RBSE Class 12th 2014 -SS-01-2014 Previous Year Papers
-SS-01-2014 from the 2014 exam year is part of the Class 12th previous year papers archive on RBSE Solution. Many learners start here after finishing the textbook to see how questions were actually framed on the Rajasthan Board of Secondary Education (RBSE) paper.
Treat this question paper as a mock under gentle timing first, then as a marking exercise the second time. The introduction on this page is written only for this subject-and-year pair, not copied from other pages.
Bookmark the link if you coach juniors — the layout stays stable for search engines and classroom sharing.
Paper details
Quick reference for this previous year papers page — confirm board, class, and year & subject before you study.
| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2014 |
| Subject | -SS-01-2014 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
The table summarises this Previous Year Papers resource. Confirm RBSE, Class 12th, year 2014, and subject -SS-01-2014 before studying.
RBSE Solution organises previous year papers so each URL carries chapter-specific guidance — better for students and for search engines than one generic paragraph for the whole class.
How to practise with this question paper
Stage one: read the -SS-01-2014 question paper from 2014 without a timer and highlight command words — explain, prove, calculate, discuss. Stage two: attempt selected questions closed-book. Stage three: compare with solutions or teacher feedback.
Previous Year Papers work best when you log mistakes by topic, not only by question number. That log becomes your revision index before pre-boards.
RBSE Class 12th 2014 -SS-01-2014
Scroll through the Previous Year Papers pages for -SS-01-2014 (2014).
Rajasthan Board Class 12th -SS-01-2014 2014 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2014
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2014
हिन्दी (अनिवार्य)
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में निर्धारित शब्द-सीमा में लिखें।
- जिस प्रश्न के आ, ब, स, द भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ लिखें।
प्रश्नों की संख्या : 5 मुद्रित पृष्ठों की संख्या : 1
पेपर कोड : SS-01-2014 विषय कोड : 55-07 (C)
खण्ड-क
निम्नांकित अपठित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है)
मेरी भूमि तो है पुण्यभूमि वह भारती,
सौ नक्षत्र-लोक करें आके आप आरती ।
नित्य नये अंकुर असंख्य वहाँ फूटते,
फूल झड़ते हैं, फल पकते हैं, टूटते ।
सुरसरिता ने वहीं पाई हैं सहेलियाँ,
लाखों अठखेलियाँ, करोड़ों रंगरेलियाँ ।
नन्दन करते विलासी सुरवृन्द, बहु वेशों में,
विहार हैं हिमाचल प्रदेशों में ।
सुलभ यहाँ जो स्वाद, उसका महत्त्व क्या ?
दुःख जो न हो तो फिर सुख में है सत्त्व क्या ?
दुर्लभ जो होता है, उसी को हम लेते हैं,
जो भी मूल्य देना पड़ता है, वही देते हैं ।
हम परिवर्तनमान, नित्य नये हैं तभी,
ऊब ही उठेंगे कभी एक स्थिति में सभी ।
रहता प्रपूर्ण है हमारा रंगमंच भी,
रुकता नहीं है लोक नाट्य कभी रंच भी ।
-
(अ) कवि ने पुण्य भूमि किसे और क्यों कहा है ?
कवि ने भारत भूमि को पुण्य भूमि कहा है, क्योंकि यहाँ सौ नक्षत्र-लोक आकर आरती करते हैं, अर्थात् यह भूमि देवताओं द्वारा पूजित और पवित्र है। यहाँ नित्य नए अंकुर फूटते हैं, फूल-फल लगते हैं, और सुरसरिता (गंगा) को सहेलियाँ मिलती हैं, जो इसकी पुण्यता को दर्शाता है।
-
(ब) हिमाचल प्रदेश की क्या विशेषता बताई गयी है ?
