RBSE Class 12th 2017 Hindi Sahitya-SS-21-2017 Previous Year Papers

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2017
Subject Hindi Sahitya-SS-21-2017
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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RBSE Class 12th 2017 Hindi Sahitya-SS-21-2017

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Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-2017 2017 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2017
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2017

हिन्दी साहित्य

समय : 3¼ घण्टे    पूर्णांक : 80


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
  2. सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
  4. जिन प्रश्नों में आंतरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
  5. उत्तर यथासम्भव निर्धारित शब्द-सीमा में ही सुपाठ्य लिखें।

No. of Questions : 3    No. of Printed Pages : 7

प्रश्न पत्र कोड : SS-21-Hindi Sah.

खण्ड - अ

1) निम्न पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(उत्तर सीमा 30 शब्द)

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है;
दो राह, समय के रथ का नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
गंत से महलों की नींव उखड़ जाती है।
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है;
जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राव्द का अंधकार
बीता, गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं,
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजेय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते आते हैं।
  1. क) पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

    उत्तर: 'जनता की शक्ति' या 'जनता का आगमन'।

  2. ख) भूडोल और बवंडर कब उठते हैं?

    उत्तर: भूडोल और बवंडर तब उठते हैं जब जनता क्रोधित होकर भौंहें चढ़ाती है, अर्थात जब जनता में असंतोष और विद्रोह की भावना जागृत होती है।

  3. ग) 'कोपाकुल' शब्द का विश्लेषण कीजिए।

    उत्तर: 'कोपाकुल' शब्द 'कोप' (क्रोध) और 'आकुल' (व्याकुल) के योग से बना है, जिसका अर्थ है क्रोध से व्याकुल या अत्यधिक क्रोधित।

  4. घ) जनता के कोप का क्या असर होता है?

    उत्तर: जनता के कोप से महलों की नींव उखड़ जाती है और ताज (सत्ता) हवा में उड़ जाता है, अर्थात सत्ता और शासन नष्ट हो जाता है।

  5. छ) तिमिर का वक्ष चीरकर कौन आ रहा है?

    उत्तर: तिमिर (अंधकार) का वक्ष चीरकर जनता के अजेय स्वप्न आ रहे हैं, जो उमड़ते हुए प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं।

निम्न गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

(उत्तर सीमा 20 शब्द)

हम साहित्यकारों में कर्मशक्ति का अभाव है। यह एक कड़वी सच्चाई है, पर हम उसकी ओर से आँखें नहीं बन्द कर सकते। अभी तक हमने साहित्य का जो आदर्श अपने सामने रखा था, उसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी; कर्माभाव ही उसका गुण था, क्योंकि अक्सर कर्म अपने साथ पक्षपात और संकीर्णता को भी लाता है। अगर कोई आदमी धार्मिक होकर अपनी धार्मिकता पर गर्व करे, तो इससे कहीं अच्छा है कि वह धार्मिक न होकर "खाओ-पीओ मौज करो" का कायल हो। ऐसा स्वच्छन्दाचारी तो ईश्वर की दया का अधिकारी हो भी सकता है, पर धार्मिकता का अभिमान रखने वाले के लिए इसकी सम्भावना नहीं। जो हो, जब तक साहित्य का काम केवल मन-बहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियाँ गा-गाकर सुलाना, केवल आँसू बहाकर जी हलका करना था, तब तक इसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी।

  1. गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

    उत्तर: साहित्य और कर्म का अभाव

  2. लेखक के अनुसार कड़वी सच्चाई क्या है?

    उत्तर: लेखक के अनुसार कड़वी सच्चाई यह है कि साहित्यकारों में कर्मशक्ति का अभाव है।

  3. कर्म अपने साथ क्या लेकर आता है?

    उत्तर: कर्म अपने साथ पक्षपात और संकीर्णता को लेकर आता है।

  4. धार्मिकता का अभिमान करने वाले के लिए क्या संभव नहीं है?

    उत्तर: धार्मिकता का अभिमान करने वाले के लिए ईश्वर की दया का अधिकारी होना संभव नहीं है।

  5. साहित्य में किसकी प्रधानता होनी चाहिए?

