RBSE Class 12th 2018 Philosophy-SS-85-2018 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2018
Subject Philosophy-SS-85-2018
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2018 2018 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2018
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2018

दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY

समय : 3¼ घण्टेपूर्णांक : 80


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
    Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily.
  2. सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
    All the questions are compulsory.
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
    Write the answer to each question in the given answer-book only.
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
    For questions having more than one part the answers to those parts are to be written together in continuity.

SS-85-Philosophy   073_   [Turn Over

प्रश्न पत्र को खोलने के लिए यहाँ फाड़ें
TEAR HERE TO OPEN THE QUESTION PAPER

खण्ड - अ / SECTION - A

निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये :
Define each of the following :

  1. जड़वाद
    Materialism

    परिभाषा: जड़वाद (Materialism) वह दार्शनिक सिद्धांत है जो केवल भौतिक पदार्थ को ही सत्य मानता है। इसके अनुसार, चेतना, मन और विचार भी पदार्थ के ही परिणाम हैं। यह आत्मा, ईश्वर और अध्यात्म को अस्वीकार करता है।

  2. तुरीयावस्था
    Turiyavastha

    परिभाषा: तुरीयावस्था (Turiyavastha) वेदांत दर्शन में चेतना की चौथी अवस्था है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है। यह शुद्ध चेतना की अवस्था है, जहाँ द्वैत का भ्रम समाप्त हो जाता है और आत्मा का ब्रह्म से एकत्व का अनुभव होता है।


नोट: प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी संस्करणों में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.

खण्ड (Section) प्रश्न संख्या (Q. Nos.) अंक प्रति प्रश्न (Marks per question) उत्तर की शब्द सीमा (Word limit of answer)
क (A) 1-10 1 20 शब्द
ख (B) 11-20 2 50 शब्द
ग (C) 21-30 5 100-150 शब्द

नोट: प्रश्न संख्या 21 से 30 तक में आन्तरिक विकल्प हैं।
There are internal choices for Q. Nos. 21 to 30.

SS-85-Philosophy [ 073 ]

प्रश्न 3 से 10: अति लघु उत्तरीय प्रश्न

3. त्रिपिटक

अर्थ: बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख ग्रंथों का संग्रह।

व्याख्या: त्रिपिटक में विनय पिटक (भिक्षु नियम), सुत्त पिटक (उपदेश), और अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विश्लेषण) शामिल हैं।

4. अपरिग्रह

अर्थ: संग्रह या परिग्रह का त्याग।

व्याख्या: जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत जो भौतिक वस्तुओं और मोह के त्याग पर बल देता है।

5. तत्त्वमीमांसा (Metaphysics)

अर्थ: वास्तविकता की प्रकृति का दार्शनिक अध्ययन।

व्याख्या: यह अस्तित्व, समय, स्थान, कार्य-कारण और ब्रह्मांड के मूलभूत प्रश्नों का विश्लेषण करता है।

6. धर्म (Dharma)

अर्थ: कर्तव्य, नैतिकता और धार्मिक आचरण।

व्याख्या: हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में धर्म का अर्थ व्यक्ति और समाज के लिए उचित आचरण और नियमों का पालन है।

7. पुरूषार्थ (Purushartha)

अर्थ: मानव जीवन के चार लक्ष्य।

व्याख्या: ये हैं: धर्म (कर्तव्य), अर्थ (धन), काम (इच्छा), और मोक्ष (मुक्ति)।

8. त्रयेक परमेश्वर (त्रिमूर्ति / Trinity)

अर्थ: हिंदू धर्म में तीन प्रमुख देवताओं का समूह।

व्याख्या: ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता), और शिव (संहारक) त्रिमूर्ति के रूप में जाने जाते हैं।

9. अवेस्ता (Avesta)

अर्थ: पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ।

व्याख्या: इसमें जरथुस्त्र (जोरोस्टर) के उपदेश और धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन है।

10. धार्मिक सहिष्णुता (Religious Tolerance)

अर्थ: विभिन्न धर्मों और विश्वासों के प्रति सम्मान और सहनशीलता।

व्याख्या: यह सिद्धांत सभी धर्मों की समानता और आपसी सम्मान पर बल देता है, जो भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है।


SS—85-Philosophy [ 2073 ]

खण्ड - ब / SECTION - B

  1. भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन में कोई दो अन्तर बताइये।

    Write down any two differences between Indian and Western Philosophy.