हिमाचल प्रदेश की विशेषता यह बताई गई है कि वहाँ नन्दन (देवलोक) के विलासी देवता विभिन्न वेशों में विहार करते हैं। अर्थात् हिमाचल के प्रदेश देवताओं के विहार स्थल हैं, जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और दिव्यता को दर्शाता है।
-
(स) “दुःख जो न हो, तो फिर सुख में है सत्त्व क्या ?” — इस कथन का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए ।
इस कथन का तात्पर्य है कि यदि दुःख नहीं होगा, तो सुख का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। दुःख के अभाव में सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। सुख और दुःख एक-दूसरे के पूरक हैं; दुःख ही सुख के मूल्य को समझाता है और जीवन में संतुलन बनाए रखता है।
-
(द) पृथ्वीवासियों को “नित्य नये” क्यों कहा गया है ?
पृथ्वीवासियों को “नित्य नये” इसलिए कहा गया है क्योंकि वे परिवर्तनशील हैं और एक स्थिति में ऊब जाते हैं। वे निरंतर बदलते रहते हैं, नए अनुभवों की तलाश में रहते हैं, और जीवन के रंगमंच पर लोक नाट्य कभी नहीं रुकता। यह परिवर्तन ही उन्हें नित्य नया बनाए रखता है।
2. निम्नांकित अपठित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है)
गाँधीजी के अनुसार शिक्षा, शरीर, मस्तिष्क और आत्मा का विकास करने का माध्यम है। वे “बुनियादी शिक्षा' के पक्षधर थे। उनके अनुसार प्रत्येक बच्चे को अपनी मातृभाषा की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए जो उसके आस-पास की जिन्दगी पर आधारित हो; हस्तकला एवं काम के जरिए दी जाए; रोजगार दिलाने के लिए बच्चे को आत्मनिर्भर बनाए तथा नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करने वाली हो। गांधीजी के उक्त विचारों से स्पष्ट है कि वे व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण जीवन पर अपनी मौलिक दृष्टि रखते थे तथा उन्होंने अपने जीवन में सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेकर भारतीय समाज एवं राजनीति में इन मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की। गांधीजी की सारी सोच भारतीय परम्परा की सोच है तथा उनके दिखाए मार्ग को अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति और सम्पूर्ण राष्ट्र वास्तविक स्वतन्त्रता, सामाजिक सद्भाव एवं सामुदायिक विकास को प्राप्त कर सकता है। भारतीय समाज जब-जब भटकेगा तब-तब गाँधीजी उसका मार्गदर्शन करने में सक्षम रहेंगे।
(अ) गांधीजी के अनुसार प्रत्येक बच्चे को किस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए? 2
गांधीजी के अनुसार प्रत्येक बच्चे को अपनी मातृभाषा में निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए, जो उसके आस-पास के जीवन पर आधारित हो, हस्तकला और काम के माध्यम से दी जाए, बच्चे को आत्मनिर्भर बनाए तथा नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करे।
(ब) “गांधीजी के उक्त विचारों से स्पष्ट है कि वे व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण जीवन पर अपनी मौलिक दृष्टि रखते थे...” यह किस प्रकार का वाक्य है; बताते हुए परिभाषा भी लिखें। 2
यह एक मिश्र वाक्य है। परिभाषा: मिश्र वाक्य वह वाक्य होता है जिसमें एक प्रधान उपवाक्य और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं। यहाँ 'गांधीजी के उक्त विचारों से स्पष्ट है' प्रधान उपवाक्य है और 'कि वे व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण जीवन पर अपनी मौलिक दृष्टि रखते थे' आश्रित उपवाक्य है।
(स) ‘आध्यात्मिक’ शब्द में मूल शब्द व प्रत्यय बताइए। 1+1=2
मूल शब्द: आत्मन् (या आत्मा)
प्रत्यय: इक (आध्यात्म + इक = आध्यात्मिक)
(द) अपठित गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। 2
गांधीजी की शिक्षा दृष्टि या गांधीजी का शिक्षा दर्शन
खण्ड-ख
3. निम्न विषयों में से किसी एक पर लगभग 450 शब्दों में सारगर्भित निबन्ध लिखिए : 7
- भारतीय राजनीति, राजनेता और जातिवाद