    उत्तर: साहित्य में कर्म की प्रधानता होनी चाहिए।


खण्ड - ब

किसी एक विषय पर लगभग 450 शब्दों में निबन्ध लिखिए।

  1. राजनीति में युवाशक्ति
  2. वैश्विक परिवेश में आतंकवाद
  3. देश की वर्तमान शिक्षा नीति
  4. समाज एवं राष्ट्र के विकास में नारी की बढ़ती भूमिका

निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 20-20 शब्दों में लिखिए।

  1. अच्छे लेखन की एक विशेषता बताइये।

    उत्तर: अच्छे लेखन की एक विशेषता स्पष्टता है, जिससे पाठक को लेखक का भाव सरलता से समझ में आता है।

  2. रेडियो माध्यम की किसी एक असुविधा को इंगित कीजिए।

    उत्तर: रेडियो माध्यम की एक असुविधा यह है कि इसमें दृश्य का अभाव होता है, जिससे जानकारी अधूरी रह सकती है।

  3. समाचार लेखन की सबसे लोकप्रिय एवं उपयोगी शैली कौनसी है?

    उत्तर: समाचार लेखन की सबसे लोकप्रिय एवं उपयोगी शैली उल्टा पिरामिड शैली है।

  4. टिप्पणी किसे कहते हैं?

    उत्तर: टिप्पणी किसी विषय पर संक्षिप्त, सारगर्भित एवं तर्कपूर्ण विचार को कहते हैं।

खण्ड - 'a'

5) कैसे बनती है 'कविता' पाठ के आधार पर बताइये कि कविता के निर्माण में किन-किन तत्वों का समावेश किया जाता है? अपने मनपसंद विषय पर 8 पंक्तियों की कविता लिखिए। [4]

कविता के निर्माण में सम्मिलित तत्व:

  • भावना (Emotion): कविता में कवि की भावनाओं का सजीव चित्रण होता है।
  • कल्पना (Imagination): कवि अपनी कल्पना शक्ति से नए-नए बिंब और दृश्य रचता है।
  • भाषा और शैली (Language & Style): सरल, प्रवाहमयी और लयात्मक भाषा का प्रयोग किया जाता है।
  • छंद और लय (Meter & Rhythm): कविता में एक निश्चित लय और छंद होता है जो उसे संगीतमय बनाता है।
  • बिंब और प्रतीक (Imagery & Symbols): कविता में बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से गहरे अर्थ व्यक्त किए जाते हैं।
  • विषय (Theme): कविता का एक केंद्रीय विषय होता है जिसके चारों ओर पूरी रचना घूमती है।
  • अलंकार (Figures of Speech): उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग कविता को सुंदर बनाता है।
  • संवेदना (Sensitivity): कवि की संवेदनशीलता कविता को जीवंत और प्रभावशाली बनाती है।

मनपसंद विषय पर 8 पंक्तियों की कविता (विषय: प्रकृति):

हरी-भरी यह धरती माँ, सुंदर सा यह संसार।
खिलते फूलों की महक, बहती हवा का प्यार।।

चाँद-तारों की चाँदनी, सूरज की किरणें उजियार।
नदियों का कल-कल नाद, पक्षियों का गीत अपार।।

पेड़ों की छाँव सुहानी, फल-फूलों का भंडार।
प्रकृति का यह उपहार, हम सबका है अधिकार।।

इसे बचाना है हमें, करना है इसका सम्मान।
तभी बचेगा यह जग, मिलेगा हमें सुख-शांति का वरदान।।

6) निम्न पद्यांशों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : [7]

पद्यांश:

947 के बाद से
इतने लोगों को इतने तरीकों से
आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है
fe अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है
पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए
तो जान लेता हूँ
मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है
मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कंगाल या कोढ़ी
या मैं भला चंगा हूँ और कामचोर और
एक मामूली धोखेबाज
लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी
या गुस्से पर आश्रित
तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज निराकांक्षी
मैने अपने आपको हटा लिया है हर होड़ से
मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं
मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम
कम से कम एक आदमी से तो निश्चित रह सकते हो

सप्रसंग व्याख्या:

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य की एक प्रसिद्ध कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने समाज में व्याप्त गरीबी, भिखारियों की मानसिकता और उनके प्रति समाज के दृष्टिकोण पर गहरी चोट की है। कवि यह बताना चाहता है कि भीख माँगने वाला व्यक्ति भी एक ईमानदार इंसान है जो अपनी लाचारी स्वीकार करता है।

