RBSE Class 12th 2017 -SS-16,63,64,65,66,67,68,69,70-2017 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2017 |
| Subject | -SS-16,63,64,65,66,67,68,69,70-2017 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2017 -SS-16,63,64,65,66,67,68,69,70-2017
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Rajasthan Board Class 12th -SS-16,63,64,65,66,67,68,69,70-2017 2017 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक पूरक परीक्षा, 2017
SENIOR SECONDARY SUPPLEMENTARY EXAMINATION, 2017
संगीत - कण्ठ अथवा वाद्य
(MUSIC - VOCAL OR INSTRUMENTAL)
समय : 3¼ घण्टे पूर्णांक : 24
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must first write his / her Roll No. on the question paper compulsorily. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity.
प्रश्न पत्र को खोलने के लिए यहाँ फाड़ें
TEAR HERE TO OPEN THE QUESTION PAPER
यहाँ से काटिए
SS-6,63,64,65,66,67,68,69,70- Music (V&I) [3] [Turn Over
भाग - अ (गायन) / Part - A (VOCAL)
5) परिभाषित कीजिए: [1+1+1 = 3]
-
i) वर्ण (Varna)
वर्ण संगीत में स्वरों के एक विशिष्ट क्रम को कहते हैं जो किसी राग की पहचान और स्वरूप को दर्शाता है। यह राग के आरोह और अवरोह में प्रयुक्त स्वरों का समूह होता है। वर्ण दो प्रकार के होते हैं: आरोही वर्ण (स्वरों का ऊपर की ओर जाना) और अवरोही वर्ण (स्वरों का नीचे की ओर आना)।
-
ii) खटका (Khatka)
खटका एक अलंकार है जिसमें एक स्वर को गाते समय उसके पहले या बाद में एक या दो स्वरों को तेजी से जोड़कर गाया जाता है। यह गायन में चपलता और सुंदरता लाने के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, 'सा' स्वर पर खटका लगाने पर 'रे सा' या 'नि सा' जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है।
-
iii) मुर्की (Murki)
मुर्की एक अलंकार है जिसमें दो या तीन स्वरों को मिलाकर एक छोटा, तीव्र और सुंदर स्वर समूह बनाया जाता है। यह खटका से अधिक जटिल होता है और इसमें स्वरों का एक विशिष्ट पैटर्न होता है। मुर्की का प्रयोग गायन में रस और भाव को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
6) किन्हीं दो पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [1½+1½ = 3]
-
i) पूर्व राग - उत्तर राग (Purva Raga - Uttara Raga)
पूर्व राग और उत्तर राग रागों के वर्गीकरण की एक पद्धति है। पूर्व राग वे राग हैं जिनमें राग के पूर्वांग (सा से मध्यम तक) का अधिक प्रयोग होता है और इनका गायन समय दिन का पहला भाग (सुबह से दोपहर तक) होता है। उत्तर राग वे राग हैं जिनमें राग के उत्तरांग (पंचम से तार सप्तक के नि तक) का अधिक प्रयोग होता है और इनका गायन समय रात का होता है। यह वर्गीकरण राग के स्वरूप और गायन समय को समझने में सहायक है।
-
ii) परमेल प्रवेशक राग (Parmel Praveshak Raga)
परमेल प्रवेशक राग वह राग है जो एक मेल (थाट) से दूसरे मेल में जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह राग दो अलग-अलग थाटों के स्वरों का मिश्रण होता है और इसे गाने से एक थाट से दूसरे थाट में सहज संक्रमण संभव होता है। इसका प्रयोग रागों के बीच संबंध स्थापित करने और संगीत में विविधता लाने के लिए किया जाता है।
-
iii) घराना क्या है? (What is Gharana?)
घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक परंपरा या शैली है जो गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। प्रत्येक घराने की अपनी विशिष्ट गायन या वादन शैली, रागों की प्रस्तुति का ढंग, तानों और अलंकारों का प्रयोग आदि होता है। उदाहरण के लिए, ग्वालियर घराना, आगरा घराना, जयपुर घराना आदि प्रमुख घराने हैं। घराना संगीत की पहचान और विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
-
iv) संधि प्रकाश राग (Sandhi Prakash Raga)
संधि प्रकाश राग वे राग हैं जो दिन और रात के संधि काल (गोधूलि बेला) में गाए जाते हैं। ये राग संधि के समय के वातावरण और भाव को व्यक्त करते हैं। इनमें प्रायः कोमल स्वरों का प्रयोग अधिक होता है और ये गंभीर एवं शांत प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए, राग भैरव (सुबह की संधि) और राग पूरिया (शाम की संधि) संधि प्रकाश राग हैं।
SS—6,63,64,65,66,67,68,69,70-Music (V&I) | 43
Write brief notes on any two –
- Purva Raga – Uttar Raga
- Permel Praveshak Raga
- What is 'Gharana'?
- Sandhi Prakash Raga
Note: The candidate is required to write brief notes on any two of the above topics. Each note should cover the definition, characteristics, and significance in Hindustani classical music.
मध्यकालीन भारतीय संगीत के संदर्भ में “संगीत पारिजात” की भूमिका को समझाइये।
Explain the role of "Sangeet Parijat" in reference of medieval Indian music.
Solution: Sangeet Parijat is a significant medieval treatise on Indian classical music, authored by Pandit Ahobala in the 17th century. It is one of the first texts to describe the 12-note system (swaras) and the concept of shuddha and vikrit notes. The book played a crucial role in standardizing the raga system and bridging the gap between ancient and medieval music traditions. It also discusses the classification of ragas, time theory, and the use of meend (glides). Its influence is seen in later works like Raga Vibodha and Chaturdandi Prakashika.
निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिये : [1+1+1 = 3]
- नाट्यशास्त्र के रचयिता का नाम लिखिये।
- नाट्यशास्त्र में वर्णित जातियों की कुल संख्या लिखिये।
- नाट्यशास्त्र में वर्णित चार रसों के नाम लिखिये।
Answer the following questions –
- Write the Author of Natyashastra.
- Total No. of Jatis mentioned in Natyashastra are:
- Write any four names of "Ras" mentioned in Natyashastra.
Answers:
- Author of Natyashastra: Bharata Muni (also known as Sage Bharata).
- Total number of Jatis: There are 7 Jatis (types of dramatic compositions) mentioned in Natyashastra.
- Four names of Rasas: Any four from the eight classical Rasas: Shringara (love), Hasya (comedy), Raudra (anger), Karuna (pathos), Vira (heroism), Bhayanaka (fear), Bibhatsa (disgust), Adbhuta (wonder). Example: Shringara, Hasya, Karuna, Vira.
राग केदार अथवा भीमपलासी का संपूर्ण परिचय लिखिए।
Write the complete Introduction of Raga 'Kedar' or 'Bhimpalasi'.
Complete Introduction of Raga Kedar:
- Thaat: Kalyan
- Jati: Sampurna – Sampurna (all seven notes in both ascending and descending)
- Aroha: S R G M P D N S'
- Avaroha: S' N D P M G R S
- Vadi Swar: Ma (Madhyam)
- Samvadi Swar: Sa (Shadaj)
- Time: First quarter of the night (6 PM – 9 PM)
- Pakad (Phrase): S R G M P M G R S
- Nature: Serious, devotional, and majestic. Often associated with Lord Shiva.
- Compositions: Many khayals and dhrupads are composed in Kedar.
OR
Complete Introduction of Raga Bhimpalasi:
- Thaat: Kafi
- Jati: Audava – Sampurna (five notes in ascent, seven in descent)
- Aroha: S G M P N S'
- Avaroha: S' N D P M G R S
- Vadi Swar: Ma (Madhyam)
- Samvadi Swar: Sa (Shadaj)
- Time: Afternoon (12 PM – 3 PM)
- Pakad (Phrase): S G M P M G R S
- Nature: Sweet, romantic, and melancholic. Often used in light classical and semi-classical forms.
- Compositions: Popular in thumri and khayal styles.
राग पहचानिए : [1+1+1 = 3]
- ग म ध प, ग म रे सा।
- ग म प, ग म ग, रे सा।
- ग म प, म ग, म ग रे सा।
Identify the Ragas:
- Ga Ma Dha Pa, Ga Ma Re Sa.
- Ga Ma Pa, Ga Ma Ga, Re Sa.