- रंगीला राजस्थान
- नये भारत की आशा -- युवा वर्ग
- स्त्री-सशक्तिकरण और शिक्षा
- मेरा प्रिय साहित्यकार
4. “आपके शहर में बढ़ते अपराध” अथवा आपके विद्यालय में आयोजित “मतदाता जागरूकता अभियान के तहत आयोजित जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं” पर समाचार पत्र में प्रेषित करने हेतु एक प्रतिवेदन लिखिए । (उत्तर-सीमा 100 शब्द) 4
5. विविध माध्यमों के लिए लेखन-स्वरूप, प्रकार और प्रक्रिया से संदर्भित निम्नांकित प्रश्नों में से कोई एक प्रश्न का हल कीजिए : (उत्तर-सीमा 80 से 100 शब्द) 4
- मुद्रित माध्यमों की विशेषताएँ एवं कमियाँ लिखिए ।
- एक अच्छे साक्षात्कारकर्त्ता में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
- विशेष लेखन के क्षेत्र बताते हुए विशेष लेखन की भाषा शैली पर भी विचार अभिव्यक्त कीजिए ।
6. निम्नांकित विषयों में से किसी एक पर आलेख लिखिए : (उत्तर-सीमा 80 से 100 शब्द) 4
- घटते संयुक्त परिवार : बढ़ते खतरे
- टी०वी० विज्ञापन और उनका प्रभाव
- रोजगारोन्मुखी शिक्षा की आवश्यकता
7. निम्नांकित विषयों में से किसी एक विषय पर फीचर लिखिए : (उत्तर-सीमा 60 से 80 शब्द) 3
- जंक फूड की बढ़ती घुसपैठ
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विकासशील देश
- राष्ट्रीय पुरस्कारों में राजनीति
SS—01—Hindi (C) [डड-55ठत]
खण्ड-ग
8. निम्नांकित पठित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है)
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से Ford हुए. और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके --दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके -
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके -
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया ।
-
“नयी चमकीली साइकिल” और “चमकीले इशारों” से क्या तात्पर्य है ? (2)
उत्तर: 'नयी चमकीली साइकिल' शरद ऋतु की नवीनता और ताजगी का प्रतीक है। 'चमकीले इशारे' शरद के आगमन की सुंदरता और उल्लास को दर्शाते हैं, जो बच्चों को पतंग उड़ाने के लिए आमंत्रित करते हैं।
-
पतंग उड़ाने वाले बच्चों को कौन बुला रहा है ? (2)
उत्तर: शरद ऋतु स्वयं पतंग उड़ाने वाले बच्चों को बुला रही है। वह अपनी नयी चमकीली साइकिल पर सवार होकर, घंटी बजाते और चमकीले इशारे करते हुए बच्चों को आमंत्रित करती है।
-
शरद का आसमान को मुलायम बनाने से क्या तात्पर्य है ? (2)
उत्तर: शरद ऋतु में आकाश साफ और नीला हो जाता है, जो पतंग उड़ाने के लिए अनुकूल होता है। 'मुलायम' का तात्पर्य है कि आकाश इतना सुंदर और कोमल हो जाता है कि पतंग आसानी से ऊपर उठ सके।
-
पतंग के उड़ने के साथ ही बच्चों के व्यवहार में क्या परिवर्तन आता है ? (2)
उत्तर: पतंग उड़ने के साथ ही बच्चों के व्यवहार में उल्लास और उत्साह आता है। वे सीटियाँ बजाने लगते हैं, किलकारियाँ भरने लगते हैं, और तितलियों की तरह खुशी से झूमने लगते हैं, जिससे एक नाजुक और रंगीन दुनिया शुरू होती है।
अथवा
निम्नांकित पठित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
( प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है )
सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।
आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी !
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोक दिया ।
ऊपर से ठीक-ठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत !
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा --
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”
-
(अ) बात का पेंच कसने से क्या तात्पर्य है ?
बात का पेंच कसने का तात्पर्य है किसी बात या विचार को जबरदस्ती, बिना धैर्य और समझ के, केवल दिखावे के लिए प्रस्तुत करना। कवि ने भाषा के साथ बलपूर्वक व्यवहार किया, जिससे वह स्वाभाविक न रहकर बेकार हो गई।
-
(ब) बात का अर्थ न निकलने पर कवि ने उसके साथ क्या व्यवहार किया और क्यों ?