व्याख्या: कवि कहता है कि 1947 के बाद से उसने अनेक लोगों को आत्मनिर्भर, धनवान और गतिशील होते देखा है। लेकिन अब जब कोई व्यक्ति पच्चीस पैसे, एक चाय या दो रोटी के लिए हाथ फैलाता है, तो कवि समझ जाता है कि उसके सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है। वह व्यक्ति स्वीकार करता है कि वह लाचार, कंगाल या कोढ़ी है, या फिर वह भला-चंगा होते हुए भी कामचोर और एक मामूली धोखेबाज है। लेकिन वह पूरी तरह से दूसरों के संकोच, लज्जा, परेशानी या गुस्से पर आश्रित है। वह अपने आपको हर होड़ से हटा चुका है और किसी का विरोधी, प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं है। कवि कहता है कि चाहे तुम उसे कुछ दो या न दो, तुम कम से कम एक आदमी से तो निश्चित रह सकते हो।

भाव-सौंदर्य: इस पद्यांश में कवि ने भिखारियों की मानसिकता और समाज की उपेक्षा को बड़ी मार्मिकता से चित्रित किया है। भाषा सरल और प्रभावशाली है। कवि ने 'नंगा', 'निर्लज्ज', 'निराकांक्षी' जैसे शब्दों से भिखारी की विवशता को उजागर किया है। यह पद्यांश समाज के प्रति एक गहरा संदेश देता है कि हमें भिखारियों को भी इंसान समझना चाहिए।

[55-2]--तागत Sah. 822

7.

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सब सूला।।
सुनि बन गवनु रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
पानहिन्ह पयादेहिं पाएँ। साखि ऐहि घाएँ।।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर न बेहू।।
अब सबु आँखिन्ह देखिअत जिअत जीव जड़ सहाई।।
निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं विषम तापस तीछी।।

निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए :

क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ए काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।।

उपर्युक्त पंक्तियों का भाव-सौन्दर्य लिखिए। [2]

भाव-सौन्दर्य : इन पंक्तियों में एक विरहिणी नायिका अपने संदेशवाहक (भँवरे या कौए) से कहती है कि तुम मेरे प्रियतम से कह देना कि जो स्त्री विरह में जलकर मर गई, उसके धुएँ का ही मुझे स्पर्श हुआ है। अर्थात् उस विरहिणी की मृत्यु के बाद भी मैं उसी दुःख को झेल रही हूँ। इसमें विरह की तीव्रता और करुणा का अद्भुत चित्रण है।

ख) हेम कुंभ ले उषा सवेरे – भरती ढुलकाती सुख भरे।
मंदिर में रहते जब – जगकर रजनी भर तारा।।

उपर्युक्त पंक्तियों का शिल्प-सौन्दर्य लिखिए। [2]

शिल्प-सौन्दर्य : इन पंक्तियों में उषा (सुबह) को 'हेम कुंभ' (स्वर्ण कलश) लेकर सुख भरती और ढुलकाती दिखाया गया है, जो एक सुंदर रूपक है। 'रजनी भर तारा जगकर' में मानवीकरण अलंकार है। भाषा में चित्रात्मकता और लयात्मकता है। प्रतीकों के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य का मनोहारी वर्णन किया गया है।

8. निम्न प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए :

क) मैने देखा एक बूँद कविता के माध्यम से कवि अज्ञेय ने बूँद एवं सागर के सन्दर्भ में कौनसे दर्शन का प्रतिपादन किया है? [2]

कवि अज्ञेय ने 'मैने देखा एक बूँद' कविता में बूँद और सागर के माध्यम से अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया है। बूँद (व्यक्ति) और सागर (ब्रह्म) में कोई भेद नहीं है। बूँद सागर में मिलकर अपना अस्तित्व नहीं खोती, बल्कि सागर ही बूँद में समाया है। यह जीव और ब्रह्म की एकता का दार्शनिक संदेश है।

ख) पसिन्धु तरयो उनको बनरा .......... ? पद्यांश में अंगद द्वारा राम के प्रताप का वर्णन किया गया है, इसे अपने शब्दों में लिखिए। [2]

अंगद ने रावण के दरबार में राम के प्रताप का वर्णन करते हुए कहा कि उन्होंने (राम ने) समुद्र को पार कर लिया, वनवासियों (बंदरों) की सहायता से लंका पर चढ़ाई की। राम के बाणों के सामने कोई टिक नहीं सकता। उनकी शक्ति अपार है और वे धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं। अतः रावण को राम से संधि कर लेनी चाहिए।

खण्ड - 'अ'

9) निम्न गद्यांशों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : [7]

गद्यांश 1:

बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारूण वारा के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रूद्ध अज्ञात जल स्रोत से रस खींचकर सरस बना हुआ है और मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरी कांतार में भी ऐसा मस्त बना है कि ईर्ष्या होती है। कितनी कठिन जीवनी-शक्ति है। प्राण ही प्राण को पुलकित करता है, जीवनी शक्ति ही जीवनी-शक्ति को प्रेरणा देती है। दूर पर्वतराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ हैं, वहीं कहीं भगवान महादेव समाधि लगाकर बैठे होंगे; नीचे सपाट पथरीली जमीन का मैदान है, कहीं - कहीं पर्वतनंदिनी सरिताएँ आगे बढ़ने का रास्ता खोज रही होंगी - बीच में यह चट्टानों की खाबड़ जटाभूमि है - सूखी, नीरस कठोर।

सप्रसंग व्याख्या:

संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक 'हजारी प्रसाद द्विवेदी' द्वारा रचित निबंध 'कुटज' से लिया गया है।

प्रसंग: लेखक ने यहाँ कठोर से कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहने वाले कुटज पुष्प की जीवनी-शक्ति का वर्णन किया है। वह इसकी तुलना मानवीय दुर्गुणों और कठिनाइयों से करते हुए इसकी अद्भुत सहनशक्ति पर मुग्ध हैं।

व्याख्या: लेखक कुटज की हरियाली और सौंदर्य को देखकर मोहित हो जाता है। वह कहता है कि चारों ओर यमराज के भयानक प्रहारों जैसी गर्म हवाएँ चल रही हैं, फिर भी यह पौधा हरा-भरा है। यह दुर्जन के मन से भी अधिक कठोर पत्थर की कालकोठरी में बंद होकर भी किसी अज्ञात जल स्रोत से रस खींचकर अपने को सरस बनाए हुए है। मूर्ख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने पहाड़ी जंगल में भी यह इतना मस्त है कि देखने वाले को ईर्ष्या होती है। लेखक इसकी जीवनी-शक्ति की प्रशंसा करता है। वह कहता है कि प्राण ही प्राण को प्रेरित करता है। दूर हिमालय की बर्फीली चोटियाँ हैं, जहाँ भगवान शिव समाधि में बैठे होंगे; नीचे समतल पथरीला मैदान है, जहाँ पर्वत की बेटियाँ नदियाँ आगे बढ़ने का रास्ता खोज रही होंगी; और बीच में यह चट्टानों की ऊबड़-खाबड़ भूमि है - सूखी, नीरस और कठोर। इस प्रकार लेखक ने कुटज की जीवटता और सौंदर्य का सजीव चित्रण किया है।

गद्यांश 2:

यदि समाज में मानव-संबंध वही होते जो कवि चाहता है, तो शायद उसे प्रजापति बनने की जरूरत न पड़ती। उसके असंतोष की जड़ ये मानव - संबंध ही हैं। मानव - संबंधों से परे साहित्य नहीं है। कवि जब विधाता पर साहित्य रचता है, तब उसे भी मानव-संबंधों की परिधि में खींच लाता है। इन मानव -संबंधों की दास्ताँ से ही हैमलेट की कवि सुलभ सहानुभूति टकराती है और शेक्सपियर एक महान ट्रेजेडी की सृष्टि करता है। ऐसे समय जब समाज के बहुसंख्यक लोगों का जीवन इन मानव संबंधों के पिंजड़े में पंख फड़फड़ाने लगे, सींकचे तोड़कर बाहर उड़ने के लिए आतुर हो उठे, उस समय कवि का प्रजापति रूप और भी स्पष्ट हो उठता है। वह समाज के द्रष्टा और नियामक के मानव-विहग से क्षुब्ध और रूद्धस्वर को वाणी देता है।

सप्रसंग व्याख्या:

संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक 'रामचंद्र शुक्ल' द्वारा रचित निबंध 'कवि क्या करता है' से लिया गया है।

प्रसंग: लेखक यहाँ कवि के समाज में सृजनात्मक और नियामक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि कवि मानव-संबंधों की विसंगतियों को देखकर ही साहित्य की रचना करता है और समाज को दिशा देता है।