    दो अन्तर:

    1. आध्यात्मिकता बनाम भौतिकता: भारतीय दर्शन मुख्यतः आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) पर केंद्रित है, जबकि पाश्चात्य दर्शन ज्ञान और सत्य की खोज में तर्क और अनुभव पर अधिक बल देता है।
    2. प्रामाणिकता का स्रोत: भारतीय दर्शन में वेदों और श्रुतियों को प्रमाण माना जाता है, जबकि पाश्चात्य दर्शन में तर्क, बुद्धि और वैज्ञानिक पद्धति को प्राथमिकता दी जाती है।
  2. कर्मयोग की अवधारणा को समझाइये।

    Explain the concept of Karmayoga.

    कर्मयोग का अर्थ है फल की इच्छा त्याग कर कर्तव्य का पालन करना। गीता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्मों में अधिकार है, परंतु फलों में नहीं। कर्मयोगी निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है और उसे ईश्वर को समर्पित कर देता है। यह मोक्ष का मार्ग है।

  3. चार आर्य सत्यों को समझाइये।

    Explain four noble truth.

    बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य हैं:

    1. दुःख सत्य: संसार में दुःख व्याप्त है।
    2. दुःख समुदय सत्य: दुःख का कारण तृष्णा (इच्छा) है।
    3. दुःख निरोध सत्य: तृष्णा के निरोध से दुःख का अंत संभव है।
    4. दुःख निरोध मार्ग सत्य: दुःख निरोध का मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है।
  4. स्वामी विवेकानन्द के अनुसार आत्मा के स्वरूप का वर्णन करें।

    Describe the nature of self according to Swami Vivekanand.

    स्वामी विवेकानन्द के अनुसार आत्मा अमर, शाश्वत, निराकार और सर्वव्यापी है। यह शरीर से भिन्न है और जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है। आत्मा स्वयं प्रकाशमान है और उसका स्वरूप आनंदमय है। मनुष्य का लक्ष्य इस आत्मा को पहचानना और मोक्ष प्राप्त करना है।

  5. अरस्तू के द्वारा प्रस्तुत चार कारणों को समझाइये।

    Explain four causes given by Aristotle.

    अरस्तू के अनुसार किसी भी वस्तु के अस्तित्व के चार कारण हैं:

    1. उपादान कारण (Material Cause): वह पदार्थ जिससे वस्तु बनी है।
    2. निमित्त कारण (Efficient Cause): वह शक्ति या कर्ता जो वस्तु को बनाता है।
    3. रूप कारण (Formal Cause): वस्तु का आकार या स्वरूप।
    4. उद्देश्य कारण (Final Cause): वह उद्देश्य जिसके लिए वस्तु बनाई गई है।
  6. धर्म एवं रीलिजन के अन्तर को समझाइये।

    Differentiate Dharma from Religion.

    अन्तर:

    • धर्म: यह एक व्यापक अवधारणा है जो कर्तव्य, नैतिकता और आध्यात्मिकता पर आधारित है। यह जीवन का मार्ग है, जो सार्वभौमिक और शाश्वत है।
    • रीलिजन (Religion): यह एक संगठित प्रणाली है जिसमें विश्वास, अनुष्ठान और संस्थाएं शामिल हैं। यह अक्सर किसी विशेष ग्रंथ या संस्थापक पर आधारित होता है।
  7. हिन्दू धर्म में कर्मों के तीन रूपों को स्पष्ट कीजिए।

    Explain three forms of action according to Hindu Dharma.

    हिन्दू धर्म में कर्मों के तीन रूप हैं:

    1. सात्त्विक कर्म: निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म, जो कर्तव्य भावना से प्रेरित हो।
    2. राजसिक कर्म: फल की इच्छा से किया गया कर्म, जो अहंकार और लोभ से युक्त हो।
    3. तामसिक कर्म: अज्ञान और मोह से प्रेरित कर्म, जो दूसरों को हानि पहुंचाता है।
  8. ईसाई धर्म की प्रमुख विशेषताएं समझाइये।

    Explain the main characteristics of Christian Religion.

