर्म करने का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

अथवा

गीता युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए कर्तव्यपालन पर बल देती है। गीता में युद्ध को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है—यह अधर्म के विरुद्ध धर्म के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। अर्जुन को युद्ध करने की प्रेरणा इसलिए दी गई क्योंकि वह एक क्षत्रिय था और उसका कर्तव्य अन्याय का प्रतिकार करना था। गीता हिंसा का समर्थन नहीं करती, बल्कि निःस्वार्थ भाव से अपने धर्म का पालन करने की शिक्षा देती है।

प्रश्न 23

जैन दर्शन के अनुसार 'सप्तभंगी नय' क्या है ? समझाइये ।

अथवा

बुद्ध दुःख के कारण की व्याख्या कैसे करते हैं ? समझाइये ।


What is 'Saptabhangi Naya', according to Jain philosophy? Explain.

OR

How does Buddha explain the cause of suffering? Discuss.

सप्तभंगी नय: जैन दर्शन में सप्तभंगी नय सापेक्षवाद (अनेकांतवाद) का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसके अनुसार किसी भी वस्तु या सत्य को सात विभिन्न दृष्टिकोणों (भंगों) से समझा जा सकता है। ये सात भंग हैं:

  1. स्याद् अस्ति (किसी दृष्टि से है)
  2. स्याद् नास्ति (किसी दृष्टि से नहीं है)
  3. स्याद् अस्ति नास्ति (किसी दृष्टि से है और नहीं भी है)
  4. स्याद् अवक्तव्य (किसी दृष्टि से अवर्णनीय)
  5. स्याद् अस्ति अवक्तव्य (किसी दृष्टि से है और अवर्णनीय)
  6. स्याद् नास्ति अवक्तव्य (किसी दृष्टि से नहीं है और अवर्णनीय)
  7. स्याद् अस्ति नास्ति अवक्तव्य (किसी दृष्टि से है, नहीं है और अवर्णनीय)

यह सिद्धांत बताता है कि सत्य बहुआयामी है और उसे एक ही दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता।

अथवा

बुद्ध दुःख के कारण की व्याख्या: बुद्ध के अनुसार दुःख का मूल कारण तृष्णा (इच्छा या लालसा) है। यह तृष्णा तीन प्रकार की होती है—काम तृष्णा (इंद्रिय सुखों की इच्छा), भव तृष्णा (जीवन की इच्छा) और विभव तृष्णा (विनाश या मृत्यु की इच्छा)। तृष्णा ही जन्म, जरा, मरण, शोक, दुःख, दौर्मनस्य और उपायास को जन्म देती है। बुद्ध ने दुःख के कारण को समझाने के लिए प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति) का सिद्धांत दिया, जिसमें दुःख की उत्पत्ति की श्रृंखला को बारह अंगों में समझाया गया है।

प्रश्न 24

वैशेषिक दर्शन के अनुसार अभाव को समझाइये ।

अथवा

सांख्य के अनुसार प्रकृति के स्वरूप को समझाइये ।


Explain Abhava according to Vaiseshika philosophy.

OR

Explain the nature of Prakriti according to Samkhya.

वैशेषिक दर्शन में अभाव: वैशेषिक दर्शन के अनुसार अभाव (अनुपस्थिति) को एक स्वतंत्र पदार्थ माना गया है। अभाव दो प्रकार का होता है:

  • संसर्गाभाव: जब दो वस्तुओं का संबंध नहीं होता, जैसे—घर में घट का न होना।
  • अन्योन्याभाव: एक वस्तु का दूसरी वस्तु से भिन्न होना, जैसे—घट पट से भिन्न है।

अभाव को ज्ञान का विषय माना गया है और यह सात पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव) में से एक है। अभाव का बोध नकारात्मक रूप में होता है, किंतु यह वास्तविक है।

अथवा

सांख्य के अनुसार प्रकृति का स्वरूप: सांख्य दर्शन में प्रकृति को जड़ जगत का मूल कारण माना गया है। प्रकृति के तीन प्रमुख गुण हैं—सत्त्व (सात्विकता, प्रकाश), रजस (गतिशीलता, क्रिया) और तमस (जड़ता, अंधकार)। प्रकृति नित्य, अव्यक्त, अचेतन और सृजनशील है। यह तीनों गुणों के साम्यावस्था में रहती है और जब यह संतुलन बिगड़ता है, तब सृष्टि की उत्पत्ति होती है। प्रकृति से ही महत् (बुद्धि), अहंकार, पंच तन्मात्राएँ, इंद्रियाँ और पंच महाभूत उत्पन्न होते हैं। प्रकृति पुरुष (चेतन तत्व) के निकट होकर ही सक्रिय होती है, अन्यथा वह निष्क्रिय रहती है।

प्रश्न 25

प्रश्न: अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म व जीव परस्पर किस प्रकार सम्बन्धित हैं ? व्याख्या कीजिये ।

अथवा

अद्वैत वेदान्त में माया के स्वरूप को समझाइये ।

English: How are Brahman and Jiva interrelated in Advaita Vedanta? Discuss.