जब बात का अर्थ नहीं निकला, तो कवि ने हार मानकर उसे कील की तरह ठोक दिया। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह तमाशबीनों की प्रशंसा पाने के लिए बात को जबरदस्ती कसता रहा, जिससे बात की चूड़ी मर गई और वह बेकार हो गई।
-
(स) “ऊपर से ठीक-ठाक, पर अंदर से, न तो उसमें कसाव था, न ताकत !'' — इन पंक्तियों का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए ।
इन पंक्तियों का तात्पर्य है कि बाहरी रूप से बात सही लगती है, लेकिन अंदर से उसमें कोई गहराई, सार्थकता या प्रभाव नहीं है। यह दिखावटी और खोखली हो गई है, क्योंकि इसे बलपूर्वक और बिना समझे प्रस्तुत किया गया।
-
(द) बात को शरारती बच्चे की उपमा क्यों दी गई है ?
बात को शरारती बच्चे की उपमा इसलिए दी गई है क्योंकि जैसे एक शरारती बच्चा मासूमियत से खेलता है और बड़ों को परेशान करता है, वैसे ही बात भी कवि के साथ खेल रही थी। वह कवि के प्रयासों को विफल करती रही और अंत में उससे सवाल पूछकर उसकी असमर्थता को उजागर किया।
9. निम्नांकित पठित काव्यांश को पढ़ कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
( प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है )
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खण्डहर का भाग लिए फिरता हूँ ।
(अ) उपर्युक्त पंक्तियों में कवि द्वारा वर्णित भावों को समझाइए ।
कवि अपने दुःख (रोदन) में भी एक मधुरता (राग) ढूँढता है और शांत वाणी में विद्रोह की आग रखता है। वह उस खंडहर के भाग्य को धारण करता है जिस पर राजाओं के महल न्योछावर होते हैं, अर्थात वह अपनी दरिद्रता और पीड़ा को भी गर्व से स्वीकार करता है।
(ब) उपर्युक्त काव्यांश के शिल्प-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए ।
इस काव्यांश में विरोधाभास अलंकार है (रोदन में राग, शीतल वाणी में आग)। भाषा में प्रतीकात्मकता है (खण्डहर का भाग)। लय और अनुप्रास (रोदन-राग, शीतल-वाणी) से काव्य-सौन्दर्य बढ़ा है। यह मुक्त छंद में रचित है जो भावों की गहराई को व्यक्त करता है।
अथवा
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर
यह विचार-वैभव सब
अनुभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल-पल में जो कुछ भी जाग्रत है -- अपलक है --
संवेदन तुम्हारा है !
(अ) उपर्युक्त पंक्तियों में कवि द्वारा वर्णित भावों को समझाइए ।
कवि गरीबी को गर्वपूर्ण और गंभीर बताता है। वह कहता है कि विचार, अनुभव, दृढ़ता और आंतरिक प्रवाह (सरिता) सब मौलिक हैं क्योंकि ये पल-पल जाग्रत होने वाली संवेदनाएँ हैं जो व्यक्ति की अपनी होती हैं। यह आत्म-गौरव और मौलिकता का भाव है।
(ब) उपर्युक्त काव्यांश के शिल्प-सौन्दर्य को लिखिए ।
इस काव्यांश में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है ('मौलिक है, मौलिक है')। भाषा में प्रतीकात्मकता (भीतर की सरिता) और लाक्षणिकता है। लयात्मकता और अनुप्रास (गरबीली गरीबी, पल-पल) से काव्य-सौन्दर्य निखरा है। यह मुक्त छंद में रचित है जो भावों की तीव्रता को दर्शाता है।