    ईसाई धर्म की प्रमुख विशेषताएं:

    • एकेश्वरवाद: एक ईश्वर में विश्वास, जो त्रिएक (पिता, पुत्र, पवित्र आत्मा) है।
    • यीशु मसीह में विश्वास: यीशु को उद्धारकर्ता और ईश्वर का पुत्र मानना।
    • बाइबिल: पवित्र ग्रंथ, जो पुराने और नए नियम में विभाजित है।
    • प्रेम और क्षमा: ईश्वर के प्रति प्रेम और पड़ोसी से प्रेम का सिद्धांत।
    • संस्कार: बपतिस्मा और यूखरिस्ट जैसे संस्कारों का पालन।

SS-85-Philosophy | 073

खण्ड - C / SECTION - C

9. भारतीय दर्शन की प्रमुख विशेषताओं को समझाइये।
Explain main feature of Indian Philosophy.

उत्तर: भारतीय दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • आध्यात्मिकता: भारतीय दर्शन का मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति है।
  • आस्तिकता और नास्तिकता का सह-अस्तित्व: इसमें आस्तिक (वेदों को मानने वाले) और नास्तिक (चार्वाक, बौद्ध, जैन) दोनों दर्शन शामिल हैं।
  • आत्मा और ब्रह्म का सिद्धांत: अधिकांश दर्शन आत्मा (जीवात्मा) और परमात्मा (ब्रह्म) के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।
  • कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत: कर्म के अनुसार जीवन चक्र और पुनर्जन्म की अवधारणा प्रमुख है।
  • मोक्ष की अवधारणा: जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) को परम लक्ष्य माना गया है।
  • अहिंसा और सत्य: नैतिक मूल्यों जैसे अहिंसा, सत्य, और अस्तेय पर बल दिया गया है।
  • गुरु-शिष्य परंपरा: ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु के मार्गदर्शन को आवश्यक माना गया है।

अथवा / OR

चार्वाक दर्शन की नीतिमीमांसा को समझाइये।
Explain the ethics of Charvaka's Philosophy.

उत्तर: चार्वाक दर्शन (लोकायत) की नीतिमीमांसा (Ethics) निम्नलिखित है:

  • सुखवाद (Hedonism): चार्वाक दर्शन के अनुसार जीवन का परम लक्ष्य सुख प्राप्ति और दुख से बचना है।
  • इंद्रिय सुखों पर बल: यह दर्शन इंद्रियों के सुखों को ही सर्वोच्च मानता है, क्योंकि आत्मा या परलोक का कोई प्रमाण नहीं है।
  • धर्म और मोक्ष का खंडन: चार्वाक धर्म, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष जैसी अवधारणाओं को अस्वीकार करता है।
  • व्यावहारिक नीति: इसके अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में अधिकतम सुख प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, बिना किसी पारलौकिक चिंता के।
  • नास्तिकता: यह ईश्वर, वेद और आत्मा के अस्तित्व को नकारता है, और केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को ही मान्यता देता है।

20. उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
Describe the nature of 'Brahman' according to Upanishads.

उत्तर: उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म के स्वरूप की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सच्चिदानंद स्वरूप: ब्रह्म सत् (सत्य), चित् (चेतना), और आनंद (आनंद) का एकीकृत रूप है।
  • निर्गुण और सगुण: ब्रह्म निर्गुण (गुणों से परे) और सगुण (गुणों सहित) दोनों रूपों में वर्णित है।
  • अद्वैत: ब्रह्म एकमेव अद्वितीय है, उसके अलावा कुछ भी सत्य नहीं है।
  • अव्यक्त और अविनाशी: ब्रह्म इंद्रियों से परे, अव्यक्त (अप्रकट) और अविनाशी है।
  • सर्वव्यापी: ब्रह्म सभी प्राणियों और पदार्थों में व्याप्त है।
  • आत्मा से अभिन्न: उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म और आत्मा (जीवात्मा) एक ही हैं (तत्त्वमसि)।

अथवा / OR

भगवतगीता के भक्तियोग की अवधारणा को समझाइये।
Explain the concept of 'Bhakti-Yoga' in Bhagvatgita.