- Ga Ma Pa, Ma Ga, Ma Ga Re Sa.
Answers:
- Raga: Bhairav (or Bhairavi depending on context; the phrase suggests a raga with strong use of Ga, Ma, Dha, Pa, Re, Sa – typical of Bhairav thaat).
- Raga: Yaman (or Kalyan; the phrase Ga Ma Pa, Ga Ma Ga, Re Sa is characteristic of Yaman's ascent and descent).
- Raga: Bihag (or Bihagda; the phrase Ga Ma Pa, Ma Ga, Ma Ga Re Sa is a typical pakad of Bihag).
Note: The exact identification may vary slightly based on the full raga structure, but these are the most likely matches for the given note sequences.
7) ताल 'धमार' का परिचय, ठेका एवं दुगुन लिखिए। [3]
ताल धमार का परिचय: धमार ताल 14 मात्राओं का एक ताल है। इसमें 5 तालियाँ और 2 खालियाँ होती हैं। इसका ठेका 'धा धा टि टि टा टि टि टा टा टि टि टा' है। यह ताल मुख्यतः ध्रुपद गायन और वादन में प्रयोग होता है।
ठेका: धा – धा – टि – टि – टा – टि – टि – टा – टा – टि – टि – टा – टा – टि – टि – टा
दुगुन: दुगुन में प्रति मात्रा पर दो बोल बोले जाते हैं। उदाहरण: धाधा टिटि टाटि टिटा टाटि टिटा टाटि टिटा
अथवा
पाठ्यक्रम के किसी एक राग के छोटा ख्याल की स्वरलिपि लिखिए। [3]
राग यमन का छोटा ख्याल (आधारित):
स्थायी: नि रे गा मा पा धा नि सां | सां नि धा पा मा गा रे सा
अंतरा: गा मा पा धा नि सां रे सां | नि धा पा मा गा रे सा
नोट: यह एक सामान्य स्वरलिपि है; विद्यार्थी अपने पाठ्यक्रम के अनुसार किसी भी राग का चयन कर सकते हैं।
8) निम्न में से किसी एक संगीतज्ञ का जीवन परिचय लिखिये। [3]
i) उस्ताद अब्दुल करीम खाँ अथवा ii) उस्ताद फैयाज खाँ
उस्ताद अब्दुल करीम खाँ (1872-1937): वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक थे। उनका जन्म किराना घराने में हुआ। उन्होंने ख्याल, ठुमरी और भजन गायन में विशेष योगदान दिया। उनकी शैली में सुरों की स्पष्टता और भावपूर्ण प्रस्तुति प्रमुख थी। वे 'सप्तक के राजा' के नाम से भी जाने जाते हैं।
अथवा
उस्ताद फैयाज खाँ (1886-1950): वे आगरा घराने के प्रसिद्ध गायक थे। उनका जन्म आगरा में हुआ। उन्होंने ध्रुपद और ख्याल गायन में महारत हासिल की। उनकी आवाज़ में गंभीरता और तानों की विविधता प्रसिद्ध थी। उन्हें 'आगरा घराने का शेर' कहा जाता है।
भाग - B (सितार/सरोद/वायलिन/दिलरूबा अथवा इसराज/बांसुरी/गिटार)
निम्नलिखित की परिभाषा लिखिये: [1+1+1=3]
- ग्राम (Gram): ग्राम संगीत में स्वरों के एक निश्चित समूह को कहते हैं। यह मूलतः सात शुद्ध स्वरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) का एक क्रम है, जिससे विभिन्न रागों की उत्पत्ति होती है।
- मूर्च्छना (Moorchhana): मूर्च्छना का अर्थ है स्वरों के क्रम को बदलना या एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाना। यह राग के विस्तार में सहायक होती है और स्वरों के आरोह-अवरोह में परिवर्तन लाती है।
- ताल (Tala): ताल संगीत में समय के मापन की एक प्रणाली है। यह मात्राओं, तालियों और खालियों के माध्यम से लय को नियंत्रित करता है। प्रत्येक ताल का अपना एक निश्चित ठेका और चक्र होता है।
रागों के 'समय-सिद्धांत' को समझाईये। [3]
रागों का समय-सिद्धांत (Time-Theory of Raga): भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों को दिन और रात के विभिन्न समयों से जोड़ा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक राग का एक निश्चित समय होता है जब उसका प्रभाव सबसे अधिक होता है। यह वर्गीकरण मुख्यतः स्वरों की प्रकृति (जैसे कोमल या तीव्र) और वातावरण पर आधारित है। उदाहरण के लिए, राग भैरव सुबह के समय गाया जाता है, जबकि राग यमन रात के पहले प्रहर में। यह सिद्धांत रागों के मूड और ऋतुओं से भी संबंधित है, जिससे संगीत का आनंद बढ़ता है।
SS—6,63,64,65,66,67,68,69,70-Music (V&I) | 3
3. प्राचीन कालीन भारतीय संगीत के इतिहास को संक्षिप्त में समझाईये।
Explain the Ancient history of Indian music in brief.