पठित कविताओं की विषय-वस्तु से सम्बन्धित दिए गए तीन प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 30 शब्द है)
-
(अ) ‘eR या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने'; ‘sor कविता की उपर्युक्त पंक्ति बाल-मनोविज्ञान पर प्रकाश डालती है । कैसे ? समझाइए ।
उत्तर: यह पंक्ति बाल-मनोविज्ञान को दर्शाती है कि बच्चे अपनी कल्पना में वास्तविकता को बदल देते हैं। वे लाल खड़िया चाक को मलकर कल्पना करते हैं कि किसी ने उनके चेहरे पर लाल रंग लगा दिया है, जो उनकी भोली और रचनात्मक मानसिकता को प्रकट करता है।
-
(ब) “अशनि-पात से शापित, उन्नत शत-शत वीर', — “बादल-राग' कविता में बादलों को 'अशनि-पात से शापित, उन्नत शत-शत वीर' कहने का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर: बादलों को 'अशनि-पात से शापित, उन्नत शत-शत वीर' कहने का तात्पर्य है कि वे वीरों की तरह बिजली गिरने के शाप से पीड़ित होते हुए भी ऊँचे उठते हैं। यह संघर्षशील और अडिग व्यक्तित्व का प्रतीक है।
-
(स) “उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं” -- फ़िराक गोरखपुरी की इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि आत्म-साक्षात्कार के लिए स्वयं को खोना आवश्यक है। जितना हम अपने अहंकार और स्वार्थ को त्यागते हैं, उतना ही हम अपने वास्तविक स्वरूप को पाते हैं।
निम्नांकित पठित गद्यांश को पढ़ कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है)
भाँति-भाँति के बढ़िया माल से चौक भरा पड़ा है । उस सबके प्रति अप्रीति इस भगत के मन में नहीं है । जैसे उस समूचे माल के प्रति भी उनके मन में आशीर्वाद हो सकता है । विद्रोह नहीं, प्रसन्नता ही भीतर है, क्योंकि कोई रिक्त भीतर नहीं है । देखता हूँ कि खुली आँख, तुष्ट और मग्न, वह चौक बाजार में से चलते चले जाते हैं । राह में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं । कहीं भगत नहीं रुकते । रुकते हैं तो एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं । वहाँ दो चार अपने काम की चीज़ लीं, और चले आते हैं । बाज़ार से हठ पूर्वक विमुखता उनमें नहीं है; लेकिन अगर उन्हें जीरा और काला नमक चाहिए तो सारे
-
प्रश्न: भगत के मन में बाजार के प्रति कैसा भाव है और वे कहाँ रुकते हैं?
उत्तर: भगत के मन में बाजार के प्रति अप्रीति या विद्रोह नहीं, बल्कि प्रसन्नता और आशीर्वाद का भाव है। वे बड़े-बड़े फैंसी स्टोरों पर नहीं रुकते, बल्कि एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं जहाँ वे अपनी ज़रूरत की चीज़ें लेते हैं।
-
प्रश्न: भगत की बाजार से विमुखता कैसी नहीं है और वे क्या लेने जाते हैं?
उत्तर: भगत की बाजार से विमुखता हठपूर्वक नहीं है, बल्कि वे संतोषी और व्यावहारिक हैं। वे अपनी आवश्यकता के अनुसार जीरा और काला नमक जैसी साधारण चीज़ें लेने जाते हैं, न कि विलासिता की वस्तुओं के लिए।
प्रश्न- (अ) बाज़ार के उत्तम-से-उत्तम माल के प्रति भी भगत जी के मन में कोई अप्रीति क्यों नहीं है?
