RBSE Class 12th 2016 Rajasthani Sahitya-SS-26-2016 Previous Year Papers

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2016
Subject Rajasthani Sahitya-SS-26-2016
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Rajasthani Sahitya-SS-26-2016 2016 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2016

SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2016

राजस्थानी साहित्य (RAJASTHANI SAHITYA)

समय : 3 घण्टे 15 मिनट | पूर्णांक : 80

परीक्षार्थियों सारू सामान्य निर्देश :

  1. परीक्षार्थी सबसूं पैली आपरे उत्तर पत्र माथे नामांक जरूर लिखे।
  2. सगढ़ा सवाल करना जरूरी है।
  3. हरेक सवाल रौ पदूत्तर उत्तर पुस्तिका में इज लिखणो है।
  4. जो सवाल रा एक सूं अधिक भाग है तो वां सगढ़ा रा उत्तर एक साथ लगातार लिखौ।
  5. लेखन मांय सुद्धता अर वैज्ञानिक विवेचन करियां ज्यादा अंक दिरीजैला।
  6. वर्तनी, व्याकरण अर सुलेख रौ विशेष ध्यान राखौ अर ओपतौ भी देवौ।
  7. उत्तर राजस्थानी भासा में ईज देवणा है।
  8. पूर्णांक अर प्रश्नांक ठावी ठौड़ अंकित है।

SS—26-Raj. Sah. 423

प्रश्न पत्र को खोलने के लिए यहाँ काटें।


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प्रश्न 2: नीचे लिख्या गद्यावतरणा री सप्रसंग व्याख्या करो:

(क) मिनख री जिंदगानी में कई घड़ी पछ इसा आवै जका उणनै ऊंचौ उठा दे अर केई घड़ी इसा आवै जिका उणनै पींदे बैठा देवे। आज भूरी रा आंसू अर उण रै मनरौ दुःख राम जस-नै नयौ प्रकाश देत। बो हड़बड़ार उठ्यो। आंख्या फाड़-अर हाथ पसार-अर बोल्यो-भूरी! उठ, बींटो बांध अर टाबरां नै त्यार कर। इण गुलामी नै आज सूं ही नमस्कार है।

[4]

सप्रसंग व्याख्या:

प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक रामजस की कहानी से लिया गया है। इसमें भूरी नामक पात्र के दुःख और उसके पति रामजस के मन में आए क्रांतिकारी परिवर्तन का वर्णन है।

व्याख्या: लेखक कहता है कि मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जो उसे ऊँचा उठा देते हैं और कई बार ऐसे क्षण आते हैं जो उसे नीचे गिरा देते हैं। आज भूरी के आँसू और उसके मन के दुःख ने रामजस को एक नया प्रकाश दिया। वह हड़बड़ाकर उठा, आँखें फाड़कर और हाथ पसारकर बोला- "भूरी! उठ, बींट बाँध और बच्चों को तैयार कर। इस गुलामी को आज से ही नमस्कार है।" यहाँ रामजस गुलामी के विरुद्ध विद्रोह का स्वर उठाता है और स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाने का संकल्प करता है।


(ख) संमव्ठी ऊंची बैठी थी, तिण विचारियौ, "जे राजा तो म्हारै पीवै छे।" संमव्ठी राजा रा हाथ मां सु झड़प मारै नै वाटको ऊंधो मारीयौ नै संमव्ठी ऊंची जाय बैठी। राजा वाटको पाणी मांडियौ सो पाणी भरायौ नै राजा त्रिसां मरतो पाणी पीवण नूं तयार थ्यो। तितरै संमव्ठी झपट मारी नै ऊंधो मारीयो। तरै संमव्ठी रै छाती पर भलठकारी दीधी। सो संमव्ठी मुई नै ऊंची आंबा पर ठरी।

SS-26-Raj. Sah. 423

सप्रसंग व्याख्या:

प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी लोककथा या कहानी का अंश है, जिसमें संमव्ठी (एक स्त्री) और राजा के बीच का प्रसंग वर्णित है।

व्याख्या: संमव्ठी ऊँची जगह पर बैठी थी, तब उसने सोचा, "यह राजा तो मेरे पीने के लिए है।" संमव्ठी ने राजा के हाथ से झपटकर लोटा (वाटको) उल्टा मार दिया और स्वयं ऊँची जगह जाकर बैठ गई। राजा ने लोटे में पानी भरा और प्यास से मरते हुए पानी पीने को तैयार हुआ। तभी संमव्ठी ने झपटकर उसे उल्टा मार दिया। फिर संमव्ठी के सीने पर भाला मारा गया। इस प्रकार संमव्ठी मर गई और ऊँची आम की डाल पर ठहर गई। यह प्रसंग संभवतः किसी बलिदान या प्रतिरोध की कहानी को दर्शाता है।