प्राचीन भारतीय संगीत का इतिहास: प्राचीन भारतीय संगीत का इतिहास वैदिक काल से प्रारंभ होता है। वेदों में सामवेद को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है, जिसमें ऋचाओं का गायन विशेष स्वरों में किया जाता था। इसके बाद नाट्यशास्त्र (भरतमुनि) में संगीत के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें स्वर, राग, ताल और वाद्यों का उल्लेख है। गुप्त काल में संगीत को राजकीय संरक्षण मिला और अनेक ग्रंथों की रचना हुई। प्राचीन काल में संगीत मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों, नाटकों और राजदरबारों में प्रयुक्त होता था।
Ancient Indian Music History: The history of ancient Indian music begins with the Vedic period. The Samaveda is considered the root of music, where hymns were sung in specific notes. Later, the Natyashastra by Bharata Muni detailed the principles of music, including swaras, ragas, talas, and instruments. During the Gupta period, music received royal patronage, and many texts were composed. In ancient times, music was primarily used in religious rituals, dramas, and royal courts.
4. निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिये।
Answer the following questions.
i) अहोबल ने किस ग्रन्थ की रचना की?
Which treatise was written by Ahobal?
उत्तर: अहोबल ने "संगीत पारिजात" नामक ग्रन्थ की रचना की। यह ग्रन्थ हिंदुस्तानी संगीत के सिद्धांतों पर आधारित है और इसमें रागों, स्वरों तथा तालों का विस्तृत वर्णन है।
Answer: Ahobal composed the treatise "Sangeet Parijat". This text is based on the principles of Hindustani music and contains detailed descriptions of ragas, swaras, and talas.
ii) 'चतुर पंडित एवं मंजरीकार' के नाम के प्रसिद्ध संगीतज्ञ कौन थे?
Famous musician also known as Chatur Pandit and Manjrikar was?
उत्तर: 'चतुर पंडित' और 'मंजरीकार' के नाम से प्रसिद्ध संगीतज्ञ पंडित वी. एन. भातखंडे थे। उन्होंने संगीत शास्त्र पर अनेक ग्रंथ लिखे और हिंदुस्तानी संगीत के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Answer: The famous musician known as 'Chatur Pandit' and 'Manjrikar' was Pandit V. N. Bhatkhande. He wrote many texts on music theory and made significant contributions to the classification of Hindustani music.
5. राग 'भैरव' का संपूर्ण परिचय लिखिए।
Write the complete Introduction of Raga 'Bhairav'.
राग भैरव का परिचय:
- थाट: भैरव
- जाति: संपूर्ण-संपूर्ण (सात स्वर)
- आरोह: सा रे ग म प ध नि सां
- अवरोह: सां नि ध प म ग रे सा
- वादी स्वर: ध
- संवादी स्वर: रे
- समय: प्रातःकाल (सुबह 4-7 बजे)
- पकड़: सा रे ग म प ध प म ग रे सा
- विशेषता: यह एक गंभीर और शांत राग है, जिसमें रे और ध स्वर को कोमल रूप में गाया जाता है। यह भक्ति रस प्रधान राग है।
Introduction of Raga Bhairav:
- Thaat: Bhairav
- Jati: Sampurna-Sampurna (seven notes)
- Aroha: Sa Re Ga Ma Pa Dha Ni Sa'
- Avaroha: Sa' Ni Dha Pa Ma Ga Re Sa
- Vadi Swar: Dha
- Samvadi Swar: Re
- Time: Early morning (4-7 AM)
- Pakad: Sa Re Ga Ma Pa Dha Pa Ma Ga Re Sa
- Specialty: It is a serious and calm raga, where Re and Dha are sung in komal (flat) form. It is predominantly a raga of devotion (bhakti rasa).