उत्तर: भगत जी के मन में बाज़ार के उत्तम-से-उत्तम माल के प्रति कोई अप्रीति नहीं है, क्योंकि वे उस माल को केवल अपनी आवश्यकता की दृष्टि से देखते हैं। उनके लिए बाज़ार की सत्ता तभी तक उपयोगी है, जब तक वहाँ उनकी ज़रूरत की वस्तु (जीरा) मिलती है। आवश्यकता पूरी होने के बाद शेष सब वस्तुएँ उनके लिए व्यर्थ हो जाती हैं। इस प्रकार, वे माल से अप्रीति नहीं रखते, बल्कि उसके प्रति उदासीन रहते हैं।
प्रश्न- (ब) “बाजार से हठ पूर्वक विमुखता' से क्या तात्पर्य है? समझाइए।
उत्तर: “बाजार से हठ पूर्वक विमुखता' का तात्पर्य है कि बाज़ार के प्रति जानबूझकर और दृढ़तापूर्वक उदासीनता या विरोध का भाव रखना। भगत जी बाज़ार के आकर्षणों से प्रभावित नहीं होते, बल्कि अपनी आवश्यकता पूरी करने के बाद वहाँ से मुँह मोड़ लेते हैं। यह विमुखता हठपूर्वक है, क्योंकि वे बाज़ार के प्रलोभनों को नकारते हुए अपने संतोष और सादगी पर अडिग रहते हैं।
प्रश्न- (स) भगत जी के व्यक्तित्व के आधार पर समझाइए कि ऐसा कौन-सा गुण है, जिसके होने पर बाज़ार के सम्पूर्ण ऐश्वर्य का आमन्त्रण व्यर्थ हो जाता है।
उत्तर: भगत जी के व्यक्तित्व का वह गुण है संतोष। वे अपनी आवश्यकता की पूर्ति में ही संतुष्ट रहते हैं और बाज़ार के ऐश्वर्य से प्रभावित नहीं होते। उनकी निश्चित प्रतीति (दृढ़ विश्वास) है कि आवश्यकता पूरी होने के बाद शेष सब व्यर्थ है। इसी संतोष के कारण बाज़ार का सम्पूर्ण आमंत्रण उन पर बेकार होकर बिखरा रहता है।
अथवा
निम्नांकित पठित गद्यांश को पढ़ कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए — (प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 40 शब्द है)
प्रश्न- (अ) भक्तिन ने किस रहस्य का उद्घाटन करके महादेवी जी को आश्चर्यचकित कर दिया?
उत्तर: भक्तिन ने महादेवी जी को यह रहस्य बताया कि उसके पास पाँच बीसी (पाँच रुपये के बीस पैसे) और पाँच रुपया गड़ा हुआ है। वह इसी रुपये से सब प्रबंध कर लेगी और महादेवी जी को वहाँ रहने की व्यवस्था कर देगी। यह सुनकर महादेवी जी आश्चर्यचकित रह गईं, क्योंकि भक्तिन की कंजूसी प्रसिद्ध थी।
प्रश्न- (ब) “लड़ाई तो कुछ अमरौती खाकर आई नहीं है' — इस कथन के आधार पर युद्ध के प्रति भक्तिन के भाव को समझाइए।
उत्तर: इस कथन से पता चलता है कि भक्तिन युद्ध को एक सामान्य और सहज अनुभव मानती है। उसके अनुसार, युद्ध कोई ऐसी भयानक या असाधारण घटना नहीं है जिससे वह डर जाए। वह इसे अमरौती (एक फल) खाने जैसा साधारण कार्य समझती है, जिससे उसका साहस और निडरता प्रकट होती है।
प्रश्न- (स) कैसे कह सकते हैं कि महादेवी जी का स्थान भक्तिन के जीवन में सर्वोपरि था?