OR

Explain the nature of Maya in Advaita Vedanta.

उत्तर (अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म-जीव सम्बन्ध): अद्वैत वेदान्त के अनुसार ब्रह्म और जीव में कोई वास्तविक भेद नहीं है। ब्रह्म एकमात्र सत्य है, और जीव उसी ब्रह्म का एक अंश या प्रतिबिम्ब है। अज्ञान (माया) के कारण जीव स्वयं को ब्रह्म से भिन्न मानता है, परन्तु वास्तव में जीव और ब्रह्म अभिन्न हैं। ज्ञान प्राप्त करने पर यह भेद मिट जाता है और जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है।

अथवा (माया का स्वरूप): अद्वैत वेदान्त में माया को अनिर्वचनीय (जिसे सत् या असत् नहीं कहा जा सकता) माना गया है। माया ब्रह्म की शक्ति है जो जगत् के रूप में प्रकट होती है। यह अविद्या (अज्ञान) का कारण है, जिसके कारण ब्रह्म में जीव और जगत् का भ्रम उत्पन्न होता है। माया न तो सत्य है (क्योंकि ज्ञान होने पर यह मिट जाती है) और न असत्य (क्योंकि व्यावहारिक स्तर पर इसका अस्तित्व प्रतीत होता है)।

प्रश्न 26

प्रश्न: डेकार्टे के कथन 'मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ' की व्याख्या कीजिये ।

अथवा

लॉक के दर्शन में 'संवेदन' और 'अनुचिन्तन' का क्या महत्व है ?

English: Discuss Descartes' statement "I think therefore I am".

OR

What is the importance of 'sensation' and 'reflection' in Locke's philosophy?

उत्तर (डेकार्टे का कथन): डेकार्टे ने संशयवादी पद्धति से सभी ज्ञान पर संदेह किया, परन्तु यह पाया कि संदेह करने की क्रिया स्वयं एक चिंतन है। इस चिंतन के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। अतः उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" (Cogito ergo sum)। यह उनके दर्शन का प्रथम सिद्धांत है, जो आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करता है और आगे के ज्ञान का आधार बनता है।

अथवा (लॉक में संवेदन और अनुचिन्तन): लॉक के अनुसार मानव मन जन्म के समय कोरी तख्ती (Tabula Rasa) होता है। सभी ज्ञान अनुभव से आता है, जो दो स्रोतों से प्राप्त होता है: (1) संवेदन (Sensation): बाहरी वस्तुओं से इंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव, जैसे रंग, स्वाद, स्पर्श। (2) अनुचिन्तन (Reflection): मन की अपनी आंतरिक क्रियाओं (जैसे सोचना, संदेह करना, इच्छा करना) का अवलोकन। ये दोनों मिलकर सभी विचारों और ज्ञान का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 27

प्रश्न: अरस्तू के अन्तिम कारण के संप्रत्यय को स्पष्ट कीजिये ।

अथवा

कारण-कार्य सम्बन्ध के विषय में ह्यम के विचारों को समझाइये ।

English: Explain Aristotle's concept of 'Final cause'.

OR

Explain Hume's ideas on cause-effect relationship.