6. अपने वाद्य का सचित्र वर्णन कीजिए।
Describe the parts of your instrument with diagram.
वाद्य का वर्णन (उदाहरण: तबला): तबला एक प्रमुख भारतीय ताल वाद्य है। इसमें दो भाग होते हैं:
- दायाँ तबला (दया): छोटा, लकड़ी का बना, जिसमें ऊपर चमड़ा मढ़ा होता है। इसे दाहिने हाथ से बजाया जाता है।
- बायाँ तबला (बायाँ): बड़ा, धातु या मिट्टी का बना, जिसमें गहरी ध्वनि होती है। इसे बाएँ हाथ से बजाया जाता है।
- सिरी (पुड़ी): ऊपरी चमड़े का भाग जिस पर बोल बजाए जाते हैं।
- गजरा: चमड़े की पट्टी जो सिरी को बाँधती है।
- लकड़ी का खोल: दाएँ तबले का आधार।
चित्र: [यहाँ एक सरल चित्र बनाएँ जिसमें दायाँ और बायाँ तबला दिखाया गया हो, भागों के नाम लिखे हों।]
Description of Instrument (Example: Tabla): Tabla is a major Indian percussion instrument. It has two parts:
- Dayan (Right Tabla): Small, made of wood, with a leather head. Played with the right hand.
- Bayan (Left Tabla): Larger, made of metal or clay, producing a deep sound. Played with the left hand.
- Pudi (Head): The upper leather part where bols are played.
- Gajra: Leather strap that binds the head.
- Wooden shell: The base of the dayan.
Diagram: [Draw a simple diagram showing the dayan and bayan with labels for parts.]
7. राग पहचानिये :
Identify the Ragas:
i) सा ध प ध, म प, म ग रे सा
Sa Dha Pa Dha, Ma Pa, Ma Ga Re Sa
उत्तर: यह स्वर समूह राग भैरवी का संकेत करता है। भैरवी में रे और ध को कोमल लगाया जाता है, और यह पकड़ विशिष्ट है।
Answer: This note sequence indicates Raga Bhairavi. In Bhairavi, Re and Dha are sung in komal form, and this pakad is characteristic.
ii) नि सा, म ग, म ग रे सा
Ni Sa, Ma Ga, Ma Ga Re Sa
उत्तर: यह स्वर समूह राग यमन का संकेत करता है। यमन में तीव्र मध्यम (म) का प्रयोग होता है और यह पकड़ राग की पहचान है।
Answer: This note sequence indicates Raga Yaman. Yaman uses teevra Madhyam (Ma), and this pakad is a signature of the raga.
iii) सा म, म प, म प ध प, म रे सा
Sa Ma, Ma Pa, Ma Pa Dha Pa, Ma Re Sa
उत्तर: यह स्वर समूह राग भूपाली का संकेत करता है। भूपाली में मध्यम (म) का प्रयोग विशेष रूप से होता है और यह पकड़ राग की सुंदरता को दर्शाती है।
Answer: This note sequence indicates Raga Bhupali. In Bhupali, Madhyam (Ma) is used prominently, and this pakad reflects the beauty of the raga.
प्रश्न 8
ताल 'झपताल' का परिचय, ठेका एवं दुगुन लिखिये। [1+1+1 = 3]
Write the introduction, Theka and Dugun of Tala "Jhaptal".
परिचय: झपताल एक 10 मात्राओं का ताल है। इसके 4 विभाग होते हैं जिनमें 2, 3, 2, 3 मात्राएँ होती हैं। इसकी ताली 1, 3, 8 पर और खाली 6 पर होती है।
ठेका: धी ना | धि धि ना | ती ना | धि धि ना |
दुगुन: दुगुन लय में प्रति मात्रा पर दो बोल बोले जाते हैं। उदाहरण: धी-ना-धि-धि-ना-ती-ना-धि-धि-ना (प्रत्येक मात्रा पर दो बोल)।
प्रश्न 9
अपने पाठ्यक्रम से किसी एक संगीतज्ञ का जीवन परिचय एवं संगीत जगत में योगदान लिखिए। [3]
Write the life sketch and contribution of any one musician of your syllabus in the field of music.
