RBSE Class 12th 2020 Philosophy-SS-85-2020 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2020
Subject Philosophy-SS-85-2020
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2020 2020 solved Previous Year Question Papers

दर्शनशास्र (PHILOSOPHY)

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2020

समय : 3.15 घण्टे    पूर्णांक : 80

परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :

GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
    Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily.
  2. सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
    All the questions are compulsory.
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
    Write the answer to each question in the given answer-book only.

No. of Questions — 30
No. of Printed Pages — 7

SS-85-Philosophy

खण्ड – A / Section – A

(प्रश्न क्रमांक 1 से 20 तक अति लघु उत्तरीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए 1 अंक निर्धारित है। शब्द सीमा 20 शब्द।)

(Question Nos. 1 to 20 are very short answer questions. Each question carries 1 mark. Word limit 20 words.)

खण्ड – B / Section – B

(प्रश्न क्रमांक 21 से 30 तक लघु उत्तरीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए 2 अंक निर्धारित हैं। शब्द सीमा 50 शब्द।)

(Question Nos. 21 to 30 are short answer questions. Each question carries 2 marks. Word limit 50 words.)

खण्ड – C / Section – C

(प्रश्न क्रमांक 31 से 40 तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न के लिए 5 अंक निर्धारित हैं। शब्द सीमा 100-150 शब्द।)

(Question Nos. 31 to 40 are long answer questions. Each question carries 5 marks. Word limit 100-150 words.)


निर्देश / Instructions

  1. सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। / All questions are compulsory.
  2. प्रश्नों के उत्तर निर्धारित शब्द सीमा में ही लिखें। / Answers should be written within the prescribed word limit.
  3. प्रश्न क्रमांक 1 से 20 तक के उत्तर 20 शब्दों में, प्रश्न क्रमांक 21 से 30 तक के उत्तर 50 शब्दों में तथा प्रश्न क्रमांक 31 से 40 तक के उत्तर 100-150 शब्दों में लिखें। / Write answers for Q. 1-20 in 20 words, Q. 21-30 in 50 words, and Q. 31-40 in 100-150 words.
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें। / For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity.
  5. प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपांतर में किसी प्रकार की त्रुटि/अंतर/विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को ही सही मानें। / If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
  6. प्रश्न क्रमांक 2 से 30 तक में आन्तरिक विकल्प हैं। / There are internal choices for Question Nos. 2 to 30.

अंक वितरण / Marks Distribution

खण्ड / Section प्रश्न संख्या / Q. Nos. अंक प्रति प्रश्न / Marks per question उत्तर की शब्द सीमा / Word limit of answer
A 1-20 1 20 शब्द / words
B 21-30 2 50 शब्द / words
C 31-40 5 100-150 शब्द / words

SS-85-Philosophy

SECTION - A

निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिए : (20 शब्दों में)

Define each of the following in 20 words.

  1. प्रारब्ध कर्म (Prarbadha Karma)

    प्रारब्ध कर्म वह कर्म है जो वर्तमान जीवन में फल देने के लिए आरंभ हो चुका है और जिसे भोगना अनिवार्य है। यह संचित कर्म का वह भाग है जो वर्तमान जीवन को निर्धारित करता है।

  2. सतकार्यवाद (Satkaryavad)

    सतकार्यवाद के अनुसार कार्य अपने कारण में पहले से ही विद्यमान रहता है। कार्य केवल अप्रकट से प्रकट होता है, नया सृजन नहीं होता। यह सांख्य दर्शन का सिद्धांत है।

  3. जड़वाद (Materialism)

    जड़वाद वह दार्शनिक मत है जो केवल जड़ पदार्थ को ही सत्य मानता है। इसके अनुसार चेतना, आत्मा या ईश्वर जैसी कोई अजड़ वस्तु नहीं है। सब कुछ पदार्थ से ही उत्पन्न होता है।

  4. प्रमाण (Pramana)

    प्रमाण वह साधन या मापदंड है जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जाता है। भारतीय दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आदि प्रमाण माने गए हैं। यह ज्ञान की सत्यता का निर्धारक है।

  5. अहिंसा (Ahimsa)

    अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से कष्ट न देना। यह जैन, बौद्ध और हिंदू धर्मों का मूल सिद्धांत है। महात्मा गांधी ने इसे आंदोलन का हथियार बनाया।