उत्तर: भगवद्गीता में भक्तियोग की अवधारणा निम्नलिखित है:

  • भक्ति का अर्थ: भक्तियोग का अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण।
  • निष्काम भक्ति: गीता में फल की इच्छा के बिना, केवल प्रेम से ईश्वर की भक्ति करने पर बल दिया गया है।
  • सरल मार्ग: भक्तियोग को सभी के लिए सुलभ और सरल मार्ग बताया गया है, जिसमें केवल ईश्वर का स्मरण और समर्पण आवश्यक है।
  • ईश्वर की कृपा: भक्तियोग के द्वारा भक्त ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है और मोक्ष को प्राप्त होता है।
  • भक्ति के प्रकार: गीता में भक्ति को नौ प्रकारों में विभाजित किया गया है, जैसे श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि।
  • सर्वधर्म समन्वय: भक्तियोग अन्य योगों (ज्ञानयोग, कर्मयोग) का समन्वय करता है और सभी को एक ही लक्ष्य की ओर ले जाता है।

2. बौद्ध दर्शन के प्रतीत्य समुत्पाद की अवधारणा को समझाइये।
Explain the theory of 'Pratitya - Samuttpada' of Buddhism.

उत्तर: बौद्ध दर्शन में प्रतीत्य समुत्पाद (Pratitya Samutpada) का सिद्धांत निम्नलिखित है:

  • अर्थ: प्रतीत्य समुत्पाद का अर्थ है "कारणों से उत्पन्न होना" या "आश्रित उत्पत्ति"।
  • मूल सिद्धांत: इस सिद्धांत के अनुसार सभी घटनाएँ और पदार्थ कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं। कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं आती।
  • द्वादश निदान (12 अंग): प्रतीत्य समुत्पाद को 12 अंगों (निदानों) की श्रृंखला के रूप में समझाया गया है:
    1. अविद्या (अज्ञान)
    2. संस्कार (कर्म संस्कार)
    3. विज्ञान (चेतना)
    4. नाम-रूप (नाम और रूप)
    5. षडायतन (छह इंद्रियाँ)
    6. स्पर्श (संपर्क)
    7. वेदना (अनुभूति)
    8. तृष्णा (इच्छा)
    9. उपादान (आसक्ति)
    10. भव (जीवन)
    11. जाति (जन्म)
    12. जरा-मरण (बुढ़ापा और मृत्यु)
  • दुख का कारण: यह श्रृंखला दुख (दुक्ख) के कारण और उत्पत्ति को समझाती है।
  • निर्वाण का मार्ग: इस श्रृंखला को तोड़कर (अविद्या के नाश से) निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।

अथवा / OR

जैन दर्शन के अनेकान्तवाद की अवधारणा को समझाइये।
Explain the concept of Anekantvada according to Jain Philosophy.

उत्तर: जैन दर्शन में अनेकान्तवाद (Anekantvada) की अवधारणा निम्नलिखित है:

  • अर्थ: अनेकान्तवाद का अर्थ है "अनेक पक्षों का सिद्धांत" या "अनेक दृष्टिकोणों से सत्य की खोज"।
  • सापेक्षता का सिद्धांत: इसके अनुसार कोई भी वस्तु या सत्य एक ही दृष्टिकोण से पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता। सत्य अनेक पक्षों वाला होता है।
  • स्याद्वाद: अनेकान्तवाद को स्याद्वाद (शायदवाद) के रूप में भी जाना जाता है, जिसमें हर कथन को "स्यात्" (शायद) शब्द से जोड़ा जाता है, जो सापेक्षता को दर्शाता है।
  • सप्तभंगी नय: अनेकान्तवाद को सात प्रकार के कथनों (सप्तभंगी नय) के माध्यम से समझाया गया है, जैसे:
    1. स्यादस्ति (शायद है)
    2. स्यान्नास्ति (शायद नहीं है)
    3. स्यादस्ति च नास्ति च (शायद है और नहीं भी है)
    4. स्यादवक्तव्यः (शायद अवर्णनीय है)
    5. स्यादस्ति च अवक्तव्यः (शायद है और अवर्णनीय भी है)
    6. स्यान्नास्ति च अवक्तव्यः (शायद नहीं है और अवर्णनीय भी है)
    7. स्यादस्ति च नास्ति च अवक्तव्यः (शायद है, नहीं है, और अवर्णनीय भी है)
  • अहिंसा और सहिष्णुता: यह सिद्धांत अहिंसा और विचारों की सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, क्योंकि यह मानता है कि हर व्यक्ति का दृष्टिकोण सत्य का एक पक्ष हो सकता है।

22. सिख धर्म के पांच चिन्हों का वर्णन कीजिए।
Describe five symbol of Sikk Religion.