व्याख्या: लेखक कहते हैं कि यदि समाज में मानव-संबंध वैसे ही होते जैसे कवि चाहता है, तो उसे प्रजापति (सृष्टिकर्ता) बनने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कवि का असंतोष इन्हीं मानव-संबंधों से उत्पन्न होता है। साहित्य मानव-संबंधों से परे नहीं है। जब कवि ईश्वर पर साहित्य रचता है, तब भी वह उसे मानव-संबंधों के दायरे में ले आता है। शेक्सपियर ने 'हैमलेट' जैसी महान त्रासदी की रचना मानव-संबंधों की कहानी से ही की है। जब समाज के अधिकांश लोग मानव-संबंधों के पिंजरे में बंद होकर तड़पने लगते हैं और उन्हें तोड़कर बाहर निकलने के लिए आतुर हो जाते हैं, तब कवि का प्रजापति रूप और भी स्पष्ट हो जाता है। वह समाज के द्रष्टा और नियामक के रूप में मानव-पक्षी की क्षुब्ध और दबी हुई आवाज को वाणी प्रदान करता है।

0) निम्न में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लिखिए : [2×2=4]

(उत्तर सीमा लगभग 50 शब्द)

(क) प्रेमघन की छाया स्मृति नामक संस्मरण के लेखक शुक्ल जी ने उनकी विनोदप्रियता को भी उजागर किया है। बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन' की विनोदप्रियता का उदाहरण पाठ के आधार पर प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: प्रेमघन की विनोदप्रियता का एक उदाहरण यह है कि एक बार वे अपने मित्र के यहाँ गए। वहाँ उन्होंने देखा कि मित्र की पत्नी उन्हें देखकर घबरा गईं और उनके सामने आने से कतराने लगीं। तब प्रेमघन ने हँसते हुए कहा, "बहनजी, आप इतना क्यों घबराती हैं? मैं कोई ससुराल का लड़का नहीं हूँ जो आपको देखकर भागूँ।" इस प्रकार उन्होंने अपनी हँसी-मजाक से माहौल को सहज बना दिया।

(ख) पत्थर पूजे हरि मिलें, तो तू पूज पहार।
इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।
कबीर के इस दोहे से आप कहाँ तक सहमत हैं? अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: कबीर के इस दोहे से मैं पूरी तरह सहमत हूँ। कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो पहाड़ की पूजा करनी चाहिए। उससे तो चक्की अच्छी है, जो अन्न पीसकर संसार का पेट भरती है। कबीर ने बाहरी आडंबर और मूर्ति-पूजा की निरर्थकता पर व्यंग्य किया है। उनके अनुसार, सच्ची भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम और मानव-सेवा में है, न कि निर्जीव वस्तुओं की पूजा में। चक्की कम से कम समाज के लिए उपयोगी है, जबकि पत्थर पूजने से कोई लाभ नहीं।

(ग) असगर वजाहत की कहानी साझा में हाथी ने किसान से गन्ने की फसल का बँटवारा कैसे किया ? कहानी में 'हाथी' के प्रतीकार्थ को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: असगर वजाहत की कहानी 'साझा' में हाथी ने किसान से गन्ने की फसल का बँटवारा इस प्रकार किया: हाथी ने कहा कि फसल के ऊपरी हिस्से का मालिक वह होगा और निचले हिस्से का मालिक किसान। किसान ने यह शर्त मान ली। जब फसल तैयार हुई, तो हाथी ने गन्ने के ऊपरी हिस्से (पत्ते) ले लिए और किसान को निचला हिस्सा (जड़) मिला। इस प्रकार हाथी ने किसान को धोखा दिया। 'हाथी' का प्रतीकार्थ शोषक वर्ग या सत्ता है, जो अपनी ताकत के बल पर कमजोर किसान का शोषण करता है।

(घ) कवि घनानन्द अथवा फणीश्वरनाथ रेणु' का साहित्यिक परिचय दीजिए। [4]

उत्तर: घनानन्द: घनानन्द रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हैं। इनका जन्म संवत 1746 में हुआ था। ये 'आनन्दघन' उपनाम से भी जाने जाते हैं। इनकी रचनाओं में शृंगार रस की प्रधानता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'सुजानसागर', 'वियोग बेलि', 'प्रेम पत्रिका' आदि हैं। इनकी भाषा ब्रजभाषा है और इन्होंने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुंदर चित्रण किया है।

अथवा

फणी

खण्ड - 'अ'

2) निम्न प्रश्नों में किन्हीं चार के उत्तर (प्रत्येक को) लगभग 50 शब्दों में लिखिए : [4×2 = 8]

(क) “आरोहण पहाड़ी लोगों की जीवनचर्या का भाग है, किन्तु वही आरोहण किसी को नौकरी भी दिला सकता है।” पाठ के आधार पर बताइये।

पहाड़ी लोगों के लिए आरोहण उनकी दैनिक जीवनचर्या का अभिन्न अंग है, क्योंकि वे ऊँचे-नीचे रास्तों पर चलने के आदी होते हैं। यही आरोहण उनके लिए रोजगार का साधन भी बन सकता है, जैसे पर्यटन क्षेत्र में गाइड का कार्य या सेना/अर्धसैनिक बलों में भर्ती होना, जहाँ शारीरिक सहनशक्ति और पहाड़ी क्षेत्रों का ज्ञान काम आता है।

(ख) 'माँ की ममता किसी प्रयोजन या उद्देश्य के लिए है' – 'बिस्कोहर की माटी' पाठ में लेखक ने माँ की ममता का वर्णन किस उदाहरण से किया है?