  6. धर्म-दर्शन (Philosophy of Religion)

    धर्म-दर्शन धर्म के मूलभूत प्रश्नों जैसे ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, धार्मिक अनुभव आदि का दार्शनिक विवेचन करता है। यह धर्म के तर्कसंगत और आलोचनात्मक अध्ययन का क्षेत्र है।

  7. जरथुस्र (Jarthustra)

    जरथुस्र (जोरोस्टर) प्राचीन ईरान के एक धर्म-सुधारक और पैगंबर थे। उन्होंने पारसी धर्म की स्थापना की और अहुरा मज़्दा को एकमात्र ईश्वर माना। उनकी शिक्षाओं में सत्य और अच्छाई पर बल है।

  8. ज़कात (Jhakat)

    ज़कात इस्लाम का एक अनिवार्य कर्तव्य है जिसमें मुसलमान अपनी संपत्ति का एक निश्चित भाग (2.5%) गरीबों और जरूरतमंदों को दान करता है। यह आर्थिक समानता और सामाजिक कल्याण का साधन है।

खण्ड-ब / SECTION — B

निम्नलिखित में से प्रत्येक को 50 शब्दों में परिभाषित कीजिए |

Define each of the following in 50 words.

  1. ईश्वरवाद एवं अनीश्वरवाद के बीच अन्तर स्पष्ट करें ।
    Explain the difference between Atheism and Theism.

    ईश्वरवाद (Theism) एक ऐसा विश्वास है जो एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है। यह ईश्वर को जगत का नियंता और नैतिकता का स्रोत मानता है।

    अनीश्वरवाद (Atheism) किसी भी प्रकार के ईश्वर या दैवीय शक्ति के अस्तित्व को नकारता है। यह ब्रह्मांड और जीवन की व्याख्या प्राकृतिक नियमों और वैज्ञानिक कारणों से करता है, न कि किसी अलौकिक सत्ता से।

  2. उपनिषदों के सन्दर्भ में “जीवात्मा' के स्वरूप को समझाइये |
    Explain the nature of “Jivatma” in context of Upnishada.

    उपनिषदों के अनुसार, जीवात्मा (Jivatma) व्यक्तिगत चेतना या आत्मा है जो प्रत्येक जीव में निवास करती है। यह शाश्वत, अजन्मा और अविनाशी है। जीवात्मा परमात्मा (ब्रह्म) का ही एक अंश है, लेकिन अज्ञान (अविद्या) के कारण वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर, मन और बुद्धि से तादात्म्य स्थापित कर लेती है। इसका लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, जो ब्रह्म के साथ एकत्व की अनुभूति है।

  3. जैन-दर्शन के अनुसार “पंच महात्रत सिद्धान्त' की विवेचना कीजिए |
    Describe the theory of ‘Punch Mahavratas’ according to Jain Philosophy.

    जैन दर्शन में पंच महाव्रत (Five Great Vows) साधु-साध्वियों के लिए अनिवार्य आचार संहिता है। ये हैं:

    1. अहिंसा (Non-violence): किसी भी जीव को मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से कष्ट न देना।
    2. सत्य (Truthfulness): हमेशा सत्य बोलना और मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करना।
    3. अस्तेय (Non-stealing): बिना दिए किसी वस्तु को ग्रहण न करना।
    4. ब्रह्मचर्य (Celibacy): सभी प्रकार की कामुक वासनाओं और इंद्रिय सुखों का त्याग।
    5. अपरिग्रह (Non-attachment): धन, संपत्ति और वस्तुओं के प्रति आसक्ति और संग्रह का त्याग।
  4. अद्वैत-वेदान्त के सन्दर्भ में 'माया-सिद्धान्तः को समझाइये |
    Explain the ‘doctrine of maya’ in context of Advait Vedanta.

    अद्वैत वेदांत के अनुसार, माया (Maya) वह शक्ति है जो ब्रह्म (एकमात्र सत्य) पर आवरण डालकर इस बहुरूपी जगत् के भ्रम को उत्पन्न करती है। माया न तो पूर्णतः सत्य है और न ही असत्य; यह अनिर्वचनीय है। यह ब्रह्म को जीव और जगत् के रूप में प्रकट करती है। माया के कारण ही व्यक्ति को द्वैत (दो) का अनुभव होता है, जबकि वास्तविकता में केवल एक अद्वैत ब्रह्म ही सत्य है। ज्ञान प्राप्त करने पर माया का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

  5. बुद्धिवाद एवं अनुभववाद में अन्तर लिखिए |
    Write the difference between rationalism and empirism.

