RBSE Class 12th 2018 Hindi Sahitya-SS-21-2018 Previous Year Papers
You opened the RBSE Class 12th 2018 Hindi Sahitya-SS-21-2018 Previous Year Papers page — a focused place to read the real previous year question paper for that subject and year. RBSE Solution keeps exam-year sets together so you can practise the same cycle your seniors faced.
Previous year papers reward patience: read instructions, note mark distribution, then attempt questions before peeking at solutions elsewhere on the site. This URL always loads the same free previous year papers content for Hindi Sahitya-SS-21-2018 (2018).
Use the details table to confirm class and year, then scroll to the paper images or PDF below. More subjects from 2018 are linked later on this page.
Paper details
Quick reference for this previous year papers page — confirm board, class, and year & subject before you study.
| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2018 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-2018 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
The table summarises this Previous Year Papers resource. Confirm RBSE, Class 12th, year 2018, and subject Hindi Sahitya-SS-21-2018 before studying.
RBSE Solution organises previous year papers so each URL carries chapter-specific guidance — better for students and for search engines than one generic paragraph for the whole class.
How to practise with this question paper
Stage one: read the Hindi Sahitya-SS-21-2018 question paper from 2018 without a timer and highlight command words — explain, prove, calculate, discuss. Stage two: attempt selected questions closed-book. Stage three: compare with solutions or teacher feedback.
Previous Year Papers work best when you log mistakes by topic, not only by question number. That log becomes your revision index before pre-boards.
RBSE Class 12th 2018 Hindi Sahitya-SS-21-2018
Scroll through the Previous Year Papers pages for Hindi Sahitya-SS-21-2018 (2018).
Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-2018 2018 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2018
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2018
हिन्दी साहित्य
समय : 3¼ घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आंतरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
- उत्तर यथासम्भव निर्धारित शब्द-सीमा में ही सुपाठ्य लिखें।
No. of Questions : 26 No. of Printed Pages : 7
Roll No. : _______________ SLNo. : _______________
SS—21—Hindi Sah. 056
खण्ड-अ
1. द्विवेदी युग के प्रमुख कवियों का परिचय दीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
द्विवेदी युग (1900-1920 ई.) के प्रमुख कवि हैं:
- मैथिलीशरण गुप्त – 'भारत-भारती' के रचयिता, राष्ट्रीय चेतना के कवि।
- अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' – 'प्रियप्रवास' के रचयिता, ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि।
- रामनरेश त्रिपाठी – 'पथिक' और 'मिलन' जैसी कृतियों के लिए जाने जाते हैं।
- रामचंद्र शुक्ल – आलोचक और कवि, 'हिंदी साहित्य का इतिहास' के लेखक।
इन कवियों ने खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया और राष्ट्रीय जागरण में योगदान दिया।
2. नाटककार के रूप में जयशंकर प्रसाद का मूल्यांकन कीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ नाटककार हैं। उनके प्रमुख नाटक हैं – 'चंद्रगुप्त', 'स्कंदगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी' और 'अजातशत्रु'।
- उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों को आधार बनाकर राष्ट्रीय चेतना का विकास किया।
- पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण और संवादों में काव्यात्मकता उनकी विशेषता है।