ख) मारवाड़ी लोगां री इण बात रौ कारण कोई बड़ी पूंजी बेपार मैं कारगर हुई एड़ी बात नहीं।

काया री खेचड़ अर बुध रो बढ़त हो धीरज धारी हिवड़ौ, जिण में ही मुसीबतां सूं टक्कर लेवण री खिमता। मिलां में दूजा लोग मैनेजर हुया पण मालिक सदा मारवाड़ी रहया। दूजा लोग उण फेट री याद करै, जिका फेट में मारवाड़ी फगत लोटौ-डोर लियां आया अर आज ठौड़-ठौड़ उणां री बड़ी-बड़ी इमारता खड़ी है।

व्याख्या: मारवाड़ी लोगों की सफलता का कारण बड़ी पूंजी नहीं, बल्कि उनकी शारीरिक सहनशक्ति, बुद्धि का विकास, धैर्य और मुसीबतों से टक्कर लेने की क्षमता है। वे मालिक बने रहे, जबकि दूसरे लोग मैनेजर बने। दूसरे लोग उस समय को याद करते हैं जब मारवाड़ी केवल लोटा-डोर लेकर आए थे और आज उनकी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं।


अथवा

म्है गेलौ हूं कई जकौ औड़ी बेहूदी बात करू? ठीक है, था लोंगा रै कैणा-कैणा। म्है इत्ता नाच, नाच लिया पण अब आ बदनामी उठाय नै तो म्हारौ इज्जत सूं जीवणौ ई मुसकिल हो जावैला। म्है आपने विश्वास दिराऊं हूं कै म्हनै नै म्हारा बाप नै की नीं चाहि जै। आप प्रत माल करजौ करने खरीदियो है वो सगव्ठौं पाछो बेच नै करजौ चुकादिरावौं। रेत कोई दायजो मंजूर नहीं हैं।

व्याख्या: यह संवाद एक पात्र का है जो कहता है कि वह बहुत नाच चुका है, अब बदनामी सहन करना मुश्किल है। वह विश्वास दिलाता है कि वह अपने पिता को कभी नहीं चाहेगा। वह कहता है कि जो माल कर्ज लेकर खरीदा है, उसे सबसे पहले बेचकर कर्ज चुकाएगा। उसे कोई दहेज स्वीकार नहीं है।

प्रश्न 4

ग) भानै आय २ बास तै जगाली ही। दोनूं भाई कनै-कनै बैठ्योड़ा हा। माधो उणभणै मन सूं आपरे हाथ री अगै माथै फूंक मार रैयो हो। भानो बैरी हिवडै री पीड़ नै जाण र बोल्यो, “क्यूं काछूजौ छोटो करै! आपां रा करम ई हीटर हैं। धीमै-धीमै सैवण रो सुभाव पड़ जावैलो। एवां वट करड़ी हो वाट।”

अथवा

स्वामीजी अर जीवण अते विचित्तर नाटक हैं। अओक-अओक घड़ी रो भी नहचौनीं? सगव्ठा सुख असल में दुःख ईज है। सुख घड़ी-पोर रा हैं। अजर-अमर है तो आ मिरत्यू! ....... मोत! आ मिरत्यू ई अक अमर सत्य है! ..... इण पीड़ा रो अनुभव ई साचो अनुभव। आपा सगढ्ठा जणा रमणियां हा। रमतिया औरा जिको अर नी कद अरस आ ..... किया तोड़ अर, स्त्रत नीं जाणां।

व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी साहित्य के एक प्रसिद्ध रचना से लिया गया है। इसमें दो भाइयों (भानो और माधो) के संवाद के माध्यम से जीवन की कठिनाइयों और दुखों को सहने की बात कही गई है। भानो कहता है कि हमारे कर्म ही हीटर (गर्मी) हैं, धीरे-धीरे सहने की आदत पड़ जाएगी। दूसरे भाग में स्वामीजी जीवन को विचित्र नाटक बताते हैं, जहाँ सुख क्षणिक है और मृत्यु ही एकमात्र अमर सत्य है। पीड़ा का अनुभव ही सच्चा अनुभव है।