उत्तर: सिख धर्म के पाँच चिन्ह (पंज ककार) निम्नलिखित हैं:

  1. केश (Kesh): बिना काटे बाल रखना, जो ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
  2. कंघा (Kangha): लकड़ी की कंघी, जो स्वच्छता और अनुशासन का प्रतीक है।
  3. कड़ा (Kara): लोहे का कड़ा (चूड़ी), जो ईश्वर के प्रति अटूट बंधन और एकता का प्रतीक है।
  4. कच्छा (Kachera): विशेष प्रकार का अंडरगारमेंट, जो शील और संयम का प्रतीक है।
  5. किरपान (Kirpan): छोटी तलवार, जो न्याय और कमजोरों की रक्षा का प्रतीक है।

23. सभी धर्मों के मूल (सर्वमान्य) तत्वों को समझाइये।
Explain the universal elements of All Religions.

उत्तर: सभी धर्मों के मूल (सर्वमान्य) तत्व निम्नलिखित हैं:

  • ईश्वर या परम सत्ता में विश्वास: अधिकांश धर्म किसी न किसी रूप में एक सर्वोच्च शक्ति या ईश्वर को मानते हैं।
  • नैतिकता और सदाचार: सभी धर्म सत्य, अहिंसा, दया, और ईमानदारी जैसे नैतिक मूल्यों पर बल देते हैं

प्रश्न 24

अष्टांग-योग मार्ग को समझाइये।
Explain eight-fold Path of Yoga Philosophy.

अष्टांग-योग मार्ग (Eight-fold Path of Yoga): पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग दर्शन में आठ अंगों का वर्णन है, जो आध्यात्मिक विकास के क्रमिक सोपान हैं:

  1. यम (Yama): सार्वभौमिक नैतिक नियम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
  2. नियम (Niyama): व्यक्तिगत अनुशासन – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान।
  3. आसन (Asana): शारीरिक मुद्राएँ – स्थिर और सुखद आसनों का अभ्यास।
  4. प्राणायाम (Pranayama): श्वास नियंत्रण – प्राण शक्ति का नियमन।
  5. प्रत्याहार (Pratyahara): इंद्रियों का विषयों से हटना – बाह्य उत्तेजनाओं से मन को विरत करना।
  6. धारणा (Dharana): एकाग्रता – मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना।
  7. ध्यान (Dhyana): ध्यान – निरंतर चिंतन की अवस्था।
  8. समाधि (Samadhi): पूर्ण समाधि – आत्मा और परमात्मा का मिलन, मोक्ष की प्राप्ति।

यह मार्ग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का साधन है।

अथवा / OR

शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कीजिये।
Describe the nature of Brahman according to Shankaracharya.

शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म का स्वरूप (Nature of Brahman): आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन में ब्रह्म को सर्वोच्च सत्य माना गया है। ब्रह्म के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:

  • सच्चिदानंद (Sat-Chit-Ananda): ब्रह्म सत् (शाश्वत सत्य), चित् (चेतना) और आनंद (परम आनंद) स्वरूप है।
  • निर्गुण (Nirguna): ब्रह्म गुणों से रहित है – यह निराकार, निर्विकार और अद्वैत है।
  • अद्वैत (Advaita): ब्रह्म एकमेव अद्वितीय है – द्वैत का भ्रम माया के कारण होता है।
  • निर्विशेष (Nirvishesha): ब्रह्म में कोई विशेषता या भेद नहीं है – यह शुद्ध चैतन्य है।
  • अव्यक्त (Avyakta): ब्रह्म इंद्रियों और मन से परे है – इसे केवल आत्म-साक्षात्कार द्वारा जाना जा सकता है।

शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और जगत मिथ्या (माया) है। आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं – "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) का ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।

प्रश्न 25

सुकरात की पद्धति को समझाइये।
Explain Socratic Method.

सुकरात की पद्धति (Socratic Method): यह एक दार्शनिक संवाद पद्धति है जिसमें प्रश्नों के माध्यम से सत्य की खोज की जाती है। इसके प्रमुख चरण हैं:

  1. विडंबना (Irony): सुकरात स्वयं को अज्ञानी बताकर दूसरों के ज्ञान की परीक्षा करते थे।
  2. माइयूटिक्स (Maieutics): प्रश्नों की श्रृंखला द्वारा व्यक्ति के मन में छिपे सत्य को बाहर निकालना – जैसे दाई बच्चे को जन्म देती है।
  3. परिभाषा (Definition): अंततः किसी अवधारणा की सटीक परिभाषा तक पहुँचना।

यह पद्धति आलोचनात्मक चिंतन, तर्क और नैतिक ज्ञान के विकास में सहायक है।

अथवा / OR

डेकार्टे की पद्धति को समझाइये।
Explain Cartesian Method.