- उनके नाटकों में आदर्श और यथार्थ का सुंदर समन्वय मिलता है।
प्रसाद ने हिंदी नाटक को एक नई दिशा दी और उसे साहित्य की प्रमुख विधा के रूप में स्थापित किया।
3. जीवनी एवं आत्मकथा विधा की परिभाषा देते हुए अंतर स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
जीवनी: किसी व्यक्ति के जीवन-चरित्र का वर्णन जो दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखा जाता है।
आत्मकथा: स्वयं अपने जीवन का वर्णन जो लेखक स्वयं लिखता है।
अंतर:
- जीवनी में लेखक और विषय भिन्न होते हैं, जबकि आत्मकथा में दोनों एक ही होते हैं।
- जीवनी में वस्तुनिष्ठता अधिक होती है, आत्मकथा में आत्मनिष्ठता।
- जीवनी में शोध और तथ्यों पर बल, आत्मकथा में व्यक्तिगत अनुभवों पर।
4. छायावादोत्तर हिंदी काव्य परंपरा का विवेचन कीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
छायावादोत्तर काल (1936 ई. के बाद) में हिंदी काव्य में नई प्रवृत्तियाँ उभरीं:
- प्रगतिवाद: समाजवादी चेतना, शोषण-विरोध (नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल)।
- प्रयोगवाद: नए प्रयोग और बिंब-विधान (अज्ञेय, मुक्तिबोध)।
- नई कविता: व्यक्तिगत अनुभवों की अभिव्यक्ति (धर्मवीर भारती, शमशेर बहादुर सिंह)।
- साहित्येतर विधाओं का प्रभाव: फिल्म, पत्रकारिता आदि का काव्य पर प्रभाव।
इस काल में कविता यथार्थवादी और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी।
खण्ड-ब
5. काव्य गुण कितने प्रकार के होते हैं? नाम लिखिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
काव्य गुण तीन प्रकार के होते हैं:
- माधुर्य गुण – कोमलता, मधुरता और भावुकता का गुण।
- ओज गुण – तेजस्विता, उत्साह और वीरता का गुण।
- प्रसाद गुण – सरलता, स्पष्टता और सहज बोध का गुण।
ये गुण काव्य में रस की अभिव्यक्ति को सुंदर बनाते हैं।
6) क्लिष्टत्व दोष की परिभाषा लिखिए।
(उत्तर सीमा 0 शब्द)
उत्तर: क्लिष्टत्व दोष काव्य में वह दोष है जब किसी शब्द या वाक्य का अर्थ समझने में कठिनाई होती है, अर्थात् अभिव्यक्ति स्पष्ट न होकर जटिल या दुरूह हो जाती है। यह दोष प्रायः अप्रचलित शब्दों, लंबे समासों या अस्पष्ट वाक्य-विन्यास के कारण उत्पन्न होता है।
7) हरिगीतिका छंद की परिभाषा उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
उत्तर: हरिगीतिका छंद एक सम मात्रिक छंद है। इसमें प्रत्येक चरण में 16 और 12 मात्राओं के दो विराम होते हैं, अर्थात् कुल 28 मात्राएँ (16+12) होती हैं। अंत में गुरु-लघु (गाग) होना आवश्यक है।
उदाहरण:
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखी।"
(यहाँ प्रथम चरण में 16+12 = 28 मात्राएँ हैं।)
8) छतप्पय एवं कुंडलिया छंद की परिभाषा देते हुए अंतर स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
उत्तर:
- छतप्पय छंद: यह एक मात्रिक छंद है जिसमें 6 चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 24, 24, 24, 24, 24 और 28 मात्राएँ होती हैं। अंत में गुरु-लघु (गाग) होता है।
- कुंडलिया छंद: यह दोहा और रोला के मेल से बना छंद है। इसमें 6 पंक्तियाँ होती हैं। पहले दो पंक्तियाँ दोहा (13+11 मात्रा) और अंतिम चार पंक्तियाँ रोला (11+13 मात्रा) के रूप में होती हैं। अंतिम शब्द की पुनरावृत्ति होती है।
अंतर: छतप्पय में 6 चरण होते हैं जबकि कुंडलिया में 6 पंक्तियाँ होती हैं। छतप्पय में मात्रा-विन्यास भिन्न होता है, जबकि कुंडलिया में दोहा और रोला का संयोग होता है तथा अंतिम शब्द की पुनरावृत्ति अनिवार्य है।
9) मानवीकरण अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
उत्तर: मानवीकरण अलंकार में निर्जीव वस्तुओं, प्रकृति या अमूर्त भावों पर मानवीय गुणों, क्रियाओं या भावनाओं का आरोप किया जाता है। इसमें पशु-पक्षियों या वस्तुओं को मनुष्य की तरह बोलते, चलते या महसूस करते दिखाया जाता है।
उदाहरण:
"हवा धीरे-धीरे फुसफुसाती है,
पत्ते झूम-झूमकर गाते हैं।"
(यहाँ हवा और पत्तों पर मानवीय क्रियाओं का आरोप है।)
10) विभावना एवं विशेषोक्ति अलंकार में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
उत्तर:
- विभावना अलंकार: जहाँ कारण के बिना ही कार्य हो जाए, अर्थात् कारण का अभाव होने पर भी कार्य का होना दिखाया जाए।
उदाहरण: "बिना पानी के ही सावन ऋतु आ गई।" (यहाँ पानी के बिना सावन का आना असंभव है, अतः विभावना।) - विशेषोक्ति अलंकार: जहाँ कारण उपस्थित होने पर भी कार्य न हो, अर्थात् कारण होते हुए भी कार्य का न होना दिखाया जाए।
उदाहरण: "सूरज की तपन के बावजूद बर्फ नहीं पिघली।" (यहाँ कारण (तपन) होते हुए भी कार्य (पिघलना) नहीं हुआ, अतः विशेषोक्ति।)
अंतर: विभावना में कारण का अभाव होता है जबकि विशेषोक्ति में कारण उपस्थित होता है। विभावना में कार्य होता है, विशेषोक्ति में कार्य नहीं होता।
खण्ड - 'अ'
1. निम्नांकित गद्यांश में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या अधिकतम 60 शब्दों में कीजिए। [3]
गद्यांश (पहला विकल्प):
भाषा संस्कृति का कुछ बाहरी अंग सा है, फिर भी वह हमारी जातीय मनोवृत्ति की परिचायिका होती है। कुशल' शब्द को ही लीजिए ; वह हमारी उस संस्कृति की ओर संकेत करता है जिसमें कि पूजा-विधान की संपन्नता के लिए कुश लाना एक दैनिक कार्य बना हुआ था। जो कुश ला सकता था वह तन्दुरुस्त और होशियार भी समझा जाता था। प्रवीण का संबंध वीणा से है- प्रकर्ष वीणायां प्रवीण:।
सप्रसंग व्याख्या:
प्रस्तुत गद्यांश 'भाषा और संस्कृति' विषय पर आधारित है। लेखक कहता है कि भाषा संस्कृति का बाहरी अंग होते हुए भी जातीय मनोवृत्ति को प्रकट करती है। 'कुशल' शब्द कुश लाने की दैनिक क्रिया से बना है, जो पूजा-विधान से जुड़ा था। इसी प्रकार 'प्रवीण' शब्द वीणा से संबंधित है, जो कला और निपुणता को दर्शाता है। इस प्रकार भाषा में संस्कृति की झलक मिलती है।
गद्यांश (दूसरा विकल्प):
वह बेचारा तो कई दिन तक विश्वास ही न कर सका। खुद गड्डे को टटोल-टटोल कर देखता और फिर TAR पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगता। जब परोपकारी पड़ोसियों ने उसके विश्वास की शिला को युक्तियों की एक-से-एक मर्मभेदी सुरंगों से उड़ा दिया, तब वह बीमार पड़ गया। पर निरंतर कर्मयोग से दीक्षित पुलिस को यह शुभ-समाचार देने की चर्चा चलते ही वह प्रशांत निराशा भरी दृढ़ता से कहने लगता - अपनी स्त्री की हुलिया लिखवाकर पकड़ मँगाना नीच का काम है।
सप्रसंग व्याख्या:
प्रस्तुत गद्यांश 'पंचलाइट' कहानी से लिया गया है। यहाँ एक सीधे-सादे व्यक्ति के भोलेपन और विश्वास का चित्रण है। वह अपनी खोई हुई चीज़ को गड्ढे में ढूँढ़ता है और फिर उसकी प्रतीक्षा करता है। पड़ोसियों के बहकावे में आकर वह बीमार पड़ जाता है, लेकिन पुलिस में शिकायत करने से इनकार कर देता है। यह उसकी सरलता और आत्मसम्मान को दर्शाता है।
2. निम्नांकित पद्यांश में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या अधिकतम 60 शब्दों में कीजिए। [3]
पद्यांश (पहला विकल्प):
अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलै तजि आपनपौ, झिझकें कपटी जे निसाँक नहीं।
घन आनंद प्यारे सुजान सुनौ, यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौ पाटी पढ़े हो कहो, मन लेह पे देहु छटाँक नहीं।
सप्रसंग व्याख्या:
प्रस्तुत पद्यांश 'सूरदास' के भ्रमरगीत से लिया गया है। यहाँ प्रेम मार्ग को अत्यंत सरल बताया गया है, जहाँ चतुराई की कोई आवश्यकता नहीं है। सच्चा प्रेमी स्वार्थ त्याग कर चलता है, जबकि कपटी झिझकता है। कवि कहता है कि इस मार्ग पर एक से दूसरा कोई भेद नहीं है। वह उद्धव से पूछता है कि तुम कौन सी पाठशाला पढ़े हो, जो मन लेकर भी छटाँक भर प्रेम नहीं देते।
पद्यांश (दूसरा विकल्प):
उदयाचल से किरन - धैनुएँ
Sih ला रहा
वह प्रभात का ग्वाला
पूँछ उठाये चली आ रही
सप्रसंग व्याख्या:
प्रस्तुत पद्यांश 'प्रभात का ग्वाला' कविता से लिया गया है। यहाँ कवि ने प्रभात के समय सूर्योदय का सुंदर चित्रण किया है। उदयाचल (पूर्वी क्षितिज) से किरणें गायों के समान निकल रही हैं, और प्रभात का ग्वाला (सूर्य) उन्हें हाँक रहा है। किरणें पूँछ उठाए चली आ रही हैं। यह प्रकृति के सौंदर्य और नवीनता का प्रतीक है।
3) “ona भी महाशक्ति बन सकता है पाठ के आलोक में भारत की उन्नति के बाधक तत्त्वों का विश्लेषण कीजिए। [4]