उदाहरण: पंडित भीमसेन जोशी
जीवन परिचय: पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गडग जिले में हुआ। वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक थे। उन्होंने संगीत की शिक्षा पंडित सवाई गंधर्व से ली।
योगदान: उन्होंने ख्याल गायन को नई ऊँचाइयाँ दीं। उनकी गायकी में भावपूर्णता और तकनीकी कौशल का अद्भुत समन्वय था। उन्हें भारत रत्न, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे सम्मान मिले।
भाग - C (तबला / पखवाज)
Part - C (Tabla / Pakhawaj)
प्रश्न 2
निम्न तालों का तुलनात्मक विवरण दीजिए। चौताल - 'एकताल' [2]
Give the comparison of following Talas ‘Chautala - 'Ektala'
| विशेषता | चौताल | एकताल |
|---|---|---|
| मात्राएँ | 12 | 12 |
| विभाग | 6 (2-2-2-2-2-2) | 6 (2-2-2-2-2-2) |
| ताली/खाली | ताली: 1,5,9,11; खाली: 3,7 | ताली: 1,5,9,11; खाली: 3,7 |
| प्रयोग | ध्रुपद गायन में | ख्याल गायन में |
प्रश्न 3
लयकारी को परिभाषित करते हुये, लयकारी के वर्गीकरण को संक्षेप में लिखिए। [2]
Write introduction of layakari with its classification.
परिभाषा: लयकारी का अर्थ है लय के साथ खेलना या लय में विविधता लाना। इसमें मूल लय को बदले बिना मात्राओं के विभाजन या समूहीकरण द्वारा नए लय पैटर्न बनाए जाते हैं।
वर्गीकरण: लयकारी के मुख्य प्रकार हैं:
- दुगुन: मूल लय की अपेक्षा दोगुनी गति
- तिगुन: मूल लय की अपेक्षा तिगुनी गति
- चौगुन: मूल लय की अपेक्षा चौगुनी गति
- आड़ी: विषम अनुपात में लय विभाजन
प्रश्न 4
प्राचीन भारतीय संगीत का संक्षिप्त इतिहास लिखिए। [3]
Write short history of ancient Indian Music.
प्राचीन भारतीय संगीत का इतिहास वैदिक काल से शुरू होता है। वेदों में सामगान का उल्लेख मिलता है। नाट्यशास्त्र (भरत मुनि) में संगीत का विस्तृत वर्णन है। प्राचीन काल में ग्राम, मूर्छना और जाति प्रणाली प्रचलित थी। मुख्य वाद्यों में वीणा, वेणु और मृदंग शामिल थे। इस काल में संगीत मुख्यतः धार्मिक और नाट्य प्रस्तुतियों से जुड़ा था।
प्रश्न 5
संगीत पारिजात के संदर्भ में मध्यकालीन संगीत का इतिहास लिखिए। [3]
Write the history of Medieval music in reference of Sangeet Parijat.
संगीत पारिजात मध्यकालीन संगीत का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना पंडित अहोबल ने 17वीं शताब्दी में की थी। इस ग्रंथ में रागों के वर्गीकरण, स्वरों के स्थान और तालों का विस्तृत वर्णन है। मध्यकाल में संगीत पर फारसी प्रभाव पड़ा और ख्याल, ठुमरी जैसी शैलियाँ विकसित हुईं। संगीत पारिजात ने हिंदुस्तानी संगीत के सिद्धांतों को व्यवस्थित किया और राग-रागिनी प्रणाली को स्पष्ट किया।
प्रश्न 6
ताल 'तिलवाड़ा' एवं 'तीनताल' का पूर्ण विवरण ठेका सहित लिखिए। [2+2 = 4]
Describe Tala "Tilwara' and 'Teentala' with theka.