डेकार्टे की पद्धति (Cartesian Method): रेने डेकार्टे द्वारा प्रतिपादित यह विधि संदेह से शुरू होकर निश्चित ज्ञान तक पहुँचती है। इसके मुख्य सिद्धांत हैं:

  1. विधि संदेह (Methodic Doubt): हर उस चीज़ पर संदेह करना जिसमें संदेह की संभावना हो – इंद्रियों, शरीर, गणितीय सत्य तक।
  2. कोगिटो एर्गो सुम (Cogito ergo sum): "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" – यह प्रथम निश्चित सत्य है जो संदेह से परे है।
  3. स्पष्ट और विशिष्ट धारणाएँ (Clear and Distinct Perceptions): जो स्पष्ट और विशिष्ट रूप से ज्ञात हो, वही सत्य है।
  4. विश्लेषण और संश्लेषण (Analysis and Synthesis): जटिल समस्याओं को सरल भागों में तोड़ना और फिर उन्हें पुनः संयोजित करना।

यह पद्धति आधुनिक दर्शन और विज्ञान की नींव है, जो तर्क और गणितीय निश्चितता पर आधारित है।

प्रश्न 26

धर्म के अर्थ एवं स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
Explain the meaning and nature of Dharma.

धर्म का अर्थ और स्वरूप (Meaning and Nature of Dharma):

अर्थ: 'धर्म' शब्द संस्कृत धातु 'धृ' (धारण करना) से बना है, जिसका अर्थ है – जो धारण करता है, जो समाज और व्यक्ति को संतुलित रखता है। धर्म का व्यापक अर्थ है – कर्तव्य, नैतिकता, सत्य, और ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था)।

स्वरूप:

  • सार्वभौमिकता (Universality): धर्म सभी मनुष्यों के लिए समान नैतिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है।
  • व्यक्तिगत और सामाजिक (Individual and Social): यह व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवस्था दोनों को नियंत्रित करता है।
  • गतिशीलता (Dynamic): धर्म स्थिर नहीं, बल्कि समय और परिस्थिति के अनुसार अनुकूलित होता है (जैसे आपद् धर्म)।
  • आध्यात्मिक आधार (Spiritual Basis): धर्म का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्ति है।
  • नैतिकता और कर्तव्य (Ethics and Duty): धर्म सत्य, अहिंसा, दया, और ईमानदारी जैसे गुणों पर आधारित है।

इस प्रकार धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है।

अथवा / OR

भारतीय अवधारणा के अनुरूप धर्म से निरपेक्ष होना संभव नहीं है। इसे समझाइये।
According to Indian thought "It is not possible for a person to live without Dharma". Explain it.

भारतीय चिंतन में धर्म से निरपेक्षता की असंभवता (Impossibility of being without Dharma in Indian thought):

भारतीय दर्शन में धर्म को जीवन का अभिन्न अंग माना गया है। इस कथन के पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

  • धर्म का व्यापक अर्थ: भारतीय परंपरा में धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि कर्तव्य, नैतिकता, सत्य, और व्यवस्था का पर्याय है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना स्वधर्म (व्यक्तिगत कर्तव्य) होता है।
  • धर्म और जीवन का अटूट संबंध: मनुष्य के प्रत्येक कार्य – चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामाजिक – धर्म के अंतर्गत आता है। बिना धर्म के जीवन अराजक और अर्थहीन हो जाता है।
  • धर्म का सार्वभौमिक स्वरूप: धर्म सभी प्राणियों के कल्याण के लिए है। यह व्यक्ति को समाज और ब्रह्मांड से जोड़ता है।
  • धर्म और मोक्ष: भारतीय दर्शन में धर्म का अंतिम लक्ष्य मोक्ष (आत्म-साक्षात्कार) है। बिना धर्म के मोक्ष संभव नहीं।

इस प्रकार, भारतीय चिंतन में धर्म से निरपेक्ष रहना असंभव है क्योंकि धर्म स्वयं जीवन का आधार है – जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती, वैसे ही मनुष्य धर्म के बिना नहीं रह सकता।

प्रश्न 27

हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर विचार को समझाइये।
Explain the Idea of God according to Hindu Religion.