    बुद्धिवाद (Rationalism) ज्ञान का प्रमुख स्रोत तर्क और बुद्धि को मानता है। इसके अनुसार, कुछ सत्य (जैसे गणितीय सिद्धांत) जन्मजात होते हैं और अनुभव से स्वतंत्र होते हैं।

    अनुभववाद (Empiricism) ज्ञान का एकमात्र स्रोत इंद्रिय अनुभव को मानता है। यह कहता है कि मन जन्म के समय कोरी स्लेट (Tabula Rasa) होता है और सारा ज्ञान अनुभवों से प्राप्त होता है।

  6. सैक्यूलरिज़्म (इहहलौकिकवाद) से आप क्‍या समझते हैं ?
    What do you mean by Secularism ?

    सैक्यूलरिज़्म (Secularism) एक ऐसा सिद्धांत है जो राज्य और धर्म को अलग-अलग रखता है। इसका अर्थ है कि राज्य किसी भी धर्म को आधिकारिक या विशेष दर्जा नहीं देता और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखता है। यह नागरिकों को अपनी पसंद के किसी भी धर्म को मानने या न मानने की स्वतंत्रता देता है। इसका उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित करना है।

  7. बौद्ध-धर्म के अनुसार “पुनर्जन्म के सिद्धान्त” की व्याख्या कीजिए |
    Explain the “doctrine of rebirth” according to Buddhism.

    बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म (Rebirth) का सिद्धांत कर्म और प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति) पर आधारित है। यह किसी स्थायी आत्मा (आत्मन) के स्थानांतरण को नहीं मानता, बल्कि यह कहता है कि मृत्यु के बाद, व्यक्ति के कर्मों के अनुसार एक नई चेतना-धारा (विज्ञान-स्रोत) उत्पन्न होती है जो एक नए शरीर में जन्म लेती है। यह एक मोमबत्ती की लौ से दूसरी मोमबत्ती जलाने जैसा है, जहाँ लौ एक नहीं है लेकिन कारण-कार्य संबंध बना रहता है।

  8. इस्लाम एवं ईसाई- धर्म के बीच क्या समानता है ?
    What is the similarity between Islam and Christianity ?

    इस्लाम और ईसाई धर्म में कई महत्वपूर्ण समानताएँ हैं। दोनों एकेश्वरवादी (Monotheistic) धर्म हैं, जो एक ही ईश्वर (अल्लाह/गॉड) में विश्वास करते हैं। दोनों ही अब्राहम (इब्राहीम) को अपना पूर्वज मानते हैं और पवित्र ग्रंथों (बाइबिल और कुरान) में कई समान पैगंबरों (जैसे मूसा, यीशु) का उल्लेख है। दोनों धर्म नैतिकता, प्रार्थना, दान और परलोक (स्वर्ग-नरक) में विश्वास पर जोर देते हैं।

  9. सिख धर्म के अनुसार “मनुष्य सम्बन्धी विचार” को समझाइये |
    Explain “the concept of man” according to Sikhism.

    सिख धर्म के अनुसार, मनुष्य ईश्वर (वाहेगुरु) की सर्वोच्च रचना है। मनुष्य में एक दिव्य चिंगारी (आत्मा) निवास करती है जो परमात्मा का अंश है। मनुष्य का जीवन ईश्वर से मिलन (मुक्ति) प्राप्त करने का अवसर है, जो गुरु की कृपा, नाम सिमरन (ध्यान), सेवा और सदाचार से संभव है। मनुष्य को संसार में रहते हुए भी विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से मुक्त होकर ईश्वरीय गुणों को धारण करना चाहिए।

  10. इस्लाम धर्म के पाँच स्तम्भों के बारे में संक्षेप में लिखिए |
    Write in short the five pillars of Islamic religion.