तिलवाड़ा ताल
परिचय: 16 मात्राओं का ताल, 4 विभाग (4-4-4-4), ताली: 1,5,13; खाली: 9
ठेका: धा ति ति धा | धा ति ति धा | ता ति ति ता | धा ति ति धा |
तीनताल
परिचय: 16 मात्राओं का ताल, 4 विभाग (4-4-4-4), ताली: 1,5,13; खाली: 9
ठेका: धा धिन धिन धा | धा धिन धिन धा | ता तिन तिन ता | ता धिन धिन धा |
6) ताल झपताल' एवं सुलताल' को ठेका, दुगुन चौगुन सहित लिखिए। [1½+1½=3]
Write Tala - 'Jhaptal' and 'Sooltal' with theka, Dugun and Chaugun.
झपताल (Jhaptal) – 10 मात्राएँ
ठेका (Theka): धिन् ना | धिन् धिन् ना | तिन् ना | धिन् धिन् ना
दुगुन (Dugun): धिन्ना धिन्धिन्ना तिन्ना धिन्धिन्ना | धिन्ना धिन्धिन्ना तिन्ना धिन्धिन्ना
चौगुन (Chaugun): धिन्नाधिन्धिन्नातिन्नाधिन्धिन्ना | धिन्नाधिन्धिन्नातिन्नाधिन्धिन्ना | धिन्नाधिन्धिन्नातिन्नाधिन्धिन्ना | धिन्नाधिन्धिन्नातिन्नाधिन्धिन्ना
सुलताल (Sooltal) – 10 मात्राएँ
ठेका (Theka): धा धा धिन् तिन् ता | तिन् धिन् धा धा धिन्
दुगुन (Dugun): धाधाधिन्तिन्ता तिन्धिन्धाधाधिन् | धाधाधिन्तिन्ता तिन्धिन्धाधाधिन्
चौगुन (Chaugun): धाधाधिन्तिन्तातिन्धिन्धाधाधिन् | धाधाधिन्तिन्तातिन्धिन्धाधाधिन् | धाधाधिन्तिन्तातिन्धिन्धाधाधिन् | धाधाधिन्तिन्तातिन्धिन्धाधाधिन्
7) निम्न बोल से ताल पहचानकर नाम लिखिये। [1+1+1=3]
Identify tala from the given Bols and write their names.
- तिंतिना (Tin Tin Na) – ताल: तीनताल (Teental)
- ता तिरकिट धिन धिन (Ta Tirkit Dhin Dhin) – ताल: झपताल (Jhaptal)
- धिन धिन ना (Dhin Dhin Na) – ताल: एकताल (Ektaal)
8) किसी एक संगीतज्ञ का पूर्ण जीवन परिचय लिखिये। [4]
Write the life sketch of any one musician of the following.
- i) हबीबुद्दीन खान (Habibuddin Khan)
- ii) नत्थन खाँ (Natthan Khan)
हबीबुद्दीन खान (Habibuddin Khan) का जीवन परिचय
हबीबुद्दीन खान (1899-1978) एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ थे, जो सितार वादन में निपुण थे। उनका जन्म राजस्थान के जयपुर में हुआ था। उन्होंने अपने पिता उस्ताद मोहम्मद खान से संगीत की शिक्षा ली। हबीबुद्दीन खान जयपुर घराने के प्रमुख सितार वादक थे। उन्होंने कई वर्षों तक आकाशवाणी जयपुर में कार्य किया और अनेक शिष्यों को संगीत की शिक्षा दी। उनकी शैली में गायकी अंग का प्रभाव स्पष्ट था। उन्हें 1970 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके प्रमुख शिष्यों में पंडित रविशंकर और उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान शामिल हैं।
अथवा
नत्थन खाँ (Natthan Khan) का जीवन परिचय
नत्थन खाँ (1920-2000) एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायक थे, जो ख्याल गायन में माहिर थे। उनका जन्म राजस्थान के बीकानेर में हुआ था। उन्होंने अपने पिता उस्ताद मोहम्मद हुसैन खाँ से संगीत की शिक्षा ली। नत्थन खाँ जयपुर-अतरौली घराने के प्रमुख गायक थे। उन्होंने कई वर्षों तक आकाशवाणी जयपुर और दिल्ली में कार्य किया। उनकी गायन शैली में बड़ा ख्याल और छोटा ख्याल दोनों का समावेश था। उन्हें 1985 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके प्रमुख शिष्यों में पंडित जसराज और उस्ताद राशिद खान शामिल हैं।