हिन्दू धर्म में ईश्वर की अवधारणा (Idea of God in Hinduism): हिन्दू धर्म में ईश्वर की अवधारणा बहुआयामी है, जिसमें विभिन्न दर्शनों के अनुसार भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हैं:

  • अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta):

खण्ड – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 28

यहूदी धर्म के नैतिक विचारों को समझाइये।

Explain the moral thoughts of Judaism.

अथवा / OR

ईसा मसीह के द्वारा पर्वत पर दिए गए उपदेशों का वर्णन कीजिए।

Describe the 'Sermon of Mount' given by Crist.

यहूदी धर्म के नैतिक विचार

यहूदी धर्म के नैतिक विचार मुख्यतः तोराह (व्यवस्था) और दस आज्ञाओं पर आधारित हैं। इसके प्रमुख नैतिक सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  • एकेश्वरवाद: केवल एक ईश्वर की उपासना और उसके प्रति पूर्ण निष्ठा।
  • न्याय और दया: सभी मनुष्यों के साथ न्यायपूर्ण और दयालु व्यवहार करना।
  • पवित्रता: शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धता का पालन करना।
  • सामाजिक उत्तरदायित्व: गरीबों, अनाथों और विधवाओं की सहायता करना।
  • सत्य और ईमानदारी: व्यापार और व्यवहार में सत्यनिष्ठा बनाए रखना।
  • क्षमा और मेल-मिलाप: दूसरों की गलतियों को क्षमा करना और शांति स्थापित करना।

यहूदी नैतिकता का मूल मंत्र है: "जो तुम्हारे लिए अप्रिय है, वह दूसरे के साथ मत करो।"

ईसा मसीह का पर्वत पर उपदेश (Sermon on the Mount)

ईसा मसीह ने गलील सागर के पास एक पर्वत पर यह प्रसिद्ध उपदेश दिया, जो मत्ती के सुसमाचार (अध्याय 5-7) में वर्णित है। इसके प्रमुख बिंदु हैं:

  • बीटिट्यूड्स (आठ धन्य वचन): "धन्य हैं वे जो आत्मा में दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।" ये विनम्रता, दया, शांति और धार्मिकता के गुणों की प्रशंसा करते हैं।
  • नमक और ज्योति: शिष्यों को संसार में अच्छाई और सत्य का प्रकाश फैलाने का आह्वान।
  • व्यवस्था की पूर्ति: मूसा की व्यवस्था को समाप्त नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ।
  • क्रोध और मेल-मिलाप: क्रोध को पाप माना और शीघ्र मेल-मिलाप का उपदेश।
  • शत्रु से प्रेम: "अपने शत्रुओं से प्रेम करो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो।"
  • दान, प्रार्थना और उपवास: इन्हें दिखावे के लिए नहीं, बल्कि गुप्त रूप से करने का निर्देश।
  • प्रभु की प्रार्थना: "हमारे पिता जो स्वर्ग में हैं..." सिखाई।
  • धन और चिंता: स्वर्ग में धन संचय करने और कल की चिंता न करने का उपदेश।
  • स्वर्ण नियम: "जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो।"

यह उपदेश ईसाई नैतिकता का आधार है और प्रेम, क्षमा, विनम्रता तथा ईश्वर पर विश्वास पर बल देता है।

प्रश्न 29

पारसी धर्म के मूल सिद्धान्त को समझाइये।

Explain the fundamental thought of Persian Religion.

अथवा / OR

लाओत्सी के प्रमुख उपदेशों को समझाइये।

Explain the main teachings of Laozi.