    इस्लाम धर्म के पाँच स्तंभ (Five Pillars of Islam) मुसलमानों के लिए मूलभूत कर्तव्य हैं:

    1. शहादा (Shahada): विश्वास की घोषणा कि अल्लाह के अलावा कोई ईश्वर नहीं और मुहम्मद उसके पैगंबर हैं।
    2. सलात (Salat): दिन में पाँच बार नियत समय पर मक्का की ओर मुख करके प्रार्थना करना।
    3. ज़कात (Zakat): अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा (लगभग 2.5%) गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना।
    4. सौम (Sawm): रमज़ान के पवित्र महीने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखना।
    5. हज (Hajj): जीवन में कम से कम एक बार, यदि सामर्थ्य हो, तो मक्का की तीर्थयात्रा करना।

खण्ड-स / SECTION — C

निम्नलिखित में से प्रत्येक को 00-50 शब्दों में परिभाषित कीजिए |

Define each of the following in 00-50 words.

21. भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए |

अथवा / OR

चार्वाक दर्शन की जड़वादी नीति मीमांसा को समझाइये |

Describe the general features of Indian Philosophy.
OR
Explain the materialistic ethics of Charvak Philosophy.

उत्तर (भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएँ): भारतीय दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ हैं – (1) आध्यात्मिकता पर बल, (2) आत्मा और परमात्मा की अवधारणा, (3) पुनर्जन्म और कर्मवाद में विश्वास, (4) मोक्ष को परम लक्ष्य मानना, (5) विभिन्न दर्शनों का सह-अस्तित्व, (6) श्रुति और तर्क दोनों को महत्व देना, (7) आचार-विचार और साधना पद्धति पर जोर।

अथवा (चार्वाक दर्शन की जड़वादी नीति मीमांसा): चार्वाक दर्शन भौतिकवादी (जड़वादी) है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मान्य है। आत्मा शरीर का गुण है, मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता। सुख ही जीवन का परम लक्ष्य है, दुःख से बचना चाहिए। धर्म, ईश्वर, परलोक आदि को यह मिथ्या मानता है। इसकी नीति मीमांसा में भोगवाद और सुखवाद पर बल दिया गया है।

22. मांडूक्य उपनिषद् के अनुसार आत्मा की चार अवस्थाओं की विवेचना कीजिए |

अथवा / OR

भगवद्गीता के अनुसार 'कर्मयोग की अवधारणा' की विवेचना कीजिए |

Describe four stages of soul according to Mandukya Upanishada.
OR
Explain the doctrine of Karma Yoga according to Bhagawatgita.

उत्तर (मांडूक्य उपनिषद् के अनुसार आत्मा की चार अवस्थाएँ): मांडूक्य उपनिषद् के अनुसार आत्मा (ब्रह्म) की चार अवस्थाएँ हैं – (1) जाग्रत (वैश्वानर) – बाह्य जगत का ज्ञान, (2) स्वप्न (तैजस) – आंतरिक मानसिक अनुभव, (3) सुषुप्ति (प्राज्ञ) – गहरी निद्रा, जहाँ कोई इच्छा या स्वप्न नहीं, केवल आनंद, (4) तुरीय – चेतना की चौथी अवस्था, जो अद्वैत, अदृश्य, अग्राह्य, शांत, शिव है। यही परम ब्रह्म है।

अथवा (भगवद्गीता के अनुसार कर्मयोग): भगवद्गीता में कर्मयोग का अर्थ है – फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य का पालन करना। श्रीकृष्ण के अनुसार, "योगः कर्मसु कौशलम्" – कर्म में कुशलता ही योग है। मनुष्य को अपने स्वधर्म का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए। आसक्ति रहित कर्म ही बंधन से मुक्त करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

23. बौद्ध दर्शन के चार आर्य-सत्यों की विस्तार से व्याख्या कीजिए |

अथवा / OR

जैन-दर्शन के सन्दर्भ में "स्याद्वादी सिद्धान्त" की व्याख्या कीजिए |

Explain in detail four noble truth of Buddhism.
OR
Explain the ‘theory of syadvada’ in the context of Jain Philosophy.