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
पाठ के अनुसार भारत की उन्नति के बाधक तत्त्वों में अंधविश्वास, जातिवाद, भ्रष्टाचार, निरक्षरता और आर्थिक असमानता प्रमुख हैं। ये तत्त्व समाज को कमजोर करते हैं और विकास में बाधा डालते हैं। इनसे मुक्ति पाकर ही भारत महाशक्ति बन सकता है।
अथवा
“पाजेब' कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी है। कथन की विवेचना कीजिए।
यह कथन सत्य है कि 'पाजेब' कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। कहानी में बच्चों की मासूमियत, उनकी इच्छाओं और भावनाओं का सजीव चित्रण किया गया है। बच्चों के मन में पाजेब की चाह और उससे जुड़ी घटनाएँ बाल मनोविज्ञान को स्पष्ट करती हैं।
4) सेनापति रीतिकाल में प्रकृति-चित्रण करने वाले श्रेष्ठ कवि हैं। सोदाहरण सिद्ध कीजिए। [4]
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
सेनापति रीतिकाल के प्रमुख कवि हैं जिन्होंने प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। उदाहरण के लिए, उनकी कविता में वर्षा ऋतु का वर्णन मिलता है जिसमें बादलों की गर्जना, बिजली की चमक और मोरों के नाच का सजीव चित्रण है। इस प्रकार वे प्रकृति-चित्रण में श्रेष्ठ हैं।
अथवा
"पेशोला की प्रतिध्वनि' कविता में वर्णित प्रेरणा की वर्तमान संदर्भों में समीक्षा कीजिए।
पेशोला की प्रतिध्वनि कविता में वीरता और बलिदान की प्रेरणा है। वर्तमान संदर्भों में यह प्रेरणा देशभक्ति, सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान के लिए कार्य करने में सहायक है। यह कविता आज भी युवाओं को साहस और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देती है।
प्रश्न 5
लेखक के मन में शिरीष को देखकर हक उठती है। क्यों ? स्पष्ट कीजिए। [3]
लेखक के मन में शिरीष को देखकर हक उठती है क्योंकि शिरीष का वृक्ष अत्यंत कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। यह वृक्ष गर्मी, सूखा और रेतीली भूमि में भी हरा-भरा रहता है। लेखक को इसकी सहनशीलता और जीवटता से प्रेरणा मिलती है, जिससे उसके मन में सम्मान और प्रशंसा का भाव उत्पन्न होता है।
प्रश्न 6
'agar' कहानी के प्रमुख पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए। [3]
'agar' कहानी के प्रमुख पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- वह अत्यंत संवेदनशील और भावुक है।
- उसमें आत्मसम्मान की भावना प्रबल है।
- वह अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहता है।
- उसका स्वभाव संघर्षशील और धैर्यवान है।
- वह समाज की विसंगतियों को समझता है और उनके विरुद्ध खड़ा होता है।
प्रश्न 7
"गुरु गोविंद तो एक है" पंक्ति में कबीर के मंतव्य को स्पष्ट कीजिए। [3]
कबीरदास की इस पंक्ति में उनका मंतव्य यह है कि ईश्वर एक है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए। 'गुरु' और 'गोविंद' दोनों एक ही परमात्मा के विभिन्न रूप हैं। कबीर ने धार्मिक आडंबरों और बाह्य आचरणों का विरोध करते हुए कहा कि सच्चा गुरु और ईश्वर एक ही हैं, और उनकी भक्ति में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 8
कुरुक्षेत्र कविता का मूल संदेश लिखिए। [3]
कुरुक्षेत्र कविता का मूल संदेश यह है कि युद्ध और हिंसा से कभी भी स्थायी समाधान नहीं मिलता। कवि ने महाभारत के युद्ध के माध्यम से यह बताया है कि मानवता, प्रेम और शांति ही सच्चे मूल्य हैं। कविता में यह संदेश दिया गया है कि अहंकार, लोभ और क्रोध के कारण होने वाले संघर्षों से बचना चाहिए और मानवीय संबंधों को महत्व देना चाहिए।
प्रश्न 9
कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निगला अथवा लेखक प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर टिप्पणी लिखिए। [2]
सूर्यकांत त्रिपाठी निगला: वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। उनका व्यक्तित्व संवेदनशील और चिंतनशील था। उनकी रचनाओं में प्रकृति, प्रेम और मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख कृतियाँ 'परिमल', 'गुंजन' और 'स्वर्ण-किरण' हैं।