उत्तर (अरस्तू का अन्तिम कारण): अरस्तू ने चार कारण बताए: उपादान कारण (Material cause), निमित्त कारण (Efficient cause), आकार कारण (Formal cause), और अन्तिम कारण (Final cause)। अन्तिम कारण किसी वस्तु के अस्तित्व का उद्देश्य या लक्ष्य है। उदाहरण के लिए, बीज का अन्तिम कारण पेड़ बनना है। अरस्तू के अनुसार प्रत्येक वस्तु अपने अन्तिम कारण (Telos) की ओर अग्रसर होती है, जो उसकी पूर्णता और विकास का कारण है।

अथवा (ह्यम के विचार): ह्यम ने कारण-कार्य सम्बन्ध को आवश्यक नहीं माना। उनके अनुसार हम केवल दो घटनाओं के बीच नियमित संयोग (constant conjunction) देखते हैं, जैसे आग और गर्मी। हम यह नहीं देख सकते कि एक घटना दूसरी को उत्पन्न करती है। कारण-कार्य का सम्बन्ध मन की आदत (habit) या विश्वास (belief) पर आधारित है, न कि तार्किक आवश्यकता पर। अतः ह्यम ने कार्य-कारण सिद्धांत को अनुभवजन्य रूप से अप्रमाणित माना।

खण्ड – 4

प्रश्न 28.

क्या विश्वसृजनमूलक प्रमाण से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है ? तर्क दीजिए ।

अथवा

ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए किस युक्ति को आप सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं ? तर्क दीजिए ।


Does cosmological argument prove the existence of God ? Give arguments.

OR

Which argument do you consider most adequate to prove the existence of God ? Give arguments.

उत्तर : विश्वसृजनमूलक (कॉस्मोलॉजिकल) प्रमाण ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का एक महत्वपूर्ण तर्क है, परंतु यह पूर्णतः संतोषजनक नहीं है।

तर्क :

  • समर्थन में : संसार में प्रत्येक घटना का कोई न कोई कारण होता है। घटनाओं की इस श्रृंखला का कोई प्रथम कारण होना चाहिए, जो स्वयं अकारण हो – वही ईश्वर है। यह तर्क आकस्मिकता (contingency) पर आधारित है कि संसार आकस्मिक है, अतः इसका कोई आवश्यक स्रोत होना चाहिए।
  • विरोध में : कार्य-कारण सिद्धांत केवल अनुभवजन्य जगत में लागू होता है, इसे ईश्वर जैसी अतींद्रिय वस्तु पर लागू नहीं किया जा सकता। कांट (Kant) के अनुसार, यह तर्क अवैध रूप से कार्य-कारण श्रृंखला को अनंत से परे ले जाता है। इसके अलावा, प्रथम कारण को ईश्वर मानने के लिए कोई अनिवार्यता नहीं है – वह कोई भौतिक शक्ति भी हो सकती है।

निष्कर्ष : विश्वसृजनमूलक प्रमाण ईश्वर के अस्तित्व की संभावना को बल देता है, परंतु इसे निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। अधिक उपयुक्त युक्ति नैतिक प्रमाण (Moral Argument) या प्रयोजनमूलक प्रमाण (Teleological Argument) हो सकती है, जो संसार में व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर ईश्वर की ओर संकेत करते हैं।

प्रश्न 29.

स्पिनोजा के समांतरवाद को समझाइये ।

अथवा

मन-देह सम्बन्धी समस्या को लाइबनिज कैसे सुलझाते हैं ? समझाइये ।


Explain Spinoza's theory of Parallelism.

OR

How does Leibnitz solve the problem of mind-body relation ? Explain.

उत्तर (स्पिनोजा का समांतरवाद) : स्पिनोजा (Spinoza) के अनुसार, ईश्वर या प्रकृति एकमात्र सत्ता (Substance) है, जिसके अनंत गुण (Attributes) हैं। मन और देह दो भिन्न गुण हैं – मन विचार (Thought) का गुण है, और देह विस्तार (Extension) का गुण।

समांतरवाद का सिद्धांत : मन और देह परस्पर कारण नहीं होते, बल्कि वे समानांतर रूप से कार्य करते हैं। प्रत्येक मानसिक घटना के समानांतर एक भौतिक घटना होती है, और दोनों एक ही सत्ता के दो पहलू हैं। उदाहरण के लिए, जब हम किसी वस्तु को देखते हैं (देह की क्रिया), तो उसी समय मन में उसका विचार उत्पन्न होता है – यह दो अलग-अलग कारण नहीं, बल्कि एक ही वास्तविकता की दो अभिव्यक्तियाँ हैं।

निष्कर्ष : स्पिनोजा का समांतरवाद मन-देह के द्वैत को समाप्त करता है और उन्हें एक ही सत्ता के दो पहलू बताता है, जिससे कार्य-कारण संबंध की समस्या हल हो जाती है।