उत्तर: महादेवी जी का स्थान भक्तिन के जीवन में सर्वोपरि था, क्योंकि भक्तिन ने अपनी कंजूसी के बावजूद अपने संचित रुपये (पाँच बीसी और पाँच रुपया) महादेवी जी के लिए खर्च करने का निर्णय लिया। यह उसकी उदारता को दर्शाता है। भक्तिन के लिए रुपये का अनुराग प्रसिद्ध था, फिर भी उसने महादेवी जी के लिए उसे त्याग दिया, जो उनके प्रति उसके अटूट समर्पण और प्रेम को सिद्ध करता है।
SS—OI—Hindi (C) — Turn over
खण्ड-ग
पठित गद्य पाठों की विषय-वस्तु पर आधारित निम्न चार प्रश्नों में से तीन के उत्तर दीजिए: 3×3=9
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 40 से 60 शब्द है)
-
“काले मेघा पानी दे” के आधार पर समझाइए कि लेखक ने भारतीयों का अंग्रेजों से पराजित होने और उनका गुलाम बनने के क्या कारण बताए हैं? वह उस स्थिति में सुधार चाहते हुए भी क्यों नहीं कर पाता है? (1+2)
उत्तर: लेखक ने भारतीयों के अंग्रेजों से पराजित होने का मुख्य कारण उनमें एकता और संगठन की कमी को बताया है। भारतीय आपसी फूट और स्वार्थ के कारण अंग्रेजों के सामने कमजोर पड़ गए। लेखक सुधार चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाता क्योंकि वह स्वयं भी उसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, जहाँ लोग बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं और वह अकेला इस स्थिति को बदलने में असमर्थ है।
-
“पहलवान की ढोलक” नामक कहानी में 'लुट्टनसिंह' एक ऐसा पात्र है जो प्रारम्भ से लेकर मृत्यु पर्यन्त जिजीविषा का अद्भुत दस्तावेज है। कैसे? समझाइए।
उत्तर: लुट्टनसिंह जीवनभर संघर्ष करता है और कभी हार नहीं मानता। वह बुढ़ापे में भी पहलवानी की भावना को जीवित रखता है। अपनी ढोलक को बजाकर वह अपने अंदर जीने की इच्छा को बनाए रखता है। मृत्यु के समय भी वह ढोलक बजाता है, जो दर्शाता है कि उसकी जिजीविषा अंत तक बनी रही। इस प्रकार वह जिजीविषा का अद्भुत उदाहरण है।
-
शिरीष के फूल, कबीर और कालिदास में हजारी प्रसाद जी ने क्या समानताएँ देखीं और क्यों?
उत्तर: हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शिरीष के फूल, कबीर और कालिदास में यह समानता देखी कि तीनों ही विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बनाए रखते हैं। शिरीष का फूल कठोर धूप में भी खिलता है, कबीर ने सामाजिक विरोध के बावजूद अपने विचार रखे, और कालिदास ने आलोचना के बावजूद अपनी रचनाएँ लिखीं। यह समानता उनके अटल और अडिग स्वभाव को दर्शाती है।
-
“असमान प्रयत्न के कारण असमान व्यवहार” से आप क्या समझते हैं? क्या आप इस दृष्टिकोण से सहमत हैं? मौलिक उत्तर दीजिए।
उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि लोगों के प्रयासों में अंतर के कारण उनके साथ किया जाने वाला व्यवहार भी अलग-अलग होता है। जो अधिक प्रयास करता है, उसे अधिक सफलता और सम्मान मिलता है, जबकि कम प्रयास करने वाले को कम। मैं इस दृष्टिकोण से सहमत हूँ क्योंकि समाज में सफलता और व्यवहार अक्सर व्यक्ति के प्रयासों पर निर्भर करते हैं। हालाँकि, कभी-कभी परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन मूल रूप से प्रयास ही व्यवहार को निर्धारित करता है।
खण्ड-घ
पाठ्यपुस्तक की विषय-वस्तु पर आधारित निम्न तीन प्रश्नों में से दो के उत्तर दीजिए: 2×3=6
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 40 से 60 शब्द है)
-
अधिकांश अभिभावकों की तरह यशोधर बाबू भी यह सोचते थे कि — “जिम्मेदारी सिर पर पड़ेगी तब सब अपने आप ठीक हो जाएँगे” — इस कथन पर अपनी मौलिक सहमति या असहमति तर्क सहित दीजिए।
उत्तर: मैं इस कथन से सहमत नहीं हूँ। जिम्मेदारी सिर पर पड़ने पर व्यक्ति अनुभव से सीख सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह अपने आप ठीक हो जाए। बिना मार्गदर्शन और पूर्व तैयारी के व्यक्ति गलतियाँ कर सकता है और उसका आत्मविश्वास टूट सकता है। अभिभावकों को बच्चों को जिम्मेदारी देने से पहले उन्हें सही दिशा दिखानी चाहिए, न कि यह सोचना चाहिए कि सब अपने आप ठीक हो जाएगा।
-
मास्टर न० टी० सौंदलगेकर के मराठी भाषा पढ़ाने का वह कौन-सा तरीका था जिससे लेखक के जीवन पर उनका सर्वाधिक प्रभाव पड़ा?