उत्तर (बौद्ध दर्शन के चार आर्य-सत्य): बौद्ध दर्शन के चार आर्य-सत्य हैं – (1) दुःख सत्य – संसार में जन्म, जरा, मृत्यु, शोक, दुःख आदि सब दुःख हैं। (2) दुःख समुदय सत्य – दुःख का कारण तृष्णा (इच्छा) है। (3) दुःख निरोध सत्य – तृष्णा के निरोध से दुःख का निरोध संभव है, जिसे निर्वाण कहते हैं। (4) दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा सत्य – दुःख निरोध का मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है।

अथवा (जैन-दर्शन में स्याद्वाद सिद्धान्त): स्याद्वाद का अर्थ है "शायद" या "अनेकांत" – किसी वस्तु को एक ही दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अनेक पहलुओं से देखना। जैन दर्शन के अनुसार, प्रत्येक वस्तु में अनेक गुण होते हैं, इसलिए उसे सापेक्ष रूप में ही जाना जा सकता है। स्याद्वाद सात भंगों (नयों) में व्यक्त होता है, जैसे – स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादवक्तव्य आदि। यह सिद्धांत सत्य की सापेक्षता को स्वीकार करता है।

24. योग के अष्टांगिक मार्ग की विस्तार से व्याख्या कीजिए |

अथवा / OR

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार बन्धन एवं मोक्ष सम्बन्धी विचारों की विवेचना कीजिए |

Write in detail the eight fold means of Yoga.
OR
Describe the concept of Bondage and liberation according to Swami Vivekanand.

उत्तर (योग के अष्टांगिक मार्ग): पतंजलि योग दर्शन के अनुसार योग के आठ अंग हैं – (1) यम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। (2) नियम – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान। (3) आसन – स्थिर और सुखद शारीरिक मुद्राएँ। (4) प्राणायाम – श्वास पर नियंत्रण। (5) प्रत्याहार – इंद्रियों को विषयों से हटाना। (6) धारणा – मन को एक स्थान पर केंद्रित करना। (7) ध्यान – निरंतर चिंतन। (8) समाधि – आत्मा और परमात्मा का मिलन। यह मार्ग मोक्ष प्राप्ति का साधन है।

अथवा (स्वामी विवेकानन्द के अनुसार बन्धन और मोक्ष): स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, बन्धन का कारण अज्ञान और माया है। मनुष्य अपनी वास्तविक प्रकृति (आत्मा) को भूलकर शरीर और मन से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, यही बन्धन है। मोक्ष का अर्थ है – इस अज्ञान से मुक्त होकर आत्मा की वास्तविक प्रकृति (शुद्ध, बुद्ध, मुक्त) का अनुभव करना। मोक्ष के लिए ज्ञान, भक्ति, कर्म और राजयोग चार मार्ग हैं। मोक्ष में जीव ब्रह्म से एकाकार हो जाता है।

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25. सुकरातीय पद्धति को समझाइये | अथवा प्लेटो के अनुसार प्रत्ययों की विशेषताएँ बताइये |

Explain the Socratic method. OR Discuss the characteristics of ideas according to Plato.

सुकरातीय पद्धति (Socratic Method)

सुकरातीय पद्धति, जिसे 'एलेंक्टस' (elenchus) भी कहा जाता है, प्रश्नों और उत्तरों के माध्यम से सत्य की खोज करने की एक विधि है। इसमें सुकरात अपने संवादी से प्रश्न पूछते थे, जिससे वह अपने विचारों में विरोधाभास स्वयं देख सके और अंततः सत्य तक पहुँच सके। यह पद्धति मुख्यतः तीन चरणों में काम करती है:

  1. विडंबना (Irony): सुकरात स्वयं को अज्ञानी बताकर दूसरे से प्रश्न पूछते थे, जिससे सामने वाले का अहंकार टूटता था।
  2. माइयूटिक्स (Maieutics): यह 'प्रसव-कला' है, जिसमें सुकरात प्रश्नों के माध्यम से दूसरे के मन में छिपे सत्य को बाहर निकालते थे।
  3. निष्कर्ष (Conclusion): अंत में, एक स्पष्ट और सत्य परिभाषा या निष्कर्ष पर पहुँचा जाता था।

इस पद्धति का उद्देश्य नैतिक अवधारणाओं (जैसे न्याय, सत्य, धर्म) की स्पष्ट परिभाषा देना था।

प्लेटो के अनुसार प्रत्ययों की विशेषताएँ (Characteristics of Ideas according to Plato)