उत्तर (लाइबनिज का समाधान) : लाइबनिज (Leibnitz) मन-देह समस्या को पूर्व-स्थापित सामंजस्य (Pre-established Harmony) के सिद्धांत से हल करते हैं। उनके अनुसार, संसार अनंत मोनैड (Monads) से बना है, जो आत्मिक, अविभाज्य और परस्पर असंबद्ध इकाइयाँ हैं। मन और देह दो अलग-अलग मोनैड हैं, जो एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते।

समाधान : ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में ही सभी मोनैडों के बीच इस प्रकार सामंजस्य स्थापित कर दिया कि मन की अवस्थाएँ और देह की गतियाँ एक-दूसरे के अनुरूप चलती हैं, जैसे दो घड़ियाँ जो एक ही समय दिखाती हैं, पर एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करतीं। इस प्रकार, मन और देह के बीच कोई वास्तविक कार्य-कारण नहीं, बल्कि केवल एक पूर्व-निर्धारित सामंजस्य है।

प्रश्न 30.

क्या दया मृत्यु नैतिक है ? तर्क दीजिए ।

अथवा

शिक्षा-दर्शन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।


Is mercy-killing ethical ? Give arguments.

OR

Write a short note on the Philosophy of Education.

उत्तर (दया मृत्यु की नैतिकता) : दया मृत्यु (Euthanasia) एक जटिल नैतिक प्रश्न है, जिसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं।

पक्ष में तर्क :

  • करुणा का सिद्धांत : यदि कोई व्यक्ति असहनीय पीड़ा में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो उसकी पीड़ा समाप्त करना करुणा का कार्य है।
  • स्वायत्तता : व्यक्ति को अपने जीवन और मृत्यु के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है। यदि वह मृत्यु चाहता है, तो उसकी इच्छा का सम्मान होना चाहिए।
  • गुणवत्ता का जीवन : जीवन केवल जीवित रहने का नाम नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। यदि जीवन केवल पीड़ा का पर्याय बन गया है, तो उसे समाप्त करना उचित हो सकता है।

विपक्ष में तर्क :

  • जीवन की पवित्रता : जीवन ईश्वर का दान है और इसे समाप्त करना नैतिक रूप से गलत है। केवल ईश्वर ही जीवन दे और ले सकता है।
  • दुरुपयोग की संभावना : दया मृत्यु का दुरुपयोग हो सकता है, जैसे वृद्धों या विकलांगों पर दबाव डालना कि वे मृत्यु चुनें।
  • चिकित्सा का उद्देश्य : डॉक्टर का कर्तव्य जीवन बचाना है, न कि मृत्यु देना। यह चिकित्सा नैतिकता के विरुद्ध है।

निष्कर्ष : दया मृत्यु नैतिक है या नहीं, यह संदर्भ और व्यक्तिगत मूल्यों पर निर्भर करता है। अधिकांश नैतिक विचारक इसे केवल अत्यंत दुर्लभ और नियंत्रित परिस्थितियों में ही स्वीकार करते हैं, जहाँ सभी विकल्प समाप्त हो चुके हों।


उत्तर (शिक्षा-दर्शन पर टिप्पणी) : शिक्षा-दर्शन (Philosophy of Education) शिक्षा के उद्देश्यों, विधियों और मूल्यों का दार्शनिक अध्ययन है। यह शिक्षा के मूल प्रश्नों पर विचार करता है – शिक्षा का उद्देश्य क्या है ? ज्ञान क्या है ? शिक्षा का समाज से क्या संबंध है ?

मुख्य विचारधाराएँ :

  • आदर्शवाद (Idealism) : शिक्षा का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और नैतिक विकास है। प्लेटो और हेगेल इसके प्रमुख समर्थक हैं।
  • यथार्थवाद (Realism) : शिक्षा का उद्देश्य बाह्य जगत का ज्ञान प्राप्त करना है। अरस्तू और रसेल इसके प्रवर्तक हैं।
  • प्रयोजनवाद (Pragmatism) : शिक्षा का उद्देश्य व्यावहारिक समस्याओं को हल करना है। डीवी (Dewey) ने इसे बढ़ावा दिया।
  • प्रकृतिवाद (Naturalism) : शिक्षा प्रकृति के अनुसार होनी चाहिए। रूसो (Rousseau) इसके प्रमुख विचारक हैं।

निष्कर्ष : शिक्षा-दर्शन शिक्षा को एक सार्थक दिशा देता है और यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षा केवल सूचना प्रदान करने तक सीमित न रहे, बल्कि व्यक्ति के समग्र विकास में सहायक हो।