उत्तर: मास्टर सौंदलगेकर मराठी भाषा को रटने के बजाय समझने पर जोर देते थे। वे कविताओं और कहानियों के माध्यम से भाषा सिखाते थे, जिससे लेखक को भाषा के प्रति गहरी रुचि और समझ विकसित हुई। उनका यह तरीका लेखक के जीवन पर सर्वाधिक प्रभावशाली रहा, क्योंकि इसने न केवल भाषा ज्ञान बढ़ाया, बल्कि साहित्य के प्रति प्रेम भी जगाया।
-
मुअन-जो-दड़ो के भौगोलिक व प्राकृतिक वातावरण पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: मुअन-जो-दड़ो सिंधु नदी के किनारे बसा एक प्राचीन नगर था। इसका भौगोलिक वातावरण उपजाऊ मैदानों और नदी के निकट होने के कारण कृषि के लिए अनुकूल था। प्राकृतिक रूप से यहाँ गर्म और शुष्क जलवायु थी, लेकिन सिंधु नदी से पानी की उपलब्धता थी। नगर की योजना बहुत विकसित थी, जिसमें सड़कें, नालियाँ और स्नानागार शामिल थे, जो दर्शाता है कि यहाँ का वातावरण सभ्यता के विकास के लिए उपयुक्त था।
4. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो का उत्तर दीजिए : 2×2=4
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 20 से 30 शब्द है)
-
‘अर्टे’ को खेती के कौन-कौन से कार्य करने पर ही अध्ययन की अनुमति पिता द्वारा दी गई?
अर्टे को खेत जोतने, बीज बोने, निराई करने और फसल काटने जैसे कार्य करने पर ही पिता ने अध्ययन की अनुमति दी।
-
मुअन-जो-दड़ो के अजायब घर में सिंधु सभ्यता को बताने वाली कौन-कौन सी वस्तुएँ निकलीं?
मुअन-जो-दड़ो से मुहरें, मूर्तियाँ, बर्तन, आभूषण, औजार और खिलौने जैसी वस्तुएँ मिलीं, जो सिंधु सभ्यता की उन्नति दर्शाती हैं।
-
“युद्ध काल में मनुष्यों की नैतिकता समाप्त हो गयी थी।” इस कथन को एन फ्रेंक द्वारा दिए गये उदाहरणों के आधार पर लिखिए।
एन फ्रेंक ने लिखा कि युद्ध में लोग एक-दूसरे को धोखा देते थे, यहूदियों को छिपाने वालों को धमकाया जाता था, और मानवीय मूल्य समाप्त हो गए थे।
5. विषय-वस्तु पर आधारित दिए गए दो प्रश्नों में से किसी एक निबन्धात्मक प्रश्न का उत्तर दीजिए : 1×3=3
(प्रत्येक प्रश्न के लिए उत्तर-सीमा 40 से 60 शब्द है)
-
किशन दा कहा करते थे कि आना सब कुछ चाहिए, सीखना हर एक की बात से, लेकिन अपनी छोड़नी नहीं चाहिए। -- किशन दा के इस विचार को यशोधर बाबू ने अपने जीवन में किस प्रकार अपनाया? स्पष्ट कीजिए।
यशोधर बाबू ने किशन दा के इस विचार को अपनाते हुए दूसरों से सीखने की इच्छा रखी, लेकिन अपने मूल्यों और पहचान को नहीं छोड़ा। उन्होंने नई बातें सीखीं, पर अपनी संस्कृति और सिद्धांतों पर अडिग रहे, जिससे वे संतुलित जीवन जी सके।
-
‘ज्ञान, काम तथा प्रगति ने औरतों की आँखें खोली हैं।’ एन फ्रेंक के इस कथन को वर्तमान परिप्रेक्ष्य के आधार पर तर्क सहित समझाइए।
एन फ्रेंक का कथन आज भी प्रासंगिक है। शिक्षा ने महिलाओं को जागरूक किया, रोजगार ने आर्थिक स्वतंत्रता दी, और प्रगति ने उन्हें समाज में समान अधिकार दिलाए। आज महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे हैं, जो उनकी जागरूकता और सशक्तिकरण को दर्शाता है।