प्रश्न पत्र – राजस्थानी साहित्य (SS–26) 2016 – पृष्ठ 5

  1. 'मुहणौत नैणसी अकबर रै चावै दरबारी अबुल फजल री जोड़ी रो इतिहासकार हो' – इस कथन को सिद्ध करता दोनां रै चरित री समानतावां बतावो।

    समाधान: मुहणौत नैणसी और अबुल फजल दोनों ही अपने-अपने समय के प्रसिद्ध इतिहासकार थे। दोनों के चरित्र में निम्नलिखित समानताएँ हैं:

    • दोनों राजदरबारों से जुड़े हुए थे – नैणसी मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह के दरबारी थे, जबकि अबुल फजल मुगल सम्राट अकबर के दरबारी।
    • दोनों ने अपने-अपने शासकों के शासनकाल का विस्तृत इतिहास लिखा।
    • दोनों की लेखन शैली में तथ्यात्मकता और निष्पक्षता का समावेश था।
    • दोनों ने अपने ग्रंथों में प्रशासन, संस्कृति और समाज का गहन विवरण प्रस्तुत किया।
    • दोनों को अपने समय के विद्वानों और इतिहासकारों में उच्च स्थान प्राप्त था।
  2. 'अरा बोल्यां किया पार पडै' व्यंग्य में व्यंग्यकार कूड़ नै अमोघ हथियार क्यूं मानै? खुलासो करो।

    समाधान: व्यंग्यकार कूड़ (व्यंग्य) को अमोघ हथियार इसलिए मानता है क्योंकि:

    • व्यंग्य सीधे प्रहार के बजाय मर्म को भेदता है और सत्य को उजागर करता है।
    • यह समाज की कुरीतियों, दोषों और विसंगतियों को बिना कठोरता के प्रभावी ढंग से उजागर करता है।
    • व्यंग्य का प्रभाव लंबे समय तक रहता है और यह पाठक/श्रोता के मन में गहरी छाप छोड़ता है।
    • यह हथियार की तरह तीखा होता है, लेकिन सीधे आक्रमण के बजाय बुद्धि और हास्य के माध्यम से काम करता है।
    • व्यंग्य के माध्यम से कठोर सत्य को भी सहजता से स्वीकार कराया जा सकता है।
  3. "आदमी री जात" कहाणी का कथानक अर भाषा-शैली री विशेषतावां बताओ।

    समाधान: "आदमी री जात" कहानी की विशेषताएँ:

    कथानक: यह कहानी मानवीय संवेदनाओं और जाति-व्यवस्था की विसंगतियों पर आधारित है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे जाति के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से अलग किया जाता है, लेकिन अंत में मानवता ही सबसे बड़ी जाति होती है।

    भाषा-शैली:

    • सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण राजस्थानी भाषा का प्रयोग।
    • संवादों में स्वाभाविकता और जीवंतता।
    • वर्णनात्मक शैली में चित्रात्मकता।
    • लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रभावी प्रयोग।
    • भावनाओं की अभिव्यक्ति में सहजता।
  4. "हूं गोरी किण पीव री" उपन्यास री नायिका सूरजड़ी रो चरित्र चित्रण करो।

    समाधान: सूरजड़ी उपन्यास "हूं गोरी किण पीव री" की प्रमुख नायिका है। उसके चरित्र की विशेषताएँ:

    • वह एक संवेदनशील और भावुक स्त्री है।
    • उसमें आत्मसम्मान और स्वाभिमान की भावना प्रबल है।
    • वह पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं से जुड़ी हुई है।
    • उसके जीवन में प्रेम, त्याग और संघर्ष का गहरा प्रभाव है।
    • वह विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस का परिचय देती है।
    • उसका चरित्र राजस्थानी नारी की मर्यादा और शक्ति का प्रतीक है।
  5. आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कहाणी लेखन माथै आलेख लिखो।

    समाधान: आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कहानी लेखन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ:

    • विषय-वस्तु: सामाजिक समस्याएँ, ग्रामीण जीवन, नारी विमर्श, ऐतिहासिक घटनाएँ और मानवीय संबंध।
    • शैली: यथार्थवादी, प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण।
    • प्रमुख कहानीकार: विजयदान देथा, शिवचरण भारतीय, नरपत राज, चन्द्र प्रकाश देवल आदि।
    • भाषा: राजस्थानी की विभिन्न बोलियों का प्रयोग, जिसमें मारवाड़ी, मेवाती, ढूंढाड़ी आदि शामिल हैं।
    • प्रभाव: आधुनिक राजस्थानी कहानी ने सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया है।
  6. नीचै लिख्या विषयां में से किणी एक विषय माथे राजस्थानी भाषा में निबंध लिखो:

    1. राष्ट्रपिता-महात्मा गांधी
    2. राजस्थानी साहित्य में वीर रस
    3. मेरा प्रिय (वाल्हो) कवि
    4. आतंकवाद री समस्या अर उपाय

    नोट: यह एक निबंधात्मक प्रश्न है। विद्यार्थी को उपरोक्त चार विषयों में से किसी एक पर राजस्थानी भाषा में निबंध लिखना है। प्रत्येक विषय पर निबंध में विषय का परिचय, मुख्य बिंदु, विश्लेषण और निष्कर्ष शामिल होना चाहिए।

प्रश्न 8: नीचे लिख्यां पद्यासां री सप्रसंग व्याख्या करो।

(क) पहली पद्यांश

रोग अग्नि ae te, जांण अलप कीजै जतन।
बधिया पछे बिगाड़, रोक्या रहे न राजिया।।
wat घणी कुरूप, HE कांटा तुलै।
wert घणी सरूप, रोड़ा get राजिया।।

सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत पद्यांश राजस्थानी साहित्य के एक लोकगीत या कविता से लिया गया है। इसमें जीवन की नश्वरता और मानवीय भूलों पर प्रकाश डाला गया है। कवि कहता है कि रोग रूपी अग्नि से बचने के लिए थोड़ा प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि बाद में पछताने से कुछ नहीं होता। दूसरे भाग में कुरूपता और सरूपता (सुंदरता) की तुलना की गई है—कुरूपता कांटे के समान कष्टदायक है, जबकि सरूपता रोड़े (रत्न) के समान मूल्यवान है। यह पद्यांश मानवीय स्वभाव और जीवन के यथार्थ को दर्शाता है।

(ख) दूसरी पद्यांश (अथवा)

मेरी मेरी करत है, देखो नर की भोल।
फिर पीछे पछतावगै, हरि बोलो, हरि बोल।।
किये रूपए ओकठें, चौकूठे अर गोल।
खाली हाथों सब गयो, हरि बोलो, हरि बोल।।

सप्रसंग व्याख्या: यह पद्यांश संत कवि की वाणी है, जो मानव जीवन की क्षणभंगुरता और मोह-माया के बंधनों को उजागर करता है। कवि कहता है कि मनुष्य 'मेरा-मेरा' करता है, परंतु यह भोलापन है। अंत में सब कुछ छोड़कर जाना पड़ता है और पछताना पड़ता है। धन-दौलत (रूपए) चाहे ओकठे (एकत्र), चौकूठे (चारों ओर से) या गोल (पूर्ण) हो, परंतु अंत में खाली हाथ ही जाना है। इसलिए 'हरि बोलो' (भगवान का नाम लो) का संदेश दिया गया है। यह पद्यांश वैराग्य और भक्ति की ओर प्रेरित करता है।

(ग) तीसरी पद्यांश (अथवा)

म्हैलां की तो टपरी बणगी
टपरी म्हैल धणो जबरो रे
सपनो आयो
तोसा खाना खाली होग्या
खाली पेट भर्‌यो जबरो रे
सपनो आयो।

सप्रसंग व्याख्या: यह पद्यांश राजस्थानी लोकगीत का अंश है, जो गरीबी और अभाव की पीड़ा को व्यक्त करता है। 'म्हैलां' (भैंसों) की टपरी (छोटी झोपड़ी) बन गई है, परंतु भैंस का दूध नहीं है। 'सपनो आयो' (सपना आया) की पुनरावृत्ति से स्वप्न और वास्तविकता का अंतर दिखाया गया है। 'तोसा खाना' (थोड़ा सा खाना) खाली हो गया, परंतु खाली पेट भर गया—यह विरोधाभास जीवन की विडंबना को दर्शाता है। यह पद्यांश सामाजिक यथार्थ और मानवीय संघर्ष का चित्रण करता है।

(घ) चौथी पद्यांश (अथवा)

ict कादो रेत WS, सगढ्ठा पड ने पांव।
रोके Wd चालता जश्यो जणी रो दांव।।
पर-घर पग नीं मेलणो, बिना मान-मनवार।
अंजण आवे देख ने, सिंगल रो सतकार।।

सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत पद्यांश नीति और व्यवहार की शिक्षा देता है। कवि कहता है कि जैसे कादो (कीचड़) और रेत में पैर फंस जाता है, वैसे ही बुरे कामों में फंसने पर व्यक्ति रुक जाता है और चाल (चालाकी) का दांव खत्म हो जाता है। दूसरे भाग में उपदेश है कि पराए घर में बिना मान-सम्मान के पैर नहीं रखना चाहिए। जब अंजन (आंखों में सुरमा) लगाने वाला आता है, तब सिंगल (सींग वाले) का सत्कार होता है—यह व्यंग्यात्मक रूप से दिखाता है कि दिखावे और झूठे सम्मान से बचना चाहिए। यह पद्यांश जीवन में सावधानी और सदाचार का संदेश देता है।

प्रश्न 9 से 14 (5 अंक प्रत्येक)

प्रश्न 9. गवरी बाई रै पदा रो सार लिखो।

उत्तर: गवरी बाई राजस्थानी साहित्य की प्रसिद्ध लोक कवयित्री हैं। उनके पदों में भक्ति, प्रेम, और समाज के प्रति जागरूकता का संदेश मिलता है। उनकी रचनाओं में सरल भाषा और गहरी भावनाएँ प्रकट होती हैं, जो राजस्थानी लोक जीवन को दर्शाती हैं।

प्रश्न 10. कल्याण सिंह राजावत री कविता “हो देवैलो हेलो” मांय कवि रो मूल संदेश लिखो।

उत्तर: कल्याण सिंह राजावत की कविता “हो देवैलो हेलो” में कवि का मूल संदेश मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, और सामाजिक समरसता पर केंद्रित है। कवि ने इस कविता के माध्यम से जीवन की सच्चाइयों और मानवीय रिश्तों की गहराई को उजागर किया है।

प्रश्न 11. “आ राजस्थानी भाषा है” कविता राजस्थानी भाषा रै विकास इतिहास नै प्रगटै” इस कथन ने सिद्ध करो।

उत्तर: “आ राजस्थानी भाषा है” कविता राजस्थानी भाषा के विकास और इतिहास को स्पष्ट रूप से प्रकट करती है। इसमें राजस्थानी भाषा की प्राचीनता, उसकी समृद्ध परंपरा, और साहित्यिक योगदान का वर्णन है। कविता के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि राजस्थानी भाषा का एक गौरवशाली इतिहास रहा है और यह साहित्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 12. काव्य रो अरथ बतावंता काव्य रा भेदा रो संक्षेप में परिचय देवो।

उत्तर: काव्य का अर्थ है – वह रचना जिसमें भावनाओं और विचारों को सुंदर, प्रभावशाली और लयात्मक भाषा में व्यक्त किया जाए। काव्य के मुख्य भेद निम्नलिखित हैं:

  • श्रव्य काव्य: जिसे सुनकर आनंद मिलता है, जैसे – महाकाव्य, खंडकाव्य।
  • दृश्य काव्य: जिसे देखकर आनंद मिलता है, जैसे – नाटक, एकांकी।
  • प्रबंध काव्य: जिसमें कोई कथा या घटना का वर्णन होता है।
  • मुक्तक काव्य: जिसमें एक ही छंद या पद में पूर्ण भाव व्यक्त होता है।

प्रश्न 13. ‘कुंडछिया’ छंद री विशेषतावां उदाहरण सहित लिखो।

उत्तर: कुंडछिया छंद राजस्थानी साहित्य का एक प्रमुख छंद है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • इसमें 16 मात्राएँ होती हैं।
  • प्रत्येक चरण में 8-8 मात्राओं के दो खंड होते हैं।
  • यह छंद गेय और लयात्मक होता है।

उदाहरण: “धरती धणी धणी, अंबर अणी अणी” – इस पंक्ति में 16 मात्राएँ हैं और यह कुंडछिया छंद का सुंदर उदाहरण है।

प्रश्न 14. ‘अनुप्रास’ अलंकार री परिभाषा अर उदाहरण लिखो।

उत्तर: अनुप्रास अलंकार की परिभाषा – जब किसी काव्य पंक्ति में किसी वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। यह ध्वनि सौंदर्य को बढ़ाता है।

उदाहरण: “चंदन चर्चित चारु चित्त” – यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति हुई है, अतः यह अनुप्रास अलंकार का उदाहरण है।