लेखक ने माँ की ममता का वर्णन एक माँ के अपने बच्चे के प्रति निःस्वार्थ प्रेम के उदाहरण से किया है। माँ अपने बच्चे को दूध पिलाती है, उसकी देखभाल करती है, बिना किसी बदले की अपेक्षा के। यह ममता किसी प्रयोजन या उद्देश्य से प्रेरित नहीं होती, बल्कि स्वाभाविक और निस्वार्थ होती है।

(ग) 'अपना मालवा' पाठ के आधार पर “उजाड़ू सभ्यता” का आशय स्पष्ट करें।

“उजाड़ू सभ्यता” से तात्पर्य उस सभ्यता से है जो अपने विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करके पर्यावरण को नष्ट करती है। यह सभ्यता विकास के नाम पर जंगलों, नदियों और पहाड़ों को उजाड़ती है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है और मानव जीवन संकट में पड़ जाता है।

(घ) “डग-डग रोटी, पग-पग नीर” – यह उक्ति किसके बारे में कही गई है व क्यों?

यह उक्ति पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बारे में कही गई है। पहाड़ी इलाकों में जीवन कठिन होता है, जहाँ हर कदम पर पानी और हर डग पर रोटी (भोजन) की चिंता बनी रहती है। यह वाक्य पहाड़ी लोगों की दैनिक जीवन की कठिनाइयों और संघर्ष को दर्शाता है।

(ङ) ऐसे कितने फूल थे जिनकी चर्चा फूलों के रूप में नहीं होती? 'बिस्कोहर की माटी' पाठ के आधार पर इन फूलों के बारे में लिखिए।

पाठ में ऐसे चार फूलों की चर्चा है जिनकी गिनती सामान्य फूलों में नहीं होती – ये हैं: बनफूल, जंगली गुलाब, बेला और चमेली। ये फूल जंगलों में स्वतः उगते हैं और इनकी सुंदरता तथा सुगंध अद्वितीय होती है। लेखक इन फूलों को प्रकृति की अनमोल देन मानते हैं, जो मानवीय हस्तक्षेप के बिना ही खिलते हैं।

3) “भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय से कम अपमान की बात नहीं है।” 'बावा की झोंपड़ी' पाठ से उद्धृत इस कथन की आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विवेचना कीजिए। [6]

यह कथन भिखारियों के लिए धन संचय को पाप संचय के समान अपमानजनक बताता है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसकी विवेचना इस प्रकार है:

  • सामाजिक दृष्टिकोण: आज भी समाज में भिखारियों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। धन संचय करना उनके लिए और अधिक अपमानजनक हो जाता है क्योंकि समाज उन्हें आलसी या ठग समझता है।
  • आर्थिक दृष्टिकोण: भिखारी अक्सर अत्यधिक गरीबी के कारण भीख मांगने को मजबूर होते हैं। यदि वे धन संचय करते हैं तो उन पर शोषण का आरोप लगता है, जबकि वास्तव में वे अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए ऐसा करते हैं।
  • नैतिक दृष्टिकोण: यह कथन इस बात पर जोर देता है कि भिखारियों के लिए धन संचय करना पाप के समान है क्योंकि वे दूसरों की दया पर जीते हैं। आधुनिक समाज में इसे एक नकारात्मक दृष्टिकोण माना जाता है, जो भिखारियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है।
  • समाधान: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इस समस्या का समाधान सरकारी योजनाओं, पुनर्वास कार्यक्रमों और कौशल विकास प्रशिक्षण के माध्यम से भिखारियों को मुख्यधारा में लाना है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और उन्हें भीख मांगने की मजबूरी न हो।

इस प्रकार, यह कथन आज भी प्रासंगिक है और भिखारियों की दुर्दशा को उजागर करता है, साथ ही समाज को उनके प्रति संवेदनशील बनने की आवश्यकता पर बल देता है।