प्लेटो के अनुसार, प्रत्यय (Ideas) शाश्वत, अपरिवर्तनीय और सार्वभौमिक सत्य हैं। उनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • शाश्वतता (Eternal): प्रत्यय न तो उत्पन्न होते हैं और न ही नष्ट होते हैं। वे सदा एक समान रहते हैं।
  • अपरिवर्तनीयता (Unchangeable): प्रत्यय कभी बदलते नहीं हैं। भौतिक वस्तुएँ बदलती रहती हैं, लेकिन उनका प्रत्यय स्थिर रहता है।
  • सार्वभौमिकता (Universal): प्रत्यय सभी स्थानों और कालों में समान रूप से लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, 'सुंदरता' का प्रत्यय सभी सुंदर वस्तुओं में समान रूप से विद्यमान है।
  • अनुभवातीत (Transcendental): प्रत्यय भौतिक जगत से परे, एक अलग लोक (प्रत्ययों का लोक) में स्थित हैं।
  • आदर्श (Perfect): प्रत्यय अपने आप में पूर्ण और आदर्श हैं। भौतिक वस्तुएँ केवल इन प्रत्ययों की अपूर्ण प्रतिकृतियाँ (copies) हैं।
  • ज्ञान का विषय (Object of Knowledge): सच्चा ज्ञान केवल प्रत्ययों का ही हो सकता है, न कि भौतिक वस्तुओं का, क्योंकि भौतिक वस्तुएँ बदलती रहती हैं और केवल मत (opinion) का विषय हैं।

26. भारतीय परम्परा में धर्म का वर्गीकरण समझाइये | अथवा रिलिजन (पंथ) के अर्थ एवं स्वरूप को स्पष्ट करें |

Classification of the religion in Indian Philosophy. OR Clarify the meaning and nature of religion.

भारतीय परम्परा में धर्म का वर्गीकरण

भारतीय दर्शन में धर्म को मुख्यतः दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. आस्तिक दर्शन (Orthodox Schools): ये वे दर्शन हैं जो वेदों के प्रामाण्य को स्वीकार करते हैं। इनमें छह दर्शन शामिल हैं:
    • न्याय
    • वैशेषिक
    • सांख्य
    • योग
    • पूर्व मीमांसा
    • उत्तर मीमांसा (वेदांत)
  2. नास्तिक दर्शन (Heterodox Schools): ये वे दर्शन हैं जो वेदों के प्रामाण्य को नहीं मानते। इनमें तीन प्रमुख दर्शन शामिल हैं:
    • चार्वाक (भौतिकवादी)
    • जैन दर्शन
    • बौद्ध दर्शन

इसके अतिरिक्त, धर्म को 'सनातन धर्म' (हिन्दू धर्म) और 'पंथ' (जैन, बौद्ध, सिख आदि) के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है।

रिलिजन (पंथ) का अर्थ एवं स्वरूप

अर्थ: 'रिलिजन' (Religion) शब्द लैटिन भाषा के 'रेलिगेयर' (religare) से बना है, जिसका अर्थ है 'बाँधना' या 'जोड़ना'। यह मनुष्य को ईश्वर या परम सत्य से जोड़ता है। भारतीय परम्परा में इसे 'पंथ' कहा जाता है, जो एक विशिष्ट मार्ग या सिद्धांत को दर्शाता है।

स्वरूप: धर्म के स्वरूप की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विश्वास प्रणाली: यह ईश्वर, आत्मा, मोक्ष आदि में विश्वास पर आधारित है।
  • आचार संहिता: यह नैतिक नियमों और आचरण का एक समूह प्रस्तुत करता है।
  • अनुष्ठान: इसमें पूजा, प्रार्थना, यज्ञ आदि धार्मिक क्रियाएँ शामिल हैं।
  • सामुदायिक आयाम: यह व्यक्ति को एक समुदाय से जोड़ता है और सामाजिक एकता प्रदान करता है।
  • पारलौकिकता: यह इस लोक से परे किसी पवित्र या दिव्य शक्ति में विश्वास करता है।

27. हिन्दू धर्म की मुख्य विशेषताएँ बताइये | अथवा जैन दर्शन के सन्दर्भ में “कर्म सिद्धान्त” को समझाइये |

Discuss the main characteristics of Hindu religion. OR Explain ‘theory of karma’ in context of Jainism.