पारसी धर्म के मूल सिद्धान्त

पारसी धर्म (जोरोस्ट्रियनिज्म) के संस्थापक जोरोस्टर (जरथुस्त्र) हैं। इसके मूल सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  • द्वैतवाद (Dualism): ब्रह्मांड में दो मूल शक्तियाँ हैं – अहुरमज़्दा (सत्य, प्रकाश और अच्छाई का देवता) और अहिरमन (असत्य, अंधकार और बुराई का देवता)। मनुष्य का कर्तव्य अच्छाई का चुनाव करना है।
  • अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म: यह पारसी धर्म का त्रिसूत्रीय नैतिक सिद्धांत है – हुमत (अच्छे विचार), हुख्त (अच्छे वचन), हुवर्श्त (अच्छे कर्म)।
  • अग्नि की पवित्रता: अग्नि को ईश्वर का प्रतीक माना जाता है और इसे पवित्र रखा जाता है। अग्नि मंदिरों में निरंतर अग्नि जलती रहती है।
  • अंतिम न्याय: मृत्यु के बाद आत्मा का न्याय होता है और अच्छे कर्मों के आधार पर स्वर्ग या नरक मिलता है।
  • प्रकृति का सम्मान: पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु को पवित्र माना जाता है और प्रदूषण से बचाया जाता है।
  • सामाजिक न्याय: समानता, दान और समाज सेवा पर बल दिया जाता है।

पारसी धर्म का मूल संदेश है: मनुष्य को सदैव सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चाहिए।

लाओत्सी के प्रमुख उपदेश

लाओत्सी (लाओ त्से) चीनी दार्शनिक और ताओ धर्म के संस्थापक थे। उनके प्रमुख उपदेश 'ताओ ते चिंग' ग्रंथ में संकलित हैं:

  • ताओ (मार्ग): ताओ सभी वस्तुओं का मूल स्रोत और अंतिम सत्य है। यह अवर्णनीय, शाश्वत और सर्वव्यापी है। "ताओ जिसे वर्णित किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।"
  • वू वेई (अकर्मण्यता): प्रकृति के अनुरूप कार्य करना, बिना बलपूर्वक हस्तक्षेप के। "बिना कार्य किए सब कुछ हो जाता है।"
  • सादगी और विनम्रता: सादा जीवन, कम इच्छाएँ और विनम्रता अपनाने का उपदेश। "जो स्वयं को महान बनाता है, वह छोटा हो जाता है।"
  • प्रकृति के साथ सामंजस्य: मनुष्य को प्रकृति के नियमों के अनुसार जीना चाहिए, उनके विरुद्ध नहीं।
  • अहिंसा और करुणा: हिंसा से बचना और सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखना। "अच्छे लोगों के साथ अच्छा बनो, बुरे लोगों के साथ भी अच्छा बनो।"
  • शासन का सिद्धांत: सर्वश्रेष्ठ शासक वह है जिसकी प्रजा को पता ही न चले कि वह शासन कर रहा है। न्यूनतम हस्तक्षेप और स्वाभाविक व्यवस्था पर बल।

लाओत्सी का मुख्य संदेश है: सादगी, सहजता और प्रकृति के साथ एकता में जीवन जीना ही सच्चा सुख है।

प्रश्न 30

सनातन धर्म में सर्वधर्म समभाव की अवधारणा को समझाइये।

Explain the doctrine of 'Sarvadharma Sambhav' according to Sanatan Dharma.

अथवा / OR

धार्मिक सहिष्णुता के स्वरूप एवं महत्व को समझाइये।

Explain the nature and importance of Religious tolerance.

सनातन धर्म में सर्वधर्म समभाव की अवधारणा

सर्वधर्म समभाव का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखना। सनातन धर्म (हिंदू धर्म) में यह अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • एक सत्य, अनेक मार्ग: ऋग्वेद में कहा गया है – "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं)। यह सभी धर्मों को सत्य तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग मानता है।
  • सभी धर्मों का सम्मान: गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – "जो भी भक्त मुझे किसी भी रूप में भजता है, मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।" यह सभी उपासना पद्धतियों को स्वीकार करता है।
  • अहिंसा और सहिष्णुता: सनातन धर्म अहिंसा परमो धर्मः (अहिंसा सर्वोच्च धर्म है) का पालन करता है और दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता सिखाता है।
  • स्वयं के धर्म का पालन: गीता में कहा गया है – "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भयावह है)। इसका अर्थ दूसरे धर्म का विरोध नहीं, बल्कि अपने धर्म के प्रति निष्ठा है।
  • उदाहरण: स्वामी विवेकानंद ने कहा – "मैं उस धर्म को नहीं मानता जो दूसरे धर्मों को सहन नहीं कर सकता।" महात्मा गांधी ने सर्वधर्म समभाव को अपने जीवन में उतारा।

सनातन धर्म में सर्वधर्म समभाव का अर्थ है कि सभी धर्म सत्य के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करते हैं और उनका सम्मान करना चाहिए।