प्रेमचंद: वे हिंदी साहित्य के कालजयी कथाकार थे। उनका व्यक्तित्व सरल, संघर्षशील और समाजसेवी था। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विसंगतियाँ और मानवीय संवेदनाओं का यथार्थ चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख कृतियाँ 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि' और 'सेवासदन' हैं।
प्रश्न 20
अर्थशास्त्र संस्कारों पर कैसे हावी हो रहा है? [2]
अर्थशास्त्र संस्कारों पर इस प्रकार हावी हो रहा है कि आज के समाज में धन और भौतिक सुख-सुविधाओं को सर्वोपरि माना जाने लगा है। पारंपरिक मूल्य, नैतिकता और सामाजिक संस्कार पीछे छूटते जा रहे हैं। लोग अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ के लिए रिश्तों और संस्कारों की अवहेलना करने लगे हैं। इससे समाज में भौतिकता का बोलबाला बढ़ गया है और आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक मूल्य कमजोर पड़ गए हैं।
खण्ड - ह
2) निम्नांकित पंक्ति का भावार्थ लिखिए -
"सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदय नहीं लाज बिसेषी।"
(उत्तर सीमा 40 शब्द)
भावार्थ: इन पंक्तियों में कहा गया है कि तुमने सूपनखा की दुर्दशा देखी, फिर भी तुम्हारे हृदय में कोई विशेष लाज नहीं आई। यह संकेत है कि सीता को लक्ष्मण से उनके व्यवहार पर शिकायत है।
22) वर्तमान संदर्भों में 'निर्वासित' कहानी की प्रासंगिकता समझाइये।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
वर्तमान संदर्भों में 'निर्वासित' कहानी की प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि आज भी समाज में लोगों को उनकी जाति, धर्म, या सामाजिक स्थिति के कारण बहिष्कृत किया जाता है। यह कहानी मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती है, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
सेल्यूलर जेल में क्रांतिकारियों पर किए गये अत्याचारों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
(उत्तर सीमा 80 शब्द)
सेल्यूलर जेल में क्रांतिकारियों पर अमानवीय अत्याचार किए गए। उन्हें अलग-अलग कोठरियों में बंद रखा जाता था, जहाँ न तो पर्याप्त रोशनी थी और न ही हवा। उन्हें भूखा रखा जाता था, कोड़े मारे जाते थे, और मानसिक यातनाएँ दी जाती थीं। कई क्रांतिकारी इन अत्याचारों के कारण पागल हो गए या मारे गए।
23) 'माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:' के भाव को स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
इस श्लोक का भाव है कि पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। हमें पृथ्वी का सम्मान करना चाहिए और उसकी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारी माता के समान है जो हमें जीवन प्रदान करती है।
24) नारी सामर्थ्य के संदर्भ में सुभाष के क्या विचार थे?
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
सुभाष का मानना था कि नारी में अपार सामर्थ्य है। वह न केवल घर-परिवार को संभाल सकती है, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने नारी को शिक्षित और सशक्त बनाने पर जोर दिया, ताकि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सके।
25) "गुप्त साम्राज्य संकट में है और हमें घर-घर भीख माँगनी पड़ेगी।" ऐसा किसने कहा और क्यों?
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
यह कथन रामकुमार वर्मा ने कहा था। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि गुप्त साम्राज्य आंतरिक और बाहरी संकटों से घिरा हुआ था। साम्राज्य की आर्थिक स्थिति खराब थी और उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। इसलिए उन्होंने यह चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो हमें भीख माँगनी पड़ेगी।
26) साहित्य में प्रचलित विभिन्न वादों के संदर्भ में रामकुमार वर्मा का क्या दृष्टिकोण था? स्पष्ट कीजिए।
(उत्तर सीमा 60 शब्द)
रामकुमार वर्मा का मानना था कि साहित्य में प्रचलित विभिन्न वाद (जैसे यथार्थवाद, आदर्शवाद, प्रगतिवाद आदि) केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। उनका दृष्टिकोण था कि साहित्य को जीवन की सच्चाइयों को प्रस्तुत करना चाहिए, न कि केवल किसी एक वाद के सिद्धांतों में बंधकर रहना चाहिए।