हिन्दू धर्म की मुख्य विशेषताएँ

हिन्दू धर्म की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सनातनता: यह विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है और इसे 'सनातन धर्म' (शाश्वत धर्म) कहा जाता है।
  • वेदों की प्रामाणिकता: वेदों को सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ माना जाता है।
  • ईश्वर में विश्वास: अधिकांश हिन्दू एक सर्वोच्च ईश्वर (ब्रह्म) में विश्वास करते हैं, जो निराकार और साकार दोनों रूपों में पूजा जाता है।
  • आत्मा और पुनर्जन्म: आत्मा (आत्मन्) अमर है और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमती रहती है।
  • कर्म सिद्धांत: प्रत्येक कर्म का फल मिलता है, जो अगले जन्म को निर्धारित करता है।
  • मोक्ष: जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) को जीवन का परम लक्ष्य माना जाता है।
  • अहिंसा: सभी जीवों के प्रति अहिंसा का भाव रखना एक महत्वपूर्ण गुण है।
  • सहिष्णुता: यह धर्म विभिन्न मतों और पूजा पद्धतियों के प्रति अत्यधिक सहिष्णु है।
  • गुरु-शिष्य परम्परा: ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु का महत्वपूर्ण स्थान है।

जैन दर्शन में कर्म सिद्धान्त

जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया गया है। इसके अनुसार:

  • कर्म एक सूक्ष्म पदार्थ है: जैन मत में कर्म कोई अमूर्त नियम नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म भौतिक पदार्थ (कर्म-पुद्गल) है, जो आत्मा से चिपक जाता है।
  • कर्म का आगमन: जब व्यक्ति कोई कार्य (मन, वचन, काया से) करता है, तो उसके अनुसार कर्म-पुद्गल आत्मा की ओर आकर्षित होते हैं और उससे चिपक जाते हैं। इसे 'आश्रव' कहते हैं।
  • कर्म का बंधन: ये कर्म-पुद्गल आत्मा से इस प्रकार चिपक जाते हैं कि आत्मा बंध जाती है। इसे 'बंध' कहते हैं।
  • कर्म के प्रकार: जैन दर्शन में कर्म को मुख्यतः 8 प्रकारों में बांटा गया है, जिनमें ज्ञानावरणीय (ज्ञान को ढकने वाला), दर्शनावरणीय (दर्शन को ढकने वाला), मोहनीय (मोह उत्पन्न करने वाला), और आयु (जीवनकाल निर्धारित करने वाला) प्रमुख हैं।
  • कर्म का फल: जब कर्म फल देने के लिए तैयार होता है, तो वह 'उदय' में आता है और व्यक्ति को सुख-दुख का अनुभव कराता है।
  • मोक्ष का मार्ग: कर्मों को नष्ट करने के लिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र (रत्नत्रय) का पालन करना आवश्यक है। जब सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं, तो आत्मा मुक्त (सिद्ध) हो जाती है।

28. ईसाई धर्म के ईश्वर सम्बन्धी मतों की विवेचना कीजिए | अथवा सूफीमत पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |

Explain Christian views related with god. OR Write short note on Suphism.

ईसाई धर्म के ईश्वर सम्बन्धी मत

ईसाई धर्म में ईश्वर के स्वरूप के बारे में निम्नलिखित प्रमुख मत हैं:

  • एकेश्वरवाद (Monotheism): ईसाई धर्म एकेश्वरवादी है, अर्थात वे एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं।
  • त्रित्व का सिद्धांत (Trinity): यह ईसाई धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट सिद्धांत है। इसके अनुसार, ईश्वर एक है, लेकिन वह तीन व्यक्तियों (persons) में विद्यमान है:
    1. पिता (Father): सृष्टिकर्ता और सर्वशक्तिमान ईश्वर।
    2. पुत्र (Son): यीशु मसीह, जो मानव रूप में अवतरित हुए और मानव जाति के उद्धार के लिए बलिदान हुए।
    3. पवित्र आत्मा (Holy Spirit): ईश्वर की शक्ति जो विश्वासियों में निवास करती है और उनका मार्गदर्शन करती है।
  • सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ: ईश्वर सर्वशक्तिमान (सब कुछ कर सकने वाला), सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) और

प्रश्न 29

गुरुनानक के जगत सम्बन्धी विचारों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

गुरुनानक देव के उपदेशों को संक्षेप में लिखिए।


Explain the Guru Nanak’s views on World.

OR

Write in brief the teaching of Guru Nanak Dev.

उत्तर / Answer

गुरुनानक के जगत सम्बन्धी विचार: गुरुनानक देव के अनुसार यह जगत सत्य, एक और निराकार परमात्मा की रचना है। वे जगत को माया से युक्त और अस्थायी मानते हैं, लेकिन इसे पूर्णतः मिथ्या नहीं कहते। उनके अनुसार जगत ईश्वर का निवास स्थान है और इसमें रहते हुए मनुष्य को सच्चाई, ईमानदारी और सेवा का जीवन जीना चाहिए। वे जगत को ईश्वर की लीला का क्षेत्र मानते हैं, जहाँ जीवात्मा कर्मों के अनुसार फल भोगती है।

गुरुनानक देव के उपदेश (संक्षेप में):

  • एक ईश्वर की उपासना (निराकार, सत्य, कर्ता)।
  • नाम सिमरन (ईश्वर के नाम का जप) द्वारा मोक्ष की प्राप्ति।
  • सत्संग और गुरु की शरण में रहना।
  • कर्म करना (किरत करो), वंड छको (बाँटकर खाओ) और नाम जपो।
  • जाति-पाँति, ऊँच-नीच और अंधविश्वासों का विरोध।
  • स्त्री-पुरुष समानता और सामाजिक न्याय पर बल।

Guru Nanak’s views on World: Guru Nanak considered the world as a creation of the One True God (Ik Onkar). He viewed the world as real but transient, filled with maya (illusion). It is a place where the soul reaps the fruits of its actions. He emphasized living truthfully, honestly, and with service (seva) while recognizing God’s presence in all creation.

Teachings of Guru Nanak Dev (in brief):

  • Worship of One Formless God.
  • Meditation on God’s Name (Naam Japna).
  • Honest living (Kirat Karo) and sharing with others (Vand Chakko).
  • Equality of all humans, rejection of caste and gender discrimination.
  • Importance of Guru (spiritual teacher) and holy company (Satsang).

प्रश्न 30

धार्मिक सहिष्णुता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

अथवा

बौद्ध धर्म के आष्टांगिक मार्ग की विवेचना कीजिए।


Write short note on religious tolerance.

OR

Describe the eight fold path of Buddhism.

उत्तर / Answer

धार्मिक सहिष्णुता पर टिप्पणी: धार्मिक सहिष्णुता का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सहनशीलता का भाव रखना। यह किसी एक धर्म को श्रेष्ठ मानकर दूसरों की आलोचना न करने का सिद्धांत है। भारतीय संस्कृति में धार्मिक सहिष्णुता का विशेष महत्व रहा है। गुरुनानक, महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद ने इस पर बल दिया। यह सामाजिक सद्भाव और शांति के लिए आवश्यक है।

बौद्ध धर्म का आष्टांगिक मार्ग: बुद्ध द्वारा प्रतिपादित यह मार्ग दुखों से मुक्ति (निर्वाण) का मार्ग है। इसके आठ अंग हैं:

  1. सम्यक दृष्टि – सही दृष्टिकोण (चार आर्य सत्यों को समझना)।
  2. सम्यक संकल्प – सही विचार (अहिंसा, त्याग, करुणा के विचार)।
  3. सम्यक वाणी – सही वचन (झूठ, गाली, फालतू बातों से बचना)।
  4. सम्यक कर्मांत – सही आचरण (हिंसा, चोरी, व्यभिचार से दूर रहना)।
  5. सम्यक आजीविका – सही जीविका (अनैतिक व्यवसायों से बचना)।
  6. सम्यक व्यायाम – सही प्रयास (बुरे विचारों को रोकना, अच्छे विचारों को बढ़ाना)।
  7. सम्यक स्मृति – सही स्मृति (शरीर, मन, भावनाओं के प्रति जागरूकता)।
  8. सम्यक समाधि – सही ध्यान (एकाग्रता और ध्यान के माध्यम से मन की शुद्धि)।

Note on Religious Tolerance: Religious tolerance means respecting all religions and allowing others to practice their faith without discrimination. It is a key value in Indian culture, promoted by saints like Guru Nanak and leaders like Mahatma Gandhi. It fosters peace, harmony, and mutual understanding in a diverse society.

Eightfold Path of Buddhism: The Noble Eightfold Path is the fourth Noble Truth in Buddhism, leading to the cessation of suffering (Nirvana). The eight practices are: Right View, Right Intention, Right Speech, Right Action, Right Livelihood, Right Effort, Right Mindfulness, and Right Concentration. These are grouped into three categories: Wisdom (1-2), Ethical Conduct (3-5), and Mental Discipline (6-8).

— SS-85-Philosophy —